लोकमान् को घेराबन्दी करने वाले दुध के धुले हुए हैं क्या ? अमरदीप मोक्तान

अमरदीप मोक्तान, डाडा खर्क ,दोलखा २१ अक्टूबर |
अख्तियार  प्रमुख पर लगाए गए  महाभियोग से नेपाली जनमानस मे जबर्दस्त तरंग उत्पन्न हुआ है  | अख्तियार प्रमुख ने    पदिय आचरण विपरित कार्य करने का  आरोप लगाकर  एमाले एवं  माओवादी केन्द्र के संसदो  द्वारा महाभियोग दर्ता करने के  फलस्वरूप लोकमान सिङ्ग कार्की हाल के लिए  निलम्बित हुए है | लोकमान सिंह कार्की पर लगाए गए महाभियोग प्रस्ताव पारित करने के लिए  आवस्यक  संख्या ३९७ की जरुरत है | लोकमान विरुद्ध जिस  प्रकार से  राजनीतक दल लगायत के  अदृश्य समुह गोलबन्द होकर लगे हुए है इससे ऐसा लग रहा है  महाभियोग प्रस्ताव पारित होने की  सम्भावना प्रबल है |  प्रश्न है बिभिन्न   घटनाक्रम  के पश्चात जिस  प्रकार कुछ राजनतिक दल आक्रामक रुप मे  लोकमान को हटाने के लिए उद्धत दिख रहे है क्या यह सही है ? यदि  अख्तियार दुरुपयोग अनुशन्धान आयोग द्वारा  नेता तथा राजनैतिक दल लगाएत के लोगो द्वारा किए गए  भ्रस्टाचार  प्रति मौनता प्रकट किया होता  तो सम्भवतः  लोकमान विरुद्ध राजनैतिक दल इतने  कठोर रुप नही  दिखते | वास्तव में कहा जाए तो  लोकमान की  नियुक्ति  मापदण्ड विपरित थी किसी भी कोण से  लोकमान अख्तियार प्रमुख होने के लिए उपयुक्त पात्र  नही थे |l  विगतकी  विवादित पृष्ठभूमि के  कारण अख्तियार प्रमुख मे लोकमान के नाम प्रस्तावित होने पर  नेपाली जनमानस मे  व्यापक चर्चा शंका उपशंका और  राजनितिक दल प्रति क्रोध ब्याप्त थी  |
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 लोकमान की  नियुक्ति से लेकर  निलम्बन तक की  परिस्थिति मे  फरक यह है उस समय  अख्तियार प्रमुख के लिए  मापदण्ड मे अनुपयुक्त तथा  अख्तियार द्वारा आरोपित  लोकमान सिंह कार्की के नाम का प्रस्ताव और समर्थन मे माओवादी केन्द्र अग्रपंक्ति मे था लेकिन वर्तमान की स्थिति यह है की   लोकमान को हटाने के कार्य मे माओवादी केन्द्र  जोर सोर के साथ   अग्रपंक्ति मे खडा दिख रहा है   | अख्तियार प्रमुख होने के लिए आवस्यक मापदण्ड मे अनुपयुक्त  लोकमान  के प्रति   राजनैतिक दल ने   नियुक्ति प्रति क्यो  सहमति जतायी थी   सोचनीय विषय है  | अख्तियार प्रमुख के रुप मे लोकमान सिंह कार्की द्वारा किए गए सभी कार्य सही है विवादमुक्त है कहन गलत होगा | शक्ति के  दम्भ मे  चुर लोकमान ने  संबिधान, कानुन उल्लङ्घन करने का  कार्य किया है साथ ही साथ कटु सत्य यह भी है  लोकमान के  कार्यकाल मे  विगत की अपेक्षा   अख्तियार की  शक्ति मे  वृद्धि  होने के साथ भ्रस्टाचारियो के हृदय मे दसहत कायम करने  मे अख्तियार सफल रहा है   |अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग ने  भ्रस्टाचारी के दिल मे शोले के गब्बर सिंह  जैसा त्रास  पैदा कर दिया है भ्रस्टाचारियो सुधर जाओ वर्ना अख्तियार कठोर दण्ड देने के लिए आ जाएगा शब्द से भयभित थे  |
स्मरण रहे  भारत मे  राजनैतिक दल की  मनमानी के आगे चुनाव आयोग निरिह थी  कोई महत्व नही था खुले  राजनैतिक  दलो द्वारा खुले  आम चुनाव अचार संहिता का उल्लङ्घन होता था और चुनाव आयोग मौन दर्शक के रुप मे खडी दिख्ती थी लेकिन जब  टि एन शेशन मुख्य चुनाव आयुक्त मे  नियुक्ति हुए    और उन्होने आचार संहिता  उल्लङ्घन करने वाले दलो के प्रति कठोरता दिखायी | टि एन शेसन  पश्चात  भारतीय चुनाव आयोग  पूर्ण रुप से शक्तिसम्पन्न होने के कारण कुछ  हद तक राजनैतिक दलो की  उदण्डता मे  अंकुश लगने का काम हुआ है जो आज तक  जारी है कहने का अर्थ   यदि लोकमान ने  गलत  किया है तो उन्हे अवश्य दण्डित होना पडेगा लेकिन प्रश्न यह है कि जिस प्रकार