वामपंथ और वर्तमान संकट

कुमार सच्चिदानन्द :साम्यवाद के सैद्धान्तिक पक्षों पर आधारित शासन व्यवस्था विश्व से लगभग विलुप्त हो गई है और जो देश आज इस व्यवस्था आदर्श माना जा रहा है, उसने भी सिद्धांतों का केंचुल बदल लिया है । साम्यवाद के नाम पर तानाशाही और नागरिक अधिकारों के हनन के आधार पर इन्होंने विकास की जो चकाचौंध पैदा की है, उससे उसके भीतर की आह और आँसू को हम देख नहीं पाते तथा समझने की कोशिश भी नहीं करते । आज नेपाल की राजनीति में जो दिशाभ्रम की अवस्था है उसका यही कारण है । सच है कि नेपाल में कम्युनिस्ट दलों की संख्या और इसके समर्थक अधिक हैं । सत्ता, अवसर और तानाशाही इनके संस्कारों में बसा है । यही कारण है कि सर्वसम्मति या सहमति के नाम पर अधिकांश दल सत्ता की कवायद में शामिल हो जाते हैं और अवसर मिलने पर तानाशाही व्यवहार से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते । आज नेपाल की समस्या जटिल से जटिलतर हुई है तो उसका सबसे बड़ा कारण है कि इसे नियंत्रित करने वाली शक्ति के रूप में स्थापित नेपाली काँग्रेस का भी कम्युनिस्टों के साहचर्य में कम्युनिस्टीकरण होने लगा है और तानाशाही प्रवृत्तियाँ इस पर भी हावी होने लगी है । लाख टके का सवाल यह है कि हमारी राजनीति अगर लोकतंत्र के संस्कारों को अपना ले तो समस्याओं का समाधान चुटकियों में किया जा सकता है । अगर हम साम्यवादियों के मक्का की हर एक चीजÞ को चरणामृत मानकर उसकी हर एक वाणी को देववाणी मानते रहे तो समस्याओं के अन्तहीन मार्ग पर देश अग्रसर होता रहेगा ।
राजनीतिक स्पेक्ट्रम के एक छोर पर वामपंथ और दूसरे छोर पर तानाशाही या दक्षिणपंथ को रखते हुए बीच में उदार तन्त्र को अपनाने की परम्परा लोकतन्त्र में रही है । लेकिन एक और तरीका है राजनीतिक स्पेक्ट्रम को समझने का, एक छोर पर एकतन्त्र और दूसरे छोर पर अराजकतन्त्र को रखते हुए, बीच में कानून के शासन अर्थात् गणतन्त्र को रखा जाता है । आज विश्व में जहां कहीं भी वामपंथ का शासन है वहाँ एक तन्त्र या समूह तन्त्र हावी है, मानवधिकार की स्थिति बेहद खराब है, बहुलवाद का नामोनिशान नहीं है । आज वामपंथ पूरी तरह अपने शास्त्रीय पथ से भटक चुका है और नारों के आधार पर जनता को गुमराह करता है ।
नेपाल में साम्यवादी दल दिखाने के लिए वामपंथी डिब्बा तो प्रयोग करते है लेकिन उसके अंदर जो माल होता है वह घोर दक्षिणपंथी विचारधारा से बना होता है । आज वामपंथियों का उद्देश्य खुद को गरीबों की पार्टी सिद्ध कर वोट बैंक की राजनीति करना मात्र रह गया है । जिस प्रकार नेकपा एमाले ने अपनी सरकार में छंटे हुए दक्षिणपंथी और एक वर्ग के शासन की वकालत करने वाले कुछ छंटियल लोगों को उप–प्रधानमन्त्री बनाया है, उसने उनके वास्तविक चरित्र को उजागर कर दिया है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए की एमाले वही दल है जो अपने पार्टी–कार्यालय में जब पश्चिमी देशों के राजदूत को आमन्त्रित करता था तो कार्यालय में टँगे मार्क्स, लेनिन और माओ के चित्र को उतार कर छुपा देता था। इसे दोहरा चरित्र नहीं तो और क्या कहेंगे ।
