लोकतन्त्र में राजवंश

अरुण कुमार “पानीबाबा”:जिसमें भारत है, एक अजूबा लोकतंत्र है। इस तंत्र में ऐसा अनेर है, जो अकल्पनीय है। हम रस्सी चढÞे नट के आकाश में विलीन होने का किस्सा नहीं कह रहे। गौरतलब है कि इंडिया, केवल ‘विशालतम लोकतंत्र’ नहीं, पिछडÞी दुनिया का ‘सफलतम’ प्रजातंत्रवादी ‘गणतंत्र’ है९ हालांकि, शासनतंत्र से न्यूनतम नैतिकता -राजधर्म) और लोक-मर्यादा के तत्त्व निर्वासित हैं।
विडंबना है कि प्रजातंत्र के संस्था सिद्धांत- प्रभुसत्ता का संवैधानिक बंटवारास सुदृढÞ स्वतंत्र न्यायपालिकास नियमानुसार प्रशिक्षित कौशल निष्णात प्रशासनिक कार्यकारिणी और स्पर्धा आधारित स्वतंत्र सूचना-संवाद माध्यम आदि अनुपालित हैं, तो भी निकृष्ट, भ्रष्ट राजशाही पनप गई है। शासन का नेतृत्व चुनने के लिए नियमित चुनावों में लोक-भागीदारी बेमिसाल है। पर मतदान होते ही लोक-भागीदारी सिमट जाती है। निरंकुश शासन प्रशासन में विधि-विधान, नियम-कानून आदि की न्यूनतम मर्यादा भी प्रचलित नहीं।
अति उत्साहित लोक-भागीदारी का विपरीत तथ्य यह है कि चुनाव व्यय सीमा से सौ गुना तो हो चुका है, आगामी लोकसभा में यह वर्तमान का दुगना-तिगुना हो जाएगा। इस प्रदूषण का विश्लेषण सरल नहीं। संसदीय लोकतंत्र में खुली लूट का साम्राज्य है, जिसका नेतृत्व पिछले नौ बरस से एक मनोनीत ‘हुकुमबरदार’ के हाथ है। देसी मुहावरा अटपटा लगे तो मनोनीत प्रधानमंत्री को ‘हर ऐंड हिज मैजस्टीज वायसराय’ कह सकते हैं।
संसद का ऐसा असंवैधानिक नियंत्रण, नेतृत्व केवल हास्यास्पद नहीं, घोर अनीति और अनैतिकता की परिस्थिति है। इस प्रयोग से भी विस्मयकारी तथ्य यह है कि विशालतम लोकतंत्र में एक भी राजनीतिक दल नहीं, राजनेता या अपवाद स्वरूप समाजशास्त्री नहीं, जिसने मई २००४ से आज तक इस अनीति, सामान्य रीति की अवमानना के विधायी तत्त्वों के विषय पर विमर्श किया हो !
नैतिकतावादी नेता और विचारक दो-तीन बरस से भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन चला रहे हैं- उस मंच से भी नकली राजवंश द्वारा मनोनीत प्रधानमंत्री के नेतृत्व में रिकार्ड-तोडÞ लूट, भ्रष्टाचार और अराजकता के विषय में कोई समीक्षा नहीं सुनी गई।
यह अनुमान सरल नहीं कि विशिष्ट वर्ग कितना निखट्टू, परजीवी अतः अनैतिक है। इस अग्रणी वर्ग को सूचना ही नहीं है कि अपने देश में प्रचलित प्रशासनिक भ्रष्टाचार और काली अर्थव्यवस्था की तुलना में बहुत बडÞी लूट का सिलसिला विदेशी मुद्रा की विनिमय दर में अवांछित हेरफेर से चल रहा है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम -यूएनडीपी) के पैमाने से अमेरिकी डाँलर का असल मूल्य पंद्रह रूपए से अधिक नहीं। तब डाँलर की अदला-बदली साठ-बासठ रूपए की दर से क्यों हो रही है – इस अंधेरगर्दी का स्रोत राजवंश है।
