वरिष्ठ नहीं गरिष्ठ : बिम्मी शर्मा

बिम्मी शर्मा, वीरगंज, १, फरवरी,२०१६ |
हमारे देश और समाज में वरिष्ठों का बोलबाला है । यह वरिष्ठ लोग भारी, भरकम आवाज में भारी शब्द और वाक्य बोल कर अपने आप को वरिष्ठ मान लेते हैं और दूसरों से भी मनवाने की कोशिश करते हैं । यह लोग वरिष्ठ हैं जो गरिष्ठ खाने की तरह हर किसी को हजम नहीं हो पाते हैं । फिर भी हर जगह घुस कर अपना वरिष्ठपन प्रदर्शन करने से बाज नहीं आते ।
कुछ वरिष्ठ लोग ऐसे होते हैं, बात हो या कोई लेख पूरा न पढ़ कर ही उस के बारे में बतियाने और राय देने लगते हैं । क्योंकि इन वरिष्ठ लोगों को लगता है कि किसी को गाहे, बगाहे बिना मांगे राय देना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है । यह नीति, नियम पर खुद नहीं चलते पर दूसरों को चलने की सलाह देते हैं और न चलने पर गुस्साते हैं । क्योंकि वरिष्ठों का धर्म है गुस्सा करना ।
और यह वरिष्ठ नामधारी जीव चाहते हैं, खुद किए गए काम की सभी प्रशंसा करे बधाई दे, पर दूसरों के अच्छे कार्य में बधाई देना तो दूर की बात मीनमेख निकालने में तवज्जो देते हैं । यह वरिष्ठता का पैमाना पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में कुछ ज्यादा ही छलकता है । कुछ साल पत्रकार बन कर पत्रिका में काम किया हो या लेखक बन कर किसी पत्रिका का दो, चार पेज रंगा हो । माशाअल्लाह वह इन्सान खुद को वरिष्ठ या दूसरे ग्रह से आया हुआ एलियन ही समझने लगता है ।
जब यह तथाकथित वरिष्ठ लेखक या पत्रकार ट्विटर और फेसबुक में घुसते हैं तो दूसरों को बर्दाश्त कर पाना मुश्किल होता है । यह चाहते हैं अपने फेसबुक पोष्ट और ट्विट को ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें लाईक और फेभ करें, पसन्द करे, आर्टी और शेयर करें । पर यह खुद किसी के पोष्ट या ट्विट पर झांकना या लाईक करने के लिए माउस को क्लिक करना नहीं चाहते । क्योंकि अपने से कमतर लोगों की लेखनी का वाहवाही करना इन के शान के खिलाफ है ।
इन वरिष्ठों को लगता है कि उनके अलावा कोई दूसरा अच्छा नहीं लिख सकता और नहीं कोई उन से ज्यादा देशप्रेमी और राष्ट्रवादी ही हो सकता है । इनको लगता है कि देश की सारी समस्याओं का हल वह चुटकी में कर देगें । जैसे भानूमती का पिटारा ही है इनके पास । यह वरिष्ठ जन पान, सिगरेट और शराब के बडेÞ शौकीन होते हैं । यहां, वहां पान खा कर पिच्च करना और सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट का धुअाँ छोड़ कर दूसरों को परेशान करना इनका मनपसंद शगल है । पर यही दूसरों को खैनी, सिगरेट और शराब न पीने के लिए घंटो लेक्चर देते हैं ।
और कुछ वरिष्ठों को बडेÞ–बड़े सेलीब्रेटियों से संबध रखना और उन के साथ खिचाए हुए फोटो को सोशल मीडिया पर शेयर कर के खुद को भी सेलीब्रेटी मान लेने का भूत सवार होता है । यदि कोई उन के फोटो पर लाईक और कमेटं न करें तो वह इनबक्स में मैसेज भेज कर हुक्म देते है । मतलब यह कि इन तथाकथित वरिष्ठों की सोशल मीडिया पर दादागिरी खूब चलती है ।
मजे की बात यह कि इनको थोड़ी सी खांसी, बुखार या जुकाम हो जाए तो उस के बारे में सोशल मीडिया पर ऐसे लिखते है जैसे कि इन को कैंसर ही हो गया हो । और उनका यह बयानबाजी तुरंत वायरल हो जाता है । और इनके चाहने वाले इन का राम नाम सत्य हो गया समझ कर मलामी जाने के लिए कमर कस कर खड़े हो जाते हैं । अपने चाहने वालों की यह घड़ियाली आँसू इन वरिष्ठों को खूब प्रिय है । यह बात वरिष्ठ जन नहीं समझते कि सोशल मीडिया एक वर्चुअल संसार है । जो अपना जैसा लगता जरुर है पर अपना नहीं होता । फिर भी यह अपना राग अलापना नहीं छोड़ते ।
यह वरिष्ठ बनने और सामने वाले को कनिष्ठ मानने की बीमारी सब और व्याप्त है । चाहे डाक्टर, इन्जीनियर, प्रोफेसर, नर्स, व्यापारी, नेता, मंत्री और लेखक पत्रकार सभी अपने आप को वरिष्ठ मानने का दम्भ भरते हैं । हां लेखक, पत्रकार और साहित्यकारों नें यह वरिष्ठता का जामा कुछ ज्यादा ही ओढ़ लिया है । जिस के कारण यह दूर से पढ़ने और सुनने में ठीक ठाक लगते हैं । पर नजदीक से तो बाप रे बाप इन के सर मे हद से ज्यादा जुएं है । ये दूसरों से मान, सम्मान और पुरस्कार पाने के लिए तर्क करते हैं झगड़ते हैं पर दूसरों को मान सम्मान देने में इनकी नानी मरती है ।
यह तथाकथित वरिष्ठ जन सार्वजनिक समारोह में दूसरों की व्यक्तिगत बातों पर खुब छींटाकसी करते है । पर जब कोई इन की कमी, कमजोरी पर सार्वजनिक मंच पर बोलने लगता हैं तो खीसें निपोर लेते हैं या वहां से उठ कर चले जाते हैं । क्योंकि अपनी आलोचना और अपमान गरिष्ठ ही होता है जो इन वरिष्ठों से जल्दी हजम नहीं हो पाता । वरिष्ठता का खोल ओढ़ना आसान है पर उस खोल के लायक होना और उस को बचा पाना मुश्किल है । इन वरिष्ठों से आए दिन मुलाकात होती रहती है ।
जैसे तेज मसालेदार तैलीय खाना गरिष्ठ है शरीर इस को हजम नहीं कर पाता और अजीर्ण हो जाता है । उसी तरह हमारे देश और समाज के तथाकथित धुरन्धर वरिष्ठ जन भी गरिष्ठ खाने की तरह ही हैं । जिन को झेल पाना और हजम कर जाना हर किसी के वश की बात नहीं है । समाज के यह वरिष्ठ जन उस उक्ति की तरह है…………
“बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे तार खजुर
पक्षीं को छांया नहीं फल लागे अति दूर” । (व्यंग्य )

Loading...
%d bloggers like this: