लोकमान और नेपाल का लोकतंत्र

कुमार सच्चिदानन्द
आज लोकमान के पीछे नेपाल के लोकतंत्र की सारी शक्तियाँ क्रियाशील हैं और चतुर्दिक आक्रमणों के बाद उनका अवसान प्रायः सुनिश्चित है । क्योंकि शासन की इतनी शक्तियों की क्रियाशीलता के बावजूद अगर कोई व्यक्ति बच जाता है तो यह भी उस तंत्र के लिए कलंक ही होगा । लेकिन इस समस्त घटनाक्रम में जो बातें उभर कर सामने आयीं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारे तंत्र में इतनी विडम्बनाएँ हैं कि इनका बोझ लेकर यह देश किसी भी हाल में सही दिशा में नहीं बढ़ सकता । अख्तियार प्रमुख लोकमान सिंह कार्की का मुद्दा आज सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है और न्यााय की कानूनी प्रक्रिया में है । लेकिन गरमागरम बहस का अखाड़ा संसद बना हुआ है और महाभियोग प्रस्ताव भी संसद में विचारणीय है । लेकिन यह युद्ध संसद और सर्वोच्च न्यायालय तक ही सीमित नहीं है । देश का समस्त सूचनातंत्र इस मुद्दे पर जनता को सुसूचित कर ही अपने दायित्व की इतिश्री नहीं समझ रहा बल्कि एकमुखी विचार और विश्लेषण को प्रस्तुत कर देश की राजनीति को दिशा देना चाहता है । बात यहीं खत्म नहीं होती । राजधानी की सड़कों ने भी लोकमान के विरोध में निकले जुलूस और प्रदर्शनों का साक्षात्कार किया और नेपाल के राजनीतिक गलियारे में गाए जा रहे पारम्परिक गीत देउसी में भी लोकमान प्रकरण जगह ले रहा है । सवाल यह नहीं है कि एक आदमी के पीछे सारा तंत्र इस कदर क्यों लगा हुआ है, सवाल यह है कि एक आदमी हमारी चेतना और समस्त तंत्र को इस तरह क्यों झकझोर रहा है ? आखिर किस भयग्रन्थि से पीड़ित हमारी राजनीति है कि एक व्यक्ति के मुद्दे पर सारी राजनैतिक शक्तियों को केन्द्रित करने का प्रयास किया जा रहा है ?
अगर मान भी लिया जाए कि लोकमान दूध के धोए नहीं हैं तो भी यह सवाल तो उठाया ही जा सकता है कि उनके पीछे शक्तियों के इस संगठन की आवश्यकता क्या है ? कानून है, संसद है फिर सड़कों पर आन्दोलन की क्या जरूरत ? इससे एक बात तो साफ है कि जो भी दल या लोग इसके पीछे लगे हुए हैं वे एक अज्ञात भय से पीड़ित हैं । वे अख्तियार के कार्याधिकार और संवैधानिक ताकत को समझते हैं । वे इस बात को बखूबी जानते हैं कि जब तक यह आदमी इस संवैधानिक पद पर बैठा है तब तक वे किसी रूप में सुरक्षित नहीं । यही कारण है कि उनके विरुद्ध जब न्यायालय में मुकद्दमा चल ही रहा था तब तक महाभियोग प्रस्ताव संसद सचिवालय में पंजीकृत करा दिया गया । आज नेपाल में संक्रमण काल का चक्र चल रहा है और नवनिर्मित संविधान का कार्यान्वयन सरकार और राष्ट्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बन कर खड़ा है । लेकिन हमारी पूरी राजनीति समाधान ढूँढने के बजाय लोकमान सिंह कार्की के पीछे लगी हुई है । इस समस्त घटनाक्रम के पीछे यह बात साफ तौर पर उभर कर सामने आती है कि हमारे देश के राजनीतिकर्मी सत्ता और अवसर पाने पर इस तरह पंकिल है कि लोकमान का इस पद पर व्यापक स्वरूप देखकर उन्हें सपने में भी लोकमान नजर आता है और उसकी व्यापकता को समेटने का साहस तो उनमें है नहीं इसलिए उन्हें पदच्यूत करने का मिशन उन्होंने बना लिया है ।
आज जो नेपाल की राजनीति में लोकमान का मिशन चल रहा है उसमें राजनीतिक दल मात्र शामिल नहीं बल्कि मीडिया भी बुरी तरह संलग्न है । किसी भी देश की मीडिया का कर्तव्य जनता को सुसूचित करने का होता है और इस आड़ में वह जनमत को प्रभावित करने का काम भी बखूबी करती है । लेकिन नेपाल की समस्या यह है कि यहाँ का समस्त सूचनातंत्र किसी न किसी राजनीतिक विचारधारा से अभिप्रेरित है । इस लिए तथ्यों को या तो वह उसी अन्दाज में प्रस्तुत करती है जिस अन्दाज में उसके राजनीतिक आका चाहते हैं या तथ्य उसी रूप में प्रस्तुत हो जाते हैं क्योंकि विचारधारा समान होती है । इसी अतिरंजित वर्णनों को सुन और समझकर लोग अपना दृष्टिकोण तय करते हैं । लोकमान सिंह कार्की के संदर्भ में संचारतंत्र का प्रायः यही हाल है ।

