विश्वपटल पर अपनी पहचान बनाता मधेश

इस बार सत्ता का पासा ही उल्टा पड़ा है । फिलहाल पहली बार मधेश के वरिष्ठ नेतागण भारत दौरे पर हैं और यह बात यहाँ की मीडिया को पच नहीं रही है, इनकी यही नकारात्मक और पूर्वाग्रह से ग्रसित सोच इनके खबरों का माद्दा बन रही है ।

पहली बार लग रहा है कि भारत की नेपाल नीति परिवर्तित हो रही है ।

डा. श्वेता दीप्ति :दिल्ली का दिल और नेपाल की नीयत, मधेश के सन्दर्भ में आज दोनों कसौटी पर है । दिल्ली की नजरों ने आज तक सिर्फ

गौर करने की बात तो यह है कि भारतीय विदेश मंत्री ने उन तमाम नेताओं के नाम गिनाए जो समय–समय पर दिल्ली का दौरा करते आए हैं, मसलन प्रचण्ड, विद्या भण्डारी, ओली, भटराई, शेरबहादुर देउवा आदि । फिर आज अगर मधेश के नेता वहाँ गए हैं तो इतना हंगामा क्यों ?
पहाड़ों की खूबसूरती को देखा था, उनकी नीयत को नहीं । तराई की समतल भूमि कितनी उबड़–खाबड़ थी, इस ओर उनकी नजरें कभी शिद्दत के साथ गई ही नहीं । उनके दिलों में वही था, जो यहाँ के मौकापरस्तों ने समय–समय पर उन्हें सुनाया । किन्तु, आज तो पहाड़ के एकछत्र राज में सेंध लग ही गई है । नेपाल के एक समुदाय में मधेश के दिल्ली भ्रमण ने हलचल मचा दी है । ऐसा लग रहा है कोई सुनामी आ गई हो । पर यह सुनामी उस वक्त कभी देखने को नहीं मिली, जब नेपाल के केन्द्रीय नेताओं की भीड़ दिल्ली में लगती है । कभी औपचारिक भेंटघाट के बहाने, कभी तीर्थ भ्रमण के बहाने, तो कभी इलाज के बहाने, पर मजे की बात तो यह है कि इन सभी बहानों में अगर नेपाल के वरिष्ठ नेताओं ने कुछ खोजा है, तो वह है सहयोग और समर्थन । उस वक्त न तो राष्ट्रवाद सामने आता है और न ही आत्मसम्मान । यह सहयोग और समर्थन कभी सत्ता परिवर्तन के लिए, कभी खुद की सत्ता बचाए रखने के लिए, तो कभी वर्षों की राजतंत्र की बेडि़यों को तोड़ने के लिए, भारत से माँगा जाता रहा है । इतना ही नहीं, अपने ही देश के एक महत्वपूर्ण हिस्से के लिए गलत ब्रिफिंग भी ये नेतागण करते रहे हैं । मधेश या तराई क्षेत्र की कोई पहचान विश्व समुदाय की नजरों में नहीं है, क्योंकि इन्हें वो पहचान दी ही नहीं गई । नेपाली का तात्पर्य विश्व के किसी भी राष्ट्र में पहाड़ी समुदाय से ही लिया जाता रहा है । किन्तु आज यह परिदृश्य बदला है । विश्व के नक्शे पर मधेश की जनता ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है । विश्व के इतिहास में अब तक का सबसे लम्बा आन्दोलन जो आज भी जारी है, उसने यह पहचान दिलाने में मधेश की जनता को सहयोग पहुँचाया है । इस बार सत्ता का पासा ही उल्टा पड़ा है । फिलहाल पहली बार मधेश के वरिष्ठ नेतागण भारत दौरे पर हैं और यह बात यहाँ की मीडिया को पच नहीं रही है, इनकी यही नकारात्मक और पूर्वाग्रह से ग्रसित सोच इनके खबरों का माद्दा बन रही है । पहली बार लग रहा है कि भारत की नेपाल नीति परिवर्तित हो रही है ।Madhesi-morcha-ka-4-neta

