वह नेपाल में भारत का स्थान कभी नहीं ले सकेगा

प्रस्तोताः रामाशीष:नेपाल में आगामी १९ नवम्बर की निर्धारित तिथि पर संविधान सभा का दूसरा निर्वाचन शान्तिपर्ूण्ा ढंग से सम्पन्न हो सकेगा या नहीं, इस पर विस्मय की स्थिति कायम है। नेपाली राजनीति से चोली-दामन के रिश्तेवाले देश भारत में, पूरा भारतीय प्रशासन पांच राज्यों एवं २०१४ के संसदीय चुनावों को सम्पन्न कराने की तैयारी में जुट चुका है। स्वाभाविक तौर पर कांग्रेसी नेता तथा भारत के विदेश मंत्री सलमान खर्ुर्शीद भी अपनी पार्टर्ीीथा खुद को भी, भारी बहुमत से विजयी बनाने के लिए प्रचार अभियान में जुट चुके हैं। nepal-china-india_20110807091317
और, इसी अफरा-तफरी एवं परिवर्तन की स्थिति में भारत में नये विदेश सचिव के पद को सुजाता सिंह ने सम्हाला है। श्रीमती सिंह वह दूसरी भारतीय महिला हैं जिन्हें यह गौरवशाली पद सम्हालने का मौका मिला है। वह पिछले १४ सितम्बर को नेपाल के भ्रमण पर आयीं और १५ सितम्बर को वापस लौट गयीं। यह एक संयोग ही है कि नेपाल की इस अफरा-तफरीपर्ूण्ा राजनीतिक परिस्थिति में ही न केवल भारत के विदेश सचिव, अपितु नेपाल में भारत के राजदूत रंजीत रे भी नये हैं तथा भारतीय विदेश मंत्रालय में नेपाल और भूटान मामलों का प्रत्यक्ष आंकलन करते रहने वाले संयुक्त सचिव अभय ठाकुर भी नये हैं। इस पद पर आसीन तथा नेपाल की नस-नस को जाननेवाले अखिलेश मिश्र का तबादला हो चुका है, वह कनाडा स्थित भारतीय राजदूतावास में कार्यभार सम्हाल चुके हैं।
फिर भी ‘भारत’ और ‘भारतीय’ शब्द की एलर्जी-रोग से ग्रस्त तथा भारतीय गतिविधियों पर चुटकियां, चटखारे और फब्तियां कसते रहनेवाले नेपाल के मीडियाकर्मी, सुजाता-भ्रमण पर फब्तियां कसने से बाज नहीं आए। इस समय नेपाल के १३० से भी अधिक एफ.एम. रेडियो स्टेशनों से नेपालियों पर अपने प्रखर भारत-विरोधी घिनौने दृष्टिकोण थोपते रहने में सफल, ब्रिटिश रेडियो ‘बीबीसी नेपाली सेवा’ ने, एक ‘पेशेवर एवं पुश्तैनी भारत विरोधी नेपाली पत्रकार’ के मुंह से यह कहवा ही दिया कि ‘सुजाता सिंह का नेपाल के राजनीतिकर्मियों से साक्षात् भेंट करना, नेपाल की प्रतिष्ठा और स्वाभिमान पर आंच है। जबकि, वस्तुस्थिति यह है कि नेपाल के हर राजनीतिकर्मी की यह जिगरी इच्छा रहती है कि भारतीय उच्चाधिकारियों एवं सरकार के नेताओं से उनका आत्मीय संबंध कायम हो और वह हमेशा बना भी रहे। दोनों देशों के चोली-दामन और बेटी-रोटी के रिश्ते को देखते हुए यह न तो कोई अपराध है और न ही कोई अस्वाभाविक आचरण।
