वसंत पंचमी – सदाबहार ऋतुओं के राजा ‘वसंत’ : विजय यादव

विजय यादव, काठमाण्डू, 19  माघ । वसंत जिसके नाम से ही हर किसी का मन उत्साहों से भर जाता है और जीवजन्तुओं से लेकर इन्सानों का भी रोम–रोम पुलकित हो उठता है । प्रकृति के साथ तारतम्य बनने लग जाता है । न ज्यादा शीत और नाहीं ज्यादा गर्मी । हर किसी को यह ऋतु लुभाने लगती है । पशु–पक्षी से लेकर पूरी धरा पर इसकी खुशी नयीं उर्जा के रुप में दिखाई पड़ने लगती हैं तभी तो हर मन कह उठता है स्वागत है ऋृतुओं के राजा वसंत का । खेत–खलियान, पेड–पौधे सारेंचिजों मे एक नयीं उर्जा के साथ वसंत का स्वागत करनें लगती है ।

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पौराणिक इतिहास
कैसे हुआ देवी सरस्वती का जन्म ? क्यों की जाती है देवी सरस्वती की पूजा ?
कहा जाता है जब ब्रह्मा जी ने भगवान् विष्णु की आज्ञा पाकर सृष्टि की रचना की तब चारों ओर शांति ही शांति थी । किसी भी प्रकार की कोई ध्वनि नहीं थी। विष्णु और ब्रह्मा जी को ये रचना कुछ अधूरी प्रतीत हुयी । उस समय ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से पृथ्वी पर जल छिड़का । जल छिड़कने के बाद वृक्षों के बीच एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुयी । जिन्हें हम देवी सरस्वती के नाम से जानते हैं । जिसके चार हाथ थे । एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था । तिसरें हाथों में पुस्तक एवं चौथे हातों में माला थी । ब्रह्मा जी के अनुरोध पर जैसे ही देवी सरस्वती ने वीणा बजायी सारे संसार को वाणी की प्राप्ति हो गयी । इसी कारण ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती को देवी की वाणी कहा । ये सब बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था ।
विद्या की देवी सरस्वती से ही हमें बुद्धि व ज्ञान की प्राप्ति होती है । हमारी चेतना का आधार देवी सरस्वती को ही माना जाता है । संगीत की उत्पत्ति करने वाली देवी सरस्वती को संगीत की देवी भी कहा जाता है । इन सब कारणों के इलावा देवी सरस्वती की पूजा का एक कारन यह भी मन जाता है कि भगवान् विष्णु ने भी देवी सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें ये वरदान दिया था कि बसंत पंचमी के दिन उनकी पूजा की जायेगी । सबसे पहले श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती का पूजन माघ शुक्ल पंचमी को किया था, तब से बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन का प्रचलन है । फलस्वरूप आज नेपाल लगायत भारत के भी कइ हिस्सों में देवी सरस्वती की आराधना बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से होती है । उसी के अनुरुप आज भी नेपाल लगायत भारत के कइ हिस्सों मे आज माता सरस्वती का पुजन करके उल्लास के साथ वसंत पंचमी का स्वागत करते आ रहे हैं ।

मन में उमंगे भरती, प्रकृति और लोगों को जोड़ने वाली ऋतुओं के रुप मे भी मानी जाती है । जिस उत्साह के साथ जीवन में परिवर्तन का मनुष्य ने स्वागत किया है वही परिवर्तन त्योहारों के रुप में हमारी परंपरा में शामिल होता गया । वसंत पंचमी भी ऋतुओं के उसी सुखद परिवर्तन का एक रुप है । इसके कई रंग है । यह प्रकृति के नए श्रृगार का पर्व हैं और सदाबहार ऋतु है । प्रेम और उल्लास का उत्सव है । इस समय प्रकृति अपने निखार पर होती है । चारों ओर फूल खिलकर, खुश्बू और रंग की वर्षा कर रहे होते हैं । धरती, जल, वायु, आकाश और अग्नि सभी पंचतत्व मोहक रुप में होते हैं । सर्दी की अधिकता के कारण जो पक्षी और जंतु अपने घरों में छिपे होते है, वे भी बाहर निकलकर चहकने लगते हैं । नवजीवन का आगमन इसी ऋतु में होता है । खेतों में पीली–पीली सरसों, अपने पीले–पीले फूलों से किसान को हर्षित करती हैं । यानी ऋतुओं में खिला हुआ, फूलों से लदा हुआ, उत्सव का क्षण हैं वसंत । मौसम का राजा है वसंत । शायद ही किसी मौसम की रुमानियत के इतने गुण गाये होंगे, जितने बसंत के गाये गए हैं । और क्यों ना हो? सबसे खुशनुमा, तमाम फूलों–फसलों से संपंन है ये महीना । इस समय पंचतत्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने हो जाते है । या यूं कहें मौसम और प्रकृति में मनोहारी बदलाव देखने को मिलता है । पेड़ों पर फूल व बौर झूम रहे होते है । उत्तर से आने वाली हवाएं बर्फीली शीत लहरे मीठी ठंड में बदल गयी होती है । फूल झर–झर झड़ रहे होते है । या यूं कहें पूरी प्रकृति पीली छठा, पीली चादर ओढ़ मदमस्त होकर झूम रही होती है । सच ! कहे तो प्रकृति उन्मादी हो जाती है । हो भी क्यों ना ! पुनर्जन्म जो हो गया है । उसका सौन्दर्य लौट आया है ।
तभी तो इस दिन पीले रंग का खास महत्व है। मंदिरों में देवी–देवताओं को लगाये जाने वाले भोग भी वसंती रंग के ही होते है। वसंत के राग गाये–बजाये जाते है । जहां देखों प्रकृति में बसंती रंग लहलहा रहा होता है । इस दिन नेपाल लगायत उत्तर भारत के कई भागों में पीले रंग के पकवान बनाए जाते है, और धुमधाम के साथ विद्या के देवी माता सरस्वती को पुजा जाता है ।
वसंत का आगमन का अर्थ ही है शीत की जड़ता की विदाई । किन्तु अधिक शीत रहने पर जिस तरह बूढ़े घर में सुस्त पड़े रहते हैं, उसी तरह बच्चों भी उस समय कम खेल–कूद करते हैं । इसलिए शीत की विदाई और वसंत के आगमन पर बच्चों और युवक सभी आनन्दोत्सव मनाते हैं ।
वसंत पंचमी ऋतुराज वसंत के स्वागत में मनाई जाती है । महाकवि कालिदास ने इस समय के वसंतोत्सव और मनोत्सव का बड़ा मनोहारी वर्णन किया है । यह उत्सव वसंत पंचमी से प्रारंभ होकर महीनों तक मनाया जाता था। उदयन और वत्सराज राजाओं के समय में इस उत्सव को मनाने की प्रथा थी । इस समय जीवों में तो नवीन संचार होता ही है, पेड़–पौधों में भी उल्लास छा जाता है । शिशिर के कष्टदायी शीत से लोग ऊब जाते हैं । उससे छुटकारा पाते ही सभी चैन की सांस लेते हैं । सुखद–शीतल, मंद–सुगंध समीर लोगों को आंन्नदीत कर देती है। इस समय चराचर की उन्मुक्त प्रसन्नता स्वाभाविक ही है । वसंत को ऋतुराज भी कहते हैं । देवराज इन्द्र को जब कभी किसी ऋषि–मुनि को विचलित करना होता था तो वे अपने मित्र और सहायक काम द्वारा वसंत का सृजन करा लेते थे ताकि सूखी नसों में भी रक्त संचार हो जाए । आदि कवि वाल्मीकि ने श्री रामचन्द्र के ऊपर वसंत के प्रभाव का वर्णन किया है – सुखानिलोयं सौमित्रे, कालरू प्रचुर मन्मथः। गन्धवान् सुरभिमासो जात पुष्प फलद्रुमः।। अर्थात हे लक्ष्मण! इस समय धीरे–धीरे सुखदायिनी हवा चल रही है, यह सुगंधिमय मास है । वृक्षों में चारों ओर फूल–फल आ गए हैं । यह बड़ा ही सुन्दर समय है ।

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