विपतराम का मानचित्र

सृजन लमसाल:सुबह आठ बजे मैं त्रिभुवन चौक पहुँचा तब तक श्रमिकों की भीड़ कम हो चुकी थी । सभी अपने पसन्द के श्रमिक को लेकर जा चुके थे । जो बाकी थे मैंने उनकी तरफ देखा । मुझे सब्जी बारी में काम करने के लिए एक मजदूर की आवश्यकता थी । अच्छे काम करने वाले मजदूर जा चुके थे । एक बूढा व्यक्ति दुबला पतला, चेहरे पर उदासीनता के बादल छाए हुए थे, जो उत्तर किनारे की तरफ बैठा उम्मीद से मेरी ओर देख रहा था । मैंने उससे पूछा, “बारी में सब्जी लगाने का काम कर सकते हो ?”
“जी कर सकता हूँ । क्यों नहीं कर सकता ?”
“कितना पैसा लोगे ” मैंने पूछा ।
“ढाई सौ” उसने कहा ।
“दो सौ दूँगा ।” मैंने मोल–भाव किया ।
“और तो तीन सौ माँगते हैं, मैंने तो कम ही मांगा है ।” उसने कहा ।
“तुम बूढे और कमजोर हो औरों की तरह काम कहाँ कर पाओगे ।” मैंने उसे दबाना चाहा ।
“जो कर सकता हूँ करूँगा ।” उसने कहा ।
“इसलिए तो कहता हूँ, जो कर सकना वही करना, दो सौ ले लो ।” मैंने कहा ।
“कहाँ जाना है ?” उसने स्वीकृति का संकेत दिया ।
“आदर्श नगर चलो ।” मैंने कहा और उसे लेकर रिक्शे से घर की ओर चल दिया । घर पहुँच कर उसे बारी में काम बता कर मैं अपना काम करने लगा । समय–समय पर आकर देख लेता था कि वो मेरे बताए अनुसार काम कर रहा है या नहीं । अगर नहीं देखो तो वो काम तो करते हैं पर काम आगे नहीं बढता है । इसलिए खाना खाने के बाद मैं वहीं आम के पेड़ के पास कुर्सी लगा कर बैठ गया ।
वह धीरे–धीरे पर सफाई से काम कर रहा था । मैंने उससे बात करना शुरु किया ।
“तुम्हारा घर कहाँ है चौधरी ?” मैंने पूछा ।
“नदी के पार ।” उसने कहा ।
“नाम क्या है तुम्हारा ?” मैंने पूछा ।
“विपतराम” उसने कहा ।
मैंने बात बढाने के ख्याल से उससे कहा, “इतनी विपत्ति वाला नाम क्यों रखा ?”
“माँ बाप ने रख दिया ।” उसने छोटा सा उत्तर दिया ।
“ऐसा नाम रखने का कोई तो कारण होगा ।” मैंने कहा ।
“हमारे जन्म के समय तीन दिन तक बारिश हुई थी । राप्ती नदी के बाढ ने आफत मचा दी थी । मेरे घर के ही पाँच सूअर, गाय, भैंस, एक हल बैल, पाँच हँस, सात मुर्गी भी बह ऐसा मेरे भैया कहते हैं । गाँव का भी न जाने कितने गाय भैंस मुर्गा, बकरी आदि बह गए । दो आदमी भी बह गए थे । मेरे भईया कहते हैं कि गाँव के जो आदमी ऊँची जगह पर चले गए वही बचे, पर दो आदमी तो बह ही गए । उसी समय हमारा जन्म हुआ इसलिए मेरा नाम विपतराम रख दिया गया ।” उसने अपने जन्म की कथा बताई ।
मैंने उसे और कुरेदना चाहा, “और कौन–कौन हैं तुम्हारे घर में ?”
