विजयादमी (दशहरा) पर्व आर्दश और त्याग की है : बिष्णु लाल कुम्हाल (प्रजापति)

बिष्णु लाल कुम्हाल (प्रजापति), नेपालगंज, २२ अक्टूबर |

durga mataहम और हमारा देश विविध और विचित्र सास्कृतिक धरोधर से परिपूर्ण रहा है । करीब एक सौ से अधिक संस्कृतिया“ हमारे देश में हैं । कुछ कम भी होते जा रहे हंै । संस्कृतियो“ के समन्वय का वृहत पर्व है विजयादशमी । विजयादशमी को बड़ा दशंै विजयादशमी, और दशहरा भी कहा जाता है ।

पौराणिक, धार्मिक, सामाजिक ऐतिहासिक और राजनैतिक महत्व भी ले रखा है । इस पर्व ने अपनी विशेषताओं के कारण से हजारौं वर्ष से सनातन धर्मालम्बी हिन्दू लगायत अन्य मानव समुदाय में आस्था और विश्वास को जगा डाला है ।

हमारे देश के शासक प्रशासकों ने इस के महत्व को स्वीकार करके प्रत्येक वर्ष विजयादशमी पर्व को धूमधाम के सँथ अपने परिवार, ईष्टमित्र, सगं साथी मान्यजन के बीच खुशियाली करके मनाते है और लम्बे दिन तक विदा इस पर्व में दिया जाता है । विदा मात्र नही है प्रत्येक वर्ष सरकारी कर्मचारीें दशै खर्च कह कर एक महीनें का तलब भत्ता पाते है ।

बिजया दशमी को हम लोग असत्य के ऊपर सत्य की बिजय, असुरी शक्ति के ऊपर दैवी शक्ति की विजय के रुप में मनाते है । प्रत्येक वर्ष आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरु होकर पुर्णिमा तक विविध पूजापाठ करते रहते है । विजया दशमी को विविध सांस्कृतिक मान्यता अनुसार विविध रुप से और कहीं कहीं पर तो मिश्रित संस्कृति के रुप में सम्पन्न करते रहते है । हमारे अवधी सांस्कृतिक समाज में यह मिश्रित संस्कृति के रुप में हर्षाेल्लास के साथ सम्पन्न किया जाता है ।

विजया दशमी के प्रथम दिन देवी नवरात्री की शुभारम्भ होती है । प्रथम दिन प्रतिपदा में कलश स्थापना करके विधिविधान के अनुसार जमरा रखकर देबी भगवती की पूजा आराधाना शुरु होती है । मट्टी आदि से निर्मित किया गया देवी की प्रतिमा स्थापना होती है, पूजा आराधाना, जागरण आदि सम्पन्न करते हुयें बिजया दशमी के बाद में बिर्सजन करने की चलन रही है । दशमी के दिन रात में तारा आने तक पूर्व विजय नामक काल समय होता है यह काल सर्व सिद्धिदायक काल होता है । इसी दिन देबी भगवती ने विजय प्राप्त किया था, भगवान श्री राम चन्द्र जी ने इसी दिन लङ्का के ऊपर बिजय प्राप्त किया था । इस दिन को विजया दशमी पर्व के रुप में मनाया जाता है ।

विजयादशमी को शक्ति की पुजारी और आस्था रखने की शक्ति प्राप्ति के रुप में भी मनाते है । बलिपूजा आदि करके सम्पन्न करते है । इस पर्व के साथ बलिपूजा का भी एकदम गहरा सम्बन्ध रहा है । राजा, महाराजा और सामन्तियों ने शक्तिपूजा करके अपनों को शक्तिवान कहकर प्रदर्शन भी करते थे ।

बिजया दशमी का दूसरा चीज हम सभी को आध्यत्मिकता की ओर ले जाता है इस का दूसरा स्वरुप त्याग और आदर्श समाज की स्थापना की ओर भी ले जाता है । आध्यात्मिक समाज निर्माण तर्फ पूरे नव रात्री भर पूजा, पाठ, आराधना, व्रत, जागरण, जप और दान दक्षिणा वितरण की ओर रहता है । हम लोग अयोध्या के राजा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जीवन आदर्श को विजया दशमी भर लोकनाट्य के आधारों में प्राप्त धार्मिक पुस्तकों के बाचन के आधारों में सम्पन्न करते है ।

सन्त शिरोमणि भक्त कवि तुलसीदासजी महाराजद्वारा रचित ‘श्रीरामचरित मानस’ आदि देव भगवान शंकर के मानवरुपी मुखारविन्दु से निःसृत अमर गाथा होने के नाते इस ग्रन्थ को मान गंगा कहने में असंगत नही होगा । विजया दशमी के समय पर इस अमर गाथा में बर्णित अमर गाथा को नाट्य शैलियों के माध्यम से भी जन मानस के कल्याणों के लिए श्री रामलीला मञ्चन भी किया जाता है । इस में गोस्वामी तुल्सीदास जी के चौपाई अनुसार

‘जब जब होहि धर्म हो हि–धर्म कर्म हानि

जवजहि असुर–अधम अभिमान

तब–तब धारी प्रभु मनुज शरीरा

हराहि विपति अरु सज्जन पीरा’

इस का अर्थ है, जव जव पृथ्वी में धर्म की हानि होती है ।

असुर, अधमों की वृद्धि होती है तव ईश्वर की मनुज रुपी धर्म स्थापना होती है जिससे सज्जनों की दुःख और पीडा की अन्त करके नव आदर्श समाज कीे स्थापना करती है ।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी लङ्का विजय पश्चात अपनीे मातृभूमि अयोध्या लौटे थे । रामराज्य की स्थापना की थी । एक ऐसा समाज जहा“ पर हत्या हिङ्सा का कोई भी स्थान नही था । अहिंसक समाज अ+बव =अवध । अवध समाज अवध संस्कृति में राम जन मानस के प्राण स्वरुप रहें है । राम सभी लोगों में रहें है । मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने आदर्श समाज की स्थापना में अपनी लीलामय जीवन पर्यन्त कृपाशील रहें । आज्ञाकारी बालक के समान वन में जा कर राक्षसी प्रवृति की अन्त करके ही राम राज्य की स्थापना करना भगवान राम का सार्थक अवसर माना जाता है ।

दशैं देश में शक्ति स्थापना करने के कारण दश शीसधारी दशंै इन्द्रिय में बिजय प्राप्त रावण को अन्त के लियेंल लागि दश+हारा= दशहारा भी कहा जाता है । दशहारा पर्व जन जागरण का पर्व है आर्दश समाज को स्थापना का पर्व है । श्री रामचारित मानस को रामलीला ने हम सभी को अपना जीवन सार्थक और आर्दशवान बनाने की पाठ सभी लोगों को सिखाता है ।

पर्व को भात भतेर और खानपीन में केवल सीमित न रखें इस का उद्देश्य महत्व और इस से परने वाला प्रभावों के प्रति भी जागरण रहन आवश्यक होता है इस पर्व ने सदेश देता है ।

इसे सच के अर्थ में कहा जाय तो दशहरा (विजया दशमी) त्याग और आर्दश की जन जागरण पर्व के रुप में लिया जा सकता है । प्रत्येक वर्ष इस वर्ष ने जहा“ असत्य के ऊपर सत्य की आदर्श सिखाता है वही पर भाई राजा राम बनवास होने के बाद उत्तराधिकारी के रुप में खेराऊ (चरण पादूका) रखकर राज्य की शासन संचालन करने की प्रतिनिधिमूलक समाज की स्थापना करने की शिक्षा भी देती है । हनुमान के स्वामी भक्ति लक्षमण के मातृप्रेम और जानकी माता की पत्नी आर्दश का पाठ इस विजया दशमी ने हम सभी लोगों को प्रत्येक वर्ष सिखाता है । दशै को दशा के रुप में इस ने कदापि प्रस्तुत करने की नही सिखाता है, लेकिन किसी किसी के द्वारा हो जाता है ।

विजया दशमी की वर्णित देव देवी व्यक्तित्व भगवान श्री राम अवध (पश्चिम नेपाल की तराई मधेश की ऐतिहासिक मानव शरिरधारी व्यक्तित्व है तो माता जानकी (सीता) पूर्वी नेपाल जनकपुरधाम की है । यह गौरव हम सभी को महान बनाता है । हिमालय पुत्री पार्वती भगवान शिवजी की अर्घाङ्गनी, जिस को आदि शक्ति दुर्गा के रुप में पूजा करके विजया दशमी मनाया जाता है । हमारे देश की यह गौरब है । यह सभी देव व्यक्ति विश्व के देव है यह सभी आराध्य शक्ति है ।

अन्त में विजया दशमी ने हम सभी को प्रत्येक वर्ष शक्ति के संचार प्रदान करें । आर्दश बनने में प्रेरणा प्रदान करें और सभी लोगों की कल्याण करने की शक्ति प्रदान करें । बिजयादशमी २०७२ (दशहरा) की हार्दिक मंगलमय शुभकामना ब्यक्त करते है ।

लेखक बिष्णुलाल कुम्हाल

लेखक बिष्णुलाल कुम्हाल

लेखक बिष्णुलाल कुम्हाल

केन्द्रीय अध्यक्ष

अवधि सा“स्कृतिक प्रतिष्ठान, नेपालगन्ज

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