वत्र्तमान संविधान में महिला अधिकार: क्या खोया क्या पाया ?

सम्भवतः नारी के प्रति हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास हमारे संस्कार और यत्र नार्यस्तु पूज्यन्तेवाली परम्परा अब स्वयं इतिहास बनने वाली है । चिर प्रतिक्षित संविधान आ चुका है और पुरुष प्रधान मानसिकता अपनी चरम सीमा के साथ संविधान में उभर कर आई है । समानता और अधिकार, महिलाओं के लिए ये खोखले शब्द आने वाले समय में नेपाल के शब्दकोष में ही सिमट कर रहने वाले हैं । किस अधिकार और समानता की बात करें हम ? हम जन्म दे सकते हैं किन्तु अपनी संतान को अपना नाम नहीं, क्योंकि इसके लिए हमें पुरुषों की आवश्यकता है, अगर वो चाहे तो अपना नाम संतान को दे, ना चाहे तो वह संतान नाजायज । खासकर वो विदेशी महिला जो ब्याह कर आती हैं, उनका अस्तित्व तो कहीं रह ही नहीं गया । उनकी अवस्था तो इतनी बदतर है कि ना तो वह अपनी जन्मभूमि की होती है और ना ही कर्मभूमि की और फिर कौन सी और कैसी कर्मभूमि ? जहाँ आप सक्षम हैं भी तो देश की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी आपको नहीं दी जा सकती है, जहाँ आप देश के प्रति समर्पित हो सकती हैं किन्तु वहाँ के महत्वपूर्ण पदों के लायक नहीं हो सकती हैं । क्योंकि आपकी जन्मभूमि यह नहीं है । ये इतने मार्मिक सवाल हैं अंगीकृत नागरिकता प्राप्त महिलाओं के लिए जिनका अस्तित्व कहीं नहीं रह जाता है । संविधान ने देश की महिला को क्या दिया और क्या नहीं दिया, इसी विषय को हिमालिनी ने महिला दिवस के अवसर पर आपके सामने लाने की कोशिश की है,

आइए संविधान में महिला अधिकार के इस महत्वपूर्ण पक्ष को विभिन्न क्षेत्र से सम्बद्ध बुद्धिजीवियों की नजर से देखें —

Dipendra jha 3

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