“सिर्फ हम बूढा–बूढी हैं ।” उसने कहा ।
“बूढी क्या करती है तुम्हारी ?” मैंने पूछा ।
“कुछ नहीं करती बीमार है ।” उसने जवाब दिया ।
“क्या रोग है ?” मैंने पूछा ।
“वही दिमाग का ।” उसने कहा ।
“ओहो, कितना खराब रोग है ये तो । बच्चे नहीं हैं ?” मैंने फिर पूछा ।
“ मत पूछिए बाबू मैं इन सब बातों को याद नहीं करना चाहता हूँ । पुरानी बातें भूलना चाहता हूँ ।” उसने कहा ।
मेरे प्रश्न ने उसे दुख पहुँचाया था । मुझे लगा कि मैंने उससे क्यों पूछा । पर मेरे भीतर और भी जानने की ईच्छा बढ गई थी । मैंने बात को आगे बढाते हुए कहा, “मेरी बात से तुम्हें तकलीफ हुई । मैं तुम्हारे लिए कुछ कर तो नहीं सकता पर अगर अपनी तकलीफ बाँटोगे तो शायद तुम्हारा दुख कुछ कम हो जाय ।”
“ क्या बताऊँ और नहीं बताऊँ । कहने से और भी दुख होता है । बच्चों को पैदा कर सिर्फ दुख ही मिला । हमने तो सह लिया पर मेरी बूढी नहीं सह सकी और उन्हें याद कर–कर के बीमार पड़ गई ।”
विपत राम के चेहरे पर दुख के काले बादल छा गए थे । वह असमंजस में था कि कहूँ या न कहूँ । एक क्षण चुप रहकर वह खुद बोलने लगा, “एक बेटी और दो बेटे थे मेरे । सब को खा लिया अब कोई नहीं है । नौ वर्ष हो गए अब हम दोनों ही हैं । बेटे–बेटी की याद आती है कि बूढी बीमार पड़ जाती है । ड़ागदर के यहाँ गए थे उसकी दवा खाती है तो कुछ दिन ठीक रहती है फिर वैसी का वैसी ही हो जाता है । घर से बाहर निकल जाती है । अकेले छोड़ने में ड़र लगता है, पर क्या करूँ छोड़ना तो पड़ता है । मजूरी नहीं करेंगे  तो क्या खाएँगे ?”
इतना कह कर वह चुप हो गया । लगा कि उसके अन्दर विपत्ति का उत्पात कुण्ड़ है । जो उसे जला रहा है । जीवन की पूर्व घटना को याद कर उसके भीतर दुख की आग जल रही है जो उसे जला रही है । शायद इसलिए वह अपने भीतर का भाव व्यक्त नहीं कर पा रहा है । मैं और भी उत्सुक हो उठा उसकी कहानी जानने के लिए ।
उसके मौन को भंग करते हुए मैं पूछता हूँ, “क्या हुआ था उन्हें ?”
एक क्षण की चुप्पी के पश्चात् वह बोला, “बेटी सबसे बड़ी है । उसकी शादी छोटे में हो गई थी पर उसका घर नहीं बस पाया । दामाद के साथ खटपट हुआ और उसने दूसरी शादी कर ली । हमारी बेटी हमारे साथ ही रहती थी । ये उसी समय की बात है जब हम बड़े जमीन्दार के यहाँ कमैया बन के रहते थे । उसी समय वो जंगल चली गई । फिर पता नहीं वो कहाँ गायब हो गई आज तक उसका अता पता नहीं चला ।”
“पार्टी के पास नहीं गए उसका पता पूछने ?” मैंने कहा ।
“गया था, क्यों नहीं जाता । पार्टी में पूछने पर कहा उसे पहाड़ पर भेज दिया गया है । पता नहीं कौन से पहाड़ पर भेजा है आज तक कुछ पता नहीं है । जिन्दा होती तो हमें याद नहीं करती ? इतना समय हो गया, याद नहीं करने की तो कोई बात ही नहीं थी । मर गई होगी । पर लाश नहीं मिलने तक आस लगाए हुए हैं ।” उसने कहा ।
मैं समझ रहा था कि मेरे प्रश्न से उसके घाव हरे हो गए हैं पर पता नहीं क्यों मैं फिर भी पूछ बैठा, “विपतराम तुम्हारे बेटे कहाँ गए ?”
