विश्वरुपा मा“ शक्तिदायिनी ५१ शक्तिपीठ की महिमा

विश्वरुपा मा“ शक्तिदायिनी ः ५१ शक्तिपीठ की महिमा
देवी प्रपन्नर्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतो˜खिलस्य ।maa Durga
प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवी चराचरस्य ।।
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवर्ीया विश्रवस्य बीजं परमासि माया ।
सम्मोहितं देवी समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ।।
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।
त्वयैकया पुरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ।।
विश्वश्वरी त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम ।
विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ।।
दर्ुगा सप्तशती
शरणागत की पीडÞा हरण करने वाली ! हमपर प्रसन्न होओ । अखिल जगत की जननी ! प्रसन्न होओ । विश्वेश्वरी ! विश्व की रक्षा करो । देवि तुम्ही चराचर जगत् की अधीश्वरी हो । तुम अनन्त बल सम्पन्न वैष्णवी शक्ति हो । इस विश्व की बीजरूपा परामाया हो । देवि ! तुमने इस समस्त जगत को भली भाँति मोहित कर रखा है । तुम्हीं प्रसन्न होने पर इस पृथ्वी पर मोक्ष की प्राप्ति कराती हो । देवि !  समस्त विधाएँ तुम्हारे ही स्वरूप भेद हैं । जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, सब तुम्हारी ही मर्ूर्तियाँ हैं । जगदम्बे ! एकमात्र तुम्हारे ही द्वारा यह सारा विश्व व्याप्त है । तुम्हारी क्या स्तुति हो सकती है – तुम स्तवन करने योग्य पदार्थों से परे और परा वाणी हो । विश्वेश्वरी तुम  विश्व का पालन करती हो । विश्वात्मिका हो, अतः समस्त विश्व को धारण करती हो । तुम विश्वाधिपति की भी वन्दनीया हो । जो लोग भक्तिपर्ूवक तुम्हारे सामने सिर झुकाते हैं, वे सम्पर्ूण्ा विश्व के आश्रयरूप हो जाते हैं ।
मौसम शारदीय नवरात्र का है । प्रकृति, शक्ति के स्वागतार्थ तैयार है, मानव मन उल्लसित है । शक्तिस्वरूपा माँ के कई रूप हैं जिनकी आराधना की जाती है । यह देश शक्ति का है, सती का है और ऋृषि मुनियों के तप का है । यहाँ के कण-कण मेर्ंर् इश्वर का साक्षात वास माना गया है । भगवती के कई जाग्रत मंदिर यहाँ हैं और उनके प्रति जनमानस की श्रद्धा भी असीम है । भगवती का ही एक पावन रूप है सती का । बडÞे दशहरे के अवसर पर आज सती की ही चर्चा करते हैं । कहते हैं माँ सती ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह किया था । इस कारण से जब राजा दक्ष ने यज्ञ का अनुष्ठान किया तो उसने भगवान शिव और सती को आमंत्रण नहीं भेजा । इस बात से सती को अत्यन्त दुख हुआ । उसने भगवान शिव से पिता-गृह जाने की जिद की और शिव के मना करने के बावजूद पिता-गृह चली गई । वहाँ उनका और उनके पति भगवान शिव का राजा दक्ष ने अत्यन्त अपमान किया । पति के अपमान को सती सहन नहीं कर पाई और प्रज्वलित अग्नि कुण्ड में स्वयं को होम कर दिया । जब यह समाचार भगवान शिव तक पहुँचा तो वह क्रोधित होकर दक्ष के यहाँ पहुँचे, जहाँ उन्होंने दक्ष का सर काटा जिसे बाद में बकरे के सर को जोडÞकर जीवित किया गया । तत्पश्चात् उसी क्रोधित अवस्था में उन्होंने यज्ञकुण्ड से माँ सती के जलते हुए शरीर को अपने हाथों में लेकर नृत्य प्रारम्भ कर दिया । उनका क्रोध शांत ही नहीं हो रहा था और न ही उनका नृत्य रुक रहा था, तब विष्णु ने अपने सर्ुदर्शन चक्र से सती के शरीर के कई टुकडेÞ कर दिए । सती के शरीर का यही खंडित अंग जहाँ-जहाँ गिरा वह शक्तिपीठ कहलाया । शक्तिपीठ की संख्या को लेकर कुछ मतभेद है, कई तो इसकी संख्या ५१ मानते हैं तो कई ५२ । सबसे अधिक शक्तिपीठ भारत के बंगाल राज्य में है । किन्तु सभी जगहों के शक्तिपीठ की अत्यन्त महत्ता है । इन स्थानों में देवी की नित्य स्थिति रहती है इसलिए ये शक्तिपीठ या सिद्ध पीठ कहलाते हैं ।
५१ शक्तिपीठ विभिन्न जगहों पर अवस्थित हैं, जो इस प्रकार हैं –
१ ः आरासुरी अम्बा शक्तिपीठ