नेपाली राजनीति के ठेकेदार समझने वाले बडे राजनैतिक दल लगाएत के  समुह  लोकमान को  अपदस्थ करने के लिए  कमर कस  कर लगे हुए हैं  इसका  स्पस्ट मतलब यह है  कि अख्तियार राजनैतिक दल से उपर नही है , राजनैतिक दल  कुछ भी करे उनके विरुद्ध अख्तियार का कोइ भी  कदम गवारा नही है वाली निरङ्कुश सोच स्पस्ट रुप मे दिखती है | भ्रस्टचारी  नेता, निजामती सेवक जो कोइ भी हो  यदि राज्य के किसी  संस्था से  भयातुर है तो  एकमात्र अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग ही है कहना गलत न होगा |
 कहिँ   लोकमान को हटाने के पिछे  भ्रस्टाचार मे  लिप्त नेता, निजामती सेवक लगायत राज्य का प्रमुख पद मे विराजमान लोग  अख्तियार द्वारा  आरोपित होने के कारण दोषमुक्त होने के लिए  गोलबन्द होकर रचा गया  प्रपन्च तो नही है  ? नेपाल मे  जब तक सही  काम करने वालो को  सम्मान और गलत  काम वालो को  दण्ड का  भय नही रहेगा  तब तक  नेपाल मे  कानुनी साशन  स्थापित होना असम्भव है  | नेपाल मे   संबिधान और  कानुन के उल्लंघन करने वालो मे  मात्र लोकमान सिंह कार्की  है  ?  अख्तियार प्रमुख के अलावा नेपाल के  प्रमुख राजनितिक दल के नेता लगायत   उच्च संबैधानिक पद मे विराजमान महानुभाव लोग  सत् प्रतिशत कलंक रहित है  ?  लोकमान को अपदस्थ करने के लिए घेराबन्दी करने  वाले मे  संसद ही नही है लोकमान को सभी तरफ से  घेराबन्दी की जा रही है प्रश्न यह है घेराबन्दी करने वाले पात्र   पवित्र गंगाजल से  स्नान किए हुए पुण्य  आत्मा की श्रेणी मे आते है क्या ?  नेपाल की  दुर्दशा का असली कारक तत्व नेपाली राजनीति के   प्रथम पंक्ति मे खडे हुए  बडे छोटे दलो के भ्रस्टचारी  नेता , राज्य के  प्रमुख  मे अंग आसिन  निजामती सेवक तथा छ्द्म्वेश धारक तथाकथित गनमान्य  व्यक्ति लोग है | बुद्धिजीवी महेन्द्र पी लामा ने  अपने  एक लेख में लिखा था  कि नेपाल मे विकाश न होने का मुख्य  कारण राज्य का कोइ भी  संस्था का संथागत न होना है| आज अख्तियार प्रमुखके रुप मे  लोकमान है कल कोई दुसरा आएगा यह गौण विषय है  मुख्य विषय यह है की संबैधानिक अंग के प्रमुख  स्वतन्त्रतापुर्वक कार्य करने की स्थिति मे रहेगी या नही ?
नेपाल मे अद्भुत  तथा दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है  कि  अच्छे कार्य करने वाले राष्ट्रभक्त राजनिक दल अथवा  नेता  को बहिस्कृत होना पडता है , कर्तव्यनिस्ठ निजामती  सेवक को अन्तिम बेञ्च का विद्यार्थी बन कर पिछे बैठना पड़ता है  , पूर्वाग्रह रहित न्याय करने  वाले न्यायमुर्ति को  न्याय करने वाले  महत्वपूर्ण  स्थान मे पहुचाने ही नही दिया जाता | संबैधानिक उच्च पद पर आसिन  लोकमान हो  चाहे कोइ भी  व्यक्ति हो वह संबिधान  कानुन से उपर नही है न तो होना चाहिए | बडे से बडे कद वाला क्यो न हो जिसने भी गलत किया है तो उसे अवस्य  दण्ड का  भागीदार बनना पडेगा तब ही  कानुनी  राज्य स्थापित हो सकती है  | अख्तियार प्रमुख ने   यदि संबिधान कनुन का  उल्लङ्घन किया है तो  निश्चित रुप मे  उन्मुक्ति नही मिलनी चाहिए लेकिन  अख्तियार द्वारा आरोप तय हुए  माओवादी लडाकु सिविर मे रकम के बारे मे ,कनकमणि दिक्षित द्वारा किए गए  कानुन विपरितके  कार्य लगाएत भ्रस्टाचार मे लाबलब डुबे हुए नेताओ को गंगाजल छिड़क कर दोषमुक्त  करनेके लिए  लोकमान को अपदस्थ करने की सजिस है तो यह  दुर्भाग्य होगा  | अख्तियार की  अख्तियारी को  कम्जोर बनाने के लिए लोकमान को समयावधी से पहले  नियतवश  अपदस्थ किया जाता है तो दावे के साथ कहा ज सकता है  नेपाल कभी भी सुधर नही सकता  कानुनी राज्य की स्थापना हो नही सकती यह निश्चित है  |
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