लड़ाई अब ज़मीन पर होने वाली है, आंदोलन का शंखनाद हो चूका है : मुरलीमनोहर तिबारी

aandolanमुरलीमनोहर तिबारी (सिपु), बीरगंज ,३ मार्च | स्थानीय चुनाव का भोपू और आंदोलन का शंखनाद एक साथ हो चूका है । ग़ौर से देखा जाए तो जिस प्रकार सभी पहाड़ी दल मिलकर संविधान जारी किया, उसी तर्ज़ पर चुनाव भी कराना चाहते है। मधेशी मोर्चा इस मुग़ालते में था, की प्रचंड और शेर बहादुर देउबा को मिला कर संशोधन करा लेंगे। हालांकि मोर्चा ने संशोधन को इस प्रकार प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया की, संशोधन प्रस्ताव के भीतर तफ़्सील पर कोई ध्यान ही नही था, मोर्चा के नेता खुद ही स्वीकार कर चुके थे, की इस संशोधन से मधेश की मांग पूरी नही होती। लचकता अपनाने के चक्कर में इतने लचक्क गए की ओली के प्रस्ताव को ही अपना प्रस्ताव बना लिया।

मधेश में जहाँ भी जाए, पहला सवाल मधेशी पार्टी में है या पहाड़ी पार्टी में ? पहाड़ी पार्टी के नाम पर नापसंदगी और मधेशी पार्टी के नाम पर दूसरा सवाल, कौन से मधेशी पार्टी में ? किसी भी मधेशी पार्टी का नाम ले, फिर नापसन्दगी मिलती है, उसके बाद सवालो की झड़ी लगती है। सुशिल कोइराला को भोट क्यों दिया ? नक्कली राजीनामा क्यों दिया ? सभी नाका बंद क्यों नही हुआ ? तेल का तस्करी किसने करवाया ? नाका बंदी क्यों खुलवाया ? प्रचण्ड के गोदी में क्यों बैठ गए ? कितने शहीदों के घऱ मिलने गए है ? शहीदों के पचास लाख़ कौन खा गया ? आपके कितने लड़के विदेशो में पढ़ते है ? सरकार से समर्थन वापस क्यों नहीं हुआ ? सत्ता-भत्ता के लालच में काठमांडू में क्यों टिके है ? संसद से राजीनामा क्यों नहीं देते है ? इस बार के आंदोलन में पिछले से अलग क्या योजना है ?

इन सवाल जबाब के बाद सवाल आता है, नेता कैसा होना चाहिए ? जबाब आता है नेता ऐसा होना चाहिए, जो हमेशा उपलब्ध हो, हम कुछ भी करे साथ दे, किसी से झगड़ा कर ले तो मुद्दा दर्ज़ ना होने दे, उलटे विपक्षी के ऊपर मुद्दा करा दे। जागीर लगवा दे, मुद्दा जीता दे, सरुआ- बरुआ करा दे। किसी कार्यक्रम में सबसे ज्यादा चंदा दे। जहां कही मिल जाए सारा ख़र्च ख़ुद उठाए, और ये सब करते हुए बिलकुल ईमानदार रहे।

मधेश के जानकार और विश्लेषक ख़बरदार करते रहे, लेकिन मोर्चा को बालू में पानी पटाने का शौक हो गया था। मोर्चा की मज़बूरी थी की आगे के संघर्ष के लिए समय काटना था, सो तो कट गया। चुनाव हुआ या ना हुआ, प्रचण्ड के दोनों हाथ में लड्डू है, इसी लड्डू का जायका जानने के लिए नारायण काज़ी दिल्ली दौरा करके आए और चुनाव का घोषणा हो गया। बाहरी शक्तियां जो मधेश को मदद करती रही है, आगे का खेल और खिलाड़ी को आजमा रही है। बिजय गच्छेदार बड़ी निर्लज्जता के मधेश बिरोधी के हां में हां मिला रहे है। अगर कोई कानून बनता है तो पहला कानून ये बनना चाहिए, मधेश में जनमत कराए बग़ैर कोई ऐरा-गैरा अपने पार्टी के नाम में मधेश का नाम शामिल कर कलंकित ना कर पाए।

अज़ीब बेहूदगी है कि, स्थानीय सीमांकन के निर्धारण के बग़ैर चुनाव की घोषणा, दुनिया में कही नही हुआ होगा। आगे बिना उम्मीदवार के चुनाव हो जाए तो आश्चर्य नही होगा। स्थानीय क्षेत्रनिर्धारण और स्थानीय चुनाव, प्रांतीय सरकार का कार्य है, स्थानीय चुनाव के बाद गांव-गांव में संगठन बनता है, जो किसी भी दल के बुनियाद का काम करता है। जिस प्रकार का गांवपालिका और नगरपालिका बनाया गया है, इसका प्रतिनिधित्व जनसमूह नही, पूंजीपति, दबंग और बाहुबली करेंगे। जिनकी बोली लगेगी, जिनकी खरीदफरोख्त होगी, और जनता इनके चुंगल में फ़सी रहेगी। सरकार चाहती है संशोधन और चुनाव के बीच मोर्चा को उलझाकर रखा जाए, संशोधन का खेल इस क़दर चलता रहे की मोर्चा का ध्यान स्थानीय चुनाव के बारीकियों पर ना जाए।

बर्तमान अवस्था में चुनाव हुआ तो सत्ता का खुलेआम दुरूपयोग होगा, सारे सरकारी तंत्र के सहारे मधेश से पहाड़ी दल को जिताया जाएगा। फिर घर-घर में इनकी घुसपैठ होगी, मधेशी दल के लोगों प्रताड़ित करके झूठे मुकदमो में फसाया जाएगा, फिर ढूढ़ने से भी मधेश का नाम लेने वाला कोई नही मिलेगा, तब बड़ी आसानी से प्रांतीय और संसदीय चुनाव कराए जाएंगे।

सी के राउत की गिरफ़्तारी भी इसी साजिश की एक कड़ी है। सरकार का उद्देश्य था कि राउत की गिरफ़्तारी के बाद मधेश अशांत होगा, द्वन्द होगा, लेकिन जब ऐसा नही हुआ तो मोर्चा से द्वन्द का माहौल बनाया जा रहा है। एमाले का तराई मधेश अभियान इसी का शक्ति प्रदर्शन है। संविधान निर्माण के समय हमारे पास बहुमत नही होने का कारण था, मगर जब लड़ाई ज़मीन पर होने वाली है, तो संघर्ष ही एकमात्र विकल्प है। २३ गते को एमाले भारदह में कार्यक्रम करने वाला है, ये निर्णायक दिन होने वाला है, अब देखना ये है कि इस दिन मोर्चा गौर घटना की पूर्णावृति करता है या एमाले के अश्वमेघ का घोडा आगे बढ़ता है।

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