गुजरात ः जूनागढÞ के आरासुर पर्वतों के बीच में माँ अम्बा का मंदिर है । सुन्दर और रमणीय प्रकृति के बीच अवस्थित है माँ अम्बा शक्तिपीठ । यहाँ सती के हृदय का एक भाग गिरा था । इस मंदिर में कोई मर्ूर्ति नहीं है । यहाँ वीसा यंत्र की पूजा होती है । यहाँ माता जी का सिंगार प्रातःकाल बालारूप में, मध्याहृन युवती रूप में और सायं वृद्धा रूप में किया जाता है ।  इसे कुछ इस तरह से सजाया जाता है कि दूर से प्रतिमा का आभास होता है । गिरनार के तीन शिखरों पर माँ अम्बा, दत्तात्रेय और गोरखनाथ का मंदिर है । यहीं पास में सती का उर्ध्व ओठ गिरा था, यह जगह भैरव शक्तिपीठ कहलाता है । माँ अम्बा के मंदिर में यों तो हर दिन की महत्ता है किन्तु भाद्रपद की पुणिर्मा का बहुत महत्व है । इस दिन लाखों लोग मंदिर में आते हैं और माँ का दर्शन और संध्या आरती में भाग लेते हैं । भक्ति और शक्ति का अद्भुत केन्द्र है माँ अम्बा शक्तिपीठ । यहाँ की शक्ति चन्द्रभागा और भैरव वक्रतुण्ड है ।
एक दूसरी मान्यता के अनुसार गिरनार पर्वत के शिखर पर स्थित अम्बिका जी के मंदिर को भी शक्तिपीठ माना जाता है । यहाँ देवी का उदर भाग गिरा है ।
२ ः रामगिरी शक्तिपीठ
मध्यप्रदेश ः इस शक्तिपीठ के सम्बन्ध में दो मान्यताएँ हैं -कुछ विद्वान चित्रकुट के शारदा मन्दिर को और कुछ विद्वान मैहर के शारदा मन्दिर को यह शक्तिपीठ मानते हैं । दोनों ही स्थान हिन्दू धर्मावलम्बी के प्रसिद्ध तर्ीथ स्थल हैं और दोनों ही मध्यप्रदेश में स्थित हैं । यहाँ सती के शरीर का दाहिना स्तन गिरा था । यहाँ की शक्ति शिवानी और भैरव चण्ड हैं ।
३ ः शुचीन्द्र शक्तिपीठ
तीन सागर के संगम स्थल पर है कन्याकुमारी । कन्याकुमारी से १३ किलोमीटर दूर शुचिन्द्रम में सती के उर्ध्व दंत का निपात हुआ था । कुछ का मानना है कि यहाँ देवी का पृष्ठ भाग गिरा था । यहीं शुचि शक्तिपीठ है । यहाँ सती कन्याकुमारी तपस्वी के रूप में विराजमान हैं । माना जाता है कि आज भी माँ, कन्यारूप में यहाँ तपस्या करती हैं । महषिर् गौतम के शाप से इन्द्र को मुक्ति यहीं मिली थी । शुचि कोज्ञानवनक्षेत्रम भी कहते हैं क्योंकि यहीं उन्हें शुचिता अर्थात पवित्रता भी मिली थी । एक और कथा यहाँ से जुडÞी हर्ुइ है । वाणासुर ने शिव को खुश कर अमरत्व का वरदान पाया था । शिव ने उसे वरदान दिया था कि वह सभी के लिए अजेय होगा सिवा कन्याकुमारी के । वरदान को पाने के बाद वाणासुर उन्मत्त होकर सभी देवताओं पर अत्याचार करने लगा । तभी माँ ने कन्या रूप में प्रकट होकर वाणासुर का वध किया । यहाँ शक्ति नारायणी और भैरव संहार रूप में विराजमान हैं ।
४ ः कन्यकाश्रम शक्तिपीठ
कन्याकुमारी ः यहीं भद्रकाली का मंदिर है । ये कुमारी देवी की सखी हैं । उनका मंदिर ही शक्तिपीठ है । यहाँ देवी का पृष्ठभाग गिरा था । यहाँ की शक्ति शर्वाणी और भैरव निमिष  हैं । कन्याकुमारी, जहाँ समुद्र के छोर से उगता र्सर्ूय लोगों को अपनी ओर खींचता है ।  मंदिरों और सागर की खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है कन्याकुमारी । यह भारत की अन्तिम दक्षिण सीमा है । पर्ूव में बंगाल की खाडÞी, पश्चिम में अरब महासागर और दक्षिण में हिन्दमहासागर इन तीनों के महासंगम से यह तर्ीथ स्थल बन गया है । महाभारत के वनपर्व में कहा गया है कि यहाँ आकर जो स्नान करता है उसे सभी कष्ट और पाप से मुक्ति मिलती है –
ततस्तीरे समुद्रस्य कन्यातर्ीथमुपस्पृशेत ।
तत्रोसस्पृश्य राजेन्द्र र्सवपापै ः प्रमुच्यते ।।
५ ः कांची शक्तिपीठ
कांचीपुरम ः तमिलनाडु के कांचीपुरम में अवस्थित है काँची शक्तिपीठ । यहाँ सती का कंकाल गिरा था । इस जगह पर कामाक्षी का भव्य मंदिर है । इसमें त्रिपुर सुन्दरी की भव्य प्रतिमा है । कांचीपुरम के तीन भाग है., शिव कांची, विष्णुकांची और जैन कांची ये अलग नहीं हैं एक ही हैं । शिव कांची नगर का बडÞा भाग है जो स्टेशन से २ किलोमीटर की दूरी पर है ।  मंदिर के द्वार पर आदिलक्ष्मी, धन लक्ष्मी, वर्ीयलक्ष्मी, सौभाग्य लक्ष्मी आदि देवी का न्यास किया गया है । परिसर में अन्नपूर्ण्ाा शारदा का भी मंदिर है । माना जाता है कि यह मंदिर शंकराचार्य ने बनवाया था । माँ कामाक्षी के तीन नेत्र त्रिदेवों के प्रतिरूप र्सर्ूय, चन्द्र उनके प्रधान नेत्र हैं तीसरा अग्नि से प्रज्ज्वलित है । कामाक्षी को कामकोटि भी कहा जाता है । यहाँ की शक्ति देवगर्भा और भैरव रुरु हैं । इस मंदिर को दक्षिण भारत का र्सवप्रधान शक्तिपीठ माना जाता है ।