आज पूरे देश के समक्ष लोकमान को संचारतंत्र ने दशहरा के रावण की तरह प्रस्तुत किया है और पूरा देश राम और रामभक्त प्रजा की तरह उसके पुतले में चिंगारी डालना और उसके धधकते हुए स्वरूप को देखना अपना धर्म समझ रहा है । लेकिन आज कोई लोकमान की नजर से नेपाल की राजनीति को देखे या राजनीति में अवसर पाकार सत्ता का सुख लिए हुए व्यक्ति के अतीत को खंगालने की कोशिश करे तो निश्चित ही जो तस्वीर उभरेगी वह विद्रुप होगी । मगर जाल इतना गहरा है कि आज उनकी आवाज और नजरिया को समझने वाला कोई नहीं । सही मायने में यह सारा खेल टी.आर.पी. का है । एक बात तो मानी जानी चाहिए कि हमारे देश में संचार तंत्र तो काफी मजबूत है लेकिन समाचार नहीं हैं । समाचारों के अभाव में इसके प्रति तटस्थता आम लोगों में बढ़ती जा रही है । लोग न्यूज चैनल तो खोलते हैं मगर हेडलाइन्स सुनकर कॉमेडी शो देखना उनके लिए ज्यादा रूचिपूर्ण होता है । इसलिए माध्यम चाहे कोई भी हो पाठकों, श्रोताओं या दर्शकों को बाँधकर रखना उनकी सबसे बड़ी चुनौती होती है । इसलिए कभी–कभी ऐसे पात्रों और घटनाओं की खबर प्रमुखता प्राप्त कर लेती हैं जो आम राजनीतिक मिजाज और तथाकथित राष्ट्रीय चिन्तनधारा से अलग के पात्र या घटनाएँ होतीं हैं ।
लोकमान सिंह कार्की की अख्तियार प्रमुख के रूप में नियुक्ति भी काफी विवादास्पद रही । उन पर सबसे बड़ा आरोप था कि वे जनान्दोलन–२ के दमन में प्रमुख सहायक थे और इसमें हुए दमन की जाँच के लिए बना रायमाँझी आयोग ने उन्हें प्रमुख दोषी सिद्ध किया था । हमारा ज्ञान इस बात का साक्षी है कि इतिहास हमेशा विजेता के दृष्टिकोण से लिखा जाता रहा है । अगर महाभारत के युद्ध में कौरवों की विजय हुई होती तो शायद दुर्याेधन आज नायक के रूप में पूजित होते और कृष्ण खलनायक के रूप में वर्णित होते ।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ । इसलिए ज्ञानेन्द्र के प्रत्यक्ष शासन में उच्च पदस्थ पदाधिकारी रहते हुए अगर उन्होंने शासकीय मर्यादा के अन्तर्गत नीतिगत स्तर पर दमन का आश्रय लिया या तत्कालीन परिस्थितियों में सत्ता के साथ रहे तो क्या इसे अपराध माना जा सकता है ? क्या महज इसलिए उन्हें आन्दोलनकारियों का स्वागत करना चाहिए था कि जनान्दोलन–२ के महानायक स्व. गिरिजा प्रसाद कोइराला ने यह बयान सार्वजनिक कर दिया था कि ‘जनान्दोलन की सफलता के बाद उन लोगों पर कार्रवाई होगी जो किसी प्रकार के दमन में सहायक होंगे । ’ एक बात तो मानी जा सकती है कि जनान्दोलन–२ का परिणाम जिस व्यापक रूप में सामने आया उसकी तुलना में संस्थापन पक्ष द्वारा हिंसा तो हुई मगर यह पक्ष उतना गहरा नहीं था । इसका प्रमाण तो बाद के मधेश आन्दोलन ने भी दिया कि हर आन्दोलन में बाद की लोकतांत्रिक सरकारों ने उसकी तुलना में अधिक व्यापक हिंसा फैलायी और इसके बावजूद परिणाम लगभग शून्य ही रहा और आज भी वे मुद्दे जीवित हैं । यही कारण है कि कई दौर के आन्दोलन हुए और सैकडों लोग हताहत हुए ।
आज लोकमान सिंह कार्की पूरे देश की नजर में खलनायक हैं । लेकिन स्मृति के पन्नों को अगर हम पलटाएँ तो साफ–साफ दिखलाई देता है कि जनान्दोलन के समय ज्ञानेन्द्र के प्रत्यक्ष शासन में गृहमंत्री कमल थापा थे और माना जा सकता है कि जितनी भी दमनात्मक कार्रवाइयाँ हुईं उनमें उनकी मौजूदगी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में थीं । लेकिन उन्हें क्लीन चीट मिल गयी है इसलिए आज जो दल लोकमान सिंह कार्की के महाभियोग में और इसके पक्ष में तर्कों और बयानों का अम्बार खड़ा किए हुए है उनकी सरकार में ही वे महत्वपूर्ण मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे थे ।