आटा, दाल, डबलरोटी, नमक, मक्खन आदि के औसत मूल्य से तुलना करें तो डाँलर का दाम दस-बारह रूपए ही बैठता है। इस लूट का अर्थ हैः कुछ खरीदो तो लागत से चार गुना दाम दो, बेचो तो एक की कीमत के बदले चार गुना सामान दो। तर्ुरा यह कि देश को लुटवाएंगे नहीं तो विकास रुक जाएगा१ सरल गणित है, गुलामी के दो सौ बरस में जितनी लूट हर्ुइ थी दलाल नेतृत्व ने पिछले पैंसठ बरस में उससे बीस गुना लुटवा दिया।
इस अनूठी लूट का सिलसिला आजादी के बाद शुरू हुआ। जवाहरलाल नेहरू की सरकार खाद्यान्न आपर्ूर्ति में विफल हो गई- तब दो ही देश आस्ट्रेलिया और अमेरिका ऐसे थे, जिनसे अन्न खरीदा या उधार मांग जा सकता था। आस्ट्रेलिया से आयात शुरू हुआ तो पता चला कि मात्रा आवश्यकता से बहुत कम है और गुणवत्ता पशुआहार तक के लिए अनुपयुक्त।
अमेरिका की तरफ देखा तो आदेश मिलाः व्यवहार के लिए नेहरू खुद वाशिंगटन पधारें। लंदन के मशहूर दर्जी ‘सेवाइल राँ’ के सिले थ्री पीस सूट, फैल्ट कैप, हाथ में छडÞी लेकर नेहरू वहां गए, राष्ट्रपति ट्रुमैन ने वही स्वागत किया जो एक नव-धनाढ्य घर आए दर्रि्र नातेदार का करता है। वैसे भी नेहरू उनके अपने ही थे। ‘अन्न सहयोग’ की विस्तृत शर्तें, डाँलर की विनिमय दर सहित तय कर दीं। पहले करार में एक दाना अन्न नहीं दिया। खाली हाथ विदा भी नहीं किया।
नेहरू की वापसी से पहले ही कोकाकोला से लदे जहाज और सोडा फैक्ट्री रवाना कर दी। नेहरू से दो करार और करवाए- एक, रेलवे में गति और सुरक्षा के लिए ‘इलेक्ट्राँनिक सिगनलिंग’ के विकास में तकनीकी सहयोग, दूसरा, ‘फोर्ड फाउंडेशन’ की बतौर विकास सलाहकार नियुक्ति।
इस तरह ‘इलेक्ट्राँनिक आटोमेशन तकनीकी’ के विकास से शुरू हर्ुइ इंडिया की पंचवषर्ीय योजनाएं। द्वितीय महायुद्ध में ‘इलेक्ट्राँनिक आटोमेशन’ की आवश्यकता समझ आई थी, उसके विकास के लिए ‘गिनीपिग प्रयोगशाला’ इंडिया को बताया गया। प्रयोग की शुद्ध लागत नहीं, र्ढाई गुनी कीमत चुकाई है, ‘पेटेंट’ अमेरिका का है।
सोने-चांदी यानी पक्के -स्र्टर्लिंग) भाव की बात करें तो १९४९-५० में अमेरिका में चांदी साठ डाँलर प्रति किलो थी। इंडिया में एक रूपया तोला- लगभग अÝासी रूपए में एक किलो। ‘उपभोक्ता’ बाल्टी के भाव की परख से डाँलर और रूपया लगभग बराबर थे। इसे नेहरू कौशल का नमूना ही कहेंगे कि औपचारिक विनिमय दर साढÞे तीन रूपया प्रति डाँलर तय हर्ुइ ! नेहरू से ‘क्यों’ पूछने वाला कोई नहीं था।
लूट के र्समर्थन में ‘पिछडÞी अर्थव्यवस्था की विवशताएं’ का सिद्धांत तथाकथित नेहरू आलोचकों ने अवश्य प्रस्तुत कर दिया। इस लूट के अर्थशास्त्र का एक पक्ष और है। पीएल द्ध८० के तहत अन्न आपर्ूर्ति तब शुरू हर्ुइ जब नेहरू सरकार ने बाक्साइट और अन्य खनिज मिट्टी के भाव देना स्वीकार कर लिया। वह सिलसिला आज भी चल रहा है। लाखों खरब डाँलर की इस लूट और उसकी दलाली में सभी पक्ष-विपक्ष शामिल हैं।