“युद्ध का आहार हो गए सभी । सबको खा लिया युद्ध ने । कमैया मुक्ति के कुछ समय पहले ही बड़ा बेटा भी जंगल चला गया । तीन महीना ही गुजरा था कि सरकारी फौज के भिड़न्त में वह भी मारा गया । छोटा बेटा हमारे साथ ही था । उसे सरकारी फौज वाले पकड़ कर ले गए । आज तक उसका भी पता नहीं है । कहते हैं सरकारी फौज वाले जिसे ले जाते हैं उसका पता नहीं चलता, सच ही कहते हैं । बेटा जिन्दा रहता तो जरूर आता । अब क्या आएगा, हमने तो आस ही छोड़ दिया । बड़े नेता कहते थे कि युद्ध से जनता का भला होगा, देश का भला होगा । क्या भला होगा युद्ध तो यमराज की तरह है । जनता को जिन्दा ही खाए जा रहा है । हमारे बच्चों को खा लिया । हम जिन्दा हैं फिर भी हमें युद्ध ने खा लिया है ।” विपतराम ने कहा ।
“ तुम पार्टी में जाकर नहीं बोले कि तुम्हारा बेटा मारा गया है, वो शायद तुम्हारी कुछ आर्थिक मदद कर देते ।” मैंने कहा ।
“पार्टी ने ही कहा था कि तुम्हारा बेटा भिड़न्त में मारा गया । पर लाश नहीं मिली । उनलोगों ने उसका सामूहिक संस्कार कर दिया । राहत की बात हमने नहीं की । उनलोगों ने मौखिक राहत की बात की कही कि जमीन देंगे, घर देंगे बहुत ही उपदेश दिए कहा, तुम्हारा बेटा शहीद हुआ है । उसके काम का मूल्यांकन तो इतिहास करेगा । शहीद के माता–पिता होने पर तो तुम्हें गर्व करना चाहिए । हमारे बेटे का मूल्यांकन खुद नहीं करके अब कौन इतिहास आ कर करेगा ? हमसब को इतना दुख है । मरे हुए बेटे पर क्या गर्व करें । हमारे बेटे के मरने से देश को क्या मिला पता नहीं । पर हमने तो बहुत दुख पाया है । जब तक काम कर सकते हैं तो करके खा रहे हैं, बाद में क्या होगा पता नहीं । भगवान जाने ।” विपतराम ने कहा ।
“छोटा बेटा लापता होने की बात मानव अधिकार या उससे सम्बन्धित संस्था को नहीं बताया ? उनलोगों ने कुछ नहीं किया ?” मैंने कहा ।
“सभी सिर्फ कहते हैं । करने वाला कोई नहीं है । हमने कहा कि साँस या लाश कुछ भी ला दो । मानव अधिकारवादी को भी कहा पर कुछ नहीं हुआ ।” उसने कहा ।
“तुम तो मुक्त कमैया हो उसके लिए भी सरकार बहुत खर्च कर रही है, तुमने वहाँ कोशिश नहीं की ?” मैंने कहा ।
“क्या पता हमारे लिए तो कुछ नहीं हुआ । मुक्त कमैया तथा विस्थापित व्यवस्थापन वाले ने हमें मुक्त कमैया माना ही नहीं । कमैया से मुक्ति का प्रमाण मांगा । हम क्या प्रमाण देते ? हम जमींदार के यहाँ रहते थे, जब कमैया मुक्ति की घोषणा हुई तो हमने भी छोड़ दिया, यही तो प्रमाण है न ? बच्चों के स्कूल की तरह हमें कौन प्रमाण देगा ? आयोग ने हमारा नाम ही नहीं लिखा । कोई ठीक नहीं है सभी बेईमान हैं बेईमान ।” उसने आक्रोशित होकर कहा ।
“कितनी अजीब बात है, तुम्हारे जैसों का नाम नहीं होगा तो किसका होगा ? और पार्टी ने भी कुछ नहीं किया ?” मैंने कहा ।
