विश्वगुरु की ओर नमो और गुरु गोलवलकर की नेपाल यात्रा

prabin gurganiप्रवीण गुगरानी:प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जिस प्रकार विदेश नीति विषयक मामलों पर अपनी पकडÞ बनाए हुये हैं और कदम दर कदम सधे हुए राजनयिक की भांति आगे बढÞ रहे हैं उससे स्पष्ट ही लगता है कि उनकी टीम विदेश नीति पर व्यापक होमवर्क कर चुकी है । नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण में विदेशी अतिथियों से लेकर भुटान चीन और नेपाल तक के वैदेशिक निर्ण्र्ााें से आरएसएस की वेदों से ली गई जम्बू द्वीप अवधारणा की सुगंध भी सुवासित होती प्रतीत हो रही है । नेपाल हो भुटान हो या कांधार यानि अफगानिस्तान को लेकर निर्ण्ाायक भूमिका में आ जानें की आकांक्षा भरी उनकी प्रारम्भिक गतिविधियाँ हों, यदि उनमें से जम्बू द्वीप कन्सेप्ट की सुगंध आती है तो इसमें विचित्र या अनोखा कुछ भी नहीं क्योंकि एक स्वयंसेवक और प्रचारक से यही अपेक्षित था । और फिर नेपाल केवल हमारा पडÞोसी ही नहीं बल्कि भारतीय आदर्शाें, मान्यताओं, संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन, पहनावा, व्रत, उत्सव आदि की दृष्टि से भी अनुकूल और हिला मिला सा लगता है । नेपाल भारत के लिए सामरिक दृष्टि से भी अति महत्वपर्ूण्ा है और चीन निरंतर नेपाल से गिद्ध दृष्टि गडÞाए हुए है । भारत एवं नेपाल के साथ साथ एक दर्ीघकालीन विदेश नीति डिजाइन करके उस अनुरूप नीतिगत निर्ण्र्ााकरते चलने की आवश्यकता दर्ीघ काल से अपेक्षित थी । पिछले वषर्ाें में भारत में चली निरंतर अल्पजीवी या अल्पमत सरकारों द्वारा इस विषय में कोई सकारात्मक पहल नहीं की जा सकी थी किन्तु आज परिस्थितियाँ अनुकूल हैं । Modi 2
आरएसएस द्वारा इस देश की विदेश नीति में नेपाल के महत्व को आज कल से नहीं बल्कि दशकों पर्ूव से आकलित किया जाता रहा है । इसी क्रम में १९६३ में श्री गुरुजी नेपाल के तत्कालीन महाराजाधिराज श्री महेन्द्रवीर विक्रमशाह से मिलने गये थे । इस यात्रा में गुरु गोलवलकर जी प्रधानमंत्री डा. तुलसी गिरि से भी मिले थे । महाशिवरात्रि के अवसर पर हर्ुइ माधव सदाशिव गोलवलकर जी की इस नेपाल यात्रा में उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर में शिवजी के दर्शन भी किये थे । विश्व के एक मात्र घोषित हिन्दू राष्ट्र होने के नाते श्री गुरूजी चाहते थे कि नेपाल का राजवंश, सरकार और सामान्य जनता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्याें और अवधारणाओं- विचार आदि को समझें । वे उस समय यह भी चाहते थे कि नेपाल में विश्व हिन्दू परिषद् की कार्याें और संगठन का विस्तार हो । उस समय पर नेपाल के राजा, प्रधानमन्त्री से अलग-अलग और बडÞे बडÞे दौर की चर्चाओं में नेपाल ने सौहार्दपर्ूण्ा वातावरण में गुरूजी के विषय, अपेक्षाओं और चर्चाओं को सहृदयता पर्ूवक सुना और समझा था । तब नेपाल के महाराजाधिराज और प्रधानमन्त्री दोनों ने ही गुरु गोलवलकर जी से प्रभावित होकर उनके समक्ष यह बात राखी थी कि वे अतिशीघ्र भारत आकर संघ कार्य को विस्तार और समीप से देखना अध्ययन करना चाहते हैं । अपने इस विस्तृत नेपाल प्रवास में गुरु गोलवलकर जी को यह आभास हो गया था कि नेपाल की भावनाएं भारतीय प्रधानमन्त्री पं. नेहरु तक व्यवस्थित रूप से पहुँच नहीं पाती है । यह संयोग था या योजना यह गुरूजी ही जाने किन्तु यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि गुरु गोलवलकर जी नेपाल से लौटने के पश्चात भारत के गृहमंत्री लालबहादुर शास्त्री से भेंट की थी और फिर शास्त्री जी ने अपने नेपाल प्रवास में श्री गुरूजी के नेपाल के अनुभवों व चर्चाओं के आधार पर नेपाल शासन के साथ हर्ुइ उनकी चर्चाओं को व्यवस्थित आकार और दिशा दी थी । शास्त्री जी की इस नेपाल यात्रा में किये गए समझौतों, वार्ताओं निर्ण्र्ााें और प्रस्तावों में गुरु गोलवलकर की छाप स्पष्ट देखी गई थी ।
गुरूजी की वैश्विक दृष्टि हमारे वेदों और पुराणों में व्यक्त जम्बू द्वीप कन्सेप्ट के तारतम्य में ही रहती थी जो कि आज भी प्रासंगिक है । इस जम्बू भूगोल के अर्ंतर्गत आने वाले क्षेत्रों की सांस्कृतिक, राजनैतिक, धार्मिक और भौगोलिक स्थितियां यदि उस समय समान थी कम से कम भोगौलिक तथ्य और परिस्थितियाँ और आवश्यकताएं तो हमें आज भी एक धुरी पर ही खडÞा करती हैं । आज भी इस जम्बू द्वीप की अर्थव्यवस्था सम्पर्ूण्ा विश्व की बाकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित ही नहीं वरन नियंत्रित करने की क्षमता रखती है और यही वह तथ्य है जो जम्बू द्वीप की अवधारणा को आज भी पुनर्जीवित करने के कारण उत्पन्न करता है । विष्णु पुराण में दिए गए विवरणों के अनुसार धरती के सात द्वीपों में से एक जम्बू द्वीप था जिसे आज यूरेशिया भी कहा जाता है । जम्बू द्वीप के अलावा जो छः द्वीप थे वे प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रोंच, शाक एवं पुष्कर कहलाते थे । उस समय के जम्बू द्वीप में आज के मिस्त्र, सऊदी अरबर्,र् इरानर्,र् इराक, इजराइल, कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, चीन, बर्मा, इंडोनेशिया, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भुटान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान देश सम्मिलित थे । इस जम्बू द्वीप जिसका शासन और धुरी केन्द्र भारतवर्षहुआ करता था और विश्वगुरु कहलाता था उसमें आज के हिन्दुस्तान, नेपाल, तिब्बत, भुटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, वियेतनाम, लाओस जैसे देशों का समावेश हुआ करता था । आज संभवतः भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के मानस में वैश्विक राजनीति को इस जम्बुद्विपीय राजनैतिक अवधारणा की ओर समन्वयकारी नीतियों के माध्यम से एक दिशा और एक लय करने की है तो यह समय जन्य तत्व ही है । यदि भारत को विश्वगुरु के उसके पुरातन अधिष्ठान पर स्थापित करना है तो इस प्रकार के युगीन तथ्यों को आज शनैः शनैः प्रयोग में लाना ही होगा ।
आज के पर्रि्रेक्ष्य में यह स्पष्ट ही देखा जा सकता है कि नेपाल में माओवादियों व वामपंथियों के बढÞते प्रभाव के कारण पिछले वषर्ाें में यहां भारत विरोधी वातावरण सघन होता जा रहा था । माओवादियों ने विभिन्न प्रकार से पिछले दशकों में नेपाल के विभिन्न संकटों और कठिनाइयों के लिए भारत को ही जिम्मेदार ठहराया और भारत के साथ सम्बंधो में निरंतर खिंचाव की स्थिति बनती गई थी । नेपाल व भारत में सांस्कृतिक समानताओं के पश्चात् भी जो परस्पर दूरियाँ बनी और बढÞी उसका मूल कारण माओवाद और चीनी दुष्प्रचार ही है । १९६२ के युद्ध के पश्चात् ही चीन ने भारत के युद्ध मोर्चें पर नेपाल के सामरिक महत्व का आकलन कर लिया था । इस के बाद उसने सतत ऐसी कार्यवाहियां की और निर्ण्र्ाालिए कि नेपाल में भारत विरोधी वातावरण बनता गया । उसने दुष्प्रचार किया कि भारत नेपाल का शोषण कर रहा है और नेपाल की निर्धनता का कारण भारत ही है । १९७३  के गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में नेपाल ने स्वयं को शान्ति क्षेत्र घोषित करने की मांग करना प्रारम्भ किया जिसके मूल में चीन का भारत विरोध ही था । इसके पश्चात् १९८८ में नेपाल ने बडÞे पैमानें पर चीन से हथियार भी खरीदे जो कि भारत के साथ हर्ुइ संधि का उल्लंघन था, जिसके अनुसार भारत की सहमति के बिना वह हथियार नहीं खरीद सकता है । नेपाल द्वारा चीन से भारत की सहमति के बिना हथियार क्रय करने का यह निर्ण्र्ााभारत नेपाल सम्बंधों का कठिनतम दौर प्रारम्भ करने वाला कारक था । आज जबकि नरेन्द्र मोदी ने घनघोर सकारात्मक वातावरण निर्मित करते हुए नेपाल यात्रा की और नेपाल के राजवंश के साथ, लोकतंत्र और अंतिम छोर के नेपाली नागरिक के साथ जिस प्रकार सीधा संवाद बनाने का अतुलनीय प्रयत्न किया है, वह निश्चित भारत-नेपाल सम्बंधों को एक नई दिशा, गति, लय और परस्पर प्रतिबद्धता प्रदान करेगा । अब भारत वर्षकी शास्त्रोक्त अवधारणा और विश्वगुरु भारत की अवधारणा पुनर्स्थापित होगी यह विश्वास किया जाना चाहिए ।

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