लोकप्रिय नेपाली कहानियाँ

नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान ने ‘लोकप्रिय नेपाली कहानियाँ’ शर्ीष्ाक से नेपाली की छत्तीस कहानियों का अनुवाद हिन्दी में प्रकाशित किया है जिसके अनुवादक कुमार सच्चिदानन्द सिंह हैं और इसका संपादन सनत रेग्मी, डाँ. संजीता वर्मा एवं गोपाल अश्क ने किया है। नेपाली कथाओं को वृहत्त पाठकवृत्त में पहुँचाने के उद्देश्य से प्रतिष्ठान अर्न्तर्गत ‘विश्व-साहित्य और अनुवाद विभाग’ द्वारा इस योजना पर कार्य कराया गया। यथाशीघ्र इसका प्रकाशन कर प्रतिष्ठान ने एक सकारात्मक संदेश दिया है और एक तरह से उक्त योजना के महत्त्व को भी जाहिर किया है। इस संग्रह में नेपाली कथा के विचारगत, विषयगत, संरचनागत, शैली और शिल्पगत विशेषताओं को चिहृनित करनेवाली वि. सं. २०३६ तक केे रचनाकारों को ग्रहण किया गया है, जिस में नेपाली कथा की सम्पर्ूण्ा यात्रा प्रतिबिम्बित होती है।
प्रवृतिगत आधार पर नेपाली कथाओं को दो भागों में विभाजित किया गया है- यथार्थवादी युग -वि.सं.१९९२-२०१९) और नवयुग -वि.सं.२०२०से आज तक)। इस युग के नेपाली कथाकारों पर एक ओर पे्रमचन्द, शरतचन्द्र और बंकिमचन्द्र की कथा प्रतिभा का प्रभाव लक्षित किया जा सकता है दूसरी ओर पाश्चात्य कथाकारों में चेखव, टाँल्स्टाय, मोपासाँ आदि का प्रभाव भी लक्षित किया जाता है। मनोवैज्ञानिक यथार्थवादी प्रवृति भी नेपाली कथाओं में दृष्टिगत होती है। नवयुग की कथाओं में वर्त्तमान युग की संक्रमणकालीन प्रवृतियों के साथ-साथ इस युग की कुण्ठा, निराशा, अजनबीपन, राजनैतिक मूल्यहीनता और संर्घष्ा आदि को भी स्वर मिला है। विवेच्य संग्रह में नेपाली कहानियों की प्रायः महत्वपर्ूण्ा विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करनेवाली रचनाओं का संकलन है। निश्चित ही इस कृति के माध्यम से हिन्दी पढÞने वाले पाठकों को नेपाली कहानी का विकास, विषय और वैशिष्ट्य समझने में सहजता होगी।
निश्चय ही ‘नेपाली लोकप्रिय कहानियाँ’ एक अनुदित कृति है और अनुदित रचनाओं की जो सीमाएँ होती है, उससे इसे भी अलग नहीं माना जा सकता लेकिन इस में प्रकाशित कहानियों को पढÞकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि अनुवादक ने बहुत हद तक अनुवाद को सहज और स्वाभाविक बनाने का प्रयास किया है। भाषा में गति है, प्रवाह है और नेपालीपन को सुरक्षित रखने का प्रयास भी। प्रस्तुत पुस्तक में अपना मंतव्य व्यक्त करते हुए ‘विश्व-साहित्य तथा अनुवाद विभाग’ प्रमुख डाँ. संजीता वर्मा ने कहा है ‘….अनुवाद कार्य बहुत जटिल काम है। इस दौरान कुछ त्रूटियाँ भी हर्ुइ होंगी। इसके बावजूद उनका काम सराहनीय है।’
पुस्तक में नेपाली कहानियों की संक्षिप्त विकास-यात्रा ‘भूमिका’ शर्ीष्ाक अर्न्तर्गत लगभग चौदह पृष्ठों में समाविष्ट है जिसे संपादक त्रय ने मिलकर सम्पर्ूण्ाता दी है। २९९ पृष्ठों की यह पुस्तक सुरुचिपर्ूण्ा है, पठनीय है मगर एक बात समझ में नहीं आती कि आवरण पृष्ठ से अनुवादक का नाम गायब है जबकि द्वितीय पृष्ठ पर कृति के नाम के बाद अनुवादक का नाम और इसके बाद तीनों संपादक के नाम हैं। यद्यपि ‘प्रकाशकीय’ के अर्न्तर्गत संस्थान के उपकुलपति गंगा प्रसाद उप्रेती ने सम्पादन-कार्य दो साहित्यकारों( डाँ संजीता वर्मा और और गोपाल अश्क के द्वारा होने की घोषणा की है। सवाल यह है कि आवरण पृष्ठ पर अनुवादक का नाम न होना महज भूल है या नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान जैसी प्रतिष्ठित संस्था की कोई नियमबद्धता या प्रतिष्ठान में सक्रिय प्राज्ञों द्वारा अपने नाम के प्रक्षेपण की प्रवृत्ति –
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