विधिका विधान

मैं यह नही भूलूँ कि कोई भी परिवारजन, रिश्तेदार, मित्र, व्यक्ति मेरा शरीरिक, आर्थिक तथा मानसिक नुकसान नहीं करता हैं। मुझे होनेवाले शारीरिक तथा मानसिक नुकसान के नौ कारण हैं- मेरे कार्य, मेरा भाग्य, मेरा प्रारब्ध, मेरी ग्रहदशा, मेरी असावधानी, होनहार, देवदोष, पितृदोष, तनाव। मुझे होनेवाले मानसिक नुकसान का कारण भी मेरी अपनी भूलें है। पराधीनता, शरीर, परिवार, सम्मान-सम्पति में मेरा मोह, शरीर को मैं मान लेना, अपने स्वरुप को भूल जाना, आप में मेरा कच्चा विश्वास होना आदि मेरे दुःख के कारण हैं।
विधान मंगलकारी
मैं यह नहीं भूलूँ कि आप के प्रतिकूल-से-प्रतिकूल दिखायी देनेवाले विधान से भी मेरा कणमात्र भी नुकसान नहीं होता हैं। उसमें मेरा परम हित छिपा रहता है। इसलिए मुझे उस में एकदम निश्चित एवं प्रसन्न रहना है। मैं यह नहीं भूलंू कि अपनी तरफसे साधानी रखने के बाद भी मेरे जीवन में अपने-आप अथवा किसी व्यक्ति के माध्यम से जिस प्रतिकूल परिस्थिति का निर्माण होता है, उस का नाम है- आप का विधान। अपनी-अपनी तरफ से सद्भाव रखने, सेवा और प्रेम का व्यवहार करने के बाद भी यदि मेरा कोई परिवारजन मुझसे नाराज रहता है अथवा मेरे साथ प्रतिकूल व्यवहार करता है, वह भी आप का विधान है।
महिमा
मैं यह नहीं भूलूँ कि आप मेरे माता-पिता हैं, करुणासागर हैं, र्सवशक्तिमान हैं। सब जगह मौजूद हैं। इसलिए मुझे खतरनाक एवं भीषण डरवानी गजहपर भी निर्भय एवं निश्चिन्त रहना है। मुझे किसी भी स्थानपर, किसी भी परिस्थिति में, किसी भी हिंसक एवं विषैले जीवजन्तु, चोर, डाकू, राक्षस, भूत, प्रेत पिशाच आदि से डÞरना नहीं है। जब मेरे प्रभु मेरे  पास हैं, जब मेरे मातापिता मेरे साथ है, वे र्सवशक्तिमान हंै तो मुझे किसका डर – आपकी महिमा अपार, कोई पावे न पार, गुन गावे हजार। -भजु रामसीया राम)।
कठपुतली है-
मैं यह नहीं भूंलू कि इस संसार का कोई भी मनुष्य कोई भी प्राणी अपनी ओर से कुछ भी नहीं करता है, मै भी नहीं। सब को सब कुछ आप स्वयं करवाते हैं या आप की माया करवाती है। अहंकार में लिप्त होने के कारण मनुष्य यह मान लेता है कि मैं करता हूँ। जैसे उदाहरण के लिए- एक मेरे दोस्त ने अपने समकक्षी से कहा कि मैंने उनका घर तोडÞकर दिखला दिया है। अरे यार, तुम मुझे क्या तोडÞोगे, तुझे तो मैने बनाया है। ये सब है भोलेनाथ की कृपा। वास्तव में सब आप के हाथों की कठपुतलियाँ हैं। सबको आप ही नाच नचाते हैं। इसलिए कहा गया है जो मुझे सुख देता है, मैं उस के राग-मोह, आसक्ति में नहीं फँसू । और जो केवल अपने कर्तव्य का पालन करता रहँू बडÞी सावधानी से, संसार में उलझूं नहीं बर्ेइमानी से।
श्री रामचरित मानस में वर्ण्र्ााकिया गया है-
बाले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढÞ न कोई।
जेहि जस रघुपति करहि जब सो तस तेहि छन होई।।
उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचाबत रामु गोर्साई।
नट मरकट इब सबहि नचावत। रामु खगेर बेद अस गावत।।र्
अर्थ इस प्रकार है- तब महादेवजी ने हँसकर कहा- न कोई ज्ञानी है, न मर्ूख। श्रीरघुनाथजी जब जिस को जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है। शिव जी कहते हैं- हे उमा स्वामी, श्रीरामजी सब को कठपुलती की तरह नचाते हैं। काकभुशुण्डिजी कहते हंै- हे पक्षियों के राजा गरुड, नट -मदारी) के बन्दरकी तरह श्रीरामजी सब को नचाते हैं, वेद ऐसा कहते है।
माया के सम्बन्ध में श्रीरामचरित्र मानस में दो वर्ण्र्ााइस प्रकार हैं ः
बहुरि राममायाहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहि झूँठ कहावा।
माया विवस भए मुनि मूढÞा। समुझी नहीं हरि गिरा निगूढÞा।।
अर्थात्ः फिर भगवान शंकरने श्रीराम चन्द्रजी की माया को सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सती के मुँह से भी झूठ कहला दिया भगवानकी माया के वशीभूत मुनि ऐसे मूढÞ हो गए कि वे भगवान की अगूढ -स्पष्ट) वाणी को भी न समझ सके।
नहीं देना
मैं यह नहीं भूलूँ कि मेरे परिवार का कोई भी सदस्य अथवा कोई भी अन्य व्यक्ति मुझे वह नहीं दे सकता, वह मेरी चिन्ता, दुःख, अशान्ति को मिटा नहीं सकता, मुझे शान्ति, मुक्ति, भक्ति दे नहीं सकता, शरीर को मिलनेवाली सुख-समाग्री एवं सुख-सुविधाएं मेरे प्रारब्ध से मिलती है, मिलेगी। परिवारजन तथा व्यक्ति एक पोष्टमैन की तरह उनमें केवल माध्यम बनते हंै। इसलिए मैं किसी भी परिवारजन तथा व्यक्ति के मोह में आवद्ध नहीं होऊँ। उसको आपना स्वरुप मानकर प्रेम देता रहूँ और बदले में कुछ नहीं चाहूँ।
केवल आप हैं- मैं यह नहीं भुलंू कि इस संसार में विभिन्न रुप में केवल आप हंै और आप अपनी लीला कर रहे हंै। प्रेम देनेसे कण-कण में आप के दर्शन हो जाते है, इसलिए मैं सब को प्रेम दूँ। गीता में कहा है-
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि र्सवमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणाइव।।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।
वासुदेवः र्सवमिति स महात्मा सुदर्ुलभः।।
श्रीमद्भगवतगीता -७।७, १९) में-
अर्थात इसलिए हे धनंजय, मेरे सिवाय -इस जगत का) दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी -कार्यकारण) नहीं है, जैसे सूतकी मणियाँ सूत के धागे में पिरोयी हर्ुइ होती हैं, ऐसे ही यह सम्पर्ूण्ा जगत मुझमें ही ओतप्रोत है। बहुत जन्मों के अन्तिम जन्म में अर्थात् मनुष्य जन्ममें सब कुछ परमात्मा ही है- इस प्रकार जानकर जो ज्ञानवान मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दर्ुलभ है।
श्रीरामचरितमान में भगवान श्री शंकर की वाणी है-
हरि व्यापक र्सवत्र सम्मान। प्रेम तें प्रगट हांेहि मैं जाना।।
अर्थात मैं तो यह जनता हूँ कि भगवान सब जगह समान रुप से व्यापक हैं। प्रेम से वे प्रकट होते है।
-भगवान भाव के भूखे होते हैं ।)
परमात्मा भविष्य की चीज नहीं है। उनकी प्राप्ति वर्तमान की बस्तु है।

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