विश्वपटल पर कीर्तिमान स्थापित करता मधेश आन्दोलन

कैलास दास:मधेश की मिट्टी लाल हो रही है किन्तु अधिकार प्राप्ति के लिए जंग अब भी जारी है । अपने ही देश में अपने अधिकार के लिए

मधेश नेतृत्वकर्ता मोर्चा ने सावन ३० गते संविधान में विगत में हुए समझौता कार्यान्वयन के लिए आन्दोलन शुरु किया । प्रहरी के दमन के कारण मधेश आन्दोलन और ऊँचाई पर जाने लगा । उसके बावजूद भी सरकार को न तो उस जनता की फिक्र रही और न ही राष्ट्र की चिन्ता । अगर चिन्ता होती तो दो महीने में केवल भारत—नेपाल की सीमा से और व्यापार से २ खर्ब रुपैयाँ राजश्व घाटा रहा, मधेशी जनता मानव सागर की तरह सरकार पर टूट पड़ी । लेकिन जनता को न तो न्याय मिला और न ही आश्वासन । मिली तो बन्दूक की गोलियाँ और अश्रु गैस । उजाड़ीं माँ बहनो की माँग की सिन्दूर ।
खून बह रहा है, वह भी अधिकार के वास्ते । क्रुरता और विभेद के विरुद्ध । शोषण और दमन के खिलाफ । एक देश में दो प्रकार के नागरिक में असमानता और मानवता विरुद्ध और संविधान में अधिकार सुनिश्चिता के वास्ते ।
नेपाल में शासन व्यवस्था चलाने वाले ही अगर राजनीति विभेद ही नही मानव विभेद भी करने लगे तो वहाँ पर जितने भी मानव की हत्या की जाय कम ही है । ऐसा नहीं होता तो मधेश के जिलों में ४० लोगों ने अधिकार के वास्ते मौत नहीं होती । शासक वर्ग ने एक बार भी श्रद्धाञ्जली तो क्या, सम्बोधन तक करने को मुनासिब नही समझा है । क्या सरकार का दायित्व नहीं है कि ऐसी सम्वेदनशील घड़ी में जनता के नाम में सम्बोधन करें । क्या उस समय अपने आप को राष्ट्रीय पार्टी कहलाने वाले नेकपा एमाले, एमाओवादी और नेपाली काँग्रेस जिन्हें जनता को आश्वासन नहीं देना चाहिए, समस्या समाधान की बात नहीं करनी चाहिए थी ? असन्तुष्ट जनता को सन्तुष्ट कैसे किया जाए वातावरण बनाना चाहिए । वह नही कर मधेश केन्द्रित दलो के साथ ‘वाक युद्ध’ कर जनता में घृणा के पात्र बन चुके हैं ।j-1 j-2 j-3 bardiya sanglo-2 bardiya sanglo-1
मानता हूँ संघीय समाज मधेशी फोरम, सद्भावना पार्टी, तराई मधेश सद्भावना पार्टी, नेपाल सद्भावना पार्टी सहित का मोर्चा अगर मधेश केन्द्रित होकर राजनीति करता है तो नजाायज नही है । वहीं पर राष्ट्रीय पार्टी एमाओवादी, एमाले, काँग्रेस सीमित क्षेत्र, समुदाय के लिए अगर राजनीति करने का मतलव है मधेशी पहाड़ी बीच द्वन्द सृजना करना । राजनीतिक समस्या को समुदायिक समस्या के साथ लड़ाना । इससे भविष्य में दो समुदाय के बीच का आन्दोलन देश को दो टुकड़े में विभाजन करने की स्पष्ट नीति दिखती है । यह चिन्तन मनन केवल राजनीतिक दलों में ही नही मीडिया में भी देखा गया है । केन्द्रीय मिडिया भी समाचार का प्रसारण÷प्रकाशन पक्षपातपूर्ण तरीके से कर रहा है ।
करीबन दो महीने से मधेश का शहर सुनसान बना हुआ है । गाँवो मे खामोशी छायी रही, लोगो में कौतुहलता बनी रही । बच्चा घर से निकलना बन्द कर दिया । शिक्षण संस्थान, कलकारखाना, यातायात पूर्णरूप से बन्द हो गया । दैनिक कामकाज करने वालों का जीवनयापन कष्टकर बन गया । हर तरफ आन्दोलन के प्रभाव से हाहाकार मच गया । घर–घर की महिलाएँ सड़क पर उतर गई । कहीं झाडु, तो कहीं भैंस, कहीं लाठी तो कही हाथ जोड़ आन्दोलन को स्वरूप दे दी गई । फिर भी सत्ता पक्ष कुम्भकरनीय नींद में हैं ।
संविधान जनता के लिए बनाया जाता है, सीमित वर्ग और क्षेत्र के लिए नही । सत्ता पक्ष संविधान के क्रम में विभेद का सीमा लाँघ चुकी है । सबसे पहले १६ बुँदे समझौता ही गलत तरीके से किया गया । जिस संविधान से प्रदेश निर्माण की बात चल रही थी कम से कम वहाँ के नेतृत्वकर्ता को भी सम्मलित करना चाहिए था । उस समय तीन चार दलों ने ही सर्वोपरी समझा । दूसरे संविधान के प्रारम्भिक मसौदे में भी मधेश नेतृत्वकर्ता दलों को बाईकट कर दिया गया । मसौदे में मधेश आन्दोलन में हुए ८ बुँदा समझौता तो क्या, चर्चा और शहीदों के नाम तक उल्लेख नही किए गए हैं । तत्पश्चात् मधेश में फिर से आन्दोलन शुरु हुआ । सर्वोच्च अदालत ने मसौदा अन्तरिम संविधान के तहत नही रहा ठहराते हुए अध्यादेश भी जारी कर दिया । सत्ता पक्ष ने बाहुबलता दिखाते हुए समझौते की बेडि़याँ तोड़ी, कानून को अपने हाथ में लिया । जिनके द्वारा कानूनी राज्य की बात होती है उन्होंने ही कानून तोड़ा ।
मधेश नेतृत्वकर्ता मोर्चा ने सावन ३० गते संविधान में विगत में हुए समझौता कार्यान्वयन के लिए आन्दोलन शुरु किया । प्रहरी के दमन के कारण मधेश आन्दोलन और ऊँचाई पर जाने लगा । उसके बावजूद भी सरकार को न तो उस जनता की फिक्र रही और न ही राष्ट्र की चिन्ता । अगर चिन्ता होती तो दो महीने में केवल भारत—नेपाल की सीमा से और व्यापार से २ खर्ब रुपैयाँ राजश्व घाटा रहा, मधेशी जनता मानव सागर की तरह सरकार पर टूट पड़ी । लेकिन जनता को न तो न्याय मिला और न ही आश्वासन । मिली तो बन्दूक की गोलियाँ और अश्रु गैस । उजाड़ीं माँ बहनो की माँग की सिन्दूर ।
राज्य पक्ष के सत्ता स्वार्थ से बने संविधान के कारण आन्दोलनकारी के उपर चलाई गई गोली से धनुषा के जमुनिया निवासी नितु यादव, दिलिप यादव, संजय चौधरी । उसी प्रकार महोत्तरी के जलेश्वर ७ निवासी रोहन चौधरी, महोत्तरी ५ के रामविवेक यादव, जलेश्वर १४ के अमित कापर, पिगौना, महोत्तरी के विरेन्द्र विच्छा, हातिलेट महोत्तरी का रामशिला मण्डल, जलेश्वर ७ का गणेश चौधरी । कलैया बारा का हिफाजत मिया, वीरुगन्ज पर्सा के सोहन साह, भोला साह, दीनानाथ साह, धर्मराज सिंह, दिलिप चौरसिया, गौर रौतहट का राजकिशोर ठाकुर, कर्णाली के हरिबहादुर कुँवर, रुपन्देही के शैलेन्द्र श्रीवास्तव, रुपन्देही के रामेश्वर पासी, भैरहवा के सुधिराम यादव, सुनिल यादव रुपन्देही के दुर्गेश यादव, सप्तरी के राजीव राउत, सुर्खेत के गोपाल सिंह रजवार, यमबहादुर विसी, टिकाराम गौतम की मौत……..हुई है । आन्दोलनकारियों के आक्रमण में कुछ सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई है । टिकापुर कैलाली में एसएसपी लक्ष्मण न्यौपाने, बलराम विष्ट, केशवराज बोहरा, लोकेन्द्र चन्द्र, लक्ष्मण खड्का, रामबिहारी ठाकुर, सुनित साउद, चिम्फु थारु और महोत्तरी में थमनबहादुर विक है ।
