वर्तमान मधेशी नेताओं में, स्व.गजेन्द्र नारायण सिंह वाली बात नहीं !

गंगेश कुमार मिश्र , कपिलबस्तु ,१३ जून |
” असीम ऊर्जावान नेतृत्व से परिपूर्ण माननीय स्व.गजेन्द्र बाबू अकेले लड़ते रहे, मधेश के स्वाभिमान और सम्मान के लिए। आज उनकी तस्वीर लटकाए, मधेश के रहनुमा, मधेशियों को बस सब्ज़बाग दिखाने में लगे हैं।”

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गजेन्द्र बाबू अकेले लड़े, लड़ते रहे; उस समय भी ये मधेश के नेतागण थे, किन्तु मधेशी न थे। आज के यही नेतागण, तब नेपाल सद्भावना पार्टी को एक साम्प्रदायिक पार्टी कहा करते थे। कहते थे, ये पार्टी मधेश और पहाड़ के बीच विभेद पैदा कर रही है। उस वक़्त इस पार्टी में कोई आना नहीं चाहता था, सभी घबराते थे। समय के साथ मानसिकता बदली लोगों की, मधेश के नेताओं की। आवश्यकता महसूस हुई मधेश के रहनुमाई की। इस प्रकार  कुकुरमुत्ते की तरह उपजे मधेशी दल, जिसने मधेश में जातीय विभाजन को बढ़ावा दिया।
मुझे आज भी याद है, कपिलवस्तु के सदर मुकाम तौलिहवा का प्रशासन कार्यालय, जहाँ नेपाल सद्भावना पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा घेराव कार्यक्रम आयोजित हुआ करता था। दुकानों से झाँकते मधेशी समुदाय के लोग होते थे और बीस-पच्चीस कार्यकर्ताओं को लाठियों से पीटती सिपाहियों की फ़ौज हुआ करती थी। यह थी एक प्रारम्भिक झलक, मधेश के हक़ के लिए लड़ने वाली पार्टी की; जिसमें आज के मधेशी नेता शामिल होने से कतराते थे, और आज देखिए वही नारा, वही उद्देश्य लिए बहुत सारे बहुरुपिए; अपने आप को मधेशी कहने में गर्व महसूस करने लगे हैं।
शेर की खाल पहन लेने मात्र से, गीदड़ शेर नहीं बन जाता; बड़े दुःख की बात है मधेश की भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले नेतागण, अभी भी सुधरे नहीं हैं। शक्ति प्रदर्शन के पीछे पागल, बड़े-बड़े पण्डाल लगाए; अपनी ही पार्टी का बखान करते न थकने वाले, स्वार्थी मधेशी नेता, एक साझे मंच पर आकर मधेश की लड़ाई लड़ने की बात कभी नहीं करते। अभी भी समय है, हार्दिक अनुरोध है मधेश के नेताओं से, बाज़ आइए अपनी हरक़तों से, मधेश के लिए अपनी स्वार्थ की राजनीति का परित्याग कर एकजुट हो जाइए।
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