लोकतंत्र नाम के जानवर के पेट में भोकतंत्र, लूटतंत्र, रोगतंत्र, जोकतंत्र और शोकतंत्र समाया है

बिम्मीशर्मा,काठमांडू , २६ अप्रिल | हाय रे लोकतंत्र !
नेपाल में लोकतंत्र नाम का एक अलौकिक जानवर सिंह दरवार के हरे, भरे खेत में पिछले आठ साल से चर रहा है । अब तो यह अलौकिक जानवर माशाल्लाह बहुत ही शानदार और ताकतवर हो गया है । ईस के सिगं भी निकलआए हैं । ईस लोकतंत्र नाम के जानवर के पेट में भोकतंत्र, लूटतंत्र, रोगतंत्र, जोकतंत्र और शोकतंत्र भी समायाहुआ है । ईसी लिए यह जानवर ईतना अलौकिक दिखता है ।

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देश में लोकतंत्र का आना मतलब जंगली राजा का आना है । पहले एक राजा थे, वह और उन के चाटूकारों से निजात दिलाने के लिए लोकतंत्र को लाया गया था । पर अबतो पूरा देश ही छोटे, छोटे अनेक राजाऔर चाटूकारों से भर गया है । अबतो पता ही नहीं चलता कि लोकतंत्र के अंदर यह हैं या ईन के अंदर लोकतंत्र है । क्यों कि यह छोटे राजा लोकतंत्र की उपज हैं और ईन्होने लोकतंत्र को खा, पी कर हजम कर लिया है । अब ईन के पेट का शल्यक्रिया करने से भी यह लोकतंत्र नहीं मिलेगा । क्यों कि यह लोकतंत्र अब नेताओं के भ्रष्टाचार के सिलबट्टे पर पिसने के बाद चटनी बन कर निरकुशंतंत्र का चटखारेदार और तिखा अचार के रुप में अब हम सब के सामने है ।
प्राचीन यूनानी दंत कथा के नायक“सिसिफस” हर दिन पहाड के निचे से पत्थर ढो कर शीखर पर पहुंचाते थे । पर वह पत्थर लुढक कर निचे आ जाता था । वह फिर से उस पत्थर को निचे से उठा कर उपर ले जाते थे । वह पत्थर फिर लुढक बहुत निचे जमिन में आजाता था । हमारे देश का लोकतंत्र भी सिसिफस के उसी पत्थर की तरह है । जो अपने जगह पर टिकता ही नहीं । पिछले आठ साल से उस पत्थर को सरमाथा के शीर कि तरह टिकाने का हर संभव रयास किया जा रहा है । पर बेचारा यह टिकता ही नहीं या ईसको ईस कीज गह पर स्थायि रुप से टिकने नहीं दियाजाता ।
जब से नेता के रुप मे बाहुवलीऔर ईन के चट्टे बट्टे ने देश में शासन शुरु किया है । तब से यह लोकतंत्र भयभित शोकग्रस्त है । ईस लोकतंत्रना के अलौलिक जानवर को ईतना बार लुटा और ठोकागया है कि यह अब अपना आकार, प्रकार ही भूल चूका है । बार, बार रेप किए गएऔरत की तरह ईस लोकतंत्र काअस्तित्व शारीरिक और मानसिक रुप से लहुलुहान है । बीच सडक में सब हात बांधे ईस को तडपते और मरते देख देख रहे हैं । पर बचाने और जिलाने का प्रयत्न कोई नहीं कर रहा ।
देश में एक साल पहले भूकंपऔर उस की तबाही का मंजर हम सभी ने देखा और भोगा । पीडित अभी भी अपने लिए रात काट्ने के लिए आशियाना खोज रहे हैं । पर सरकार की तरफ से ईन के लिएआशियाना तो दूर उल्टे बाबाजी का ठूल्लू दिखाया जा रहा है । अभी भूकंप की पहली बरसी पर कल ही नेकपा एमाले के नेता शंकर पोखरेल ने कहाकि“जिस के पास सामथर््य है वह भूकंप से धराशायी हुएअपने घर को खुद बनाए तो भी कुछ नहीं बिगडेगा । जो कमजोर है और उन के अपना घर फिर से बनाने का सामथर््य नहीं हैं उनको ईस से सहयोग ही होगा । जरुरी नहीं कि सब कुछ सरकार ही करे ।” तो देखा आप ने पिएम ओली के नंबर एक चमचे का कथन । उन लाचार भूकंप पीडितों को पोखरेल के बयान के बाद तो जिने का कोई अधिकार ही नहीं है ।
जब ऐसा दिमाग में छेद वाले भगौने सियासत में है तो उस देश में कहां पर और किना होगा ? यह सोचने की बात है । पोखरेल को लगता है कि भूकंप पीडितों के सहयोग के लिएजो पैसा सरकार देगी या घर बनाएगी वह ईन के पकेट या नेकपा एमाले के आर्थिक कोष से देना पडेगा । नहीं तो ऐसी संवेदनशील घडी पर ईतनी निर्लज्जता भरी बात कोई अच्छा आदमी नहीं कर सकता । पोखरेल ने बता दिया किउनकी पार्टी नेकपा एमाले और खुद उनका सोच कितना गिरा हुआ है । और लोकतंत्र उनकी नजर मे बस लुटखसोट मचाने वालातंत्र है ।
ईसी लोकतंत्र में एक संविधान बनाने के लिए दो बार संविधान सभा का निर्वाचन हुआ   । तब भी सभी की भावनाओं और अधिकारों को समेट्ने वाला संविधान नहीं बन सका । ईसी लोकतंत्र मे अपने बेटे के हत्यारे की गिरफ्तारी की माग करते हुए नन्द प्रसादअधिकारी चल बसे, और उनका शव अभी भी अस्पताल के फ्रिज मे जमा पडा है । ईसी लोकतंत्र के सर्वोच्च अदालत ने बाल कृष्ण ढुगेँल को पकड्ने का आदेश दिया था । पर बाल कृष्ण आजाद पंक्षी की तरह बाहर घूम रहा है ।
ईसी लोकतंत्र में आए हुए भूकंप में देश के लाखों लोगों का ठौर ठिकाना छिन लिया । पर सरकार ईन के घाउ में मरहम लगा कर मातम मनाना तो दूर की बात बेलुन उडा कर ईन पीडितों के दुख पर अट्टहास कर रही है । ईसी लोकतंत्र मे तथाकथित नाकाबंदी के नाम पर अपने ही देश कीजनता पर यहां की सरकार ने महंगाई और कालाबजारी का नाया तोहफा दिया । ईसी लोकतंत्र मे मधेश में अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए जो आंदोलन हुआ था । उस मे सरकार ने ताक, ताक कर ईनको विशेष रुप से सरकारी गोली का उपहार दिया । जिस के कारण आंदोलनकारी ईसान से लाश में तब्दिल हो गए । तो देखा आप ने ईस लोकतंत्र की हम नागरिकों पर कितना कृपा दृष्टि रही है ?
इह लोकतंत्र नाम का अजिब सा जानवर जो हम देशवासीयों के मत्थे मढा गया था । उस में हमारे सनातनधर्म को भी बाबाजी का ठूल्लू कहते हुए हटाया गयाऔर जबरदस्ति धर्म निरपेक्षता का नकाब देश को पहनाया गया । अब देश ईस के अंदर घूट रहा है और चिल्ला रहा है । ईसी लोकतंत्र मे अख्तियार के प्रमुख लोकमान कार्की देश के साथ जोक करते हुए सभी को शोक मग्न बना देते । जब, जब देश मे प्रतिकूल परिस्थिति सवार हो जाती है तब तब जहाज के पंक्षी की तरह लोकतंत्र उड कर दूर चला जाता है और उस की जगह पर निरकुंशता का गिद्ध देश और जनता को नोचने लगता है ।

व्यग्ंय

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