आज मधेश विकराल समस्या के रूप में अगर देश के सामने खड़ा है तो इसका मूल कारण यह है कि यहाँ की साम्यवादी सरकार इसका साम्यवादी समाधान तलाश रही है । वार्ता के ठोस आधार के बिना वार्ता का नाटक करती है और वार्ता के साए में दमन का चक्र चलाती है । वीरगंज का मैत्री पुल और रुपनी का राजमार्ग बल के आधार पर खाली कराने के सरकारी प्रयास को इसी संदर्भ में देखा और समझा जाना चाहिए । सवाल यह है कि मधेश आन्दोलन के महीनों गुजÞर गए हैं, पूरा देश अभाव की त्रासदी झेल रहा है और नेपाल की राजनीति देश के भीतर समस्या का समाधान ढूँढ़ने के बदले नाकाफी विकल्पों की तलाश में अपना दिमागÞ खपा रही है और समस्या का अन्तर्राष्ट्रीयकरण कर ऐसा जाल बुन रही है जिसमें फँस कर वह खुद दम तोड़ दे ।
साम्यवाद कहता है कि ‘दुनिया शोषण से मुक्त हो ।’ नेपाल की तराई में पारम्परिक रूप से रहने वाले लोग पिछले ढाई सौ वर्षों से शासन द्वारा शोषण की बात करते हैं और अपनी सांस्कृतिक अस्मिता खोने की चिन्ता से मुक्ति के लिए लम्बे समय से आन्दोलनरत हैं ।लेकिन सरकार इसे सुनने के लिए तैयार नहीं । विभिन्न कुतर्कों के द्वारा वह आन्दोलन के महत्व का अवमूल्यन करना चाहती है । आज भी वे अपने नताओं और कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देकर तराई में जनता को यह समझाने के लिए तो भेज ही रहे हैं कि नव संविधान में विभेद की बात नहीं । लेकिन इस मुद्दे पर तराई–मधेश इतना संवेदनशील है कि वह कोई भी कुतर्क सुनने के लिए तैयार नहीं । सरकारी पक्ष अपने नुमाईंदों के माध्यम से आज भी उन वर्गों को लक्षित कर आन्दोलन का प्रतिकार करने के लिए प्रेरित कर रहा है जिसे वह कमजÞोर समझता है या जिस पर अपना प्रभाव होने के प्रति अपने स्तर पर आश्वस्त है । सवाल है कि अगर सरकार समस्या का समाधान चाहती है तो इन हथकण्डों की जÞरूरत क्या ?
‘समानता’ साम्यवाद की धूरी है और इसी समानता की माँग मधेश का मुख्य मुद्दा है । सरकार इस माँग को नाजायजÞ कह सकती है । लेकिन सवाल उठता है कि जब मधेश जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र की माँग करता है या समानुपातिक प्रतिनिधित्व की बात करता है तो उसके मूल में समानता की माँग नहीं तो और क्या है ? नेपाल का जमीनी यथार्थ यह है कि देश की आधी से अधिक आबादी मधेशियों की है लेकिन चाहे शासन का कोई भी संयन्त्र क्यों न हो, वहाँ मधेशियों का सम्यक् प्रतिनिधित्व नहीं है । यह सच है कि सरकार बदलते हुए परिवेश में मधेशियों के लिए अवसर के दरवाजÞे सर्वथा बन्द नहीं किए हैं मगर उसकी मात्रा वह उतना ही रखना चाहती है जितना दाल में नमक । इसलिए अगर मधेश समानता पर आधारित नीतियों के लिए सरकार पर दबाव डाल रहा है तो उसे नाजायजÞ कैसे कहा जा सकता ?