लूट निरंतर जारी है, क्योंकि ‘नेहरू संविधान’ के चलते ‘लोकतांत्रिक’ नेतृत्व बौने से पिद्दी बन रहा है। इस अनैतिक व्यवस्था में धृष्टता की कोई सीमा नहीं। इंडिया के प्रधानमंत्री ने देश लुटवा कर अर्थव्यवस्था चौपट कर दी, भ्रष्टाचार की खुली छूट देकर वे गौरवान्वित हैं१ किसी को लज्जा नहीं आती, खून नहीं खौलता, दस-बारह रूपए के डाँलर के तिरसठ-चौंसठ रूपए चुका रहे हैं।
हमें संज्ञान नहीं हैः ‘संवैधानिक लोकतंत्र’ का स्थापना से पहले ही अपहरण हो गया था। ‘नेहरू संविधान’ की रचना इंडिया के प्रतिनिधियों ने की थी। उस धारा-सभा में भारत या हिंदुस्तान का एक भी प्रतिनिधि नहीं था।
आजादी की पर्ूव वेला में कहें या उससे बहुत पहले, जब भी फिरंगी हाकिम ने जान लिया कि प्रत्यक्ष नियंत्रण छोडÞ कर वापस लौटना पडÞेगा, तभी उसने साम्राज्यवाद के तंत्र में दिशा परिवर्तन शुरू कर दिया। र्’नई’ रणनीति रची कि निमित्त मात्र सत्ता हस्तांतरण किस ढब, किन शर्ताें पर, कब, कैसे और किसे करना है – फिरंगी को यह विवेक तो दर्ीघकाल से जागृत था कि मध्य अठारहवीं सदी से जिस ‘सिविलाइजेशन’- करखनिया उत्पाद, रेल, मोटरकार, विद्युत ऊर्जा, टामीगन, मशीनगन, बख्तरबंद तोप गाडÞी, कटलरी, डाइनिंग टेबल, उसके मर्ैनर्स -भोज की मेज और उसका सलीका) आदि का विकास, जिस पर वह इठला रहा है, उसकी कीमत कौन चुका रहा है। इसलिए यह संज्ञान अनुमान स्वतः था कि उस -अ)सभ्यता -सिविलाइजेशन) को शर्ीष्ा पर बनाए रखने का दाम और श्रम कौन चुकाएगा।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में जब ‘भारत छोडÞो’ -१९४२) आंदोलन अपने चरम पर था, उसी समय अमेरिकी राष्ट्रपति प|mैंकलिन रूजवेल्ट ने ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर विंसटन चर्चिल को चेता दिया थाः चाहे जो करो१ इंडिया हमारे प्रभाव क्षेत्र से बाहर नहीं निकलना चाहिए। इस तजवीज के बाद अमेरिकी सरकार ने विजयलक्ष्मी पंडित -नेहरू की बहन) को स्वतंत्रता अभियान चलाने के लिए वहीं बुला लिया था। वापसी पर वे गांधी के लिए अमेरिका पधारने का आमंत्रण लाई थीं।
यह आरोप आमफहम हैः नेहरू-राजवंश की स्थापना में गांधी का सक्रिय योगदान था। इस मुद्दे पर शोध-संवाद से हिचकना अज्ञान से उपजी नादानी है। गांधी ने अपराध किया है तो भी उस पाप का प्रायश्चित अनिवार्य है। उस पाप की सजा प्रजा कब तक भोगेगी – उस इतिहास का विधिवत शोध-विमर्श तत्काल शुरू किया जाए। यह सावधानी आवश्यक है कि ‘गांधी निंदा, विरोध’ में भावनावश यह तथ्य दृष्टि ओझल न हो जाए कि राजवंश परंपरा का देशव्यापी विकास, सुदृढÞीकरण संवैधानिक वोट राज में हुआ है।
हमारा आग्रह हैः आगामी लोकसभा चुनाव में यह बेबाक बहस शुरू हो कि नेहरू राजवंश की प्रभुसत्ता का दोषी कौन – बेहिसाब लूट, शोषण, भ्रष्टाचार का अपराधी कौन – गांधी ने जिन ‘नम्र’ शब्दों में अमेरिकी आमंत्रण अस्वीकृत किया था, उससे यह स्पष्ट है कि वे यह जानने के लिए अत्यंत उत्सुक थे कि एक अणुबम से धुरी राष्ट्र संघ के र्समर्पण के बाद दूसरे अणुबम का प्रयोग किस उद्देश्य या किस शत्रु के विरुद्ध किया था –
हमारे विश्लेषण से दो प्रश्न उपजते हैंः एक, अगर नेहरू अमेरिका से भीख न मांगते तो क्या भारत की प्रजा भूखों मर जाती – दो, अगर भारत विकास की गिनीपिग प्रयोगशाला बनने से स्पष्ट इनकार कर देता, तब भी हमारी यही दर्ुदशा होती, जो आज है –
मान लिया, भीख मांगना अनिवार्य था, तब क्या सेवाइल राँ का थ्री-पीस सूट पहन कर वहां जाना चाहिए था – उस अपराधी देश के राजा और प्रजा से यह नहीं पूछना चाहिए था कि अणुबम का प्रयोग जर्मनी-इटली की धरती पर क्यों नहीं किया – ‘सिविलाइजेशन’ से विस्मित, भयाक्रांत किसी इंडिया नेता ने यह विमर्श शुरू करने का साहस नहीं जुटाया। गांधी ने इस संवाद की भूमिका अवश्य तैयार कर दी थी। हमारा मुद्दा भारत के आत्मसम्मान को बाजार में गिरवी रखने का है, कोकाकोला संस्कृति के विकास और लूट के अर्थशास्त्र की स्थापना का है।
प्रश्न है कि हमारा देश कब तक विकास की गिनीपिग प्रयोगशाला बना रहेगा – ऐसे समस्त राष्ट्रवादी विमर्श तभी शुरू हो सकेंगे जब नेहरू-राजवंश की प्रभुसत्ता का अंत हो जाए।
सरल तथ्य है कि आम भारतीय का दैनंदिन देना-पावना गांव मोहल्ला, तहसील-थाना, जिला निजाम से आगे नहीं जाता। पर नेहरू संविधान में जिला और उससे नीचे के शासन-प्रशासन का उल्लेख अनुपस्थित है। गणतंत्र का संविधान आकाश में टंगी त्रिशंकु विधि-संहिता है। फिरंगी कायदा-कानून -टीबी मेकाले द्वारा रचित इंडियन पीनल कोड) आज तक जस का तस कायम है। कलेक्टर के पद का केवल निहितार्थ नहीं, शब्दार्थ भी ‘लूट एकत्रित करने’ के लिए नियुक्त हाकिम ही होता है। ‘कलेक्टर’ यानी जिला हाकिम गणतंत्र के संविधान का प्रमुख अभिभावक ९कस्टोडियन० है। यह विसंगति हमारे लोकतंत्र का बुनियादी दोष-पाप है- परिणाम है- अनैतिक राजनीति, भ्रष्ट प्रशासन, अनंत लूट की छूट।
इस गुलामी का निराकरण भारतीय राजनीति के निर्मलीकरण की पहली शर्त है। जिला, तहसील, ग्राम प्रशासन का प्रजातांत्रीकरण तभी संभव होगा जब उस स्तर की शासन-व्यवस्था संविधान का अंग बने। उस परिस्थिति में लोकनीति की सत्ता का विकास संभव हो सकेगा, राजनीतिक दलों की निचली इकाइयों में प्रत्यक्ष लोक-भागीदारी की गुंजाइश भी बन सकती है।
इतना सरल वैधानिक सुधार या परिवर्तन दो कारणों से लगभग असंभव जैसा है। वंशानुगत राजनीति का समझ-बूझ कर विस्तार किया गया है। अन्य ‘राजवंश’ परंपरा में चुगली-चापलूसी के अभ्यास के अतिरिक्त अन्य किसी योग्यता, राजनीतिक कौशल की आवश्यकता ही नहीं होती। इसलिए जो पर्ूण्ा अवांछित तत्त्व राजनीति में स्थापित हो गए हैं, वे किसी नैतिक विमर्श संभावना को ही अवरुद्ध कर देते हैं। िि
-िजनसत्ता से सभार

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