विद्रोह करना कोई अपराध नहीं : विशेश्वर प्रसाद कोईराला


कैलाश महतो, परासी, २३ जून | गुगल शब्द भण्डार अनुसार : बगावत, राजद्रोह, ख़िलाफ़त, क्रांति , नियमों, कानूनों आदि के विरुद्ध किया जाने वाला कार्य, आचरण या व्यवहार किसी व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था के प्रति असहमति होना ही विद्रोह है ।
मधेशी पार्टी के एक लाल बुझक्कड नेता अपने कार्यकर्ताओं को एक कार्यक्रम में सिखा रहे थे कि डर के कारण ही मधेशी जनता नेपाली शासन का गुलाम है । डर को मन से निकाल देना चाहिए ।
बडा विचित्र चरित्र है मधेशी पार्टी के नेताओं का । जो खुद कायर है, वे अपने कार्यकर्ता और सीधे सादे मधेशी जनता को निडर बनने का पाठ पढाता है । जो खुद कभी किसी आन्दोलन में पुलिस के सामने आने का हैसियत नहीं रखता है, वह लोागें को डर से निपटने का शिक्षा देता है ।
शासक द्वारा निर्मित अनावश्यक डर प्रणालियों के विरुद्ध खडा होना ही विद्रोह है । विद्रोह करना मानवीय स्वाभाव है । विद्रोह के बिना आदमी जीवन का सही रस ले ही नहीं सकता ।



जीने के लिए आदमी को विद्रोही बनना अनिवार्य है । विद्रोह का रुप भले ही अलग अलग हों, पर वह शास्वत सत्य है । विद्रोह प्राकृतिक हाें, राजकीय हाें, धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, राजनैतिक या फिर सामाजिक ही क्यूँ न हाें, वह एक व्यक्ति या समाज को पहचान दिलाता है । विद्रोही गलत हो सकता है, पर दुनियाँ का कोई विद्रोह गलत नहीं हो सकता । शासकों के लिए तो उसके विरोध में किसी बच्चे का हँसना, रोना और खिलखिलाना भी विद्रोह ही होता है । एक बच्चा जब विद्यालय जाने लगता है तो शासकों का नींद उडने लगती है । वे डरने लगता है कि वो बच्चा कहीं उसके गलत कर्तुतों का इतिहास न जान जाये । उनके अपराधों का सारा पोल न खोल दें और उनके राज्य सत्ता के विरोध में कहीं कोई आन्दोलन न छेड दें । शासकों का यह स्वाभाव हो ही नहीं सकता कि वे जनता को अपना अनुसन्धानकर्ता मानें । पढलिखकर कोई गरीब का बच्चा उनके सामने खडा हो जाये । उनके शासन के विरोध में कोई आवाज दें, विद्रोह करें ।

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