नेपाल के राजनीतिक नेताओं और नेपाल में सक्रिय देशी-विदेशी मीडिया के धुंआधार भारत विरोधी प्रचारों ने भारत और भारतीयों की तस्वीर को किस हद तक धूल-धुसरित कर रखा है, वह आपबीती एक घटना से स्पष्ट हो जाएगा। पिछले १५ सितम्बर को नेपाल के अन्तर्रर्ाा्रीय त्रिभुवन हवाई अड्डे पर भारतीय विदेश सचिव सुजाता सिंह का एक प्रेस कान्प|mेन्स आयोजित किया गया था। जिसमें नेपाली एवं भारतीय पत्रकारों के एक छोटे से समूह ने भाग लिया था। इन पंक्तियों का लेखक भी उनमें से एक था। उस अति संक्षिप्त प्रेस सम्मेलन के बाद लौटते वक्त मुझे अपने एक मित्र पत्रकार के सद्भाव से एक ‘प्रेस स्टीकर’ लगी गाडÞी में बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उस गाडÞी में बैठते ही, गाडÞी के एक लडÞके जैसे ड्राइवर ने, न आव देखा न ताव, अपने पत्रकार बाँस से झट पूछ डाला – ”के भन्यो सुजाता ले – के उसले बताएनन् कि उ नेपाललाई कहिले खान्छ – के उसले बताएनन् कि नेपालको लोडशेडिंग कहिलेसम्म चुचुरोमा पुग्छ र भारतीय बैट्रीको नेपालमा बिक्री बढ्छ -” उस छोटे से डर््राईवर तक के दिलो-दिमाग में भी यह बात बैठ चुकी है कि ‘भारत, नेपाल को निगल जाएगा’ और ‘भारत ही अपने देश में उत्पादित बैट्री की बिक्री बढÞाने के लिए ही नेपाल पर लोडशेडिंग -बिजली की कटौती) थोपे हुए है। इसलिए उसने प्रश्न किया – क्या सुजाता सिंह ने यह नहीं बताया कि भारत, नेपाल को कब निगल जाएगा – क्या उसने यह नहीं बताया कि नेपाल में बिजली कटौती, कब चरम सीमा पर पहुंचेगी, ताकि भारत में उत्पादित बैट्री की नेपाल में बिक्री बढÞ सकेगी।
‘एक डर््राईवर’ और ‘एक पत्रकार’ -एक, भारत को लुटेरा बता रहा है तो दूसरा नेपाल-भारत के बन्धु-बान्धव और बेटी-रोटी के रिश्ते को दरकिनार करते हुए ‘एक सामान्य भेंट’ को नेपाल के ‘स्वाभिमान’ और ‘प्रतिष्ठा’ पर आंच बता रहा है। अल्प-पठित उस बाल-मस्तिष्क नाचीज ड्राइवर के विषवमन को दरकिनार कर दिया जाए, तो भी नेपाली भाषा में बीबीसी रेडियो पर अन्ध-राष्ट्रवादिता का राग अलापने वाले पत्रकार महोदय को यह बताना आवश्यक है कि ”सगे भाई-बन्धुओं, मां-बेटे और भाई-बहनों में ‘स्वाभिमान’ का सवाल उठा कर, एक बन्धु-देश के प्रति विषवमन करते रहना, कदापि उचित नहीं है। क्योंकि, उनके इस विषवमन का, भारत में जीवन-यापन कर रहे लगभग ७५ से ८५ लाख नेपालियों की आजीविका पर सीधा असर पर पडÞ सकता है।
फिर भी, यदि भारत विरोधी विषवमन करनेवाले नेपाली नेता, मीडियाकर्मी और पत्रकार, नेपाल के राष्ट्रीय स्वाभिमान का सवाल बार-बार उठाते हैं और उसकी आडÞ में नेपाल-भारत संबंधों को विषाक्त करते हैं, तो सबसे पहले उन्हें ७५-८५ लाख नेपालियों को भारत से वापस बुला लेना चाहिए। यही नहीं उन्हें भारत के मुर्म्बई, दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में नेपालियों द्वारा ही बेची गईं लगभग दो लाख नेपाली बहू-बेटियों एवं बहनों को अविलम्ब वापस लाने की व्यवस्था करनी चाहिए जिन्हें वेश्यावृत्ति के घृणित धन्धे में लगाया जा चुका है। और, यदि उक्त पेशेवर भारत विरोधियों को इससे भी और आगे जाना हो तो उन्हें महात्मा गांधी के रास्ते पर चलते हुए, नेपाल में भी ‘नमक सत्याग्रह’ प्रारंभ कर, भारतीय नमक और ब्रिटिश वस्त्रों के वहिष्कार की तरह, भारतीय वस्त्रों के वहिष्कार का आन्दोलन चलाना चाहिए। और, वह यदि ऐसा करने में र्समर्थ नहीं हैं तो उन्हें भू-राजनैतिक तथ्यों को आत्मसात करते हुए आधी से अधिक नेपाली आबादी को विदेशों में निम्नस्तरीय जीवन जीने से बचाने के लिए, निकटतम पडÞोसी तथा मित्र देश भारत एवं अन्य सहयोगी मित्र देशों के सहयोग से नेपाल में ही रोजगार का अवसर मुहैया कराने के महान राष्ट्रवादी अभियान में सच्चे मन से लगना चाहिए।
इसी बीच नेपाल-भारत-चीन संबंधों पर कराए गए एक बहस कार्यक्रम में भारत के अवकाशप्राप्त सेना अधिकारी जनरल अशोक मेहता ने दाबा किया है कि नेपाल में चीन किसी भी हालत में भारत का स्थान नहीं ले सकेगा, वह भारत को रिप्लेस नहीं कर सकेगा। चाहे वह नेपाल को अपने प्रभावक्षेत्र में लाने की जितनी भी कोशिश क्यों न कर ले।
दूसरी ओर, नेपाली राजनीति के एक विश्लेषक भरत दहाल बताते हैं कि यदि भारत, तिब्बत मामले पर चीन को निश्चिन्त रहने का विश्वास दिलाने में सफल हो गया तो ‘चीन और भारत’ मिलकर, नेपाल की सौदेवाजी कर सकते हैं और नेपाल के अस्तित्व पर खतरा हो सकता है।
जबकि, नेपाल में कार्यरत रुस के राजदूत र्सजई दे वेनिच्किन बताते हैं कि उन्हें अनेक अन्तर्रर्ाा्रीय मंचों पर भारत के साथ बैठने का मौका मिला है लेकिन कहीं किसी ओर से यह संकेत नहीं मिला है कि ‘भारत और चीन’ के बीच नेपाल पर किसी सौदेबाजी पर बातचीत हो रही है।
एशियायी मामलों के चीनी जानकार प्रोफेसर वांग का मानना है कि चीन द्वारा नेपाल में किए जानेवाले हर काम को भारत का संस्थापन पक्ष, संदेह की नजर से देखता है जबकि भारत में ही अनेक ऐसे विद्वान हैं जो चीन के साथ भारत के मैत्रीपर्ूण्ा संबंध कायम होने के पक्षधर हैं और उन्होंने इस विषय पर पुस्तकें भी लिखी हैं।
बीबीसी नेपाली सेवा द्वारा आयोजित बहस का प्रारंभ भारत के एक अवकाशप्राप्त जनरल की इन पंक्तियों के ‘कोट’ से हुआ- राजा वीरेन्द्र के कार्यकाल का एक समय वह भी था, जब इस्ट-वेस्ट हाईवे बन रहा था और भारत ने सुझाव दिया कि चीन के वर्कर्स या चीनियों को तर्राई में नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे भारत की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। मुझे याद है, तब ‘राजमार्ग निर्माण के चाईनीज कंटै्रक्ट को कैंसिल कर’, वह कंटै्रक्ट भारत को दे दिया गया था।
