लोप्रियता क गिरता ग्राफ

Dr.Baburam Bhatraiप्रधानमन्त्री पद पर निर्वाचित होने के तुरंत बाद स्वदेश में निर्मित मुस्तांग की सवारी कर डा. बाबुराम भट्टर्राई की लोकप्रियता में जो इजाफा हुआ था, उसका ग्राफ अब काफी तेजी से नीचे खिसक गया है।
मुस्तांग की सवारी, जनता से सीधे जुडने की कवायद, राहत पैकेज की घोषणा, संविधान निर्माण में सहमति, पडÞोसी देशों से अच्छे संबंध जनता की समस्याओं के समाधान के लिए त्वरित कार्रवाही, मितव्ययिता, सरकारी अफसरों पर लगाम ऐसी कई बातें और ऐसे कई निर्ण्र्ााकिए गए जिससे प्रधानमन्त्री के रुप में डा. भट्टर्राई की लोकप्रियता को काफी ऊँचाई पर ले गया था। आम नेपाली जनता के मन में भट्टर्राई के प्रति एक आशा जगी। लोगों में एक उम्मीद बढÞी की शायद अब देश का कुछ भला होगा। गोया आम आदमी को चैन और सुकून से रहने को मिलेगा। उनकी दैनिक उपभोग की वस्तुएं सहज ही उपलब्ध होंगी। सडÞकंे बनेगी, बिजली होगी, पानी की समस्या से जूझना नहीं पडेÞगा, रसोई गैस सिलिण्डर के लिए हफ्तो इंतजार नहीं करना पडेÞगा, सरकारी काम के लिए अपनी चप्पल व जुत्ते को घिसना नहीं पडेÞगा। चारों ओर एक उत्साह की ऊर्जा संचारित होने लगी थी। सत्ता पक्ष क्या उनके विरोधी भी उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे। और इन सब से अधिक देश की बहुतप्रतिक्षित शान्ति प्रक्रिया के पूरा होने और नयाँ संविधान मिलने की भी उम्मीद बढÞ गयी थी। लेकिन आम आदमी की यह सोच, यह खुशी, यह उत्साह यह उमंग अधिक दिनों तक नहीं टिक पाया। और लोगों ने भट्टर्राई के साथ-साथ माओवादी की भी असलियत देख ली।
भट्टर्राई एक अच्छे इंसान हैं, विद्वान हैं, दूरदृष्टि रखने वाले नेता हैं, लेकिन शायद इन सब में हम यह भूल गए थे कि वो एक वामपंथी ही नहीं एक कट्टर वामपंथी भी हैं। माओत्सेतुंग और लेनिन जैसे तानाशाह क्रूर शासकों के अनुयायी हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि आम जनता का ध्यान उनकी रोजमर्रर्ााी जरुरतों पर केन्द्रित कर अपना असली राजनीतिक एजेण्डा कैसे पूरा किया जाता है। माओवादी होने के नाते भट्टर्राई ने भी वही किया। उनकी असलियत उस समय पहली बार सामने आई जब हत्या के आरोप में सर्वोच्च अदालत से उम्रकैद की सजा पा चुके अपनी ही पार्टर्ीीे सभासद् को आममाफी दिए जाने का फैसला कैविनेट से करवा लिया।
इसके बाद तो एक के बाद एक ऐसे निर्ण्र्ााकिए गए जिससे लोगों का भरोसा भट्टर्राई पर से उठने लगा। इसी बीच आज जनता की जरुरतांे को पूरा करने में भी भट्टर्राई पूरी तरह असफल रहे। उनके कार्यकाल में महंगाई एक बार फिर से चरम पर पहुँच गई। यातायात के साधनों में बेतहाशा मूल्यवृद्धि का पूरे देश में व्यापक विरोध हुआ। जब सरकार ने तेल की कीमतों में एक ही बार इतनी बढÞोत्तरी कर दी कि उनके ही पार्टर्ीीयुवा संगठन, छात्र संगठन उनके विरोध में उतर आए। हालांकि बाद में सरकार झुकी लेकिन भट्टर्राई की साख पर बट्टा लग चुका था। तेल की कीमतों में बढोत्तरी के बावजूद महीने भर तक लोगों को डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस व मिट्टीतेल के लिए लम्बी कतार लगाने की मजबूरी थी। यह तो रही आम जनता की परेशानी।
