वास्तविकता शिक्षा की रमेश झा

शिक्षा शब्द का अर्थ होता है, किसी कार्य विषय या विद्या को सीखने या सिखाने की क्रिया। अर्थात् शिक्षा का मूल उद्देश्य है- मनुष्य में मानवीय गुर्णो का विकास करना, जिससे व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का समग्र विकास हो। मानवीय विकास की पृष्ठभूमि पर ही शिक्षा की प्रभावकारिता का वास्तविक मूल्यांकन किया जा सकता है। शिक्षा और शिक्षक दोनों व्यक्ति, समाज और राष्ट्र में परिवर्तन लाने वाला वास्तविक संवाहक है।
आज नेपाल का हरेक व्यक्ति, हर क्षेत्र असमञ्जस में है। इसलिए नेपाल की शिक्षा व्यवस्था शिक्षा माफिया या पूँजीपतियों के हाथ की कठपुतली बन कर नाच रही है। नेपाली जनता शिक्षा जगत के उमस भरे माहोल से निकलना चाहती है पर निकले कैसे, कारण शिक्षा व्यवस्था चक्रव्यूह में फँस गई है। जहाँ वह छटपटा रही है। निकलने का मार्ग ही नहीं। हालाँकि शिक्षा में बदलाव की बात सब करते हैं। समय-समय में कितने ही आयोग बने और समय के अन्तराल के साथ-साथ ठण्डे बस्ते में चल गए। पुरानी शिक्षा को बदल कर नयी शिक्षा नीति लाई गई, पर वही ढÞाक के तीनपात। कोई भी नीति अपने आप में अधूरी नहीं होती, किसी भी नीति को क्रियान्वित करना जरुरी होता है। नेपाल की शिक्षा नीति इसी का शिकार हो रही है। आज की अदूरदर्शी नीति निर्माता, राजनेता और पदाधिकारियों के द्वारा प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में ब्रहृमलूट हो रहा हैं, शैक्षिक स्तर दिनानुदिन गिरता जा रहा है। पाठ्यक्रम निर्धारण, पाठ्यपुस्तक निर्माण, प्रौढÞ शिक्षा परीक्षा सञ्चालन प्रक्रिया तथा उत्तर पुस्तिका परीक्षण कार्य सब में अनियमितता होने की खबर समय-समय में समाचार माध्यमों से सुनने, पढÞने को मिलती है। इस प्रकार की शैक्षिक अनियमितताओं का शिकार विद्यार्थी वर्ग होता है, जो देश का भावी कर्ण्र्ाार है। जिसके बल पर देश का भविष्य निर्भर करता है। ऐसी स्थिति में हमारे देश का भविष्य कैसा हो सकता है – अनुमान लगाना आसान है। अब जरुरत इस बात की है कि शिक्षा से जुडÞा हर नागरिक, चाहे वह छात्र, शिक्षक, अभिभावक हो, समाज का प्रबुद्ध वर्ग हो या चिन्तनशील नागरिक, यह सोचे कि हमारे देश की शिक्षा कैसी है, कैसी होनी चाहिए और बदलाव कैसे हो – यह तय तभी हो पाएगा।
हमारे देश में हमेशा से असमान शिक्षा नीति लागू होती आ रही है, यही कारण है कि अधिकांश जनता वर्तमान शिक्षा से बंचित रह जाती है। शिक्षा नीति निर्धारण देश की आवश्यकता अनुसार होनी चाहिए। पश्चिमी शिक्षा नीति अनुरुप शिक्षा लागू किया जाना हमारी सबसे बढÞी भूल है। हम में अंग्रेजी एवं पश्चिमीपन का मोह भंग होना जरुरी है। हमें अपनी मिट्टी जलवायु सभ्यता-संस्कृति एवं प्राप्त संसाधन के अनुरुप मौलिक शिक्षा पद्धति की शुरुवात करने की आवश्यकता है। जनता की आकांक्षा, मनोवृत्ति और सम्भावनाओं के आधार पर शिक्षा नीति बनाई जाय, और उसे प्रदान करने की व्यवस्था की जाय साथ ही शिक्षकों में अपने पेशे के प्रति आत्मीयता जगाने के लिए शिक्षा सेवाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन की अपेक्षा है।