६ ः विशालाक्षी शक्तिपीठ
काशी ः यहाँ भगवती सती की कर्ण्र्ााण गिरी थी । यहाँ की देवी विशालाक्षी कहलाईं । इनकी महिमा अपरम्पार है । देवी भागवत में तो काशी में एकमात्र विशालाक्षीपीठ होने का उल्लेख मिलता है । मत्स्यपुराण में उल्लेख है कि देवी ने अपने जिन १०८ शक्तिपीठों के नाम कहे हैं उनमें सबसे पहले वाराणसी में स्थित विशालाक्षी का ही उल्लेख हुआ है –
वाराणस्यां विशालाक्षी नैमिषे लिङ्गधारिणी ।
प्रयागे ललिता देवी कामाक्षी गन्धमादने ।।
भगवती विशालाक्षी का मंदिर काशी में मीरघाट में है । यहीं पर श्री विशालाक्षीश्वर महादेव का शिवलिंग भी है । देवी गौरवर्ण्र्ााी हैं तथा उनके शरीर से कान्ति निकलती रहती है । यहाँ की शक्ति विशालाक्षीऔर भैरव कालभैरव हैं ।
७ ः कामाख्या शक्तिपीठ
असम ः ५१ शक्तिपीठों में श्री कामाख्या महापीठ र्सवश्रेष्ठ शक्तिपीठ माना जाता है । यहाँ सती देवी का योनिभाग गिरा था । ब्रहृमपुत्र नदी के तट पर गुवाहाटी के कामगिरी पर्वत पर भगवती आद्यशक्ति कामाख्यादेवी का पावन पीठ विराजमान है । इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी, भैरवी कामाख्यादेवी यानीलपार्वती हैं । यहाँ के भैरव उमानन्द शिव हैं । कालिकापुराण के अनुसार नीलाचल पर्वत पर देवी का योनिमण्डल गिरकर नीलवर्ण्र्ााा प्रस्तररूप हो गया, इस हेतु यह पर्वत नीलाचल के नाम से भी विख्यात है । उसी प्रस्तरमय योनि में कामाख्या देवी निवास करती हैं । जो मनुष्य इस शिला का र्स्पर्श करते हैं वे अमरत्व को प्राप्त करते हैं ।
कामाख्यादेवी के मंदिर निर्माण के विषय में कहा जाता है कि यह कामदेव द्वारा विश्वकर्मा से बनवाया गया है । कामाख्यादेवी मंदिर के समीप उत्तर की ओर देवी की क्रीडÞापुष्करिणी है । यह तालाब सौभाग्यकुण्ड के नाम से जाना जाता है । कामाख्यादेवी मंदिर में प्रवेश करते ही माँ की चलन्ता मर्ूर्ति के दर्शन होते हैं । इस के उत्तर में वृषवाहन पंभवक्त्र एवं दशभुजविशिष्ट कामेश्वर महादेव अवस्थित हैं । दक्षिणभाग में कमलासना देवी की मर्ूर्ति है । पहले कामेश्वरी देवी और कामेश्वर शिव का दर्शन किया जाता है उसके पश्चात् देवी महामुद्रा का दर्शन किया जाता है । देवी का योनि मुद्रपीठ दस सोपान नीचे अन्धकारपर्ूण्ा गुफा में अवस्थित होने के कारण वहाँ सदा दीपक का प्रकाश रहता है ।
कामाख्या देवी मंदिर के अतिरिक्त महाविधाओं के सात मन्दिरों में से भुवनेश्वरी मन्दिर नीलाचल पर्वत के सर्वोचच श्रृगं पर होने से विशेष महत्व का है ।
८ ः भद्रकाली शक्तिपीठ
कुरुक्षेत्र ः यहाँ सती का दक्षिण गुल्फ गिरा था । यहाँ की शक्ति सावित्री और भैरव स्थाणु हैं । दिल्ली और अम्बाला के बीच में कुरुक्षेत्र है । इस स्टेशन से झांसारोड पर स्थाणु शिवमंदिर के पास भद्रकाली देवी का मंदिर स्थित है । इन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम स्थाणेश्वर पडÞा है । माना जाता है कि पहले स्थाणु शिव का दर्शन करना चाहिए उसके बाद भद्रकाली का दर्शन करना चाहिए । मिथक है कि महाभारत युद्ध में विजय के लिए पाण्डवों ने स्थाणु शिव और भगवती धद्रकाली का दर्शन पूजन कर आशर्ीवाद प्राप्त किया था । यहाँ शक्तिपीठ के पास ही द्वैपायन सरोवर भी है । र्सर्ूयग्रहण के अवसर पर इस सरोवर में स्नान करने का बहुत महत्व है ।
९ ः काली शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल, कोलकाता । हाबडÞा स्टेशन से सात किलोमीटर की दूरी पर कोलकाता में काली घाट के किनारे काली शक्तिपीठ का मंदिर है । मंदिर में माँ काली की भव्य और विकराल प्रतिमा स्थापित है । यहाँ की शक्ति माँ कालिका और भैरव नकुलीश रूप में हैं । यहाँ सती के दाएँ पैर की चार उFmगलियाँ गिरी हैं । मंदिर में हर रोज भक्तों की भीडÞ होती है दूर दूर से भक्तगण माँ काली के दर्शन हेतु आते हैं । इस मंदिर में त्रिनैना माँ रक्ताम्बरा, मुण्डमालिनी और मुक्तकेशी विराजमान हैं ।
१० युगाद्या शक्तिपीठर्
