वर्ष२०७१-७२ का बजट: क्या चाहा, क्या पाया

कुमार सच्चिदानन्द:पर्ूव निर्धारित समय पर नही,ं मगर समय पर आर्थिक वर्ष२०७१-२०७२ का बजट, नेपाली काँग्रेस में अर्थमंत्री का पर्याय बन चुके माननीय रामशरण ने संविधानसभा के पटल पर प्रस्तुत किया । यह भी एक सुखद संयोग रहा कि यह बजट जननिर्वाचित सरकार के द्वारा प्रस्तुत किया गया और समय पर, अन्यथा विगत के कुछ वर्षों में तो टुकडÞों में बजट आना देश की नियति बन गई थी । श्री महत कुछ अर्थों में भाग्यवान माने जाते हैं कि छठी बार वे अर्थमंत्री बने और इस बजट के द्वारा आर्थिक रूप से देश को निर्देशित करने का प्रयास किया । ६.१८ खरब के इस बजट के सर्न्दर्भ में विवाद भी है, सपने भी और यथार्थ भी । इसलिए इस पर विशेषज्ञों की मिश्रति प्रतिक्रियाएँ हैं । नेपाल फिलहाल अविकसित राष्ट्र की श्रेणी में परिगणित है और इसे विकासशील राष्ट्र की श्रेणी में जाने के लिए सन् २०२२ तक का लक्ष्य रखा गया है । लेकिन इसके लिए जिस पुँजीगत खर्च की आवश्यकता भौतिक विकास-निर्माण के क्षेत्र में है, उसका किंचित अभाव यहाँ देखा जा रहा है । इसके बावजूद इसे सकारात्मक इसलिए माना जा सकता है कि, कम से कम सपना तो चालू बजट में बाँटा गया है । इसके अतिरिक्त बजट से यह भी अपेक्षा की जाती है कि राष्ट्र की वर्तमान समस्या और आमलोगों की दैनिक अपेक्षाओं पर बजट कितना खरा उतरता है । न्यून आर्थिक विकास दर, बढÞता व्यापार घाटा, मूल्यवृद्धि, भौगोलिक असमान विकास, बेराजगारी, ऊर्जा संकट आदि देश के अर्थतन्त्र की चुनौतियाँ हैं । इन समस्याओं के समाधान करने की दिशा में मौजूदा बजट कितना कारगर है, यह भी उसकी सफलता का मानदण्ड हो सकता है । लेकिन सबसे महत्वपर्ूण्ा सवाल तो यह है कि, जिस पारम्परिक कर प्रणाली को निवर्तमान और वर्तमान लोकतांत्रिक सरकारों ने निरन्तरता दी है, उसे देखते हुए मौजूदा बजट के नीतिकारों से तो पूछा ही जा सकता है कि लोकतंत्र सिर्फनारों और सत्ता के बँटवारे तक सीमित है या बजट में भी इसका स्वरूप आना चाहिए और आमलोगों को यह महसूस भी होना चाहिए –new budget nepal 2071-2072
आगामी वर्षके बजट में अर्थमंत्री ने सीमित अर्थों में गरीब और पिछडÞे वर्ग को समेटने का प्रयास करते हुए पाँच सौ से अधिक की संख्या में रोजगार देने वाले उद्योग-कर में राहत देने की बात कर औद्योगीकरण को प्राथमिकता देने का संकेत किया है । लगभग ३ अरब रूपए सांसदों में वितरित कर उनहें संतुष्ट करने का प्रयास किया गया है । पूँजीगत खर्च शर्ीष्ाक में १ं१६ खरब रूपए के विनियोजन का लक्ष्य रखा गया है । कुल बजट का ६४ प्रतिशत रकम दैनिक कार्य संचालन के लिए रखा गया है । वैदेशिक ऋणों के भुगतान और देश की संकटग्रस्त संस्थाओं के लिए १.२ खरब रूपए के विनियोजन का लक्ष्य रखा गया है । आगामी आठ वर्षके भीतर देश को विकासशील राष्ट्र की श्रेणी में ले जाने के लिए ५० अरब पूँजी विकास-निर्माण के मद में खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है । नीतिगत सुधार और बडÞी जल विद्युत परियोजना में ५ प्रतिशत तक कर की छूट देकर विदेशी निवेश को आकषिर्त करने का प्रयास किया गया है । आगामी बजट में ऊर्जा के क्षेत्र में ३७ अरब रूपए का विनियोजन किया गया है जिसमें ऊर्जा का ३५ प्रतिशत बजट प्रसारण लाइन के विस्तार के लिए रखा गया है । सडÞक आदि के पर्ूवाधार विकास के लिए गत वर्षकी तुलना में रकम बढÞाकर ४१ अरब रूपए आवंटित किए गए हैं । कृषि के लिए बैंकों से ऋण लेने पर ६ प्रतिशत से अधिक ब्याज न लगने की बात कहकर अर्थमंत्री ने कृषकों को भी आकर्ष्र्ित करने का प्रयास किया है । इसी तरह जनान्दोलन के घायल, द्वन्द्व प्रभावित आदि वर्ग के लिए भी बजट में कोई न कोई व्यवस्था की गयी है । यह आगामी बजट का लोक कल्याणकारी पक्ष है । कर्मचारियों के वेतन मे १० प्रतिशत की वृद्धि कर इस वर्ग को भी संतुष्ट करने का प्रयास किया गया है साथ ही आयकर की सीमा ५०,००० रूपया बढÞाकर ३,००,००० कर देने से करदाताओं को भी राहत देने का प्रयास किया गया है ।
अपना बजट प्रस्तुत करने के क्रम में अर्थमंत्री ने आगामी वित्तीय वर्षके लिए ६ प्रतिशत विकास दर हासिल करने की बात कही है और यह असम्भव सा लक्ष्य भी नहीं क्योंकि विगत वर्षमें ५.८ प्रतिशत का विकास दर हासिल किया गया है । फिलहाल दो दलों की स्पष्ट बहुमतवाली सरकार है और राजनैतिक स्थिरता की आशा की जा सकती है । मगर सवाल है कि इस विकास दर से क्या हम विकासशील राष्ट्र की श्रेणी में स्वयं को पहुँचा सकते हैं – इसलिए पर्ूव अर्थमंत्री एवं प्रधानमंत्री श्री बाबूराम भट्टर्राई सन् २०२२ तक इस लक्ष्य की प्राप्ति पर आशंका जतलाते हैं और उनकी इस आशंका को निराधार नहीं कहा जा सकता । इस सर्न्दर्भ में एक बात और उभर कर सामने आती है कि विगत वर्षके बजट से १८ अरब ५३ करोडÞ रूपया बचने का अनुमान है जो आगामी बजट के लिए राहत की बात तो है मगर एक नाकारात्मक पक्ष भी । क्योंकि बजट का विनियोजन जितना महत्वपर्ूण्ा है उससे कम महत्वपर्ूण्ा उसके कार्यान्वयन का सन्यन्त्र भी नहीं । इसलिए अगर हम लम्बी छलांग मारना चाहते हैं तो इस बिन्दु पर भी सरकार को संवेदनशील होना चाहिए ।
आगामी वित्तीय वर्षमें महँगाई को ८ प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया है । मान भी लिया जाए कि आगामी आर्थिक वर्षमें महँगाई ८ प्रतिशत तक सीमित रह जाए, मगर सरकार का यह दावा उसकी कपोल कल्पना ही समझा जाना चाहिए । क्योंकि यह सामान्य सी बात आमलोगों के स्तर पर भी समझा जाता है कि खाद्यान्नों से लेकर औद्योगिक उत्पादों के लिए कच्चेमाल और उत्पाद तक भी हमारी आत्मनिर्भरता नहीं है । यूँ तो महँगाई अन्तर्रर्ाा्रीय आर्थिक घटनाक्रम है लेकिन अगर भारत में आलू-प्याज एवं खाद्यान्नों की कीमतें बढÞती है तो नेपाल इससे पीडिÞत और प्रभावित होता ही है । यह सच है कि महँगाई ऐसी चीज है जिसे छुपा कर हम लाल कालीन के नीचे नहीं रख सकते । हाँ, सरकार इसे कुछ हद तक नियंत्रित रख सकती है । भारत की राजनीति के ताजा घटनाक्रमों के मद्देनजर इस बात को और स्पष्ट किया जा सकता है कि महँगाई को मुद्दा बनाकर वर्त्तमान मोदी सरकार सत्ता में आई मगर अन्तर्रर्ाा्रीय बाजार में पेट्रोलियम की कीमतें बढÞी और सरकार को अप्रिय निर्ण्र्ाालेने पडÞे । इसी तरह रेलभाडÞे में भी १० प्रतिशत की वृद्धि की गई । लेकिन मोदी सरकार को अपने वादों के प्रति लापरवाह नहीं कहा जा सकता क्योंकि सरकार ने आवश्यक २३ वस्तुओं को सूचीकृत किया है और इसकी कीमतें नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही है । मगर इस तरह का कोई भी नीतिगत निर्ण्र्ााआगामी बजट में नहीं दिखलाई देता ।
नेपाल कृषि प्रधान राष्ट्र है और आम किसानों के लिए इस बजट का सबसे सकारात्मक पक्ष है बैंकों से लिए गए कृषि ऋण में ६ प्रतिशत का ब्याज दर । आगामी बजट में यह धारणा व्यक्त की गई है कि देश के कुल गार्हस्थ उत्पादन में एक तिहाई योगदान देने वाले कृषि क्षेत्र आज भी आधुनिक और व्यावसायिक नहीं बन सका है । लेकिन इस क्षेत्र की सबसे बडÞी समस्या असिंचित क्षेत्र और उर्वरक आदि का अभाव है । खरीफ की फसलों के समय यह समस्या और अधिक सतह पर आती है और सिंचाई तथा उर्वरक के लिए हाहाकार देखा जाता है । सिंचाई की व्यवस्था और पानी का प्रबंधन तो पूरी तरह यहाँ की सरकार की जिम्मेवारी है । रसायनिक उर्वरक के लिए उद्योग आदि लगाने की बात तो दूर, उसकी आपर्ूर्ति सरकार करा सके, यही कृषि क्षेत्र की सबसे बडÞी चुनौती है । यद्यपि बजट में इस बात की चर्चा है लेकिन यह कितना कारगर होगा यह समय सापेक्ष्य है । यह सच है कि देश में आज भी भुखमरी की नौबत है । दर्ुगम जिलों में खाद्यान्नों की सहज आपर्ूर्ति नहीं हो पाती । इसलिए अत्यधिक गरीब जनता को कम मूल्य पर खाद्यान्न आदि की आपर्ूर्ति की प्रतिबद्धता अगर जतलायी जाती तो बजट को लोकल्याणकारी माना जा सकता था । एक बात तो कही जा सकती है कि जिस समाजवाद के सिद्धान्तों पर हम देश को चलाने की बात करते हैं, वह समाजवाद अभी भी हमारे व्यवहार में नहीं उतर पाया है ।
किसी भी देश के विकास का परिसूचक उस देश के औद्योगिक क्षेत्र और इसका कुलगार्हस्थ उत्पादन में योगदान भी है । यह सच है कि पंचायती काल में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार नहीं हो पाया था, लेकिन जनान्दोलन प्रथम के बाद नीतिगत सुधार के कारण यह क्षेत्र भी विस्तारित हुआ और २०५७-५८ में देश के कुल गार्हस्थ उत्पादन में ९ प्रतिशत तक इस क्षेत्र ने अपना योगदान दिया था । इस समय यह कम होकर ६ प्रतिशत में सीमित हो गया है । इसके कारण निर्यात हतोत्साहित हुआ है और देश आयातमुखी हो गया है । आर्थिक वर्ष२०५७-५८ में देश के कुल आयात