विभाजित हुआ मधेशी मोर्चा

प्रधानमंत्री निर्वाचन के क्रम में मधेशवादी दलों का मोर्चा स्पष्टतः दो भागों में विभाजित हो गया है । उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाली मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल, विजय कुमार गच्छेदार के नेतृत्व वाले फोरम लोकतांत्रिक, महन्थ ठाकुर के नेतृत्व वाली तमलोपा व राजेन्द्र महतो के नेतृत्व वाली सद्भावना पार्टर्ीीारा आबद्ध संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा में प्रधानमंत्री निर्वाचन के दौरान उम्मीद्वारी से लेकर झलनाथ खनाल के प्रधानमंत्री बनने के बाद सरकार में सहभागिता को लेकर मतभेद इस कदर गहरा गया कि उपेन्द्र यादव ने अपने आपको मोर्चा से अलग रखते हुए मोर्चा के निर्ण्र्ााें को मानने से इंकार कर दिया ।
प्रधानमंत्री पद के लिए नए सिरे से हुए निर्वाचन प्रक्रिया में मधेश की भूमिका सशक्त बनाने के लिए कई दौर की बैठकें हर्ुइ । शुरु से ही मोर्चा के तीन अन्य दलों के साथ उपेन्द्र यादव का वैचारिक टकराव रहा । पिछले डेढÞ साल तक सत्ता से दूर रहे फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव इस बार यह मौका गंवाना नहीं चाहते थे । इसलिए पहले भी जब एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल को माओवादी ने र्समर्थन देने का आश्वसन दिया था और कुछ देर के लिए ऐसा लग रहा था कि खनाल चुनाव जीत जाएँगे उस समय भी उपेन्द्र यादव मोर्चा की बैठक बीच में ही छोडÞकर खनाल से मिलकर र्समर्थन पत्र थमा आए । लेकिन तेजी से बदली राजनीतिक घटनाक्रम के साथ ही उपेन्द्र यादव ने भी पलटी मारी और चन्द घण्टे पहले खनाल को दिया र्समर्थन वापस ले लिया ।
इस बार भी जब तीनों बडेÞ दलों ने अपनी उम्मीद्वारी दी तब मोर्चा की भूमिका को लेकर भी बैठक हर्ुइ । १७ दलों के सुझाव व र्समर्थन का आश्वासन के बाद मोर्चा के तरफ से विजय कुमार गच्छेदार को उम्मीद्वारी देने का फैसला किया गया । लेकिन गच्छेदार की उम्मीद्वारी का उपेन्द्र यादव ने विरोध किया । उनका तर्क था कि गच्छेदार की उम्मीदवारी प्रधानमंत्री चयन में बाधक है । मतदान से ठीक एक दिन पहले हर्ुइ मोर्चा की बैठक में गच्छेदार की उम्मीद्वारी को बेमौसम की बाजा कहकर विरोध किया था । जबकि मोर्चा के अन्य नेताओं का तर्क था कि गठबन्धन सरकार का नेतृत्व पाने की काफी संभावना है । यादव बीच में ही बैठक छोडÞकर चले गए । बाहर निकलकर उन्होंने मोर्चा के निर्ण्र्ाामें अपनी असहमति होने की प्रतिक्रिया देकर मंशा जाहिर कर दी । यादव के विरोध के साथ ही गच्छेदार की कम संभावना भी क्षीण होती नजर आने लगी । गच्छेदार की उम्मीद्वारी को कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने आत्मघाती निर्ण्र्ााकरार दिया । विश्लेषकों का मानना है कि यदि गच्छेदार की उम्मीदवारी ना दी जाती तो लोकतांत्रिक शक्तियों की सरकार गठन का रास्ता साफ हो जाता । लेकिन मधेशी मोर्चा से आबद्ध नेता इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते । मोर्चा के एक बडे नेता ने कहा कि बडÞे दलों की टेढÞी नजर हमेशा से ही मधेशी मोर्चा के सभासदों पर रही है । गच्छेदार की उम्मीदवारी देने के पीछे एक यह भी मंशाय थी कि मधेशवादी सभासादों की खरीद बिक्री रोकी जा सके ।
फोरम अध्यक्ष उपेन्द्र यादव के लिए मोर्चा के निर्ण्र्ााके विपरित जाना इतना आसान नहीं रहा । गच्छेदार या खनाल को मत दिया जाए इस पर फोरम संसदीय दल की बैठक में भी शोर शाराबा हुआ । फोरम के सह अध्यक्ष जेपी गुप्ता र्समर्थक सभासद नन्दन दत्त, बीपी यादव, एकबाल अहमद, सरिता साह, सबिता यादव, संध्या देव, चन्द्रिका यादव व सलमा खातुन ने मधेशी उम्मीदवार होने के नाते गच्छेदार के ही पक्ष में मतदान करने का तर्क दिया । मतदान के कुछ घण्टे पहले तक गुप्ता निकट सभासदों ने काफी हो हल्ला मचाया । आखिरकार उपेन्द्र यादव मतदान प्रक्रिया से अनुपस्थित रहने की रणनीति पर चलने में सफल रहे । वो गच्छेदार के पक्ष में मतदान कर अगली सरकार में जाने की संभावना को खत्म नहीं करना चाहते थे और ना ही खनाल के पक्ष में मतदान देकर आम मधेशी जनता व अपने ही प्रतिद्वंद्वी सभासदों को नाराज करना चाहते थे । इसलिए फोरम नेपाल मतदान प्रक्रिया के दौरान सदन से अनुपस्थित रहा ।
अंततः गच्छेदार की उम्मीदवारी ने मोर्चा को तो सत्ता तक नहीं पहुँचाया लेकिन मधेशी मोर्चा में विभाजन जरुर ला दिया । मोर्चा में आए विभाजन पर सद्भावना पार्टर्ीीे अध्यक्ष राजेन्द्र महतो ने इसे मधेश के लिए सम्भावित दर्ुघटना का संकेत बताया है । महतो का कहना है कि ूप्रधानमंत्री निर्वाचन के क्रम में देखे गए वाम और गैर वाम ध्रुवीकरण से मधेश में दर्ुघटना की संभावना बढÞ गयी है । इसलिए मोर्चा के निर्ण्र्ााके विपरीत जाने वाले उपेन्द्र यादव के लिए अब मोर्चा में कोई जगह नहीं है ।ू लेकिन अपनी पार्टर्ीीे अध्यक्ष उपेन्द्र यादव का बचाव करते हुए फोरम नेपाल के सभासद् अभिषेक प्रताप शाह ने कहा कि हमारी पार्टर्ीीीछलग्गू नहीं बनना चाहती । संविधान सभा में सबसे कम उम्र के सभासद शाह ने कहा कि पौडेल या गच्छेदार का र्समर्थन करने पर लोकतांत्रिक और विरोध करने पर वामपन्थी का लेबल लगा देना कहाँ तक उचित है – उन्होंने कहा कि इस अनिश्चितता के समय में खनाल का प्रधानमंत्री बनना ही मधेशी जनता की जीत है ।
मधेशी मोर्चा में देखे गए ध्रवीकरण के लिए तमलोपा सह महासचिव जीतेन्द्र सोनाल बडÞे दलों को ही जिम्मेवार ठहराते हैं । सोनल का मानना है कि प्रधानमंत्री चयन के समय मधेशवादी दलों में जिस तरह से ध्रुवीकरण हुआ है उसके लिए उपेन्द्र यादव के साथ साथ माओवादी व एमाले भी बराबर के जिम्मेदार है । मधेशी मोर्चा मे आए विभाजन को मधेश के विश्लेषक शुभ संकेत नहीं मान रहे हैं । विश्लेषकों का कहना है कि एक मधेशवादी दल के सरकार में होने और तीन अन्य दल के विपक्ष में होने से मधेश में राजनीतिक द्वन्द्व की स्थिति को निमंत्रित करेगा । एक तो मधेशी मोर्चा में पहले ही स्थिति कमजोर बनी हर्ुइ है । तमलोपा के विभाजन, फोरम लोकतांत्रिक में विभाजन के संकेत व सद्भावना पार्टर्ीीा विभाजन होने से बाल-बाल बचना इस बात का द्योतक है कि मोर्चा से आबद्ध दलों को आपसी एकता कायम रखने के साथ-साथ आन्तरिक एकता पर भी ध्यान देना होगा ।

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