वसन्त तू अन्त कर दुष्कर्म को

नेपाली साहित्य के एक सिद्धहस्त लेखक भुवनहरि सिग्देल की अनेक कृतियाँ पढÞी और सराही गई हैं। अपनी कविताओं में छन्दों की मधुरिमा के लिए सुप्रसिद्ध कवि सिग्देल गद्य-विधा में भी अपनी एक हस्ती रखते हैं।
एक कहावत प्रचलित है- इतिहास मे सिर्फनाम और मिति सत्य होते हैं, लेकिन ऐतिहासिक उपन्यास में -रचनाओं में) नाम और मिति कल्पित होते हैं, बाँकी सब कुछ सच होता है। इस कथन की साथर्कता प्रस्तुत उपन्यास में मिल सकती है। उपन्यास की रोचकता पाठक को बांधे रखती है।
नेपाल में १०४ वर्षों तक राणाओं ने राज किया। उनका घरेलू जीवन कैसा था, उनके शौख कैसे थे, ऐयाशी का आलम कैसा था- इसकी पर्ूण्ा झलक उपन्यास में पाठक को मिल सकती है।
दरबार में खुद की अपनी एक खास भाषा होती है। रीतिरिवाज भी अलग होते हैं। बाहर की दुनियाँ से दरबार की दुनियाँ बहुत मायने में फरक होती है। ऐयाशी के लिए भी दरबार प्रख्यात/कुख्यात होते थे। लखनउ के नबाबों से राणाओं ने ऐयाशी सीखी थी। हर काम के लिए अलग-अलग नौकर चाकर रखे जाते थे। गरीब घरों की लडÞकियां, बेसहारा युवतियां, और मर्द सब दास -दासी के रूप में दरबार की सेवा में अपना पूरा जीवन न्यौछावर कर देते थे। वे बंधुवा मजदूर की तरह होते थे। उनका अपना अलग अस्तित्व समाप्त हो जाता था। ‘रमिला नानी’ एक ऐसी ही पात्र है, इस उपन्यास में। दरबार में किशोरावस्था में प्रवेश करनेवाली रमिला नानी के सारे अरमान, सपने पानी के बुलबुले की तरह चकनाचूर हो जाते हैं।
स्मरणीय है, दरबार सिर्फराणाओं के नहीं होते थे। शाह वंशीय राजाओं की भी लम्बी परम्परा यहाँ रही है और उनके भी दरबार काफी रहस्यमय, ऐर्श्वर्ययुक्त और सुविधा सम्पन्न होते थे।
हे वसन्त तंू कर अन्त !

हे वसन्त तू अन्त कर दुष्कर्म को
समझ मेरी व्यथा और मर्म को
मन्द-मन्द गति में तूने मन मोह लिया
भंवरे को मधुरस पान करा जीवन सफल किया
आनन्द के सागर से शान, सुख सौरभ दिया
मधुरस पियाकर प्रेम का तूने दुःख को हर लिया
है तमन्ना सिर्फतुमसे अहम को तू नाशकर
ऊब चुका है जो जीवन से उसमें तू आश भर
न्ाामरस पीकर रहूँ यह मेरा अधिकार है
‘नरेश’ जो मन से पिया सदा जय जयकार है !
-लेखक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं)

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