लोकतंत्र से भीड़तन्त्र में परिवर्तित होता नेपाल : किशोर नेपाल

किशोर नेपाल

किशोर नेपाल

राजनीति के खिलाड़ियों ने नेपाल को एक खेलभूमि बना दिया है । खेल के मैदान के भी कुछ नियम होते हैं । पर राजनीति के खेल का यह मैदान ऐसे रूप में परिवर्तित हो गया है जहाँ सभी अपनी–अपनी मर्जी से खेल रहे हैं । उन्हें ना तो खेल के नियमों की परवाह है और ना ही उन दर्शकों की जो उन्हें देखने के लिए बड़े शौक से नजरें बिछाए होते हैं । यह वह धरती है जहाँ जनता बड़ी उम्मीद के साथ परिवर्तन के लिये आन्दोलन में हिस्सा लेते हैं । अपनी जान की परवाह न करते हुए लड़ते हैं, मरते हैं, इस उम्मीद पर कि कल का सबेरा नेपाल और नेपालवासियों के लिए एक नई रोशनी लेकर आएगा । पर उस उम्मीद को बिखरते समय नहीं लगता । आलम तो यह हो गया है कि जनता अब इस स्थिति में है कि किस पर यकीन करे । सभी को आजमा कर उन्होंने देख लिया है पर नतीजा के नाम पर अभी भी उनके हाथ खाली हैं । आखिर सात सालों से वो इंतजार ही तो कर रहे हैं ।
राजनीति के लोग, चाहे हिमाल से हों या मधेश से, पहाड़ से हों या तराई से, अपनी निहित स्वार्थ में ही लगे रहते हैं । उन्हें परवाह ही नहीं है कि जनता ने उनसे क्या अपेक्षाएँ की थीं । वो जनता को क्या दे रहे हैं । उनकी सुषुप्त आकांक्षाएँ इतनी ज्यादा हैं कि उसको पूरी करने में ही उनका अधिकांश समय चला जाता है । किन्तु ये आकांक्षाएँ इतनी अधिक हैं कि लगता नहीं कि वो कभी पूरी होंगी और इनका ध्यान बेचारी जनता की ओर जाएगा । ऐसा नहीं लगता कि इसके अलावा उनका कोई वृहत्त राजनीतिक लक्ष्य और सामाजिक ध्येय भी है । विकासशील देशों में ऐसा होता है, किन्तु नेपाल में राजनीति के तमाम आयाम व्यक्तिगत आकांक्षाओं का पोषण, सुख–सुविधाओें की जुगाड़ और शक्ति का उन्मादपूर्ण दुष्प्रयोग तक ही सीमित रहा है । नेपाली राजनीति में विधि के शासन और लोकतान्त्रिक आचरण की बात तो सभी करते हैं । जो इस तरह की बातें करते हंै, उनका खुद का आचरण एक सवाल बन कर रह जाता है । कथनी और करनी में जो अन्तर नेपाली राजनीति में दिखाई देता है, वह और कहीं नहीं दिखाई देता । नेपाली राजनीतिक समाज में लोकतान्त्रिक अभ्यास अभी–अभी शुरु हुआ है । इसे परिपक्व होने में कुछ समय तो लगेगा ही । पर सवाल यह है कि यह समय इतना लम्बा न हो जाय कि जनता की धैर्य की सीमा ही टूट जाय । अब तो जनता सिर्फ परिणाम देखना चाहती है, आश्वासन नहीं ।
अब लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपाल की संविधान निर्माण के प्रयत्नों को ही देखें । विगत सात सालाें से नेतागण यह दावा करते आये हैं कि संविधान निर्माण की सूत्रों की खोज में ही लगे हुए हैं । आखिर ये सूत्र है क्या जो उन्हें मिल ही नहीं रहा ? विषय को सम्बोधित करना और सबको संतुष्ट करना असम्भव हो सकता है पर यह नामुमकिन नहीं है । आश्चर्य तो यह है कि देश के पास अंतरिम संविधान है, जिसमें कुछ मुद्दों को सम्बोधित करना है और उसे शामिल कर के संविधान के साथ लगा हुआ अन्तरिम शब्द हटा देना है, तब यह काम इतना दुरूह हो रहा है । अगर संविधान नाम की कोई चीज ही नहीं होती और पूर्णरूपेण इसका निर्माण करना होता तब ये नेतागण क्या करते ? आज नेपाली जन–मानस अधर में लटका हुआ है । राजनीति के लोग वहुत गर्र्व के साथ बार–बार इस बात को दुहराते रहते हैं कि वो सहमति के प्रयास में लगे हुए हैं । माओवादियों की दशक लम्वी हिंसात्मक संघर्ष, जब राजनीतिक दलों के साथ मिलकर संयुक्त आन्दोलन में परिणत हुआ तो आन्दोलन का सफल परिणाम आया । मधेश आन्दोलन ने उस सफल आन्दोलन को पूर्णता प्रदान किया । देश में उसके वाद जो चुनाव