इसी सर्न्दर्भ में वर्तमान शिक्षा प्रणाली या नीति में कौन ऐसी कमजोर कडÞी है, जिसे बदलना चाहिए। इसी सवाल से सम्बन्धित विचार शिक्षा क्षेत्र से जुडÞे विभिन्न व्यक्तियों के समक्ष रखा गया, देखें उनके विचार-
विद्यार्थी ही जिम्मेवार
सम्प्रति बायोमेडिकल  इन्जीनियरिंग में प्रोफेसर एवं विभागीय प्रमुख श्रीवास्तव कहते हैं-
मैं अध्यापन में करीब ४३ वर्षो से जुडÞा हूँ। और मैंने इस बीच इस क्षेत्र में काफी उथल-पुथल देखा है। समष्टि में कहा जाय तो हमारे यहाँ शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रयोग किए गए लेकिन कोई प्रयोग कारगर नहीं हो सका। इसके पीछे कई कारण हैं। कुछ लोग राजनीतिज्ञ को दोष देते हैं तो कुछ शिक्षा विशेषज्ञों को। कुछ देश के आर्थिक परिवेश पर ही दोषारोपण करते हैं। कुछ महत्वाकांक्षी लोग तो पडÞोसी देश के कुछ राज्यो के कुशासन एवं शिक्षा व्यापारीकरण को दोषी मानते हैं। साथ ही इस स्थिति के लिए विद्यार्थी वर्ग को ही जिम्मेवार ठहरानेवाले की तादाद भी कम नहीं है। इस स्थिति के लिए एक दूसरे पर दोषारोपण की प्रवृत्ति भी कम जिम्मेवार नहीं है।
लेकिन मेरा स्वयं का अनुभव कहता है कि इसके लिए विद्यार्थी स्वयं ही प्रथमतः जिम्मेवार है। दूसरो को दोष क्यों देना – देश में शिक्षा की स्थिति को सुधारने के लिए विद्यार्थीवर्ग को राजनीति को नकारना होगा और नकारात्मक सोच से ऊपर उठकर कुछ अच्छा, कुछ सकारात्मक, कुछ सुन्दर सोचना होगा और सम्पर्ूण्ा युवा शक्ति को संगठित कर सरकार को उनके भविष्य के बारे में सोचने और कदम उठाने को मजबूर करना होगा। तभी अपने उज्ज्वल एवं सुनहरे भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। अन्यथा आने वाले कुछ वर्षों में भी अन्धकार के अलावा उन्हें कुछ हाथ नहीं लगेगा और कुछ लोगो के हाथों की कठपुतली बनकर अपना और देश का भविष्य बर्बाद करते रहेंगे। भगवान इन्हें सद्बुद्धि प्रदान करें।
शिक्षा का बाजारीकरण न हो
शिक्षा को मुख्य रुप से व्यावसायिक कर दिया गया है। शिक्षा का बाजारीकरण करने से शिक्षा में सामाजिक परिवेश, धर्म-व्यवहार एवं नैतिक विचार उपेक्षित होने के कारण विकृतियाँ हावी हो गई हैं। आज की शिक्षा प्रमाणपत्रप्राप्ति का साधन बनकर रह गई है। आज जो शिक्षा प्रदान की जाती है, उसमें चिन्तन-मनन की परम्परा तथा ज्ञानार्जन की परम्परा को अलग-थलग कर दिया गया है।
शिक्षा क्षेत्र में सक्षम, योग्य, कर्तव्यनिष्ठ एवं वरिष्ठ नेतृत्व का र्सवथा अभाव हो गया है। इसी से इस क्षेत्र में अनेक समस्याएँ आ गई हैं और आती रहेंगी। यदि सौभाग्य से शिक्षा या अन्य क्षेत्र में सही, योग्य, इमान्दार नेतृत्व आए तो मुझे विश्वास है कि बिहार के मुख्यमन्त्री नीतिश की तरह नेपाल का शिक्षाजगत ही नहीं अन्य क्षेत्र भी प्रगति की ओर अवश्य बढेÞगा। नेपाल में सबकुछ है पर सही नेतृत्व नहीं है । कोई भी राष्ट्र शिक्षा को महत्व नहीं दिया तो वह राष्ट्र सबल, सक्षम नहीं बन सकता है ।
शिक्षा क्षेत्र राजनीति से बाहर होना चाहिए
शिक्षा में राजनीति हावी है। शिक्षा आर्जन करने की अपेक्षा राजनीति करने, राजनीति के माध्यम से पैसा बनाने के कार्य में ध्यान देने की वजह से शिक्षा में विकृतियाँ उत्पन्न हो रही हैं। शिक्षा पूँजीपतियों के हाथ में जाने से महंगी हो गई है। ऐसा होने में सरकार की उदासीनता या निकम्मापन मुख्य कारण है, जो देश के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। उचित विधान-कानून एवं शैक्षिक वातावरण स्थापित करने की कडÞी नीति राज्य की ओर से आने पर शिक्षा से विकृतियाँ दूर हो सकती हैं।
योग्य शिक्षक सम्मानित हों
किसी भी राष्ट्र की उन्नति सही शिक्षा से ही संभव है और शिक्षा को समृद्ध बनाने का दायित्व शिक्षकों पर होता है। परन्तु अगर शिक्षक को सही सुविधा नहीं मिले तो वे सच्चे दिल से शिक्षा नहीं दे पा सकेगें। शिक्षक अगर योग्य हों, सुविधा सम्पन्न हों तो वे शिक्षा व्यवस्था को काफी मजबूत बना सकते हैं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों को उनकी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि चाकरी के आधार पर बेतन और अन्य सुविधा मिलती है, जिससे अच्छे शिक्षक दुखी और उदासीन होकर अपने आप को कोसते रहते हैं, और अपनी योग्यता सही दिल से विद्यार्थियों में बाँट नहीं पाते हैं। इसलिए सबसे जरुरी यह है कि शिक्षकों को अच्छा बेतन और अच्छी सुविधा उनकी योग्यता के आधार पर प्राप्त हो, जिससे शिक्षा व्यवस्था मजबूत हो। ऐसा करने पर शिक्षा में वाञ्छित सुधार आ सकता है।
प्रतिबद्ध जनशक्ति का अभाव
शिक्षा पेशा प्रति प्रतिबद्ध जनशक्ति के अभाव के कारण ही नेपाल की शिक्षा व्यावसायिक नहीं हो पा रही है। शिक्षा के नामपर आज निजी शिक्षण संस्था की बढÞत्तोरी है। यह बात सकारात्मक तो है लेकिन ऐसी संस्था में जो बेरोजगार युवा की भीडÞ लगती है, उसमें शिक्षा प्रति प्रतिवद्ध और सक्षम व्यक्ति नहीं आ पाता है। सरकारी निकाय में भी शिक्षा क्षेत्र सुधार के लिए प्रतिबद्ध व्यक्ति नहीं पहुँच पा रहा है। जिसके कारण भी हमारा पाठ्यक्रम व्यावहारिक ढंग से निर्माण नहीं हो पा रहा है।
पाठ्यक्रम व्यावहारिक नहीं हो तो कैसे सीपमूलक और दक्ष जनशक्ति निर्माण होगा – इसी तरह हमारी शिक्षण विधि भी विद्यार्थी केन्द्रित नहीं है। जो पाठ्यक्रम हमारे हाथ में हैं, शिक्षण प्रद्धति सही न होने के कारण भी इस पाठ्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थी सही शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहा है। इसलिए सही और व्यावसायिक शिक्षा के लिए पेशा के प्रति प्रतिबद्ध जनशक्ति, व्यावहारिक पाठ्क्रयम, सही शिक्षण विधि और जीवनपोयोगी शिक्षा की आवश्यकता है। यह सब काम सरकारी स्तर से ही सम्भव होगा।
नैतिक शिक्षा की आवश्यकता
शिक्षा में आई विकृतियों को रोकने के लिए र्सवप्रथम सभी स्तर में नैतिक शिक्षा का समावेश करना जरुरी है। अभिभावक वर्ग भौतिक सुविधा की दौडÞ में इतने व्यस्त हैं कि वे अपनी सन्तति पर आंशिक समय भी नहीं दे पाते। उन्हें बच्चों पर सम्यक ध्यान देना चाहिए। बच्चों को ध्यान-योग का नियमित अभ्यास जरूर कराएँ, जिससे उनमें पढर्Þाई के प्रति एकाग्रता में हो और गुरु के प्रति श्रद्धाभाव बढÞे। जो पाठशाला समय सापेक्ष, पारम्परिक मूल्य एवं मान्यताओं को आत्मसात करे, मूल धार्मिक मर्म को बचावें, वैसे विद्यालय का चयन अभिभावकों को करना चाहिए।
सिद्धान्त में सीमित नहीं होना चाहिए
शिक्षा में सैद्धान्तिक पक्ष अधिक हाबी होने के कारण ही नेपाल में व्यावसायिक और सीपमूलक जनशक्ति का उत्पादन नहीं हो पा रहा हैं। उदाहरण के लिए आज लाखों विद्यार्थी के पास स्कूल और काँलेज की र्सर्टिफिकेट है, लेकिन उनके पास जीने के लिए कुछ आधारभूत और सीपमूलक ज्ञान नहीं है। इसी तरह नेपाल कृषि प्रधान देश है, लेकिन हमारी शिक्षा कृषि उत्पादन के लिए उतना ज्ञान नहीं देता, जो शिक्षा आर्जन करने के बाद विद्यार्थी रोजगारमुखी बन सके। यही कारण है कि उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद भी हर वर्षहजारों नेपाली बेरोजगार बनते हैं। यह बात निश्चित है कि जब बेरोजगार युवा समाज में बढÞते जाएँ तो समाज में अवश्य ही आपराधिक घटना और विकृति की बढÞोत्तरी होगी। इसलिए शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए बडÞी-बडÞी बातें होती हैं, लेकिन बातें, बात में ही सीमित रह जाती हैं। सरकार और निजी क्षेत्र मंे व्यावसायिक शिक्षा के लिए हो रहे प्रयास भी पर्याप्त नहीं है। इस ओर गम्भीरतापर्ूवक ध्यान देकर उसी के मुताबिक पाठ्यक्रम निर्माण हो तो अवश्य ही हमारी शिक्षा में सुधार होगा ।
शिक्षा में नयी पीढी का अभाव
दक्ष शिक्षकों का अभाव ही शिक्षा क्षेत्र व्यावसायिक न होने का कारण है। शिक्षण पेशा में तालिम प्राप्त, नई प्रविधि के जानकार और व्यावसायिक शिक्षक के अभाव के कारण ही सही शिक्षण नहीं हो पा रहा है। विज्ञान और प्रविधि के क्षेत्र में तीव्र विकास कर रहे आज के युग में अधिकांश शिक्षक पुराने हैं, जो नईर्-नई शिक्षण पद्धति और प्रविधि की जानकारी से बेखर हैं। ज्ञान और अनुभव प्राप्त वैसे शिक्षकों के लिए नई प्रविधि के मुताबिक तालिम देने की व्यावस्था भी नहीं है। दूसरी तरफ नई प्रविधि और शिक्षण पद्धति से परिचित युवा पीढी इस क्षेत्र में आना ही नहीं चाहते। क्योंकि कुछ स्थायी सरकारी शिक्षकों के अलावा और सभी शिक्षक अपने पेशे को सुरक्षित नहीं मानते। ऐसी अवस्था में शिक्षण पेशा को सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए सरकार की तरफ से कुछ हो तो जरूर नये और दक्ष व्यक्ति इस क्षेत्र में आ सकते है । विज्ञान और प्रविधि से भरपूर जानकार युवा पीढÞी शिक्षा क्षेत्र में हो तो अवश्य ही हमारी शिक्षा व्यावहारिक और व्यावसायिक बन सकती है। इसी तरह अभी भी हमारीे शिक्षण प्रणाली विद्यार्थी केन्द्रित नहीं है। शिक्षक जितना जानता है, उतना ही शिक्षण करता है। विद्यार्थी का मनोविज्ञान समझ कर शिक्षण कार्य हो तो विद्यार्थी कम ही समय में बहुत कुछ सीख सकता है। इसीलिए शिक्षण क्रियाकलाप और पाठ्यक्रम में भी सुधार लाना जरुरी है। ±±±

हिमालिनी डेस्क: