वार्ता के नाम पर खिलवाड़, ओलीजी को और भी आहूति की आकांक्षा है : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू, २६ नोभेम्बर |

100 days of madhesh andolan

ओली सरकार अपने दूसरे महीने में भी सिर्फ बयानबाजी तक ही सिमटी हुई नजर आ रही है । देश के आन्तरिक मामले को सुलझाने की अगर कोई कोशिश हुई है, तो वह है प्रहरी दमन और अपनी ही जनता को मौत की सौगात । कल एक मीडिया में रिपोर्ट देखने को मिला प्रस्तुतकर्ता बड़े ही प्रभावशाली तरीके से कहते हुए नजर आ रहे थे कि “भारत को कोई अधिकार नहीं है यह कहने का कि नेपाल अपनी समस्या का समाधान राजनीतिक स्तर से करे या अपनी समस्त जनता को सम्बोधित करते हुए संविधान में अधिकार दिलाने की बात करे क्योंकि नेपाल कभी भी भारत पर दवाब नहीं डालता कि भारत में बसे नेपालियों पर जो अत्याचार या दमन हो रहा है उसे रोके या उन्हें अधिकार दे । तराई आन्दोलन नेपाल का आन्तरिक मामला है और उसे नेपाल सरकार अपने तरीके से सुलझाएगी ।” बात सही है कि मधेश मुद्दा शतप्रतिशत नेपाल का आन्तरिक मामला है किन्तु गौरतलब यह है कि इस आन्तरिक मामले के प्रभाव से वह पड़ोसी कभी अछूता नहीं रह सकता जिसकी सीमाएँ खुली हुई हैं । वह देश अपनी सीमा की सुरक्षा और अपने नागरिक की सुरक्षा के प्रति उदासीन नहीं हो सकता इस स्थिति में उसकी दिलचस्पी स्वाभाविक है । उसके हस्तक्षेप का हम विरोध कर सकते हैं और नाजायज हस्तक्षेप का विरोध करना भी चाहिए । परन्तु यह कैसे तय किया जाय कि कौन सा भारतीय हस्तक्षेप जायज है या कौन सा नाजायज ? क्योंकि इतिहास गवाह है कि यहाँ के हर आन्दोलन या परिवर्तन में चाहे अनचाहे भारतीय से मदत लिया गया है । विगत के मधेश आन्दोलन को समाप्त करने के लिए भारतीय भूमि में जाकर समझौते कराए गए थे और आन्दोलन को खत्म किया गया था और उस समय अगर यह हस्तक्षेप जायज था तो आज नाजायज कैसे हो गया ?

जहाँ तक नेपाल सरकार यह कह रही है कि यह नेपाल का आन्तरिक मामला है और उसे वह अपने तरीके से सुलझाएगी, आखिर वह तरीका है क्या ? पिछले कई महीनों से आन्दोलन के तहत, चाहे कोईराला सरकार हो या ओली सरकार समस्या समाधान के नाम पर जिस तरीके को अपना रही है वह है मधेश की जनता को मौत देना, निषेधाज्ञा लागू करना और इसकी आड़ में राजधानी तक आवश्यक चीजों की आपूर्ति करना और इन सबसे अहम जो काम सरकार कर रही है वह है राष्ट्रवाद की भावना को उत्तेजित कर के जनता को उसकी आग में झोंकना । यह राष्ट्रवाद सिर्फ भारत के प्रति जनता के मन में सरकार नहीं सुलगा रही, बल्कि देश के महत्वपूर्ण हिस्से के प्रति साम्प्रदायिकता के उग्र रूप को जन्म दे रही है । मधेश मुद्दा का भारतीयकरण करा कर सिर्फ विषवमन किया जा रहा है किन्तु सटीक निष्कर्ष की पहल नहीं हो रही है । भारतीय राजदुत महोदय ने एक अन्तर्वाता में कहा था कि भारत इच्छुक है सभी विवादित मुद्दे पर बात करने के लिए परन्तु आप तो यह माहोल बनाइए कि आप भारत से क्या चाहते हैं ? सिर्फ यह कहना कि भारत अपना फायदा देख रहा है कहकर दोनों देशों की समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता । अब समय आ गया है कि एक खुली बहस हो दोनों पक्ष की ओर से किन्तु इसके लिए आपको पहले अपने देश में एक स्थिरता लानी होगी और शांतिपूर्ण माहोल तैयार करना होगा । किन्तु हमारी सरकार तो अभी लाखों खर्च कर के पार्टियों में व्यस्त है । कालाबाजारी पूरे जोर शोर से जारी है जिनके पास विदेशी पैसे हैं उन्हें कोई परेशानी नहीं है मर तो आम जनता रही है । एम्बुलेन्स में सामानों की तस्करी हो रही है जिसकी वजह से एम्बुलेन्स को भी बाधित होना पड़ रहा है और ऐसे में खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है । खबर आ रही है कि सुनसरी सीमा पर तेल की तस्करी रोकने के क्रम में भारतीय पुलिस ने फायरिंग की है जिसमें कुछ मधेशी नागरिक घायल भी हुए हैं और सीमा पर चौकसी बढा दी गई है । यानि हर ओर से भुगतना मधेश को ही पड़ रहा है । इस घटना को भी नेपाली मीडिया कुछ इस तरह से प्रसारित कर रही है कि जनता भड़के और फिर कुछ असामान्य और दुखद घटना की पुनरावृति हो । एक इमानदार पत्रकारिता का यह उसूल तो बिल्कुल नहीं है ।

राजमार्ग खुलवाने के नाम पर झड़प की स्थिति बनाना और फिर गोली चलाकर जनता को मौत देना क्या यही तरीका है समस्या के समाधान का ? सरकार का ध्यान सिर्फ नाकाबन्दी पर टिका हुआ है, वह उसे हटाने के लिए सभी हथकन्डे अपनाने को तैयार है किन्तु नाकाबन्दी क्यों हुई है और इसका क्या समाधान हो सकता है, उस ओर तो वो सिर्फ वार्ता के नाम पर खिलवाड़ कर रही है । तीन दिन पहले प्रधानमंत्री ने कहा कि एक साझा धारणा बनाने की आवश्यकता है राष्ट्र के नाम पर और सभी विषयों पर लचकता अपनाते हुए समस्या का समाधान खोजा जाना चाहिए । तीन दिन गुजर चुके हैं परन्तु बात सिर्फ बैठक तक ही सीमित है । जिस त्वरित रूप में कदम उठाया जाना चाहिए वह तत्परता नहीं दिख रही । न जाने सरकार कब गम्भीर होगी ? या अभी और भी आहूति लेने की इच्छा है । धर्मग्रंथों में मान्यता है कि अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए बलि प्रदान की जाती है सम्भवतः सत्ता को अपनी स्थिरता बनाए रखने के लिए और भी आहूति की आकांक्षा है देखें ये आहुतियाँ क्या रंग लाती हैं ।

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