भट्टर्राई सरकार ने अपने कार्यकाल में राजनीतिक रुप से भी कई विवादास्पद निर्ण्र्ाा बिप्पा जिसके लिए ना सिर्फसरकार की बल्कि प्रधानमन्त्री के रुप में भट्टर्राई की भी किरकिरी हर्ुइ। जनयुद्ध के समय माओवादी जनसत्ता के द्वारा जमीन जायदाद संबंधी निर्ण्र्ााको औपचारिक रुप से मान्यता दिए जाने की बात से सरकार की काफी फजीहत हर्ुइ। तीन हफ्तो तक विपक्षी दलों ने संसद को अवरुद्ध रखा। इस कारण शान्ति व संविधान के कामों पर भी नकारात्मक प्रभाव पडÞा। कांग्रेस-एमाले सहित विपक्षी दलों के साथ-साथ सरकार के घटक दल मधेशी मोर्चा ने भी माओवादी के दबाव में प्रधानमन्त्री द्वारा किए गए इस निर्ण्र्ााको वापस लेेने का दबाव बनाया। आखिरकार सरकार को झुकना पडÞा और अपने निर्ण्र्ााको सरकार ने वापस ले लिया। प्रधानमन्त्री बनने के बाद डा. भट्टर्राई हमेशा ही शान्ति प्रक्रिया को पूरा कर संविधान जारी करने को अपनी पहली प्राथमिकता बताते रहे। लेकिन शान्ति प्रक्रिया से जुडेÞ सेना समायोजन के विषय को लेकर अपनी ही पार्टर्ीीे कुछ नेताओं के कारण प्रधानमन्त्री की काफी फजीहत हर्ुइ। पहले लडÞाकुओं के पर्ुनर्वर्गीकरण को लेकर फिर बाद में उनकी बिदाई को लेकर और फिर स्वैच्छिक अवकास में जाने वाले लडÞाकुओं ने पोल खोला उससेे शिविर के भीतर की असलियत भी उजागर हो गई।
चेक पानेवाले लडाकुओं ने अपने ही कमाण्डारों पर जान से मारने की धमकी देने, चेक को जबरदस्ती अपने कब्जे में कर लेने शिविर के भीतर शारीरिक व मानसिक यातना देने जैसी घटनाओं का पर्दाफाश हुआ। बाद में पता चला कि यह सब आलाकमान के ही निर्देशन से हो रहा है।
यह तो रही शान्ति प्रक्रिया की बात। अब जरा संविधान निर्माण के काम पर नजर डÞालें तो उस में भी प्रधानमन्त्री ने जो बडेÞ-बडेÞ वादे किए थे उन में भी उन की ही पार्टर्ीीारा बाधाएँ उत्पन्न की जाती रही हैं। ऐसा लगता है कि माओवादी नयाँ संविधान बनाने की सोच में ही नहीं है। तभी तो उनका एक पक्ष जो करता है, दूसरा पक्ष उसका विरोध करता है। इसी बीच सर्वोच्च अदालत ने संविधान सभा का कार्यकाल अंतिम बार ६ महीने के लिए बढाए जाने और इस बार संविधान का काम पूरा नहीं होने पर संविधान सभा को ही स्वतः भंग माने जाने का आदेश दिया। जिस समय यह आदेश आया, उस समय से सरकार के पास ६ महीने का समय था, लेकिन संविधान निर्माण के लिए उचित माहौल बनाने के बजाय प्रधानमन्त्री ने अपना समय संविधान सभा पर सुप्रीप कोर्ट द्वारा दिए गए निर्ण्र्ााको वापस करवाने में लगाया। इस बार भी संविधान का काम पूरा करने की नीयत में डा. भट्टर्राई नहीं दिखते। इसलिए तो संविधान निर्माण के लिए प्रमुख दलों के बीच बने अच्छे खासे माहौल और विश्वास के वातावरण को अपने विवादास्पद फैसले से खराब कर दिया और अब जबकि संविधान सभा का समय तेजी से गुजर रहा है, ऐसे में सर्वोच्च अदालत से गुहार लगा रहे है। र्
अर्थमन्त्री के रुप में भट्टर्राई की लोकप्रियता को प्रधानमन्त्री के रुप में एक नई ऊँचाई मिली थी। भट्टर्राई के पास एक ऐतिहासिक मौका था, शान्ति संविधान का काम पूरा कर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने का। लेकिन उन्होंने यह मौका भी गंवा दिया। जनता की नजर में भी उनकी इज्जत कम होती गई। लोकप्रियता का उनका ग्राफ जो एकबार काफी ऊपर चढÞ गया था और देश की जनता उन्हें अपना भावी प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति के रुप में देखने लगी थी, वह ग्राफ सीधे गर्त में जा गिरा है। भट्टर्राई एक असफल डाक्टर साबित हुए है। और उनकी ही बदौलत सरकार की उलटी गिनती भी शुरु हो गई है। ±±±

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz