वट सावित्री व्रत कथा व पूजा विधि : आचार्य राधाकान्त शास्त्री

आचार्य राधाकान्त शास्त्री, इस वर्ष वटसावित्री व्रत  २५ मई २०१७  गुरुवार को किया जाएगा ,

जबकि मूल रूप से इस व्रत में तीन दिन तक व्रत की पवित्रता धारण होनी चाहिए ,जिसके अनुसार 22 मई मंगलवार को व्रत का नहाय खाय , 23 मई बुधवार को एक बार को खीर पूड़ी का भोजन एवं 25 मई गुरुवार को विशेष व्रत किया जाएगा ।

  वट सावित्री व्रत कथा व पूजा विधि :-

वट सावित्री व्रत एक ऐसा व्रत जिसमें हिंदू धर्म में आस्था रखने वाली स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र और संतान प्राप्ति की कामना करती हैं। उत्तर भारत में तो यह व्रत काफी लोकप्रिय है। इस व्रत की तिथि को लेकर पौराणिक ग्रंथों में भी भिन्न-भिन्न मत मिलते है। दरअसल इस व्रत को ज्येष्ठ माह की अमावस्या और इसी मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। एक और जहां निर्णयामृत के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को किया जाता है तो वहीं स्कंद पुराण एवं भविष्योत्तर पुराण इसे ज्येषठ पूर्णिमा पर करने का निर्देश देते हैं। वट सावित्री पूर्णिमा व्रत दक्षिण भारत में किया जाता है, वहीं वट सावित्री अमावस्या व्रत उत्तर भारत में विशेष रूप से किया जाता है| आइये जानते हैं क्या है वट सावित्रि व्रत की कथा और क्या है इस पर्व का महत्व?

वट सावित्रि व्रत कथा :-

वट सावित्रि व्रत की यह कथा सत्यवान-सावित्रि के नाम से उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रचलित हैं। कथा के अनुसार एक समय की बात है कि मद्रदेश में अश्वपति नाम के धर्मात्मा राजा का राज था| उनकी कोई भी संतान नहीं थी| राजा ने संतान हेतु यज्ञ करवाया| कुछ समय बाद उन्हें एक कन्या की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने सावित्री रखा| विवाह योग्य होने पर सावित्री के लिए द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पतिरूप में वरण किया| सत्यवान वैसे तो राजा का पुत्र था लेकिन उनका राज-पाट छिन गया था और अब वह बहुत ही द्ररिद्रता का जी वन जी रहे थे। उसके माता-पिता की भी आंखो की रोशनी चली गई थी। सत्यवान जंगल से लकड़ियां काटकर लाता और उन्हें बेचकर जैसे-तैसे अपना गुजारा कर रहा था। जब  सावित्रि और सत्यवान के विवाह की बात चली तो नारद मुनि ने सावित्रि के पिता राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं
और इस वर्ष के समाप्त होते ही उसका जीवन समाप्त हो जायेगा |”

राजा को सत्यवान की अल्पायु के बारें में ज्ञात होते ही उन्होंने सावित्री से कहा ! “पुत्री ! कोई दूसरा वर ढूढ लो | सत्यवान अल्पायु है, अत: अल्पायु युवक से विवाह करना उचित नहीं है |” तब सावित्री ने अपने पिता से कहा, “ मैंने जिसका एक बार वरण कर लिया है उसका त्याग मैं कदापि नहीं कर सकती पिताजी |”

राजा ने पुत्री की बात मानकर सावित्री और सत्यवान का विवाह कर दिया और विवाह के बाद सत्यवान की दीर्घायु के लिए सभी लोग मंगल कामना करने लगे |

धीरे – धीरे समय बीतता गया और वह समय भी अति निकट आ गया, जिस दिन सत्यवान का देहावसान होने वाला था | सावित्री अपने पति की प्राण रक्षा हेतु तीन दिन पहले से ही व्रत और उपवास रखने लगी और तीसरे दिन उसने पितृदेवों का पूजन किया |
नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने के लिए निकल पड़े | सावित्री ने भी अपने सास – ससुर के पैर छूकर आज्ञा लिया और सत्यवान के साथ जंगल की ओर चल पड़ी |

जंगल पहुंचकर जैसे ही सत्यवान ने लकड़िया काटनी शुरू की उनके सर में दर्द उत्पन्न होने लगा | अत: वह पेड़ से उतर आये और सावित्री की जांघ पर सर रखकर सो गए | कुछ देर उपरांत सावित्री ने देखा कि यमराज उसके समकक्ष खड़े है |

यमराज सावित्री से विधि का विधान बताकर सत्यवान की आत्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए | सावित्री भी उनके पीछे – पीछे चलने लगी | काफी दूर निकल जाने पर यमराज ने सावित्री से कहा, “ मनुष्य जहाँ तक मनुष्य का साथ दे सकता है, वहां तक तुमने सत्यवान का साथ दिया | अब तो तुम्हें लौट जाना चाहिए |” तब सावित्री ने यमराज से कहा, “जहाँ तक मेरे पति की आत्मा जाएगी वहां तक मैं भी जाउंगी | ऐसा करने से दुनिया की कोई शक्ति मुझें नहीं रोक सकती है |”

यमराज ने सावित्री को समझाते हुए कहा, “बेटी मैं तेरी बातों से अत्यन्त प्रसन्न हूँ | अत: तुम सत्यवान के जीवन के अलावा कोई भी वस्तु मुझसें मांग लो |”

सावित्री ने विचार किया और यमराज से कहा, “ महाराज ! मेरे ससुर की दोनों आँखे खराब है, अत: आप कृपा करें कि उनके दोनों नेत्र पूर्वावस्था में चले आवें | यमराज ने कहा, तथास्तु और आगे बढ़ने लगें | सावित्री अभी भी यमराज के पीछे चल रही थी | यमराज ने पीछा छुड़ाने के लिए सत्यवान के जीवन के अलावा दूसरा वर मांगने को कहा तो सावित्री ने अपने ससुर से छीन गया गया राज्य वापस मिल जाने का वर माँगा | यमराज ने कहा, तथास्तु और आगे बढ़ चले | सावित्री अभी भी उनके पीछे – पीछे चल रही थी | एक बार फिर यमराज ने उससे सत्यवान के प्राण के अतिरिक्त वर मांगने को कहा | सावित्री ने इस बार अपने पिता के सौ पुत्र होने की कामना की |

यमराज ने कहा, तथास्तु और आगे बढे | लेकिन सावित्री ने पीछा न छोड़ा | यमराज ने पुन: कहा कि सत्यवान की आत्मा को छोड़कर कोई भी अन्य चीज मांग लो |
सावित्री ने कहा, महाराज ! मुझे न तो सुख की इच्छा है न ही तुच्छ जीवन की इच्छा है और न ही किसी अन्य  वस्तु की | मेरी आप से केवल एक ही प्रार्थना है कि सत्यवान से मुझें सौ पुत्र की प्राप्ति हो | सावित्री ने यमराज के मन में अपने वचन से दया और करुणा का भाव उत्पन्न कर दिया और उन्होंने सत्यवान की आत्मा को छोड़ दिया |

इस प्रकार सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राणों को बचा लिया |

वट सावित्री व्रत का महत्त्व :-

हिन्दू धर्म अनुआयियों में वट सावित्री व्रत का विशिष्ट महत्व माना गया है | ऐसी मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजा करने और सावित्री – सत्यवान की कथा सुनने से सभी मनोकामना की पूर्ति होती है |

वट वृक्ष की पूजा का महत्व : शास्त्रानुसार वट वृक्ष पर व्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है | वट वृक्ष की जड़ में व्रह्मा, धड में विष्णु और ऊपरी भाग में महेश का वास होता है | जो स्त्री वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्ष की पूजा करती है उसकी सभी मनोकामना पूरी होती है |
देवताओं का वास होने के साथ – साथ वट वृक्ष अपनी विशालता और दीर्घायु के लिए भी लोक में प्रसिद्द है | इसलिए भी महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर अपने पति की दीर्घायु की मंगल कामना करती है |

सावित्री और सत्यवान की कथा सुनने का महत्व एवं महात्म्य :-
वट सावित्री व्रत के दिन सावित्री और सत्यवान की कथा सुनने का महात्म्य है | ऐसी मान्यता है कि जो स्त्री वट सावित्री व्रत को रखती है और सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती है उसका सुहाग अमर हो जाता है |

अपने महत्व के कारण ही हिन्दू धर्म में हर सौभाग्यशाली स्त्री वट सावित्री व्रत के दिन पुरे दिन का उपवास रखने के संकल्प के साथ पूजा करती है और सावत्री – सत्यवान की कथा सुनती है |

वट सावित्री व्रत की पूजा कैसे करें ?
वट सावित्री व्रत के दिन प्रात:काल पूरे घर की सफाई करें |
सूर्योदय स्नान के बाद सम्पूर्ण घर को गंगाजल से पवित्र करें |
एक बांस की टोकरी में वट सावित्री व्रत की पूजा की सामग्री (सत्यवान – सावित्री की मूर्ति, बॉस का पंखा, लाल धागा, धूप, मिट्टी का दीपक, घी, फूल, फल, चना, रोली, कपडा, सिंदूर, जल से भरा हुआ पात्र) को व्यवस्थित कर लें |
वट वृक्ष के आस – पास भी सफाई कर लें | अब वट सावित्री व्रत की पूजा आरम्भ करें |
सर्वप्रथम पूजा स्थान पर सावित्री और सत्यवान की मूर्ति स्थापित करें | अब धूप, रोली, सिंदूर व दीप जलाकर पूजा करें |
लाल रंग का कपडा सावित्री और सत्यवान को अर्पित करें और फूल समर्पित करें |
बांस के पंखे से सावित्री और सत्यवान को हवा करें | पंखा करने के बाद वट वृक्ष के तने पर कच्चा धागा लपेटते हुए 5, 11, 21, 51 या 108 बार परिक्रमा करें |
परिक्रमा करेने के पश्चात वट सावित्री व्रत की कथा सुने |
वट सावित्री व्रत में दान बांस की टोकरी में वस्त्र, फल, मिठाई आदि रखकर करें |

आचार्य राधाकान्त शास्त्री

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