की तुलना में निर्यात की स्थिति लगभग ५० प्रतिशत की थी जो आज घटकर १३ प्रतिशत हो गई है जिसके कारण चालू वर्षमें व्यापार घाटा लगभग ६०० अरब होने की संभावना है, जो देश के लिए प्रत्युत्पादक है । वर्त्तमान स्थिति का सबसे बडÞा कारण देश की द्वन्द्वग्रस्तता और विगत की सरकारों की अस्थिरता रही है । यह सच है कि देश द्वन्द्व से निकल चुका है, लेकिन हमारा जो राजनैतिक चरित्र है उसे देखते हुए स्थिरता की ग्यारेण्टी नहीं दी जा सकती । यद्यपि आगामी बजट ने निवेश मैत्री वातावरण देने की बात कही है मगर राष्ट्रीय और अन्तर्रर्ाा्रीय उद्योग जगत इस पर कितना भरोसा करता है यह बात आने वाला समय ही बतलाएगा ।
‘उज्यालो नेपाल समृद्ध नेपाल’ अभियान के साथ आगामी बजट तीन वर्षके भीतर देश के लोडसेडिंग अन्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त करता है । इस अवधि में र्सार्वजनिक क्षेत्र से ५६० और निजी क्षेत्र से ६२८ मेगावाट बिजली उत्पादन की बात कही गई है । लोडसेडिंग अन्त करने के लिए सरकार ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत की सम्भाव्यता पर भी विचार प्रस्तुत किया है । इसी तरह कृषि क्षेत्र के आधुनिकीकरण, विविधिकरण, व्यावसायीकरण , बाजारीकरण की बात कही गई है । यह बजट का लोकलुभावन पक्ष है । लेकिन इसके लिए जिस कार्ययोजना के ठोस प्रारूप की जरूरत है, उसका यहाँ अभाव देखा जा रहा है ।
आगामी बजट में कर्मचारियों के वेतन में १० प्रतिशत की वृद्धि की गई है और आयकर की सीमा बढÞाकर इस वर्ग को भी राहत देने का प्रयास किया गया । यद्यपि यह वर्ग इस वृद्धि से सन्तुष्ट तो नहीं है मगर खामोश है । दरअसल नेपाल के सरकारी कर्मचारियों की आज सबसे बडÞी समस्या यह है कि महँगाई सुरसा के मुँह की तरह निरन्तर बढÞती जा रही है और राहत के लिए इन्हें हर साल बजट का बाट जोहना होता है । सरकार की कृपा के बादल किसी साल बरसते हैं और किसी साल नहीं । निरन्तर उनकी क्रयशक्ति कम होती जाती है । दरअसल कर्मचारियों की समस्या का सबसे बेहतर समधान तो यह हो सकता है कि महँगाई की वृद्धि के सूचकाँक के आधार पर नियमित उनके वेतन की वृद्धि हो लेकिन इसके लिए कोई प्रभावी संयन्त्र नहीं है और उन्हें हर साल बजट का मुखापेक्षी और अर्थमंत्री का कृपाकांक्षी बनना पडÞता है । यद्यपि मौजूदा बजट में एक वेतन आयोग के गठन और उसके रिपोर्ट के आधार पर वेतन पुनरीक्षण की बात कही गई है जो आगामी वित्तीय वर्षके सर्न्दर्भ में कुछ बेहतर की आशा जगाती है ।
इस बजट के सम्बन्ध में एक आरोप यह भी लगाया जाता है कि राष्ट्रीय पूँजी निर्माण करने की दिशा मे मौजूदा बजट में कोई चिन्ता नहीं व्यक्त की गई है । एक अरब से अधिक के निवेश के उद्योग जो अपने लिए विद्युत की आवश्यकता स्वयं पूरी कर सके, ऐसे उद्योगों को कर में छूट दिया गया है । यह प्रावधान बडÞे निवेशकों के लिए तो अनुकूल है लेकिन छोटे और मध्यम दर्जे के निवेशकों को प्रोत्साहित करने की कोई नीति नहीं है । इसी तरह अर्थमंत्री र्सार्वजनिक रूप में दूसरे चरण के उदारीकरण का वक्तव्य देते हैं । लेकिन यह बजट इस सम्बन्ध में मौन है । यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह कार्यक्रम गैरबजट प्रक्रिया द्वारा तो सरकार लाना नहीं तो चाह रही है –
भौगोलिक रूप में असमान आर्थिक विकास भी देश की प्रमुख आर्थिक समस्याओं में एक है । असमानता कम करने के लिए भौगोलिक क्षेत्रों की आवश्यकता, सम्भावना और समस्या जैसे विविध पक्षो की पहचान कर उपयुक्त कार्यक्रम और उसके क्रियान्वयन की कोई व्यवस्था वर्त्तमान बजट में नहीं है । फिर सन्तुलित विकास के लिए पर्ूववर्ती सरकार द्वारा स्थापना किया गया सुदूर पश्मिांचल तथा कर्ण्ााली विकास आयोग के सम्बन्ध में यह बजट मौन है । इससे असमान विकास की समस्या को सम्बोधित करने का लक्ष्य सरकार का नहीं दिखता । इस दृष्टि से तर्राई-मधेश की शिकायत भी सरकार से काफी गहरी रही है । आज भी भीतरी तर्राई-मधेश के गाँव विकास की रोशनी से कोसों दूर हैं । दो गाँवों के बीच सडÞकें नहीं, हैं भी तो पुल नहीं । ग्रेवेल की गई सडÞकें बरसात के मौसम में कीचडÞ और गढ्ढों में परिवर्तित होकर हमारी आर्थिक नीतियों पर व्यंग्य करते दिखलाई देती हैं ।
आज नेपाल की सबसे बडÞी समस्या है कि वाषिर्क ६ लाख युवा शक्ति श्रम बाजार में आते हैं और रोजगार न पाने की अवस्था में विदेशों की ओर रुख करते हैं । इसका परिणाम यह होता है हमारी कृषियोग्य उर्वरा भूमि भी श्रमशक्ति के अभाव में अपनी क्षमता के अनुकूल उत्पाद नहीं दे पाती । इससे एक और सामाजिक समस्या उत्पन्न हो रही है कि गाँव पुरुषविहीन होते जा रहे हैं और महिलाएँ भी सीमा बन्धन को तोडÞकर श्रम की तलाश में विदेश की ओर पलायन कर रहीं हैंंे । यह सच है कि इससे राष्ट्र की जबर्दस्त आमदनी है । लेकिन एक ओर जो हाथ देश के विकास में लगना चाहिए वे विदेशों में अपना योगदान दे रहे हैं, दूसरी ओर महिलाओं के विदेशगमन से अनेक प्रकार की व्रि्रूपताओं की तस्वीर हमारे सामने आती है और किसी न किसी रूप में यह हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान पर भी प्रश्नचिह्न भी खडÞा करता है । यद्यपि सरकार ने कृषि क्षेत्र में अवसर बढÞाकर श्रमशक्ति के इस पलायन को रोकने की बात कही है लेकिन इसे अव्यावहारिक कहा जा सकता है क्योंकि यह क्षेत्र अभी इतना व्यावसायिक नही हो पाया है यह युवाशक्ति को आकषिर्त कर सके ।
यह सच है कि बजट हर समस्या का समाधान नहीं लेकिन यह अपेक्षा तो की ही जाती है कि नीतियाँ समय-समय पर पुनरावलोकित हो । इस बात में किसी की असहमति नहीं हो सकती कि भले ही हमारे विकास का दर कम क्यों नहीं हो मगर हम विकास तो कर रहे हैं । समय के साथ-साथ लोगों का आर्थिक स्तर भी बढÞ रहा है और इसके साथ ही आर्थिक रूप से एक सशक्त मध्यमवर्ग तैयार हो रहा है जिसकी उपभोग की अपनी महत्वाकांक्षाएँ हैं । लेकिन आज भी र्साईकिल को छोडÞ हर वाहन पर कस्टम ड्यूटी अत्यधिक है जिसे पुनरीक्षित करने की सरकार की कोई योजना नहीं दिखलाई देती । वाहनों पर वाषिर्क करों की रूपरेखा भी बजट के पारम्परिक स्वरूप को उजागर करता है । फिर भारतीय वाहनों के नेपाल प्रवेश पर दैनिक करों में जो व्यापक वृद्धि की गई है, उससे तर्राई-मधेश स्वयं को पीडिÞत और प्रभावित महसूस कर रहा है । सम्बन्ध और सरोकार भारत से भी होने के कारण सीमा क्षेत्र में भारतीय वाहनों का आवागमन आवश्यकता भी है और मजबूरी भी । लेकिन नया प्रवेश दर आने के बाद यह समस्या के रूप में सामने आया है ।
आज तर्राई-मधेश मौजूदा बजट में स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है । उनका यह आरोप है कि वर्त्तमान बजट में मधेश की उपेक्षा की गई है । बजट में बारा जिला में जिस अन्तर्रर्ाा्रीय विमानस्थल प्रस्तावित है उसके लिए महज ६० करोडÞ रूपए का विनियोजन किया गया है जो ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ की कहावत चरितार्थ करता है । फिर हुलाकी राजमार्ग के लिए ४० किलोमीटर सडÞक निर्माण की बात कही गई है । यह राजमार्ग जो तर्राई-मधेश की धडÞकन हो सकती है, उसके प्रति सरकार की सम्यक् गम्भीरता नहीं है । तर्राई-मधेश में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के सम्बन्ध में बजट में कोई चर्चा नहीं है । तर्राई के जिला मुख्यालयों की अवस्था जर्जर है, इसके लिए भी बजट मौन है और सबसे बढÞकर कि अगर संविधान समय पर आता है तो देश का संघीयता में जाना सुनिश्चित है लेकिन इसके मद्देनजर बजट में कोई संकेत नहीं । यह बजट तर्राई-मधेश संवेदना का विरोधी इसलिए भी माना जा रहा है कि इसमें तर्राई आन्दोलन के शहीदों और घायलों की कोई चर्चा नहीं । इन्ही बिन्दुओं को आधार बनाकर मधेश केन्द्रित कुछ दल इस बजट का विरोध कर रहे हैं ।
यह सच है कि यह बजट देश का अन्तिम बजट नहीं है । राजनैतिक अस्थिरता का पर्याय बन चुके इस देश में समय पर बजट आना एक शुभ संकेत माना जा सकता है । यह भी निश्चित है कि हमारा जो अर्थतन्त्र है, उसमें जनता की सारी अपेक्षाओं पर खरा उतरना सम्भव भी नहीं लेकिन मूल समस्या यह है कि बजट को संतुलित होना ही चाहिए और देश के अधिकाँश वर्ग के लोग इससे स्वयं को उपेक्षित और पीडिÞत महसूस न करे, यह सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए । हर वर्ग के आत्मसम्मान की रक्षा के साथ-साथ उसकी सन्तुष्टि और असन्तुष्टि को तर्कसम्मत धरातल पर ले जाना आगामी अर्थतंत्र की सबसे बडÞी चुनौती है । इसके लिए सरकार चाहे किसी भी दल का क्यों न हो, राजनीति और अर्थनीति को केंचुल परिवर्त्तन करना होगा और पारम्परिक मनोविज्ञान के आवरण से निकलना होगा ।

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