आज भी नेपाल की तरल राजनैतिक अवस्था में कभी भी सत्ता का समीकरण बदल सकता है और कभी भी वे हाशिये से मुख्य धारा में आकर सत्ता का भागीदार बन सकते हैं । मगर वे इसलिए निष्कलंक है क्योंकि राजनीति की मुख्य धारा से सम्बन्धित हैं और कार्की नौकरशाही के क्षेत्र से आते हैं । हमारी राजनीति यह कैसे बर्दाश्त कर सकती है कि कोई नौकरशाह संवैधानिक पद पर बैठकर उनके क्रियाकलापों का न केवल लेखाजोखा करे बल्कि उसे दण्डित करने का प्रयास भी करे । वस्तुतः यह सारा प्रयास राजनीति को इस देश में सर्वशक्तिमान बनाने का प्रयास है जिस पर कोई भी नौकरशाह कभी भी अँगुली उठाने का साहस न करे । हाँ, अदना–ठिगना कोई है तो अलग बात है । नौकरशाहों द्वारा आला नेताओं पर सवाल उठाने की कोशिश तो ऐसा ही है मानो ‘हमारी बिल्ली, हमसे म्याऊँ । ’
कहा जाता है ‘एक तो करैला, दूसरा नीम चढ़ा ।’ निलम्बित अख्तियार प्रमुख के संदर्भ में यह बात ज्यादा सांदर्भिक लगती है । क्योंकि उन पर सीधे तौर पर दो आरोप लग रहे हैं—प्रथम कि वे राजावादी हैं और दूसरा नेपाल के संवैधानिक पद पर बैठा हुआ भारतीय सिक्का हैं जो उसके इशारे पर राजनैतिक दलों के नेताओं को कार्रवाई के दायरे में लाते हैं या ला सकते हैं । वैसे भी राजावादी होना इस देश में ऐसी गाली है जिसे चिरयौवना की तरह सदा सान्दर्भिक कही जा सकती है । जिस किसी को बदनाम करना या उसकी ऊँचाई को कम करना है तो ‘राजावादी’ शब्द का भूत जिन्दा हो जाता है और इस प्रतीक के द्वारा उसका मान–मर्दन किया जाता है ।

लोकमान सिंह कार्की के संदर्भ में भी यह बात आज घटित हो रही है । हाँ, यह बात राजनीतिकर्मियों पर लागू नहीं होती क्योंकि उन्हें शायद ईश्वर से यह वरदान प्राप्त है कि वे कमल के पत्ते पर जल के बूँदों की तरह होते हैं—निर्लिप्त और बिल्कुल वीतराग । अन्यथा यह वरदान अगर उन्हें नहीं होता तो पूर्व राजा या राजाओं से राजनैतिक लाभ–हानि के आधार पर सम्बन्ध विकसित और सीमित करने में शायद किसी भी दल के बड़े नेता पीछे नहीं रहे हैं । लेकिन वे इन आरोपों से सर्वथा मुक्त हैं । इसी तरह भारत और भारतीय विस्तारवाद की बातें और नारे लगाना इस देश में राष्ट्रवाद की प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण कसौटी है ।

लोकमान पर भी यह आरोप शिद्दत से लगाया जाता है और कहा जाता है कि उच्च संवैधानिक पद पर बैठा हुआ यह ऐसा व्यक्ति है जो भारत के इशारे पर कार्रवाई की तलवार लटका कर रखता है और अगर कोई भी दल या नेता चाहे वह सरकार का नुमाइन्दा ही क्यों न हो अगर भारतीय हितों के विपरीत जा रहा है तो उसे कानून के दायरे में लाकर दण्डित करने का प्रयास उनके द्वारा होता है या हो सकता है । किसी को पदच्यूत करने के लिए इनमें से एक ही आरोप की प्रामाणिकता काफी है । लेकिन यहाँ तो एक ही व्यक्ति दो–दो आरोपों से घिरा है फिर उसका टिका रहना तो असंभव है ।
इस देश की सबसे बड़ी राजनैतिक समस्या यह है कि कोई भी दल संसद में स्पष्ट बहुमत की अवस्था में नहीं है और कोई भी दल विपक्ष में भी बैठकर रचनात्मक भूमिका निर्वहन करने की मानसिकता में भी नहीं है । अगर कोई दल या नेता सत्ता से बाहर रहकर इस तरह की बात कहता है तो इसे उसका नाटकीय संवाद माना जा सकता है क्योंकि राष्ट्र की समस्याओं से निजात के नाम पर समस्त राजनैतिक शक्तियों के मिलने की बात वे तोते की तरह रटते नजर आते हैं । आज के सत्ता समीकरण में दो बड़े दल शामिल हैं और तीसरा बाहर बैठकर इस महाभोज के आखिर कब तक देखता रह सकता था । इसलिए उसे कमजोर करने के लिए उसने एक ऐसा अंकुश डाला जिससे किसी न किसी रूप में यह गठबंधन कमजोर भी हो और बाहर बैठे दल की महत्ता भी सिद्ध हो ।

प्रारम्भ में यह बात तो बहुत सहज लगी लेकिन जब इस पर राजनीति गरमायी तो महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले सांसद ही अब यह कहने लगे हैं कि किसी अन्य प्रयोजन के लिए उनसे हस्ताक्षर लिए गए । अब समस्या यह है कि इस प्रस्ताव की वैधानिकता ही शक के दायरे में है । फिर फाँस यह है कि मधेश के मुद्दे को संबोधित कर स्थानीय निकायों के चुनाव तक देश को ले जाने और नवनिर्मित संविधान के कार्यान्वित करने के मार्ग में सबसे बड़ी उलटबयानी नेकपा एमाले द्वारा हुई और आज लोकमान के महाभियोग प्रस्ताव का सबसे मुखर प्रवक्ता भी वही है । इसलिए बाकी के दल जिसका मुँह उन्होंने अपने सत्ता नेतृत्व के दौरान जलाया था, आज वे फूँक–फूँक के कदम बढ़ा रहे हैं और इस महाभियोग के मसले के साथ–साथ संशोधन के प्रस्ताव को भी शामिल कर दिया है । अब देखना है कि ये दोनों मुद्दे निष्कर्ष तक कैसे पहुँचते हैं ?
इन समस्त मुद्दों पर सत्ता का प्रमुख साझेदार नेपाली काँग्रेस ने स्पष्ट रूप से अपनी धारणा सामने रख दी है कि संविधान के कार्यान्वयन जैसे महत्वपूर्ण विषय को ओझल करने के लिए लोकमान प्रकरण को आवश्यकता से अधिक प्रचारित किया गया है । उसकी स्पष्ट धारणा है कि एक व्यक्ति को लेकर इतनी बड़ी चर्चा आवश्यक नहीं है । उनके अनुसार लोकमान एक व्यक्ति हैं और राज्य के कानून के अनुसार उन पर कार्रवाई हो सकती है । लेकिन संविधान कार्यान्वयन के मुद्दे को पीछे धकेलते हुए किसी व्यक्ति की इतनी चर्चा नहीं होनी चाहिए । इसलिए इस महाभियोग का हश्र क्या होगा यह हम सहजता से समझ सकते हैं ।

इस महाभियोग प्रस्ताव को लेकर सबसे अधिक उत्साहित तीनों दलों के युवा सांसदगण हैं जिन्हें यह कदम बहुत ही अग्रगामी और गतिशील लग रहा है । वास्तव में ये युवा इस महाभियोग के पक्ष में बयानबाजी कर एक आदर्श और गत्यात्मक छवि लेकर राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत होना चाहते हैं । लेकिन उन्हें यह आत्मचिंतन करना चाहिए कि पार्टी में बिना गंभीर विमर्श के उन्होंने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर तो कर दिया मगर आज समग्र रूप में पार्टी की सोच कुछ अलग दिशा में है ।

अब सवाल उठता है कि आज की बदली हुई परिस्थिति में उनके इस कदम को आदर्श माना जाए या राजनीतिक दण्डहीनता ? कहा जा सकता है कि समग्र रूप में यही दण्डहीनता नेपाल की राजनीति की सबसे बड़ी समस्या है । आज महाभियोग प्रसंग में वे आदर्श तो दिखला रहे हैं लेकिन संविधान को स्वीकार करने के समय देश में जो व्यापक विरोध देखा जा रहा था उस समय उनका आदर्श कहाँ था ? उस समय इस जज्बात का परिचय अगर उन्होंने दिया होता तो शायद आज की यह जटिल परिस्थिति पैदा नहीं होती । इसलिए उन्हें समझना चाहिए कि राजनीति मात्र भावुकता, आवेश और आदर्श नहीं है ।
एक बात तो निश्चित है कि इतनी फजीहत के बाद किसी व्यक्ति का इतने बड़े संवैधानिक पद पर बनाए रखना और रहना–दोनों ही अनुपयुक्त है । लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक बात जो सामने आयी उसका संदेश साफ है कि अधिकारों को प्राप्त कर जिस तरह शक्तियों की दुरुपयोग हमारे राजनेता करते हैं उसी तरह का पदचाप नौकरशाही के गलियारे में भी सुने जा रहे हैं और सबसे बड़ी कवायद तो मौजूदा राजनीति की सर्वशक्तिमानता सिद्ध करना है कि बाद में कोई ऐसा लोकमान फिर न पैदा हो जाए जो इस वर्ग की ओर अँगुली उठाकर देखे ।

लोकमानजी पद छोड़ेंगे या छोड़ने के लिए विवश किए जाएँगे लेकिन इसके बाद अख्तियार का जो स्वरूप होगा वह कुछ अलग सा होगा । यह निश्चित है इस संवैधानिक निकाय का नेतृत्व नौकरशाहों के द्वारा ही होगा मगर ऐसे नौकरशाहों द्वारा जो मानसिक स्तर पर राजनैतिक मिजाज के होंगे और इसमें भी त्रिदलीय बँटवारे का फर्मूला लागू होगा । कार्रवाइयाँ तो इनके द्वारा होंगी लेकिन राजनीतिकर्मी पहुँच के बाहर होंगे । निरीह और लाचार लोग इसके चंगुल में फँसते रहेंगे । इसलिए अब लोकमान का जाना महत्वपूर्ण नहीं बल्कि इसका स्वरूप परिवर्तित होना देश के लिए अशुभ संकेत माना जाएगा ।

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