लोप होती होलैया प्रथा

लोप होती होलैया प्रथा
विजेता चौधरी, जनकपुर चैत्र १०
holayaफागु पर्व में प्रतीकात्मक सन्देश ले कर गाँव घरों में सांगीतिक लहर लाने वाले होलैया प्रथा लोप होने की स्थिति में है ।
मिथिला का परम्परागत वाद्ययन्त्र डम्फू, मजीरा, ढोल और बाँसुरी के तालयुक्त मधुर ध्वनि में फागु राग गाते नाचते घर घर पहुँचकर होली आगमन की संकेत के साथ आपसी भाइचारे की प्रतीकात्मक संदेश प्रवाह करने वाली होलैया प्रथा बुरी तरह से विलुप्त होने की स्थिति में है ।
संस्कृति विद डा. रेवतीरमण लाल बताते हैं– होलैया प्रथा मिथिला का एक कलात्मक एवम् प्रतीकात्मक प्रथा है पर आधुनिकता के साथ साथ बढ़ती तड़क भड़क में उक्त प्रथा गुमनाम होने के साथ ही कुछ स्थान में लघु रुप में ही सीमित है ।
लाल बताते हैं– होलैया में सहभागी पुरुषों के जोश और उमंग से फागु मे अतिरिक्त उत्साह मिलता है । उन लोगों के कर्णप्रिय एवम् मनमोहक फागु राग के तान से समाज का हरेक वर्ग सम्मोहित होने के साथ हँसी मजाक और व्यंग्य से आपसी मतभेद, मनमुटाव स्वतः समाप्त हो जाता था ।
साहित्यकार डा. रामभरोष कापड़ि भ्रमर का कहना है– होलैया की सबसे बड़ी विशेषता यह है की उन लोगों की नृत्य एवम् गायन से वास्तविक रुप से सामाजिक पुनर्निमाण का जग खड़ा होता था । समाजिक कटुता और मनमुटाव को जड़ से समाप्त करना ही होलैया प्रथा का मूल सन्देश है ।
डा. लाल कहते हैं– होली पर्व के समय मे एक महीना पहले से ही होलैया दल नाचगान आरम्भ कर देता था उन लोगों के गायन के साथ प्राचीन राग भी जीवन्त थे यद्यपि एक महीना अधिक लम्बा समय हो गया परन्तु जीवन प्रति उत्साह उमंग भरने के लिए एवम् संस्कृति को बचाने के लिये भी उक्त प्रथा को जीवित रखने की आवश्यकता है ।
वहीं डा. कापडि का कहना हैं– भले ही लघु स्वरुप में लेकिन होलैया प्रथा को पुनः जीवित करना अनिवार्य हो गया है । इस से एक तो फागु राग का संरक्षण होगा दूसरा आपसी भाइचारा बढने के साथ संस्कृति को भी बचाया जा सकता है । नहीं तो आधुनिकता के नाम में होली के अवसर पर निकलने वाली विकृत और अश्लील गीत एवम् व्यंग के प्रभाव से मिथिला का अनेक परम्परा मुक्त नहीं हो सका है ।

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