मधेश आन्दोलन एक बार ही नही दो—दो बार क्यों किया गया ? मधेश में रहने वाली जनता हमेशा मधेश भूमि के लिए शहादत देने के लिए क्यों तैयार रहे ? अगर शासक वर्ग मधेशी जनता को भी नेपाली समझते तो वहाँ की जनता ‘राष्ट्र’ की जय—जयकार करते न कि महिला—पुरुष और बच्चा तक ‘जय मधेश’ का उद्घोष । सरकार की ‘नीयत और नीति’ में खोट की उपज है मधेश आन्दोलन । नेपाल की भूमि ‘मधेश’ आन्दोलन में विश्व में कीर्तिमान कायम कर चुका है । अन्तर्राष्ट्रीय रेकर्ड के अनुसार बंगला देश में ३१ दिन तक आन्दोलन चला था । जबकि मधेश आन्दोलन को करीब दो महीना होने के बावजूद भी यहाँ की सरकार में जिस प्रकार क्रुरता और विभेद देखा गया है वह जनता में आक्रोश ही नही आन्दोलन करने के लिए विवश करता रहा ।
२०६२÷०६३ में जन आन्दोलन हुआ था वह आन्दोलन १९ दिनों तक चला था । जिसमे नेपाल के १९ लोगों ने शहादत दिया था । आन्दोलन राजतन्त्र के खिलाफ किया गया था । कहते हैं नेपाल में राणा शासन के बाद राजतन्त्र ही क्रुर शासन रहा । उस समय १९ दिन के आन्दोलन और १९ लोगों की शहादत ने सत्ता परिवर्तन कर दिया अर्थात राजतन्त्र को अन्त हो गया ।
राजतन्त्र अन्त के पश्चात मधेश नेतृत्वकर्ता ने अन्तरिम संविधान जलाकर ०६३÷०६४ में मधेश आन्दोलन किया वह २२ दिनों तक चला जिसमें ५४ मधेशी जनता शहीद हो गये । आन्दोलन इस लिए किया गया था कि अढाई सौ वर्ष से शोषित, दमित एवं अवहेलित जनता का संविधान में अधिकार सुनिश्चित किया जाए । संविधान में मधेशी जनता का अधिकार सुनिश्चित किया जाए । उस समय सत्ता पक्ष और आन्दोलनरत मधेशवादी दल के साथ ८ बुँदे सम्झौता हुआ । उसी समझौता को संविधान में समावेश करने के लिए आज फिर से ४० लोगों की मौत हुई है । सत्ता पक्ष की क्रुरता के कारण मधेश आन्दोलन विश्व के मानचित्र में समावेश हो गया है । आन्दोलन की समयावधि और स्वरूप ने विश्व में कीर्तिमान कायम कर दिया है । ११ सौ ५५ किलोमीटर अर्थात मधेश प्रदेश के क्षेत्र में जनता ने एक साथ खड़ा होकर हाथ से हाथ जोड़कर यह प्रदेश हमारा है कहकर जयजयकार लगाया जो विश्व मेंं अभी तक का रेकर्ड नहीं है ।
राजनीतिक विश्लेषक सी.के लाल के अनुसार बहुमत से जीतकर जाना और शासन करना बड़ी बात नहीं है क्योंकि इसका भी बहुत बड़ा इतिहास है, हिटलर भी बहुमत से ही जीतता था, लेकिन उसका क्रुर शासन होने के कारण ही अन्त हुआ इतिहास साक्षी है । ऐसा बहुत सारा इतिहास है कि बहुमत के बल पर जनता की आवाज को दवाने वाले खुद मिट चुके हैं । वर्तमान शासक ने भी मधेश आन्दोलन को यही समझ रखा है । वह समझते हैं कि राष्ट्र की सेना, जिल्ला प्रशासक, न्याय, कूटनीतिक के साथ साथ बहुमत भी हमारे साथ है । हम जैसा चाहे वैसा कर सकते हैं । अगर ऐसी मनसा नहीं होती तो जायज माँग के लिए आन्दोलित निहत्थी जनता के ऊपर बन्दूक की गोलियाँ नही बरसाते, अश्रु गैस नहीं छोड़ते, घर घर में जाकर नही पीटते । जबतक जनता के मत का सदुपयोग होता है उसका शासन चलता रहता है, जनता के मत का दुरुपयोग होने पर शासन खतरे में पड़ जाता है, इतिहास साक्षी है । पाकिस्रुतान केरु मुसररुफ नेरु भी ९० प्रतिशत मत तथा इररुाक केरु सद्दाम नेरु ९५ प्रतिशत मत केरु आधाररु मेरुं क्रुररुता पूर्वक शासन किया थारु। लेरुकिन नतीजा यह निकला की उनका पतन होरु गयारु। अब वही हाल नेरुपाल मेरुं होरुगा वह भविष्य बतला ररुहा हैरुरु।