नेपाली मामले के जानकार जनरल अशोक मेहता ने उक्त उदाहरण दिया- यह बताने के लिए कि एक समय नेपाल में चीन की अपेक्षा भारत का कितना अधिक प्रभाव था। लेकिन, अब वह बताते हैं कि उक्त परिस्थिति में परिवर्तन आना शुरू हो चुका है। इस समय नेपाल में चीन की गतिविधियां -एक्टिविटी) पहले की अपेक्षा बहुत अधिक बढÞ चुकी हैं। हाइड्रो पावर सेक्टर में चीन आ चुका है। भारतीय सीमा से लगे हुए तर्राई में चीनी भाषा सीखाने के कार्यालय -लैंगुएज स्पीकिंग आफिस) एवं ३०-३३ कन्फ््युसियन सेन्टर बन चुके हैं।
जबकि, नेपाल में चीन की बढÞती गतिविधि से भारत के चिन्तित होने के सर्ंदर्भ को एशियायी मामले के चीनी जानकार प्रो. वांग हांग ओइ ने इस रूप में देखा है- भारत लम्बे समय से नेपाल को अपने प्रभाव-क्षेत्र के रूप में देखता आ रहा है। इसलिए चीन द्वारा नेपाल में कोई भी काम शुरू करने के साथ ही, भारत उसे खतरे के रूप में देखता है। वास्तव में वह नेपाल के हर क्षेत्र को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश करता है। चीन और नेपाल, आर्थिक पूंजी निवेश के क्षेत्र में एक दूसरे को सहयोग करने की कोशिश करते हैं तो भारत उसे खतरे के रूप में देखता है। नेपाल में चीन के सहयोग से किए जानेवाले किसी भी विकास के काम को, भारत नुकसान के रूप में देखा करता है। जबकि, ऐसी दृष्टि भारत की जनता की नहीं है। प्रोफेसर वांग इसका आरोप भारत के संस्थापन पक्ष पर लगाते हैं। वह बताते हैं मेरे अनेक भारतीय मित्र हैं, जो कोई पर्ूवाग्रह नहीं रखते और वे लोग चीन के साथ अच्छा संबंध रखना चाहते हैं। वे लोगर् इमानदार हैं और उन लोगों ने चीन और भारत के बीच के संबंध की सही प्रकृति के बारे में किताब भी लिखी है। वे लोग भारत की जनता के सद्भाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन, उस सद्भाव को भारत के अधिकारियों ने स्वीकार नहीं किया है, मुझे ऐसा लगता है।
उत्तर -मेहता)ः भारतीय अधिकारी क्या स्वीकार करते हैं, क्या नहीं- यह अलग बात है, लेकिन चीन द्वारा इस तथ्य को स्वीकार कर लिए जाने का दाबा जनरल मेहता करते हैं कि ‘चीन को भी इस बात का ज्ञान है कि वह भारत को, नेपाल में, किसी भी हालत में रिप्लेस नहीं कर सकता, वह नेपाल में कभी भी भारत का स्थान नहीं ले सकता’।
प्रिश्नः यह तो आपने कहा, लेकिन, चीन तो इस तर्क को नहीं मानेगा। चीन तो यही कहेगा, हां ठीक है, ऐसा पहले रहा होगा, लेकिन इस समय तो हमलोग भारत को रिप्लेस करेंगे, हम ऐसा बखूबी कर सकते हैं। पिछले दिनों भूटान में ऐसा ही देखा गया है। सवाल यह है कि इस प्रकार का रवैया, नेपाल के ट्रान्जिशन अवधि को लम्बा करने में कैसा रोल अदा कर रहा है, वह कितनी भूमिका निभा रहा है –
उित्तर -मेहता) ः आपका आर्व्जर्वेशन एकदम दुरुस्त है कि इस ट्रांजिशन काल में, चीन ने अपने स्थान को, अपने स्पेस को बढÞा दिया है। मेरे विचार में नेपाल में चुनाव के बाद चाहे जो भी सरकार आएगी, उसके मन में चीन के लिए ‘रेड लाईन’ खींची हर्ुइ होनी चाहिए और उसे इस जगह आना ही होगा।
प्रिश्नः यह तो भारत की चाहना है लेकिन वैसा तो चीन भी कर सकता है। और, वैसा होने के बाद, इसी प्रकार नेपाल, ‘पुस एण्ड पुल’ खींचतान का शिकार बना रहा तो नेपाल का संक्रमण काल जल्द ही समाप्त नहीं होनेवाला –
उित्तर -मेहता)ः- यह तो नेपाल सरकार को फैसला करना होगा। एक समय प्रचण्ड जी ने क्या फैसला किया था – मैं २००८ में नेपाल आया था, उस समय पुष्पकमल दहाल जी ने नेपाल टीवी में क्या कहा था – तब वह कहा करते थे ”वी नीड चाइना टू बैलेन्स इंडिया’, ‘हमें नेपाल में भारत को संतुलित करने के लिए चीन की आवश्यकता है’। लेकिन, आज वह ऐसा नहीं कहेंगे। आज २०१३ में प्रचण्ड ऐसा कदापि नहीं कह सकते। हमें विश्वास है २०१३ में प्रचण्ड जी ऐसा किसी भी हालत में नहीं कह सकते। वह कह ही नहीं सकते, ऐसी बात भी नहीं है लेकिन वह ऐसा नहीं कह सकेंगे। क्योंकि, वह इस तथ्य को समझ चुके हैं कि आज नेपाल की भू-राजनीतिक तथा साउथ एशिया का जीओ-पोलिटिक्स क्या है। आनेवाली नई सरकार भी इस बात को समझेगी। अन्यथा, आप ठीक कहते है,ं यह खींचतान ‘पुल पुस’ चलता ही चला जाएगा।
प्रिश्नः पुल-पुस अर्थात् नेपाल के मामले में भारत और चीन के बीच की खींचतान का चलते चला जाना, नेपाल की अस्थिरता को लम्बा करता जाएगा, एक यह विश्लेषण तो अपनी जगह है ही। लेकिन, दूसरी ओर चीन और भारत के बीच नेपाल के बारे में सहमति बनेगी, ऐसा विश्वास करनेवाले लोग भी हैं। उनमें से एक विश्लेषक हैं -भरत दहाल। उनका कहना है –
उित्तर -भरत दहाल)ः एक क्षण के लिए मान लें कि चीन, पश्चिमी शक्तियों को नहीं रोक सका और उसका प्रभाव बढÞ गया। तथा, अबतक इंडिया यहां जिस प्रकार चलाता आ रहा था, मान लें कि उस अवस्था में पश्चिमी शक्तियों का प्रवेश हुआ तो, उन्हें रोकने के लिए इंडियन और चाइनीजों के बीच एक गठबंधन होगा। वैसी अवस्था में यदि तिब्बत के विरुद्ध- कोई भी गतिविधि न करने, तथा तिब्बतियों, खासकर दलाई लामा एवं पश्चिमी शक्तियों को चीन विरोधी गतिविधि नहीं करने देने की गारन्टी भारत ने दिया, तो नेपाल के अस्तित्व पर चीन, भारत के साथ सौदेबाजी कर सकता है, जैसा सिक्किम में देखा गया। उन दिनों चीन कभी सिक्किम का नक्शा, तो कभी इंडिया का विवादित नक्शा दिखाने का काम करता आ रहा है- नेपाल को ट्रांजिट पोआइन्ट बताते हुए, त्रिदेशीय भूमि बताते हुए। अब यह तथ्य भी सामने आ चुका है कि ट्रान्जिट पोआइन्ट के बारे में हर्ुइ इंडियन लोगों के साथ समझदारी की जानकारी, चीन ने नेपाल को नहीं दिया।