बर्दवान ः बर्दवान से लगभग ३२ किलोमीटर उत्तर की ओर क्षीरग्राम में यह शक्तिपीठ स्थित है । यहाँ सती के दाहिने पैर का अँगूठा गिरा था । यहाँ की शक्ति भूतधात्री और भैरव क्षीरकण्टक हैं । कुब्जिकातन्त्र में क्षीरग्राम की दिव्यपीठ में गणना की गई है । गर्न्धर्वतन्त्र,बृहन्नीलतन्त्र, शिवचरित, पीठनिर्ण्र्ााआदि ग्रन्थों में इस पीठ का उल्लेख मिलता है । क्षीरग्राम की पीठदेवी भूतधात्री महामाया के साथ देवी येगाद्या की भद्रकाली मर्ूर्ति एक हो गई है और देवी का नाम युगाद्या या योगाद्या प्रसिद्ध हो गया ।
११ ः त्रिस्नोता ः पश्चिम बंगाल के सिलीगुडÞी से कुछ ही दूर जलपाईगुडÞ स्टेशन है । इस जिले के बोदा इलाके में शालवाडÞी ग्राम है । यहीं से होकर तीस्ता नदी गुजरती है नदी के किनारे बहुत ही सुन्दर और मनोरम दृश्य के बीच देवी का मंदिर स्थित है । यहाँ सती का बायाँ चरण का निपात हुआ था । यहाँ की शक्ति भ्रामरी और भैरवर् इश्वर हैं ।
१२. बहुला शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल ः यह शक्तिपीठ हावडÞा से १४४ किलोमीटर तथा नवदीपधाम से २४ मील दूर कटवा जंक्शन से पश्चिम केतुग्राम में है । यहाँ देवी के शरीर का बायाँ हाथ गिरा था । यहाँ की शक्ति बहुलाऔर भैरव भीरुक है ।
१३ ः वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल ः ओंडाल जक्शन से सैंथिया लाइन जाती है । इसी लाइन पर ओंडाल से २२ मील की दूरी पर दुब्राजपुर स्टेशन है । इस स्टेशन से सातमील उत्तर तप्त जल के कई झरने हैं । इन झरनों के समीप कई शिव मंदिर हैं । बाकेश्वर नाले के तट पर होने से यह स्थान बाकेश्वर या बक्त्रेश्वर कहलाता है । यह शक्तिपीठ सैन्थिया जक्शन से १२ किलोमीटर की दूरी पर श्मशानभूमि में स्थित है । यहाँ पापहरण कुण्ड है । जनश्रुति के अनुसार यहाँ अष्टावक्र ऋषि का आश्रम था । यहाँ देवी का मन गिरा है । यहाँ की शक्तिमहिषमर्दिनी है और भैरव वक्त्रनाथ हैं ।
१४ ः नलहटी शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल ः यह शक्तिपीठ सैंन्थिया से ४२ किलोमीटर और बोलपुर शान्तिनिकेतन से ७५ किलोमीटर पर है । नलहटी रेलवेस्टेशन से ३ किलोमीटर की दूरी पर नैऋत्यकोण में यह मंदिर स्थित है । यहाँ सती की उदरनली गिरी थी । यहाँ की शक्ति कालिका और भैरव योगीश हैं ।
१५ ः नन्दीपुर शक्तिपीठ
पश्चिमबंगाल ः हावडÞा से क्यूल लाइन में सैंथिया स्टेशन से थोडÞी दूर पर नन्दीपुर ग्राम में एक बडÞे बटवृक्ष के नीचे देवी मंदिर है, यह ५१ शक्तिपीठों में से एक है यहाँ देवी का कण्ठहार गिरा था । यहाँ की शक्ति नन्दिनी और भैरव नन्दिकेश्वर हैं ।
१६ ः किरीट शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल ः हावडÞा बरहरबा रेलवे लाइन पर हावडÞा से र्ढाई किलोमीटर दूर लालबाग कोट स्टेशन से लगभग ५ किलोमीटर पर बडÞनगर के पास गंगा तट पर यह शक्तिपीठ स्थित है । कयहाँ देवी का मुकुट गिरा था । यहाँ की शक्ति विमला, भुवनेशी और भैरव सर्ंवर्त है । कुछ लोग कानपुर के किरीट को यह शक्तिपीठ मानते हैं ।
१७ ः अट्टहास शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल ः यह शक्तिपीठ वर्द्धमान से ९३ किलोमीटर दूर अहमदपुर लाइन पर लाबपुर स्टेशन के निकट है ।  यहाँ देवी का नीचे का ओंठ निपात हुआ था । यहाँ की शक्ति फुल्लरा और भैरव विश्वेश हैं ।
१८ ः विभाष शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल ः यह शक्तिपीठ मिदनापुर जिले के ताम्रलुक में है । यहाँ रूपनारायण नदी के तट पर वर्गभीमा का विशाल मंदिर है । यह मंदिर अत्यन्त प्राचीन है । दक्षिण पर्ूव रेलवे के पास कुडÞा स्टेशन से २४ किलोमीटर की दूरी पर यह जगह है । यहाँ सती का बांया टखना गिरा है । यहाँ की शक्ति कपालिनी,भीमरूपा तथा भैरव र्सवानन्द हैं ।
१९ ः यशोर शक्तिपीठ
बँगलादेश ः पहले यह शक्तिपीठ बृहत्तर भारत में थे किन्तु विभाजन पश्चात यह बँगलादेश में है । यह खुलना जिले के जैशोर शहर में है । यहाँ सती की बाँयीं हथेली गिरी थी । यहाँ की शक्ति यशोरेश्वरी और भैरव चन्द्र हैं ।
२० ः चट्टल शक्तिपीठ