कटु आलोचनाओं के बाद भी भारत नेपाल के साथ हमेशा रहा है । यहाँ भारत की अपनी जरुरतें हो सकती हैं और होनी भी चाहिए । क्योंकि, पड़ोसी के घर की आग अपने घर तक भी आ सकती है, इसलिए उसे आग को बुझाना ही होगा । भारत के बढ़ते कद से जिन देशों को परेशानी है अगर उसे नेपाल की धरती प्रश्रय देती है, तो यह उसके लिए चिन्ता का विषय बनेगा ही । सामरिक दृष्टिकोण से भी और भौगोलिक दृष्टिकोण से भी । निःसन्देह मधेश का मामला आन्तरिक है, किन्तु उसका असर भारत पर भी पड़ रहा है । सीमा से सटा हर क्षेत्र इस समस्या से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित है, ऐसे में भारत सरकार खामोशी से तमाशा देखे यह सम्भव ही नहीं है । अब सवाल हमारी सोच का है कि हम क्या चाहते हैं ? किसी अन्य देशों का सहारा लेकर युद्ध, या अपने ही देश की जनता को संतुष्ट कर के शांति ? यह पूरी तरह यहाँ की सत्ता पर निर्भर करता है । पिछले पाँच छः महीनों से हमारे सर्वज्ञानी नेताओं ने भारत के विरुद्ध अपनी जिस वाक्शक्ति का प्रयोग किया है, उससे तो यही धारणा बलवती होती चली गई कि भारत से बड़ा दुश्मन इस देश का कोई है ही नहीं । परन्तु आज चीन की चुप्पी ने इन्हें भी चुप कर दिया है । बात आपके घर की थी और बाजार में उसे आप ही ले आए, तो यह आन्तरिक कहाँ रह गया ? नाका आपकी जनता ने अवरुद्ध किया और आप उसे अन्तरराष्ट्रीयकरण करने की बात करने लगे । आश्चर्य तो यह है कि नेता ही नहीं, यहाँ के कुछ कानूनविद् और बुद्धिजीवियों ने भी सरकार को यह उचित सलाह दी ।

किन्तु , शायद वो भूल रहे थे कि कानूनन किसी को फँसाने के जितने रास्ते होते हैं, उससे निकलने के उससे भी सौगुणे अधिक रास्ते होते हैं । आप अगर अन्तरराष्ट्रीय अदालत में जाएँगे तो क्या लगता है, आपसे यह नहीं पूछा जाएगा कि आपके देश की आधी आबादी क्यों असन्तुष्ट है ? क्यों आए दिन पुलिस के दमन का शिकार जनता हो रही है ? क्यों मानवअधिकार का हनन हो रहा है ? क्यों आप अपनी जनता को भेड़ बकरियों की तरह हलाल कर रहे हैं ? इस कई ‘क्यों’ की जगह भारत से सिर्फ एक प्रश्न किया जाता कि ‘नाकाबन्दी क्यों’ और इसका जवाब देना भारत के लिए कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि, यह घोषित नाकाबन्दी नहीं है । भारत चाहे तो घोषित नाकाबन्दी भी कर सकता है, अपनी सुरक्षा वजहों को दिखाकर और पूर्व की घटनाओं और आज की वर्तमान परिस्थितियाँ स्वयं सुबूत बन कर सामने होंगी । सच तो यह है कि हमारी सरकार कूटनीति और विदेश नीति में ही नहीं आन्तरिक नीति में भी कमजोर साबित हुई है । खोखली राष्ट्रवादिता का नारा देकर अपनी कमजोरियों पर भरपूर पर्दा डाला गया है और स्वयं मजे ले रहे हैं और निरीह जनता रोज अभाव की पीड़ा झेल रही है, मर रही है ।
भारत–नेपाल सम्बन्ध की चर्चा अब भारतीय राज्यसभा में भी अपना स्थान बना चुकी है इतना ही नहीं नेपाल सरकार की मधेशियों के प्रति के दृष्टिकोण को भी वहाँ पर्याप्त जगह मिली है ।

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्य सभा में भारत सरकार की नेपाल नीति को स्पष्ट कर दिया है और प्रतिपक्ष को भी सहमत कर लिया है । एक साझी धारणा उभर कर आई कि, हमेशा की तरह नेपाल की वर्तमान अवस्था के लिए भारत को एक जिम्मेदार भूमिका का निर्वाह करना चाहिए । विपक्ष की ओर से यह कहा गया कि एक शिष्ट मंडल नेपाल भेजा जाय और इस समस्या का समाधान खोजा जाय । इस पर भारतीय विदेश मंत्री ने सरकार की ओर से विपक्ष को आश्वस्त किया कि अगर आवश्यकता हुई तो यह भी किया जाएगा । राज्य सभा में चौदह वक्ताओं ने अपनी बातें रखीं, जिनमें सबसे अहम बात जो उभर कर आई वो यह कि, नेपाली जनता आज आवश्यक वस्तुओं की कमी की वजह से पीडि़त हैं और मधेश कई महीनों से अपनी सरकार से अधिकार की लड़ाई लड़ रहा है । इसके लिए एक कारगर कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि नेपाल की जनता मुसीबतों से निजात पा सकें । राज्य सभा में यह माना गया कि पिछले दिनों नेपाल में जो भी गतिविधियाँ हुई हैं, वह कहीं से भी राजनतिक दृष्टिकोण से सही नहीं है । मामला राजनैतिक है उसे उसी तरह निपटाया जाना चाहिए । नेपाल में दवा की कमी को लेकर भारत सरकार पर नैतिक रूप से जो दोषारोपण नेपाल सरकार की ओर से किया जा रहा है उस सम्बन्ध में भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि दवाओं की सुची माँगने पर भी आज तक भारतीय राजदूत को उपलब्ध नहीं कराया गया है । बावजूद इसके दवाओं की आपूर्ति हो रही है । उन्होंने कहा कि हम इंसानियत और मानवता को भूले नहीं हैं । हमने तो उन्हें कहा है कि आप सीधे कम्पनियों से दवाएँ मँगवाएँ हम उन्हें पैसे की भुगतानी करेंगे, इसके बावजूद भारत पर नेपाल क ीओर से लगातार आरोप लगाया जा रहा है । हम दवाओं की लिस्ट माँग रहे हैं और वो आज तक लिस्ट हमें नहीं भेज रहे हैं ।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि नेपाल में आज जो स्थिति है, उसकी वजह नेपाल सरकार की अपनी नीति है । जिसने अपने ही देश के मधेशी समुदाय को नजरअंदाज करते हुए आपाधापी में अपना संविधान जारी किया । २००७ के संविधान को पलट कर नया संविधान जारी किया गया । आज जो स्थिति से नेपाल गुजर रहा है, इस स्थिति का अंदेशा भारत को पहले ही से था और भारत ने इससे आगाह भी कराया था । किन्तु नेपाल सरकार ने इस बात की गम्भीरता को नहीं लिया और आज की हालात उसी का परिणाम है । भारत चिन्तित है कि अगर मधेश आन्दोलन हिंसात्मक होता है, तो इसका सीधा असर भारत पर भी पड़ेगा । भारतीय विदेशमंत्री ने स्पष्ट किया कि, नेपाल एक स्वायत्त देश है और भारत ने इसमें कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया है और न ही करने की नीति है । उन्होंने कहा कि जिस देश से हमने सम्बन्ध नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश की, उसी देश में हम अपनी छवि क्यों बिगाड़ेंगे नाकाबन्दी कर के ? अगर नाकाबन्दी भारत ने किया होता तो सीमाओं पर ट्रकों की लम्बी कतारें नहीं होतीं । उन्हें पीछे लौटा दिया जाता किन्तु भारत इंतजार कर रहा है कि, नेपाल की स्थिति सुधरे और भारत बिना देर किए ट्रकों को नेपाल भेज सके । आवश्यक चीजों की आपूर्ति भारत री–रुटिंग कर के भेज रहा है, किन्तु यह समस्या का समाधान तो नहीं है ।
भारत दौरे पर रहे मधेशी नेताओं ने मधेश की वर्तमान अवस्था की ओर भारत का ध्यानाकर्षण कराया है, जिससे यहाँ बौखलाहट सी हो गई है । नेपाल की पीत पत्रकारिता मधेशी नेता के भारत भ्रमण को पूरी नकारात्मकता के साथ जोर–शोर से हवा दे रही है । पर जिस तरह आज तक भारत की सत्ता ने मधेश को दरकिनार किया हुआ था, वह पूर्व परिस्थिति आज बदलती नजर आ रही है । नेपाल में मधेश और मधेश की जनता दोनों की स्थिति से विश्व परिचित हो चुका है । वैसे तो पूरी कोशिश नेपाली सत्ता की ओर से अब भी हो रही है कि, भारत किसी तरह नाका सुचारु करे । किन्तु भारत ने कह दिया है कि पहले अपनी जनता की माँगों को सुनें और उन्हें सन्तुष्ट करें, हमारी ओर से कोई कठिनाई नहीं है । जब तक नेपाल में असंतोष है, उससे हमारी सीमा भी सुरक्षित नहीं है और भारत अपनी जनता की सुरक्षा चाहता है । भारत की इस नीति के साथ वहाँ का पक्ष और विपक्ष दोनों एक हो चुके हैं । सच तो यह है कि विदेश नीति के मामले में भारत में मतभेद होने के बावजूद पक्ष और विपक्ष हमेशा एक रहता है । अब तो विपक्ष, मौजुदा सरकार से स्पष्टोक्ति माँग रही है कि, नेपाल के संविधान में मधेशियों को जिस तरह अधिकारविहीन किया जा रहा है उसपर भारतीय सरकार अब तक क्यों खामोश है ? यहाँ तक कि बिहार की सरकार ने खुलकर कह दिया है कि, बिहार मधेश के साथ है । आज भारत को शायद यह अहसास हुआ है कि, जिस रोटी और बेटी के सम्बन्ध का दावा वर्षों से दोनों देश करते आए हैं, सच कहा जाय तो जमीनी तौर पर यह मजबूत सम्बन्ध नेपाल के एक क्षेत्र मधेश से है, न कि सम्पूर्ण नेपाल से । अगर सम्पूर्ण नेपाल से यह सम्बन्ध होता, तो आज शायद जारी संविधान में मधेश के साथ नागरिकता की नीति में भी बेइमानी नहीं होती । राज्य सभा में मुख्य विपक्षी नेता डा. कर्ण सिंह ने मधेश और मधेशियों की स्थिति पर चिंता जाहिर की । उन्होंने कहा कि, मधेशियों को अन्तरिम संविधान में जो अधिकार प्राप्त थे वो भी आज समाप्त कर दिए गए हैं । नागरिकता में भी विभेद की नीति अपनाई जा रही है । गौर करने की बात तो यह है कि भारतीय विदेश मंत्री ने उन तमाम नेताओं के नाम गिनाए जो समय–समय पर दिल्ली का दौरा करते आए हैं, मसलन प्रचण्ड, विद्या भण्डारी, ओली, भटराई, शेरबहादुर देउवा आदि । फिर आज अगर मधेश के नेता वहाँ गए हैं तो इतना हंगामा क्यों ?
हमारे नेता आज भी गम्भीर नहीं हो रहे । मधेश के मुद्दों पर वो कोई बात ही नहीं कर रहे हैं । वो सिर्फ वार्ता करने का बहाना कर रहे हैं । उनकी नीयत बस इतनी है कि किसी तरह आन्दोलन कमजोर हो जाय । इसके लिए भी साम, दाम दण्ड भेद अपनाया जा रहा है । जगह–जगह अराजक तत्व को आन्दोलन में घुसाकर हिंसात्मक कार्य करवाए जा रहे हैं । मधेश के शाँतिपूर्ण आन्दोलन को बदनाम करने की पूरी कोशिश जारी है । उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जाते हैं धार्मिक आयोजन में और फिर वहाँ से लौट कर यह दावा करते हैं कि समझौता हो चुका है और अब नाकाबन्दी खुलने वाली है । ये सब मधेश का मनोवल तोड़ने के लिए किया जा रहा है । किन्तु इस बार मधेश की जनता भी अड़ गई है कि, अधिकार की लड़ाई में कोई उधार का समझौता नहीं । फिर भी हमारी सरकार वस्तुस्थिति की नाजुकता को नहीं समझ रही है । उन्हें समझना होगा कि दमन और गोली समस्या का समाधान नहीं है । भारतीय नाकाओं पर भारत की जनता के साथ बल प्रयोग कर के पुलिस प्रशासन स्थिति को और भी जटिल बना रही है, जिसका उदाहरण रुपैडिहा नाका की घटना है । अगर ऐसी ही घटनाएँ होती रहीं तो नाकाओं पर स्थिति और भी तनावपूर्ण हो सकती है और ऐसे में अभी जो देश की गति है, वह और भी बुरी तरह प्रभावित हो सकती है । समय रहते चेतने की आवश्यकता साफ तौर पर दिखाई दे रही है । सरकार अपनी खुशफहमी से यथाशीघ्र निकले वरना स्थिति हाथ से निकलती चली जाएगी ।

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