तान के मुसरफ ने भी ९० प्रतिशत मत तथा इराक के सद्दाम ने ९५ प्रतिशत मत के आधार में क्रुरता पूर्वक शासन किया था । लेकिन नतीजा यह निकला की उनका पतन हो गया । अब वही हाल नेपाल में होगा वह भविष्य बतला रहा है ।
मधेश आन्दोलन मधेश नेतृत्वकर्ता दलाें का अब नहीं रह गया । यहाँ का हरेक वर्ग समुदाय, जातीय संघ संस्था, युवा क्लव, मानव अधिकारवादी, सरकारी तथा गैर सरकारी कर्मचारी भी आन्दोलन में उतर चुके हैं । एक बैनर के नीचे हजारों लोग शामिल हंै । भले ही बैनर अलग अलग है लेकिन प्रत्येक बैनर में ‘आन्दोलन प्रति एक्बद्धता और समर्थन’ अवश्य लिखा रहता है । देश का मेरु दण्ड शिक्षा और व्यापार होता है, वह भी खुलेआम सड़क पर उतर चुके हैं । दैनिक करोड़ौ की राजस्व वसूली बन्द हो चुकी है ।
मधेश नेतृत्वकर्ता दलों के कारण भी मधेश आन्दोलन शिथिल है । अगर अब भी वह अपना राजनीतिक छवि नही सम्भाले तो आने वाला कल में उनकी स्थिति और भी दयनीय होने वाली है मधेश में यह तो तय है । मधेशी जनता का सवाल है कि आखिर मधेश नेतृत्वकर्ता दलों का प्रतिपक्षी कौन सा दल है । एकीकृत नेकपा माओवादी, एमाले वा काँग्रेस । हमारी लड़ाई किसके साथ है यह स्पष्ट जवाब देना होगा । क्याेंकि कल के दिन में एमाओवादी के साथ भी सरकार बना चुकी है, काँग्रेस और एमाले के साथ भी । हाँ, राष्ट्रिय पार्टी के साथ जाना विवशता है परन्तु ऐसा भी नही कि जिन्हाेंने मधेशी जनता को हमेशा शोषण, दमन और नेपालीपन कहलाने से दूर रखा वैसे दलाें के साथ किस प्रकार का गठनबन्धन । फिलहाल अभी जिस के साथ हमारा आन्दोलन चल रहा है उसका साथ मधेशी दलों ने क्यों दिया जनता का यही सवाल है जो जायज भी है । मधेशी जनता तो इतनी सीधा साधी है कि दूसरों के दर्द को देखकर अपना दर्द ही भूल जाते हैं । जिस प्रकार से २०७२ बैशाख १२ और २९ गते भूकम्प आया था उसमें मधेशी जनता ने भाईचारा, बन्धुत्व का रिश्ता कायम किया था आज अगर यही भाव पहाडि़यों में दिखा होता तो एक मिसाल कायम हो जाता किन्तु अफसोस कि ऐसा कुछ नहीं दिखा ।

‘नेपाल का संविधान २०७२’ और मधेश आन्दोलन के बारे में कुछ व्यक्तियों से लिए गए विचार इस प्रकार है ः
मधेश जल रहा है और राष्ट्रीय पार्टी काँग्रेस, एमाले और एमाओवादी उसमें आग में पानी की जगह घी डाल रहे हंै । वैसे सरकार याा सत्ताधारी दल से जनता क्या उम्मीद कर सकती है । ‘नेपाल का संविधान २०७२’ आने पर देश की ४८ प्रतिशत जनता खुशीयाली, ५१ प्रतिशत जनता काला दिन और १ प्रतिशत जनता असमंजस में है । फिर भी वह गौर्वान्वित है । मधेश आन्दोलन अधिकार का आन्दोलन है, पक्षपात के विरोध का आन्दोलन है । विभेद, शोषण, दमन और देश में दूसरे दर्जे का नागरिक समझने का आन्दोलन है । जहाँ पर ४० लोगों की मौत हो चुकी हो और सरकार श्रद्धाञ्जली तो क्या सम्बोधन भी करना उचित नही समझा । वैसे सरकार और पार्टी के नेता से उसी प्रकार का व्यवहार करने का यह वक्त है । इस आन्दोलन में सेना की गोली और पुलिस की अश्रु गैस कम पड़ सकती है परन्तु आन्दोलनकारी के अधिकार की लड़ाई लड़ने का जुनून नही ।
– राजेन्द्र कुमार साह (राजु), समाजसेवी