बंगलादेश ः यह शक्तिपीठ भी बंगला देश में है । यह चटगाँव से ३८ किलोमीटर दूर सीताकुण्ड स्टेशन के पास चन्द्रशेखर पर्वत पर भवानी मन्दिर के रूप में स्थित है । यहीं चन्द्रशेखर शिव का भी मंदिर है । यह स्थान समुद्र सतह से लगभग ३५० मीटर की ऊँचाई पर स्थित है । सीताकुण्ड, र्सर्ूयकुण्ड, व्यासकुण्ड, ब्रहृमकुण्ड, जनकोटिशिव, सहस्रधारा तथा लवणक्ष तर्ीथ स्थल यहीं पर है । बाडवकुण्ड में से निरन्तर अग्नि प्रज्ज्वलित होता रहता है । यहाँ सती की दक्षिण बाहु गिरी थी । यहाँ की शक्ति भवानी और भैरवचन्द्रशेखर हैं । महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ मेला लगा करता है ।
२१ ः करतोयातट शक्तिपीठ
बंगलादेश ः यह शक्तिपीठ भी बंगलादेश में ही है । लालमनीरहाट संतहाट रेलवे लाइन बोंगडÞा स्टेशन से दक्षिण पश्चिम में ३२ किलोमीटर दूर भवानीपुर ग्राम में यह शक्तिपीठ अवस्थित है । मंदिर लाल बलुआ पत्थर का बना हुआ है, जिसमें टेराकोटा का सुन्दर काम हुआ है । यहाँ देवी का बांया तल्प गिरा था ।  यहाँ की शक्ति अपर्ण्ाा और भैरव वामन हैं । करतोयातट शक्तिपीठ, विभाषपीठ योजन विस्तृत शक्तित्रिकोण के अर्न्तर्गत आता है । यह सिद्धि क्षेत्र है । यहाँ देवता भी मृत्यु की इच्छा करते हैं । इस क्षेत्र के घर घर में देवी का निवास माना जाता है ।
करतोयानदी को सदानीरा कहा जाता है । श्रावण और भाद्रमास में जब अज्य नदियाँ दूषित हो जाती हैं यह तब भी पवित्र बनी रहती है । वायुपुराण के अनुसार यह नदी ऋृक्षपर्वत से निकली है । इसका जल मणि सदृश उज्ज्वल है । इसको ब्रहृमरूपा भी कहा जाता है ।
२२ ः सुगन्धा शक्तिपीठ
बंगलादेश ः यह शक्तिपीठ भी वर्त्तमान में बंगलादेश में है । यहाँ जाने के लिए खुलना से बारीसाल तक स्टीमर से जाया जाता है । बारीसाल से २१ किलोमीटर उत्तर में शिकरपुर ग्राम में सुगन्धा नदी के तट पर उग्रतारा देवी का मंदिर है । यहाँ देवी की नासिका का निपात हुआ था । यहाँ की शक्ति सुनन्दा और भैरवत्रयम्बक हैं ।
२३ ः कात्यायनी शक्तिपीठ
उत्तरप्रदेश ः मथुरा वृन्दावन के बीच भूतेश्वर नामक रेलवे स्टेशन के समीप भूतेश्वर मंदिर के प्रांगण में यह शक्तिपीठ अवस्थित है । यह स्थान चामुण्डा कहलाता है । तंत्र चुडामणि में इसे मौली शक्तिपीठ माना गया है । यह स्थान महषिर् शाण्डिल्य की साधना स्थली भी रही है । यहाँ सती के केश गिरे थे । यहाँ की शक्ति उमा तथा भैरव भूतेश हैं । ब्रहृमवर्ैवर्त्तपुराण में उल्लेख है-वज्रे कात्यायनी परा, अर्थात वृन्दावन स्थित पीठ में पराशक्ति महामाया माता श्रीकात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध हैं । यह शक्तिपीठ भारत के शक्तिपीठों में अत्यन्त प्राचीन है । यहाँ की आध्यात्मिक तथा अलौकिकता का मुख्य कारण है साक्षात र्सवशक्तिस्वरुपिणी, जन्म मरण कष्टहारिणी और सिद्धिदाता गणेश एवं अर्द्धनारीश्वर का विद्यमान होना ।
२४ ः प्रयाग शक्तिपीठ
उत्तरप्रदेश ः अक्षयवट के निकट ललितादेवी का मंदिर है । कुछ विद्वान इसे शक्तिपीठ मानते हैं और कुछ अलोपी माता के मंदिर को शक्तिपीठ मानते हैं । वैसे ये दोनों  ही माँ ललितादेवी के मंदिर हैं । साथ ही अन्य मान्यता के अनुसार मीरपुर में ललितादेवी का शक्तिपीठ माना जाता है । यहाँ सती की हाथों की उँगुलियाँ गिरी थीं । यहाँ की शक्ति ललिता भैरव भव हैं ।
२५ ः गोदावरी शक्तिपीठ
आंध्रप्रदेश ः देवस्थानों के लिए यह स्थान प्रसिद्ध है । यहाँ शिव, विष्णु, गणेश, सुब्रहृमण्यम आदि देवताओं की पूजा होती है । गोदावरी स्टेशन के पास कुब्बूर में कोटितर्ीथ है, यह शक्तिपीठ यहीं अवस्थित है । यहाँ सती का बायाँ गाल गिरा था । यहाँ की शक्ति विश्वेशी या रुक्मिणी और भैरव दण्डपाणि हैं ।
२६ ः श्रीशैल शक्तिपीठ
आन्ध्रप्रदेश ः हैलराबाद से २५० किलोमीटर की दूरी पर कर्ुर्नुल है । यहीं श्रीशैल में भगवान शिव का मल्लिकार्जुन नामक ज्योर्तिलिंग है । वहाँ से लगभग ४ किलोमीटर पश्चिम में भगवती भ्रमरादेवी का मंदिर है । यही शक्तिपीठ है । यहाँ सती की ग्रीवा का पतन हुआ था । यहाँ की शक्ति महालक्ष्मी और भैरवसंवरानन्द हैं । श्रीशैल को दक्षिण का कैलाश भी कहते हैं ।
२७ः करवीर महालक्ष्मी शक्तिपीठ
महाराष्ट्र ः कोल्हापुर पौराणिक करवीर क्षेत्र है, जो स्वयं महालक्ष्मी द्वारा निर्मित है । देवीगीता में उल्लेख है, ‘कोलापुरे महास्थानं यत्र लक्ष्मी सदा स्थिता ।’ यह वह जगह है जहाँ महालक्ष्मी हमेशा निवास करती हैं । यह एक महान शक्तिपीठ है । तन्त्रचूडÞामणि के अनुसार यहाँ सती के तीनों नेत्रों का निपात हुआ था । यहाँ की शक्ति महिषमर्दिनी और भैरव क्रोधीश हैं । यहाँ की जगदम्बा को करवीरसुवासिनी या कोलापुर निवासिनी भी कहा जाता है । कोल्हापुर पाँच नदियों का संगम और प्राचीन पौराणिक मंदिरों का शहर है ।
देवी का रूप अत्यन्त भव्य है ।  देवी का श्रीव्रि्रह वज्रमिश्रति रत्नशिला का स्वयम्भू और चमकीला है । उसके मध्यस्थित पद्मरागमणि भी स्वयम्भू है । प्रतिमा अत्यन्त पुरानी हो गई थी । इसलिए सन् १९५४ में कल्पोक्त विधि से मर्ूर्ति में वज्रलेप अष्टबन्धादि संस्कार किए गए हैं । मंदिर में विश्वेश्वर महादेव का मंदिर है । महादेवी ने यहाँ कोलासुर नामक दैत्य का वध किया था । मरने से पहले दैत्य देवी की शरण में आया और कहा कि यह क्षेत्र मुझे प्राप्त हो और इसका नाम मेरे नाम पर हो । तभी से इस क्षेत्र को करवीर क्षेत्र या कोलापुर नाम दिया गया । यह शक्तिपीठ श्री यंत्र पर स्थापित है । पाँच शिखरों और तीन मंडप से सुशोभित इस मंदिर में मध्य रात्रि तक पूजा की जाती है । यहाँ मुक्ति और मोक्ष के साथ धन और वैभव की कामना पूरी होती है ।
२८ . भैरव पर्वत शक्तिपीठ
मध्यप्रदेश ः यह शक्तिपीठ उज्जैन के निकट श्रि्रानदी के तट पर स्थित है । यहाँ देवी के ओष्ठ गिरे थे । यहाँ की शक्ति अवन्ती और भैरव लम्बकर्ण्र्ााैं ।
२९.  माँ तारा चण्डी शक्तिपीठ
सासाराम ः माँ के तीन नेत्रों में से दक्षिण नेत्र का निपात यहाँ हुआ है । यह मंदिर विन्ध्य पर्वत की कैमूर श्रंृखला में अवस्थित है । महिषासुर के दो सेनापतियों में से चण्ड का वध देवी ने यहीं किया था इसलिए इन्हें चण्डी कहा जाता है । भगवान बुद्ध ने बोधगया जाते समय यहाँ २१ दिन रहकर माँ की आराधना की थी । यह सम्पर्ूण्ा क्षेत्र धार्मिक मान्यताओं और कथाओं से परिपर्ूण्ा है ।
३०. उज्जयिनी शक्तिपीठ
मध्यप्रदेश ः उज्जैन में रुद्रसागर या रुद्र सरोवर के निकट हरिसिद्धि देवी का मंदिर है इसे ही शक्तिपीठ माना जाता है । यहाँ सती की कुहनी गिरी थी । यहाँ की शक्ति मंगलचण्डिका और भैरवमांगल्यकपिलाम्बर हैं । यह मंदिर चारो ओर दीवार से घिरा हुआ है । मंदिर में मुख्य पीठ पर प्रतिमा के स्थान पर श्रीयंत्र विराजमान है और उसके पीछे भगवती अन्नपूर्ण्ाा की प्रतिमा है । वर्तमान में गर्भगृह में स्थित हरसिद्धि देवी की भी पूजा होती है । मंदिर में महाकालिका, महालक्ष्मी, महासरस्वती तथा महामाया की भी पूजा होती है । प्रतिवर्षआश्विन मास के नवरात्र में पाँच दिनों तक यहाँ काफी धूमधाम रहती है ।
३१. शोण शक्तिपीठ
मध्यप्रदेश ः यह शक्तिपीठ अमरकण्टक के नर्मदा मंदिर में स्थापित है । यहाँ देवी का दक्षिण नितम्ब गिरा था । यहाँ की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी और भैरव भद्रसेन है ।
३२. मिथिला शक्तिपीठ
बिहार ः इस शक्तिपीठ का निश्चित स्थान अज्ञात है । मिथिला में कई ऐसे देवी मंदिर हैं जिन्हें लोग शक्तिपीठ मानते हैं । इनमें से उच्चैठ नामक स्थान पर वनदर्ुगा का मंदिर, सहरसा के पास वनगाँव महिषी का उग्रतारा मंदिर और समस्तीपुर से पर्ूव ६१ किलोमीटर दूर सलौना रेलवे स्टेशन से ९ किलोमीटर दूर जयमंगला देवी का मंदिर है जिसे शक्तिपीठ माना जाता है ।  यहाँ देवी का वाम स्कन्ध गिरा था । यहाँ की शक्ति उमा या महादेवी और भैरव महोदर हैं । परन्तु उग्रतारा मंदिर के विषय में मान्यता है कि यहाँ देवी का नेत्र पतन हुआ था । यहाँ एक यंत्र पर तारा, जटा तथा नीलसरस्वती की मर्ूर्तियाँ स्थित हैं ।
३३. वैद्यनाथ शक्तिपीठ
झारखण्ड ः वैद्यनाथधाम शिव और शक्ति के ऐक्य का प्रतीक है । यह गिरीडीह के पास है । यह स्थान चिताभूमि में है । मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने यहीं देवी का दाह संस्कार किया था । यहाँ देवी का हृदय अंश गिरा था । यहाँ की शक्ति जयदर्ुगा और भैरव वैद्यनाथ हैं ।
३४. मगध शक्तिपीठ
बिहार ः पटना में स्थित बडÞी पटनदेवी के मंदिर को शक्तिपीठ माना जाता है । यह स्थान पटना सिटी से लगभग पाँच किलोमीटर पश्चिम महाराजगंज में है । यहाँ देवी की जंघा का निपात हुआ था । यहाँ की शक्ति र्सवानन्दकरी और भैरव व्योमकेश हैं ।