हुये और संविधान सभा का संगठन हुआ तो नतीजा और भी अच्छा आया । शताब्दियों से जो राजतन्त्र नेपालियों के भाग्य में कुण्डली मारकर वैठा था वह ढह गया । परन्तु, राजनीतिक दल के नेतागण इस उपलव्धि को संस्थागत नहीं कर पाये । पहली संविधान सभा से संविधान निर्माण में वह चूक गये और देखते–देखते इनकी राजनीतिक साख शून्य में गिरी । इनके जीवन भर का सारा संघर्ष सत्ता की संकरी गलियों में कहीं खो गई और आज तो यह बिल्कुल निष्पन्द ही हो गयी है । राजनीति के जिस उच्च शिखर पर इन्हें देखा जा रहा था आज वहाँ से बहुत नीचे ये आ चुके हैं । आज ना तो इनपर विश्वास करने का कोई कारण दिख रहा है और ना ही साथ चलने का आधार फिर भी जनता बेचारी क्या करे कोई तो मंच चाहिए जिसके माध्यम से उनकी इच्छाएँ सरकार के सामने आए और शायद यही वजह है कि लोगों की भीड़ इनके साथ है ओर ये एक बार फिर भीड़ जुटाने में सफल हो रहे हैं ।
संविधान सभा के लिये दूसरा चुनाव नेताओं के लिये एक चुनौती थी तो जनता के लिये एक कष्टकर विडम्वना । पर इससे इन्हें क्या, ना तो आर्थिक भार की इन्हें चिन्ता है और ना ही जनता के मानसिक तनाव की । अगर नेतागण को इन सबकी परवाह होती तो आज वो गम्भीरता और तत्परता के साथ निर्माण कार्य में लगे होते । किन्तु आज ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा, सारी बाते जानते और समझते हुए भी नेतागण संविधान निर्माण में अपने आपको केन्द्रित नहीं कर पा रहे हंै । सहमति के नाम पर जो ड्रामाबाजी अभी चल रही है इससे यह स्पष्ट हो चुका है कि दल के नेता संविधान को लोकतन्त्र के आधार स्तम्भ के रूप में नहीं, अपने–अपने दल के विधान के अनुकूल लिखना चाहते हैं । संघीय संरचना, शासकीय स्वरूप और पहचान के प्रश्न पर अभी सरकार और प्रतिपक्ष के ओर से जो विवाद निकाला जा रहा है वह निरर्थक है । सत्तापक्ष को समझ लेना चाहिये कि किसी भी देश का संविधान, देशवासियों के आपसी सहमति का एक दस्तावेज होता है । एक ऐसा जीवन्त दस्तावेज, जो गतिशील हो और आगामी समाज की आवश्यकताओं को संवोधित करने में भी कारगर सावित हो सके । जहाँ देश के सभी क्षेत्र को सम्बोधित किया गया हो । सबकी मानसिकता का ख्याल किया गया हो । कोई क्षेत्र उपेक्षा का शिकार ना हो । आज बार बार प्रक्रिया शब्द सामने आ रहा है, किन्तु संविधान निर्माण में प्रक्रिया जैसी कोई बात नहीं होती है । यह सत्तापक्ष को समझना होगा । प्रतिपक्ष को भी चाहिये कि वह अपने व्यवहार को ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय और जिम्मेवार वनायें । तथा सहयोग की राजनीति करे । सृष्टि का नियम है कि उग्रता विध्वंश लाती है और संयम निर्माण का आधार बनती है । इसलिए आगामी परिणाम को सोचकर ही कोई निर्णय लेना चाहिए ।
लोकतान्त्रिक गणतन्त्र वृहत्तर नेपाली समाज के लिये नूतन अभ्यास है । इस अभ्यास को तभी आगे बढ़ाया जा सकता है, जव नेपाली नेतागण सहमति के समान बिन्दुओें को खोजें । जिस दक्षता और कौशल के साथ नेपाल के राजनीतिक नेताओं ने आन्दोलन के समय देश की नब्ज का पहचान किया था और एकता के साथ आगे बढ़े थे आज भी उसी बात की आवश्यकता है । किन्तु आज ये राजनीति की मूलधार तैयार करने में उतने ही नाकाविल सावित हो रहे हैं । राजनीति में उत्सर्ग समय का एक पक्ष होता है और व्यवस्थापन दूसरा पक्ष । लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्थापन में विफलता का अर्थ होता है लोकतन्त्र में विचलन । अभी जो कुछ हो रहा है उसे देखकर लगता है कि नेतागण लोकतन्त्र की विचलन और भीड़तन्त्र के निर्माण की ओर लगे हुए हैं ।

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