सत्ता परिवर्तन हो चुका है । अब हम लोग गणतन्त्र दिवस मनाते हंै, लेकिन वर्तमान सत्ताधारी के विचारो में परिवर्तन बिलकुल नहीं हुआ है । समय अनुसार हर कुछ में परिवर्तन नही हुआ तो उसकी आयु कम हो जाती है । ‘नेपाल का संविधान २०७२’ से हुआ मधेश आन्दोलन उसी का देन है । राष्ट्रीय पार्टी कहलाने वाले दल में राष्ट्र हित की भावना नही होने का परिणाम आज मधेश आन्दोलन से अर्बो रुपये देश का नुकसान हुआ है । सत्ता तो बदली परन्तु सत्ताधारी की सोच नही ।
–सुरेन्द्र भण्डारी, सचिव जउवा संघ, जनकपुर
गणन्त्रात्मक संविधान अगर कफ्र्यू लगाकर, सेना परिचालन कर, जनता उपर पुलिस की गोलियाँ चलाकर लिखा जाए उस संविधान की आयु कितनी होगी यह कहनेवाली बात नही है । यह सब इसलिए किया गया की इस संविधान में मधेशी, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, थारु को अधिकार से वञ्चित किया गया है । मधेश का आन्दोलन खश शासक को अन्त और अधिकार का आन्दोलन है । यह मधेशी जनता लेकर रहेगा ।
–मुन्नी दास, महिला अधिकारकर्मी

मधेश में मधेश नेतृत्वकर्ता दल ही नही जातीय संघ संस्था, पेशाकर्मी, युवा क्लव, कानून विज्ञ, महिला अधिकारकर्मी आन्दोलित रहे, क्याें ? इसलिए कि खश शासक अभी भी मधेशी जनता को नेपाली नागरिक स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है । मधेशी युवाओं को गणन्त्र में भी कफ्र्यु लगाकर, सेना परिचालन कर तथा पुलिस की गोलियों से आन्दोलनकारीयों को मारकर खून से लिखा गया विभेदकारी संविधान स्वीकार्य नही है । मधेशी युवा कमजोर नही है वह मधेश आन्दोलन में दिखा चुका । जिस प्रकार राजतन्त्र का अन्त हुआ है खसवादी शासक अपना में परिवर्तन और सत्ता मोहन त्याग नहीं किए तो यही आन्दोलन उन सभी को अन्त कर देगा ।
–धर्मेन्द्र साह, संयोजक, संयुक्त युवा संघर्ष समिति

मधेश के युवा विद्यार्थी से लेकर युवा कमिटी तक आन्दोलित रहा । अपने ही देश में अधिकार के लिए दो महीना से आन्दोलन करने के बावजूद भी सरकार पक्ष का राजनीतिक दल गम्भीर नही दिखा । अगर उनको राष्ट्र की चिन्ता होती तो मधेश आन्दोलन से हुए २ खर्ब का नुकसान होने बचा लेते । ‘वाक युद्ध’ के कारण देश डूबती नैया पर सवार हो चुका । मधेश आन्दोलन का कोई नया मांग नही है जिसे सरकार को सोचने में विवश होना पड़े । लेकिन सीमित क्षेत्र, समुदाय और सत्ता स्वार्थ के कारण देश विभाजन की ओर बढता जा रहा है । ऐसी परिस्थिति से देश को बचाना कर्तव्य ही नही दायित्व भी है ।
–राजेश भण्डारी (भोला), अध्यक्ष श्री गणेश युवा कमिटी

मधेश आन्दोलन से देश का ही नही हरेक मधेशी नागरिक को नुकसान हुआ है । शिक्षा तो कोशो दूर चली गयी । तत्पश्चात भी सरकार को न तो देश की चिन्ता हो रही और नही मधेश में रहनेवाले नागरिक की । राजनीतिक मुद्दा राजनीतिक स्तर से समाधान होनी चाहिए, द्वन्द और दमन से नही । बहुत अफसोस की बात है कि मधेश की जनता अधिकार के लिए शहादत देने पर भी राज्य ने श्रद्धाञ्जली तो क्या सम्बोधन तक नही किया गया । यह सरकार की मधेशी नागरिक के लिए गैर जिम्मेवारीपन देखा गया ।
–चन्द्रनारायण मण्डल शिक्षक

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz