विकास की राह देखता राजविराज

कञ्चना झा:पुरानी कहावत है, ‘बावर्ची ज्यादा हो तो सब्जी खराब हो जाती है ।’ योजनावद्ध ढंग से बसाया गया नेपाल का पहला नगर राजविराज की हालत भी कुछ ऐसी ही है । भारतीय सीमा से जुडÞे दक्षिण-पश्चिमी इस शहर को नगरपालिका का दर्जा मिला है, लेकिन दर्ुभाग्य यह सुन्दर नगर दिनोदिन कुरूप बनता जा रहा है । पिछले दो दशकों से यहाँ विकास का काम लगभग नहीं के बराबर है । सरकार की उदासीनता और स्थानीयवासी में चेतना के अभाव के कारण यह नगर गाँव की ओर उन्मुख है ।
युवा नेता एवं नेपाली काँग्रेस के सभासद रंजित कर्ण्र्ााा कहना है- राजविराज ने बहुत से नेताआंे को जन्म दिया लेकिन नेताओं ने कभी भी इस शहर के विकास के बारे मंे नहीं सोचा । कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे गाँव और शहर दोनों के लिए आवश्यक सभी पर्ूवाधार के होते हुए भी नेताओं ने राजविराज के विकास को कभी एजेन्डा बनाया ही नहीं । भारत की सीमा से लेकर नेपाल के पहाडी इलाके के साथ सीधा सर्म्पर्क होते हुए भी यह शहर विकास से कोसों दूर हो गया है । जातीय नारा लगाकर पर्याप्त संभावना वाले इस शहर को नेताओं ने तबाह कर दिया । सभासद कर्ण्र्ााहते हैं- बहुत हो चुका, अब काम करने का समय आ गया है । विकास के एजेन्डा पर सभी दलों को एक होना पडेÞगा और जनता को भी साथ देना ही होगा ।rajbiraj
सभासद कर्ण्र्ााी बात बहुत हद तक सही दिखती है । अपने नगर का विकास हो यही सोचकर जनता वोट देती है । नेता पर विश्वास कर जनता अपना जनप्रतिनिधि बनाकर संसद में भेजती है । लेकिन दर्ुभाग्य ही कहना चाहिए राजविराज से जनप्रतिनिधि चुने गये विभिन्न दल के नेताओं ने शायद ही संसद में यहाँ के विकास के बारे में सवाल उठाया हो । चुनाव जीत कर जाने के बाद फिर वो अगली चुनाव में ही दर्शन देते हैं और अगले निर्वाचन में वे फिर जातीय विभेद को मुद्दा बना लेते हंै और जनता की आँखो में धूल झोंककर फिर संसद में पहुँच जाते हैं ।
एकीकृत नेकपा माओवादी के सभासद उमेश कुमार यादव का भी मानना है विभिन्न राजनीतिक दल के नेताओं ने राजविराज के विकास को अवरुद्ध कर दिया । प्रजातन्त्र पुनर्स्थापना के बाद तो राजविराज के विकास की गति ही रुक गयी । केन्द्र ने राजविराज नगरपालिका के साथ हमेशा ही विभेद किया और सत्ता में रहे दल के स्थानीय नेताओं ने उस विभेद को स्वीकार किया और अब आकर राजविराज के विकास का सबसे बडÞा दुश्मन कोई है तो- अफवाह । सभासद यादव कहते हंै कि- नियोजित ढंग से अफवाह फैलायी गयी है कि उद्योग, धन्दा, कल कारखाना के लिए राजविराज का वातावरण ठीक नहीं । देशभर की बात करें तो राजविराज जैसा शान्त शहर और कोई नहीं लेकिन अफवाह के कारण उद्योगी-व्यापारी आना नहीं चाहते हंै । और जब तक उद्योग की स्थापना नहीं होगी तब तक शहर गति नहीं ले पायेगा । शायद यही सोचकर उन्होंने संविधानसभा में चुनाव का नारा बनाया था- क्लीन राजविराज, ग्रीन राजविराज- द ग्रेट सप्तरी, द बेस्ट सप्तरी, अप्पन गाम, सुन्दर ठाम । काश सभासद यादव का नारा अभ्यास में उतर जाता तो आज सप्तरी और वहाँ का सदरमुकाम राजविराज कुछ और ही रहता । यद्यपि अपनी ओर से सभासद यादव प्रयासरत हैं । वे कहते हंै- राजविराज जोडÞनेवाली सडÞकें, विमानस्थल और अस्पताल के विकास के लिए प्रयास हो रहा है ।
राजविराज से करीब १० किलोमीटर पूरब में स्थित हनुमाननगर शहर कभी व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था । लेकिन कोशी नदी से सटे हुए इस शहर को कोशी नदी की बाढ ने बार-बार तबाह किया । बि. स. १९८६ में तत्कालीन सरकार ने राजविराज नगर की परिकल्पना की थी । पर्ूर्वी नेपाल के तत्कालीन कमान्डर जनरल बब्बर शमशेर, उनके सहयोगी प्रकाश शमशेर ने राजविराज नगर बसाने की कोशिश की । करीब ६० बीघा जमीन लेकर इन्जीनियर डिल्लीजंग राणा ने इस नगर को बसाया । और बि. स.१९९८ मंे  इसे सदरमुकाम का दर्जा मिल गया । यह नगर सप्तरी जिला और सगरमाथा अञ्चल का सदरमुकाम है और खुद भी एक नगरपालिका है । प्रत्येक चार घर के बाद छोटी गली, फिर सहायक सडÞक और मुख्य मार्ग बनाया गया । एक शहर के लिए आवश्यक सडÞक, ढल निकास, पीने का पानी, सौर्न्दर्य सभी कुछ है इस नगर के पास लेकिन पता नहीं किसकी नजर लगी कि यह शहर आगे के बदले पीछे ही जा रहा है ।र्
वर्तमान राजविराज की बात करें तो, शहर गन्दगी से भरा हुआ है । मुख्य सडÞक पर बडेÞ बडेÞ गड्ढे हंै । सहायक सडÞक अतिक्रमण के कारण गली में परिवर्तित हो गया है और गली तो सूअर चरने का और घर की गन्दगी फेंकने का अखाडÞा बन गया है । नगरपालिका के हिसाब से देखें तो पचास लाख से ज्यादा रुपया सफाई के नाम पर खर्च किया गया है । लेकिन परिणाम की बात करें तो- सहायक रोड से चलने वाले यात्री नाक बन्द कर चलने को बाध्य हैं । कुछ देर बारिश हो जाये तो अधिकांश सडÞक तरणताल बन जाती हैं ।
नेकपा एमाले की सभासद रञ्जु झा ठाकुर का मानना है कि जनता जब तक चेतनशील नहीं होगीे तब तक विकास सम्भव नहीं । उन्हे समझना होगा कि यह जगह हमारी है इसे सुन्दर और विकास के मार्ग पर लाना हमारी जिम्मेवारी है । शिक्षा का स्तर घटता जा रहा है, बेरोजगारी बढÞ रही है और लोगों में उच्छृ्रंखलता भी बढÞती जा रही है । सभासद रञ्जु ठाकुर आगे कहती हंै कुनौली- राजविराज, राजविराज-रुपनी रोड लगायत राजविराज के विकास के लिए कुछ नयी योजना बजट में समावेश की गयी है लेकिन  योजना का कार्यान्वयन भी स्थानीय वासी पर ही निर्भर करता है ।
शहर असुरक्षित बन गया है । लागू औषध सेवनकर्ता और राजनीति के नाम पर खुला सशस्त्र समूह  शाम होते ही सक्रिय हो जाते हंै और अकेले चलना मुश्किल हो जाता है । लूटपाट, चोरी आम बात बन गयी है । स्थानीय प्रशासन मूक दर्शक बनकर रह गया है । स्थानीय लोगों का कहना है- प्रशासन और लुटेरों के बीच मिलीभगत है ।
स्थानीय पत्रकार हेमशंकर सिंह का कहना है नगरपालिका विगत १२ सालों से जनप्रतिनिधि विहीन है । जनप्रतिनिधि नहीं होने के कारण लोग उच्छृ्रं्रखल बन गये हैं और भौतिक पर्ूवाधार सामग्री को तोडÞ कर हो या चुरा कर  अपने घर में ले जाते है । शहर में अतिक्रमण बढÞ गया है और शहर दिनोदिन कुरूप बनता जा रहा है । अब तो हालत यह है कि स्थानीय वासी, नगरपालिका या और कोई भी निकाय अकेले कुछ नहीं कर सकता है । नगरवासी जब तक चेतनशील नहीं होंगे और विकास के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप बगैर सामूहिक प्रयास जब तक नहीं होगा तब तक राजविराज का आगे बढÞना मुश्किल है ।
औद्योगिक रूप से आगे बढÞने के लिए सन् १९८८ में राजविराज में औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना की गयी । शहर से करीब चार किलोमीटर उत्तर मलेट गाँव में २२ बीघा जमीन को लेकर राजविराज औद्योगिक क्षेत्र बनाया गया । भारतीय निवेश में निर्माण किया गया यह औद्योगिक क्षेत्र सन् १९९३ में नेपाल सरकार को हस्तान्तरण कर दिया गया । लेकिन बिना कोई उद्योग सञ्चालन हुए यह क्षेत्र जर्ीण्ा बन गया । संरचनाए ध्वस्त होती जा रही हंै । दरअसरल औद्योगिक क्षेत्र तो बनाया गया लेकिन शहर को राजमार्ग और सीमा से जोडÞने की बात पर ध्यान नहीं दिया गया । करीब १२ किलोमीटर दक्षिण में अवस्थित भारतीय शहर कुनौली से जोडÞनेवाली सडÞक वर्षों से जर्ीण्ा है । उद्योग के लिए आवश्यक कच्चा पदार्थ दूसरे सीमावर्ती नाका से लाने में खर्च ज्यादा होता है और ऐसे में व्यापारियों के लिए यहाँ उद्योग स्थापना करना उतना सहज नहीं ।
किसी समय शिक्षा के लिए राजविराज का नाम लिया जाता था । अच्छे स्कूल और काँलेज थे । कानून की पढर्Þाई तो पूरव में सिर्फमहेन्द्र बिन्देश्वरी क्याम्पस में हुआ करती थीा । न्यायिक क्षेत्र में अभी भी देश में जितने लोग हैं अधिकांश इसी काँलेज से पढÞे हुए हैं । लेकिन अभी राजविराज का शिक्षा-क्षेत्र ध्वस्त बनता जा रहा है । राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण काँलेज और स्कूल में पढर्Þाई से ज्यादा गुण्डागर्दी होने लगी है ।
नेपाल की राजनीति में राजविराज हमेशा नेतृत्व से नजदीक रहा । राजतन्त्र के दौरान भी यहाँ के बहुत से लोग मन्त्री, अञ्चलाधीश रह चुके हैं । लोकतन्त्रवादी नेता रामराजा प्रसाद सिंह और मधेश मुक्ति आन्दोलन के अग्रणी गजेन्द्र नारायण सिंह का कार्यक्षेत्र भी राजविराज ही रहा और २०६३ में मधेश आन्दोलन की शुरुआत भी इसी शहर से हर्ुइ थी और पहली शहादत भी इसी नगरवासी ने दी थी ।
वास्तव में देखा जाय तो इस शहर के पास हिम्मत, बौद्धिक क्षमता और पर्ूवाधार भी पर्याप्त है । पर्यटन की भी प्रशस्त संभावनाएँ है यहाँ, लेकिन सरकार ने इस तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया । वषोर्ं पहले बना विमानस्थल अभी तक कच्चा ही है, जहाँ बारिश शुरु होते ही जहाज का उडÞान और अवतरण बन्द हो जाता है । दस किलोमीटर दक्षिण में हिन्दू धर्मावलम्बी  शक्तिपीठ छिन्नमस्ता है और करीब १८ किलोमिटर पूरव में कंकालिनी भगवती का मन्दिर है जहाँ लाखांे भक्तजन पहँुचते हंै लेकिन इन धार्मिक स्थलों का प्रचार-प्रसार और सर्ंबर्द्धन नहीं हो पाया है । इसी तरह सात नदियों का संगम सप्तकोसी पर बना बैरेज, -जो संभवतः नेपाल का ही सबसे बडा बैरेज है) उसी से सटी हर्ुइ कोसी टप्पु बन्यजन्तु आरक्ष है । सन् १९७६ में स्थापित यह आरक्ष १७५ वर्ग किलोमिटर में फैला हुआ है । जहाँ लोपोन्मुख प्रजाति की जंगली भैंस अर्थात अर्ना सहित स्तनधारी जीव के ३१ प्रजाति का वास है । इसी तरह आरक्ष में ४८५ प्रजाति की चिडिÞयाँ और २०० से अधिक प्रजाति की मछलियाँ पायी जाती हंै । सन् १९८७ में इस आरक्ष को रामसार साइट का दर्जा मिला था । लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव में ये सभी जगहें पर्यटकों की सिर्फप्रतीक्षा करती रहती है ।
राजविराजवासी निराश हो चुके है । अब तो लोगों ने सरकार से अपेक्षा रखना भी छोडÞ दिया है । शहर के विकास के लिए वे खुद जागरुक बनने लगे हैं । शुरुआत उन्होने सफाई से किया है । राजविराज नगरपालिका ने अपना काम ठीक ढंग से नहीं किया, ऐसा सोचकर सफाई अभियान शुरु किया गया है । नगरपालिका से मिलकर स्थानियवासियों ने टोल सुधार समिति गठन किया है । सभी समिति में पचास प्रतिशत महिला सदस्य हैं । स्थानीयवासी विनीत झा कहते हंै कि कुछ टोल में सुधार समिति ने उदाहरणीय कार्य किया है । लेकिन कुछ समितियों को काफी परेशानी झेलनी पडÞ रही है । टोल सुधार समिति ने सिर्फसफाई ही नहीं बल्कि महिलाओं को चारदीवारी से बाहर निकलने का अच्छा अवसर भी दिया है । झा का कहना है कि टोल सुधार समिति को ज्यादा से ज्यादा सक्रिय होना चाहिए ।
लेकिन वर्षों से धोखा खाए हुए राजविराजवासी ने अपने ही लोगों पर  विश्वास करना छोडÞ दिया है । समितिओं में छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव हो गया है । स्थानीयवासी का कहना है- नेतृत्व में जो उदारता होनी चाहिए, टोल सुधार समिति के लोगों में नहीं है । टोल सुधारने के बजाय समिति के पदाधिकारी अपने घर के आगे का सडÞक और पोल मर्मत करवा रहे हैं । अपने घर के आगे साफ करवा लिया तो वे समझते हंै टोल साफ हो गया । समिति को साठ प्रतिशत रकम नगरपालिका और ४० प्रतिशत स्थानीय स्तर से संकलन करना होगा । लेकिन स्थानीयवासी को शंका है कि सफाई के नाम पर संकलित पैसा समिति वाले ही हजम कर जाएंगे । और शायद यही कारण है अधिकांश टोल सुधार समिति को स्थानीयवासी का सहयोग नहीं मिल रहा है ।
कोई नया काम शुरु हो तो उसका विरोध होना कोई नयी बात नहीं, राजविराज का टोल सुधार समिति भी इस से अछूता नहीं रह सकता । लेकिन डूबते को तिनके का सहारा और राजविराजवासी के लिए टोल सुधार समिति ही अन्तिम विकल्प के रूप में रह गया है । उन्हंे चाहिए कि वे अपने शहर को खुद ही बनायें, विकास के मार्ग पर लायें, शहर को सुन्दर बनायें और इसके लिए कुछ खोना भी पडÞता है तो तैयार रहें । शुरुआत हो चुकी है और जरुरी है कि इतिहास को भूल कर वो अब सिर्फविकास की बातें करें ।

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