“पार्टी ने हमारे जैसे तीन सौ परिवार को जंगल के किनारे बसाया पर पर कुछ ही दिन में वन विभाग वाले ने आकर हमें भगा दिया और हमारे झोपड़ों में आग लगा दी । उसके बाद हम सबको एक जमीन्दार की जमीन पर बसाया पर उसने अदालत में मुकदमा कर दिया । बाद में जीत उसी की हुई । वहाँ से भी हमें पुलिस ने भगा दिया । उसके बाद हम बाजार में आकर ड़ेरा लेकर रह रहे हैं । और मजदूरी कर अपना पेट भर रहे हैं ।” विपतराम ने अपनी कथा सुनाई ।
उसकी कहानी सुनने के बाद उसे कोई सलाह देने का मन नहीं किया मैं चुप होकर बैठा रहा ।
वह भी असमंजस में बैठा था । एक क्षण के बाद उसने कहा, “बड़े लोग हमारी बात समझते नहीं हैं । भूमि सुधार की बात कहते हैं । गरीबी दूर करने की बात कहते हैं । पर कुछ नहीं होता है । वे लोग सिर्फ अपना पेट भरते हैं । हम तो यही चाहते हैं कि भूमि जिनकी है उन्हीं का रहे पर हमारे परिश्रम के लिए हमें उपज का आधा हिस्सा दें । हमारे श्रम का सम्मान हो हमें न्याय मिले । पर कमैया मुक्ति के नाम पर हमें काम से ही निकाल दिया । हमें भूमिपूत्र कहते हैं और हमें हल बैल और मिट्टी से ही अलग कर दिया । मेहनत करने वालों को आधा मिलना चाहिए यह कानून बनाने की बात हमारे नेता के दिमाग में क्यों नहीं आती है । इनके दिमाग में बुद्धि की जगह लिद्दी भरी हुई है । इतना काम तो हम अनपढ भी कर सकते थे । सब वैसे ही हैं । हमें कोई नहीं समझता या समझना नहीं चाहता । नेता हमारी लाश पर चढ कर सत्ता में जाते हैं, कुर्सी में बैठते हैं । हमें भूल जाते हैं । जमीन्दार हमारा पसीना पीकर अघाते नहीं हैं । मानव अधिकारवादी और एन. जी. ओ वाले सिर्फ ड़ालर की खेती करते हैं । हमें बेचकर खुद अमीर बन जाते हैं । हम दिन में छुट्टी नहीं लेंगे हमको चार बजे छुट्टी दे दीजिए बाबू । मेरी पत्नी बीमार है । कहीं चली जाएगी इस बात का ड़र लगता है ।” उसने कहा ।
“ठीक है चले जाना ।” मैंने कहा । उसके बाद मैं चुप बैठा रहा । कुछ बोलने का मन नहीं किया । विपतराम की बातों ने मुझे सचेत किया । मैं सोचने लगा । मुझे नहीं लगा था कि वह इतना तर्क वितर्क की बातें करेगा । समय स्थिति और यथार्थ को समझने के लिए शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती । इसमें मानवीय चेतना खुद काम करती है । मुझे लगा नेता से अधिक तो विपतराम देश को समझता है । उतनी बातें तो मैं भी नहीं समझता था ।
उसकी कही बातें मैं सर झुका कर सोचता हूँ । बात तो उसकी सही ही है ।
हर एक दिन मैं स्थानीय एफ. एम सुनता हूँ । विपतराम मेरे यहाँ से जिस दिन काम करके गया उसी दिन सुबह स्यानीय पत्रिका की खबर एफ. एम से सुनकर मैं स्तब्ध था । समाचार था, मानसिक असन्तुलन वाली एक महिला द्वारा आत्महत्या ।
पूरा समाचार पढ कर मैं समझ गया कि ये विपतराम की पत्नी फुलमतिया ही थी । जिस समय विपतराम मेरे यहाँ था उसी समय उसने अपने कमरे में फन्दा लगाकर आत्महत्या कर ली । तब से असीम पीड़ा, दुख, व्यथा से जले चमड़े के साथ नरकंकाल चेहरा लिए हमेशा मेरे सामने छाया रहता है विपतराम का मानचित्र ।

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