जातीय या नस्लवादी अहंकार जब सिद्धांतों पर भारी पड़े तो उसे राजनीतिक बेईमानी कही ही जा सकती है । आज नेपाल की ऐसी साम्यवादी शक्तियाँ जो सत्ता में शिरकत कर रही है,अगर मधेश आन्दोलन का अवमूल्यन कर रही है तो इसके मूल में इसी मनोविज्ञान को माना जा सकता है । इनकी समस्या यह है कि ये वर्ग संघर्ष की बात तो करते हैं मगर वर्गों की आवाजÞ को दमित करने की तमन्ना रखते हैं ।
एक बात तो हमारे नेताओं को समझना ही चाहिए कि ‘वाद’ चाहे कोई भी हो, वह अतिवादी पंथ है तथा इससे कुछ लोगों का मनोविज्ञान तो संतुष्ट हो सकता है मगर इससे देश और जनता का कल्याण नहीं हो सकता । आज अगर देश विगत दस वर्षों से संवैधानिक समस्या से ग्रस्त है तो इसके मूल में इसी ‘वाद’ की राजनीति है । अगर धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में जाएँ तो साधना से अधिक भक्ति मार्ग को सहज माना जाता है । गौतम बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ भी इसी सहज मार्ग का पर्याय है । इसलिए अगर हम देश का सम्यक् विकास चाहते हैं तो किसी भी वाद से ऊपर उठकर ऐसी नीति का निर्माण करना होगा जिसमें देश का नागरिक स्वयं को सम्मानित महसूस करे । जब तक देश के उपेक्षित समुदाय को सामाजिक न्याय नहीं मिलता तब तक अन्तर्संघर्ष जारी रहेगा तथा समृद्धि और विकास की बात बेमानी मानी जाएगी ।
नेपाल की राजनैतिक जÞमीन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ जो साम्यवादी राजनीति के समर्थक अधिक देखे जा रहे हैं, उसके मूल में साम्यवाद का सैद्धान्तिक आधार न होकर सम्यक् राजनैतिक प्रक्रिया का विकास न होना है । नेपाल में राजनैतिक स्तर पर मध्यममार्गी दलों का अभाव रहा है । नेपाली काँग्रेस जैसी पार्टिया इसका प्रतिनिधित्व करती है लेकिन सत्ता और कार्यकर्ता केन्द्रित राजनीति के कारण इसके समर्थक भी साम्यवादी दलों झोली में गिरते रहे हैं और ये दल समर्थ दिखते रहे हैं । लेकिन समग्र रूप में इनके सैद्धान्तिक जÞमीन को खोखला माना ही जा सकता है । यही कारण है कि वाम और दक्छिन पंथ का तालमेल होते हुए भी यहाँ समय नहीं लगता और अगर कोई वर्ग अगर अपने अधिकारों की बात करता है तो सारे विपरीत मार्गी राजनैतिक दल एक जÞमीन पर खड़ा हो जाते हैं । आज जो समस्या दिखलायी दे रही है उसके मूल में यही कारण हैं ।
नेपाल के साम्यवादी दलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ की जमीनी सच्चाई को न समझते हुए ये हर समस्या का साम्यवादी समाधान ढूँढ़ते हैं, इसलिए उत्तर उन्हें जÞ्यादा प्रिय लगता है । जबकि सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक और यहाँ तक कि भौगोलिक दृष्टि से दक्षिण उसके ज्यादा कÞरीब है और नेपाल के साथ उसका सम्बन्ध जनस्तर का है । इसलिए भारत के साथ उसका संबंध तल्ख होना उसकी राजनैतिक विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न उठाता है । इस मसले को हवा देने में यहाँ के राजनैतिक दल जितने जिम्मेवार हैं उससे कम यहाँ के संचार–माध्यम भी नहीं जिन पर इन राजनैतिक दलों का गहरा प्रभाव है । स्वयं को रास्ट्रवादी सिद्ध करने की होड में ये हमारे अन्तरंग संबंधों की जडें खोदते हैं ।
आज सरकार साम्यवादी दल के नेतृत्व का है और इसमें कुछ दक्षिणपंथियों का भी सहयोग है और कुछ अवसरपंथियों का भी । समग्र रूप से सत्ता के बंदरबाँट की जÞमीन तैयार है । राष्ट्र समस्या से ग्रस्त है और जनता अभाव से त्रस्त । समाधान की बातें गौण हैं और संघर्ष की कूटचाल प्रबल । इस पथ को राष्ट्रवाद कहकर पारिभासित किया जा रहा है मगर हम सब जानते हैं कि इससे राष्ट्र का कल्याण नहीं हो रहा । पूरा देश दो पाटों में विभाजित है । संघर्ष के धुएँ में नीतियाँ गुमराह हैं । आवश्यकता है जमीनी सच्चाई को समझ कर नीतियाँ बनाने और समाधान ढूँढ़ने की । समसामयिक वैश्विक परिवेश में कोई भी ‘वाद’ आधारित नीति से देश का कल्याण नहीं हो सकता ।

loading...