३५. मणिवेदिक शक्तिपीठ
राजस्थान ः पुष्कर सरोवर के निकट एक ओर पर्वत की चोटी पर सावित्री देवी का मंदिर है दूसरी ओर गायत्री मंदिर है यही शक्तिपीठ है । यहाँ सती की कलाई गिरी थी । यहाँ की शक्ति गायत्री और भैरवशर्वानन्द हैं ।
३६. विराट शक्तिपीठ
राजस्थान ः जयपुर से ६४ किलोमीटर उत्तर में महाभारतकालीन विराटनगर के पुराने खण्डहर हैं । इसके पास ही एक गुफा है । इस गुफा को भीम का निवास स्थान माना जाता है । माना जाता है कि पाण्डवों ने अपने वनवास का अज्ञातवास यहीं बिताया था । यहीं पर वैराट ग्राम में शक्तिपीठ है । यहाँ देवी के दाएँँ पैर की ऊँगलियाँ गिरी थीं । यहाँ की शक्ति अम्बिका और भैरव अमृत है ।
३७. जनस्थान शक्तिपीठ
महाराष्ट्र ः नासिक के पास पंचवटी में स्थित भद्रकाली के मंदिर को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है । इस मंदिर में शिखर नहीं है । सिंहासन पर नवदर्ुगा विराजमान हैं । यहाँ सती की ठुड्डी गिरी थी ।  यहाँ की शक्ति भ्रामरी और भैरव विकृताक्ष हैं ।
३८. श्रर्ीपर्वत शक्तिपीठ
कश्मीर ः इस शक्तिपीठ के सर्ंदर्भ में दो मान्यताएँ हैं । कुछ इस शक्तिपीठ को लद्दाख कश्मीर में मानते हैं तो कुछ असम के सिलहट में जैनपुर नामक स्थान को मानते हैं । यहाँ देवी का दक्षिण तल्प गिरा था । यहाँ की शक्ति श्रीसुन्दरी और भैरव सुन्दरानन्द हैं ।
३९. कश्मीर शक्तिपीठ
कश्मीर ः कश्मीर में अमरनाथ की गुफा में भगवान शिव के हिम ज्योर्तिलिंग के दर्शन होते हैं । वहीं हिमशक्तिपीठ भी बनता है । श्रावण पूणिर्मा को अमरनाथ के दर्शन के साथ साथ यह शक्तिपीठ भी दिखाई देता है । यहाँ देवी देह के कण्ठ का पतन हुआ है । यहाँ देवी सती के अंग तथा अंगभूषण कण्ठप्रदेश की पूजा होती है । यहाँ की शक्ति महामाया और भैरव त्रिसन्ध्येश्वर हैं ।
४०. जालन्धर शक्तिपीठ
पंजाब ः जालन्धर को जलन्धर नामक दैत्य की राजधानी माना जाता है । इस दैत्य का वध भगवान शिव ने किया था । यहाँ विश्वमुखी देवी का मंदिर है । इस मंदिर में पीठस्थान पर स्तनमर्ूर्ति कपडÞे से ढंकी रहती है और धातुनिर्मित मुखमण्डल बाहर रहता है । यह मंदिर ही शक्तिपीठ है । यहाँ देवी का वाम स्तन गिरा था । यहाँ की शक्ति त्रिपुरमालिनी और भैरव भीषण हैं । ऐसी मान्यता है कि इस पीठ में सभी देवी देवता और तर्ीथ अंश रूप में निवास करते हैं इसलिए यहाँ मृत्यु पश्चात सभी को सद्गति प्राप्त होती है ।
४१. उत्कल शक्तिपीठ
उडÞीसा ः यहाँ के विषय में भी दो मान्यता है । कुछ के अनुसार पुरी में जगन्नाथ जी के मंदिर के प्रांगण में स्थित विमलादेवी का मंदिर ही शक्तिपीठ है । यहाँ देवी देह की नाभि गिरी थी । यहाँ की शक्ति विमलाऔर भैरव जगन्नाथ हैं ।
दूसरी मान्यता के अनुसार याजपुर में ब्रहृमकुण्ड के समीप स्थित विरजा देवी का मंदिर शक्तिपीठ है और यही नाभि पीठ है । याजपुर नाभिगया क्षेत्र माना जाता है । यहाँ श्राद्ध, तर्पण आदि का विशेष महत्व है । यहीं वैतरणी नदी है ।
४२. ज्वाला शक्तिपीठ
हिमाचलप्रदेश ः योगीन्द्र रेलमार्ग पर स्थित ज्वालामुखी स्टेशन से २१ किलोमीटर दूर काँगडÞा जिले में कालीधर पर्वत की सुरम्य तलहटी में ज्वालामुखी शक्तिपीठ है । इस मंदिर का वास्तुशिल्प अनूठा है । मंदिर के निर्माण में विशाल शिलाओं का प्रयोग किया गया है । सन् १९०५ के भूकम्प में काँगडÞा में काफी क्षति हर्ुइ थी पर यह मंदिर ज्यों का त्यों रहा । इस शक्तिपीठ में देवी की जिहृवा गिरी थी । माना जाता है कि सती अपनी सातों बहनों के साथ यहाँ सात ज्वाला रूप में रहती हैं । ये लपटें पर्वतीय भूमि से निकली हर्ुइ हैं और सदा प्रकाशमान और प्रज्ज्वलित  रहती हैं । ये ज्योतियाँ देवी दर्ुगा की शक्ति से निरंतर जलती रहती हैं । इनको दुग्धपान कराया जाता है तो उसमें बत्ती तैरने लगती हैं और कुछ देरतक नाचती है । यह दृश्य अत्यन्त मनमोहक होता है । यहाँ एक कुण्ड है जिसका पानी खौलता रहता है पर छूने पर ठण्डा रहता है । मंदिर के प्रवेश द्वार पर माँ के पद चिहृन हैं । यहाँ की शक्ति सिद्धिदा और भैरव उन्मत्त हैं ।
४३.  हिंगुला शक्तिपीठ
पाकिस्तान ः यह शक्तिपीठ पाकिस्तान के हिंगलाज नामक स्थान  में है । कराँची से फारस की खाडÞी की ओर ही एक चन्द्रकूप है । यह आग उगलता हुआ सरोवर है । इस शक्तिपीठ तक जाने का मार्ग अत्यन्त कठिन है ।  चन्द्रकूप से आगे हिंगलाज है । हिंगलाज देवी गुफा के अंदर विराजमान हैं । यहाँ शक्तिरूप ज्योति के दर्शन होते हैं । यहाँ देवी का ब्रहृमरन्ध्र गिरा था । यहाँ की शक्ति कोट्टरी और भैरव भीमलोचनहैं ।
४४. जयन्ती शक्तिपीठ
मेघालय ः मेघालय प्राकृतिक सौर्न्दर्य से भरपूर भारत का एक राज्य है । यहाँ की जयन्ती पहाडÞी को ही शक्तिपीठ माना जाता है । यहाँ सती की वाम जंघा का पतन हुआ था । यह शक्तिपीठ शिलांग से ५३ किलोमीटर दूर जयन्तिया पर्वत पर वाउर भग ग्राम में है । यहाँ की शक्ति जयन्ती तथा भैरव क्रमदीश्वरहैं ।
४५. त्रिपुरसुन्दरी शक्तिपीठ
त्रिपुरा ः यहाँ भगवती राजराजेश्वरी का भव्य मंदिर है । उन्हीं के नाम पर यहाँ का नाम त्रिपुरा पडÞा है । इस राज्य के राधाकिशोरपुर ग्राम से लगभग ३ कि. मी. की दूरी पर पर्वत पर यह शक्तिपीठ अवस्थित है । यहाँ सती का दक्षिण पाद गिरा था । यहाँ की शक्ति त्रिपुरेश्वरी तथा भैरव त्रिपुरेश हैं ।
४६. कालमाधव शक्तिपीठ
त्रिपुराः यहाँ देवी का वाम नितम्ब गिरा था । यहाँ की शक्ति काली तथा भैरव असितांग कहा जाता है ।
४७. गण्डकी शक्तिपीठ
नेपाल ः नदियों और पर्वतों का देश अपने प्राकृतिक सौर्ंदर्य और प्राचीन हिन्दू संस्कृति के लिए जाना जाता है । गण्डकी शक्तिपीठ गण्डकी नदी के उद्गम स्थल पर स्थित है । यहाँ सती का दक्षिण गण्ड-कपोल) गिरा था इसलिए इस स्थान को गण्डकी नाम मिला ।  यहाँ की शक्ति गण्डकी तथा भैरव चक्रपाणि हैं ।
४८. गुहेश्वरी शक्तिपीठ
नेपाल ः पशुपति नाथ मंदिर से सटा हुआ ही है गुहेश्वरी का सिद्ध शक्तिपीठ । इन्हें नेपाल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है । सारा नेपाल इन गुहृकालिका देवी की अनन्य भक्ति से वन्दना करता है । यहाँ का मंदिर विशाल और भव्य है । मंदिर में एक छ्रि्र है जहाँ से निरन्तर जल प्रवाहित होता रहता है । यह मंदिर ही शक्तिपीठ है । यहाँ सती के दोनों घुटने गिरे थे । यहाँ की शक्ति महामाया और भैरव कपाल हैं । यहीं पर चन्द्रघन्टा योगिनी और सिद्धेश्वर महादेव का प्रादर्ुभाव हुआ । माना जाता है कि शरीर के किसी भी अंग -विशेषकर गुप्तांग)में कोई रोग हो तो भगवती गुहेश्वरी के दर्शन से वहाँ पाठ कराने से उस रोग से मुक्ति मिल जाती है ।  शक्तिसंगमतंत्र में कहा गया है कि जटेश्वर से प्रारम्भ कर योगेश तक साधकों को सिद्धि प्रदान करने वाला नेपाल देश है ।
४९. लंका शक्तिपीठ
लंका ः यहाँ देवी का नूपुर गिरा था । यहाँ की शक्ति इन्द्राक्षी और भैरव अमर है ।
५०. मानस शक्तिपीठ
चीन ः यह शक्तिपीठ चीन अधिकृत तिब्बत में मानसरोवर के तट पर स्थित है । यह उत्कृष्ठ शक्तिपीठ है । यहाँ सती की दांयी हथेली गिरी थी । यहाँ की शक्ति दाक्षयणी और भैरव अमर हैं ।
५१. पंचसागर शक्तिपीठ
इस पीठ के स्थान की सही जानकारी नहीं मिलती है । यहाँ देवी के नीेचे के दाँत गिरे थे । यहाँ की शक्तिवाराही और भैरव महारुद्र हैं ।
५२. पाटेश्वरी शक्तिपीठ
माना जाता है कि उत्तरप्रदेश के बलरामपुर से थोडÞी दूर तुलसीपुर में यह शक्तिपीठ है । यहाँ देवी के पट -वस्त्र) उनके वाम स्कन्ध के सहित गिरे थे । नेपाल राज्य की सीमा को देवी पाटन पूण्यपीठ र्स्पर्श करता है । देवी पाटन को पातालेश्वरी शक्तिपीठ भी कहा जाता है । यह शँक्ितपीठ सिद्ध योगपीठ भी है ।
सनातन हिन्दू धर्म की कई मान्यताएँ हैं जो हमारी संस्कृति को परिभाषित और स्थापित करती हैं । चाहे कितने भी वैज्ञानिक तर्क वितर्क दे दिए जाएं किन्तु परम सत्ता के सच को हम किसी ना किसी रूप में अवश्य स्वीकार करते हैं । कोई अदृश्य सत्ता है जो हमें संचालित करती है और हम उसके शरणागत हैं । नेपाल और भारत की भूमि अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की वजह से जुडÞे हुए हैं जिसे जनमानस के हृदय से अलग नहीं किया जा सकता । यह वह सेतु है जो युगों से हमें जोडÞता आया है और जोडÞता रहेगा ।
प्रस्तुतिः डा. श्वेता दीप्ति

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz