विकल्प सामाजिक क्रान्ति

जनता के अधिकार के नाम पर हुए बारम्बार के आन्दोलन और संर्घष्ा ने जनता के अधिकार को स्थापित नहीं कर सके, इस तथ्य को स्वयं आन्दोलन का इतिहास ही प्रष्ट करता है। नेपाल में वि.स. २००७ साल से वि.स. २०६३ साल तक हुए आन्दोलन और उस के बाद हुआ राजनीतिक परिवर्तन ने स्थापित किया हुआ राजनीतिक अधिकार जनप्रतिनिधिमुखी हुआ, जनमुखी नहीं हो सका। इसी कारण सभी आन्दोलन के बाद स्थापित राजनीतिक परिवर्तन ने जनता की आवश्यकता और आकांक्षा को पूरा नहीं कर सका और जनता की भावना अनुरुप काम भी नहीं कर सका। इसका मूल कारण, जनता के नाम पर स्थापित अधिकार को जनप्रतिनिधियों ने अपने अनुकूल प्रयोग किया। इसी कारण जनता को अपने से ही किया हुआ आन्दोलन के विरुद्ध उन्हें पुनः दूसरे आन्दोलन के लिए बाध्य होना पडÞा। जिससे वि.स. २००७ साल से वि.स. २०६३ साल तक प्राप्त कोई भी राजनीतिक उपलब्धी को स्थायित्व प्राप्त नहीं हर्ुइ है।
वि.स. २०६२/६३ के जनआन्दोलन के बाद स्थापित संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के ऊपर भी अभी अनेक प्रश्न उठने लगे हैं। कारण है, जनता के बलिदान से स्थापित राजनीतिक परिवर्तन से यदि उसका लाभ जनता प्राप्त नहीं करती तो जनता में उसके प्रति वितृष्णा पैदा होने लगती है और जनता उस परिवर्तन के विकल्प में आगे बढÞने के बारे में सोचने लगती हैं। अभी ठीक वैसी ही अवस्था हमारे देश में दिखने लगी हैं। जनता ने संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र में शान्ति, विकास और प्रगति की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन इस व्यवस्था में भी जनप्रतिनिधियों ने शासन व्यवस्था को अपने अनुकूल बनाए तो जनमानस में आक्रोश बढÞने लगा हैं। संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र का स्थायित्व और स्थापित करने के लिए संविधान निर्माण में दलों का असहयोगी व्यवहार और भावना से संविधान नहीं आने से दल एवं उनके नेताओं के प्रति जनता में अविश्वास बढÞने लगा है। इसी अविश्वास के संकट से आज तक कोई भी राजनीतिक व्यवस्था नेपाल में टिकाऊ नहीं बन सके। अगर राजनीतिक दल इसी तरह आगे बढÞते रहे तो वि.स. २०६२/६३ की उपलब्धि भी अधिक दिन तक टिकऊ नहीं हो सकती।
संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र की घोषणा के दिन से ही विरोधी शक्तियों ने इस व्यवस्था के विरुद्ध में काम करना शुरु कर दिया था। एक ओर इस व्यवस्था का स्थायित्व के लिए काम कर रहे राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं के असहयोगी भावना के कारण ये व्यवस्था स्थापित नहीं हो रही तो दूसरी ओर राजनीतिक दलों के असहयोगी काम से विरोधी शक्ति को धीरे-धीरे शिर उठाने का मौका मिला रहा है। शुरु के दिनों में संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र स्थापना के लिए साथ-साथ चले दल अभी सत्ता के खेल में आगे-पीछे होने के कारण इस व्यवस्था के विरुद्ध अनेक तर्क और कर्ुतर्क उठने के साथ ही विभिन्न षड्यन्त्र भी होने लगे हैं। जिससे लम्बे समय तक अस्थिरता कायम रहने का संकेत मिलता है। राजनीतिक उलझन और अस्थिरता के बीच जनता में उठ रहे तरंग को राजनीतिक दलों ने यदि नियन्त्रित नहीं किया तो पुनः क्रान्ति नहीं होगी, एसा नहीं कहा जा सकता !
मूलतः सामाजिक क्रान्ति नहीं होने से अभी तक कोई भी राजनीतिक परिवर्तन स्थापित नहीं हो सका हैं। अभी तक हुए राजनीतिक परिवर्तनों ने सिर्फराष्ट्रिय एजेण्डा को ही समेटने का प्रयास किया है। सामाजिक परिवर्तन की ओर किसीका ध्यान नहीं गया। समाज में विद्यमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक विभेद और बहिष्करण जैसी समस्याएँ राजनीतिक रुप में नहीं उठने से अभी तक सामाजिक मुद्दों का सही समाधान भी नहीं खोजा जा सका है। समाज में रहे वर्ग, समुदाय और जात जातियों की समस्या समाधान नहीं होने पर कोई भी राष्ट्रिय परिवर्तन समाज में स्थापित नहीं हुआ। समाज परिवर्तन के लिए सामाजिक क्रान्ति अनिवार्य होता है, जो समाज में व्याप्त समस्याओं को बाहर ला कर राष्ट्रिय स्वरुप प्रदान करता है और समाधान के उपायों का निकास ढूंढÞता है। सामाजिक क्रान्ति, समाज में रह रहे जातजाति एवं समुदायों को अपने अधिकार और कर्तव्य पथ पर आगे बढÞने के लिए जागरुकता भी बढाती है, जिससे समतामूलक समाज के निर्माण में मदद मिलती है। समतामूलक समाज का निर्माण ही सामाजिक क्रान्ति का मूल उद्देश्य होता है, जिसके लिए राष्ट्रिय रूप में सामाजिक क्रान्ति करना होता हैं। सामाजिक क्रान्ति को राष्ट्रिय स्वरुप प्रदान कर उसके पश्चात् स्थापित राष्ट्रिय राजनीतिक परिवर्तन मात्र स्थायित्व प्राप्त कर सकता है, जिसके अनेक उदाहरण विश्व के इतिहास में दर्ज हैं।
नेपाल में भी समाज परिवर्तन करने के लिए सामाजिक क्रान्ति की आवश्यकता है, जो समाज को नयाँ दिशा प्रदान करेगी। साथ ही राष्ट्रिय राजनीति को भी स्थायित्व देगी। अभी तक सामाजिक आवश्यकताओं को सम्बोधन न करके राजनीतिक स्थायित्व की खोज नेतृत्व वर्ग करते आ रहे है। वीपी कोइराला से गिरिजाप्रसाद कोईराला होते हुए अभी पुष्पकमल दाहाल तक के नेताओं ने सिर्फराष्ट्रिय राजनीति को राष्ट्रिय धार में रख कर परिवर्तन करने का प्रयास किया। किसी ने भी इसमें सामाजिक धार मिलाने का प्रयास नहीं किया। राष्ट्रिय राजनीति निर्माण का आधार ही सामाजिक परिवर्तन है। इस विषय में अभी तक किसी भी राजनीतिज्ञ, राजनीतिक विश्लेषक ने गम्भीर होकर विचार नहीं किया है। परिणामस्वरुप राजनीतिक उपलब्धियाँ स्थायित्व ग्रहण नहीं कर पा रही है। बडे नेता जडतावादी सिद्धान्त से ऊपर उठ कर अभी तक सामाजिक परिवर्तन की बात नहीं करना चाहते। राजनीतिक सभाओं में नेता बडे-बडे सपने बाँटते है और जनता भी नेताओं की बात सुन कर गद्गद् होती हैं। लेकिन जब वही जनता घर वापस पहुँचती है तो सामाजिक समस्याओं मंे ग्रसित हो जाता है। वह जिस समाज में रहता है, उस में कुछ भी परिवर्तन नहीं होता। कुछ समय बाद समाज में फिर वही नेता के विरोध में आवाज उठने लगती है और नई क्रान्ति की बातें होने लगती है। जिससे सामाजिक व्यक्ति में एक किसिम की व्रि्रोही भावना जागृत होने लगती है और समाज में व्रि्रोह पनपने लगता है।
समाज में व्याप्त समस्याओं को समाधान करने और समाज को सही दिशा प्रदान करने के लिए सामाजिक क्रान्ति के मार्फ जनता को अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति जागरुक करा कर सामाजिक न्याय स्थापित करना होगा। सामाजिक एजेण्डाओं को राष्ट्रिय एजेण्डा से जोडÞ कर राजनीतिक अधिकार का सुनिश्चितता होनी चाहिए। उसके बाद ही कोई भी राजनीतिक परिवर्तन स्थायित्व प्राप्त कर सकता है। सामाजिक क्रान्ति के बाद जनता भी अपने अनुकूल नेताओं का चयन करने में सक्षम होती है। समाज के व्यक्ति में जब तक अपने उत्तरदायित्व का बोध नहीं होगा, तब तक वे अपने भविष्य के प्रति सचेत भी नहीं होंगे। अपने उत्तरदायित्व का बोध होने के बाद उनमें अपना भविष्य निर्माण करने के लिए प्रतिनिधि के चुनाव के प्रति भी सचेतना होगी और सही एवं सक्षम नेतृत्व का चयन होगा। जिससे जनमुखी शासन प्रणाली का निर्माण होगा और समाज में सामाजिक न्याय स्थापित होगा।
-लेखक नेपाल पिछडावर्ग  महासंघ के अध्यक्ष है।)
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