उित्तर -नेपाल में रुसी राजदूत)ः चीन और भारत के बीच नेपाल के बारे में वैसी कोई सहमति कायम नहीं हो सकी है, ऐसा संकेत देते हैं, नेपाल के लिए रुसी राजदूत सजै दर्ेइ वेनिच्किन- हमें इस बात की जानकारी है कि चीन और भारत के एजेन्डे मे,ं इस विषय ने वैसा कोई महत्त्व नहीं पाया है। हमलोगों ने उन लोगों की बहस में तो भाग नहीं लिया है लेकिन डि्रक्स शांर्घाई को-आपरेशन आर्गेनाइजेशन जैसे संयंत्रों में होनेवाली अन्तरक्रिया -इन्टरैक्शन्स) कार्यक्रमों के आधार पर हमलोगों के पास पुख्ता जानकारी यह है कि ‘उक्त विषय में इस प्रकार का कोई अभ्यास नहीं हुआ है’। हमें पता है, वे लोग अपने बीच का विश्वास बढÞाने के लिए काफी मेहनत कर रहे हैं। रूसी राजदूत वेनिच्किीन ने उक्त कथन रखने के साथ ही कहा- ‘जानकारी की यह बात है कि हम भारत और चीन शामिल’ अनेक सहयोगी संयंत्रों -नेटववर्क्स) में सहभागी हैं। इसलिए हमारे ये विशेष साझेदार एवं सहयोगी देश, वास्तव में क्या सोचते हैं, इसके बारे में रुस पूरी तरह सचेत है। हम इसमें सुनिश्चित हैं कि न्यायपर्ूण्ा और सहयोगी विश्वमंच तैयार करने की दिशा में वे लोग अपने संबंध एवं अन्तरक्रिया को मजबूत और विश्वासी बनाते हुए आगे बढÞ रहे हैं।
उित्तर -भारत में चीन के पर्ूव राजदूत)ः भारत के लिए चीन के पर्ूव राजदूत पे यूयान इंग ने हाल ही में चाइना डेली अखबार में लिखा था- ‘चीन और भारत, काफी सारे मुद्दों पर मिलना चाहता है, लेकिन कुछ शक्तियां वैसा नहीं होने देना चाहती। वे दोनों देशों के प्रयास को असफल बनाने में लगी हर्ुइ हैं। नेपाल में वैसा कुछ हो रहा है या नहीं, यह एक अलग ही खोज का विषय हो सकता है’।
लिेकिन विश्लेषक दहाल बताते हैं- ‘नेपाल के मामले में भारत और चीन मिल गए तो संकट टलने के बदले और अधिक उलझ जाएगा’। वह बताते हैं उनके बीच कोई भी राजनीतिक समझदारी कायम हर्ुइ तो वह ‘नेपाल के अस्तित्व को चुनौती देने की दिशा में आगे जा सकती है’। मैं केवल अपनी ही बात नहीं करूंगा, मैं तो यह बताना चाहूंगा कि अब वे लोग भी, जो विभिन्न स्वार्थाें के कारण हमारी राजनीति में सक्रिय हैं, अब इससे बाहर निकलने की हालत में नहीं हैं। जैसे मैंने शक्ति संर्घष्ा की बात की- भारतीय, पश्चिमी शक्ति और चाइनीजों की। यदि ये लोग इसी ढंग से आगे बढÞते रहे तो एक के विजयी होने या सफल होने, और बांकी के असफल होने की बात नहीं होगी। अपितु, दोनों का अन्त ही होगा। इसलिए नेपाल का संकट तो ऐसा भयावह है कि न उन लोगों के ही, इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता है और न ही हमारे और आपके बाहर आने का।
प्रिश्नः तो फिर, बाहर निकलने का रास्ता क्या है – इसका सही उत्तर क्या होगा – नेपाल का संक्रमण और कितना लम्बा होगा – इन प्रश्नों का जबाब तो दिया जा सकेगा। लेकिन, असहमति की राजनीति फलने-फूलनेवाले नेपाल में एक को ठीक लगनेवाला समाधान दूसरे को बेठीक नहीं लगेगा, ऐसा कुछ है क्या – यही प्रश्न पूछा जा सकता है, नेपाल में सक्रिय वाहृय शक्तियों के संबंध में भी – ििि

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz