विश्व भाषा पटल पर हिन्दी

रामाशीष:जिस प्रकार सन्त सूरदास के भक्ति-पदों ने भगवान कृष्ण से साक्षात्कार करा कर ब्रजभाषा को ‘सिद्ध-भाषा’ का स्थान दिलाया उसी प्रकार भोजपुरी मिश्रति अवधी भाषा के रामचरित मानस ने सन्त तुलसी दास को भागवान राम का दर्शन दिलाकर, अवधी में ही रचित ‘साखी’ एवं दोहे ने सन्त कबीर और रहीम खानखाना को भगवान से साक्षात्कार कराकर, अवधि भाषा को सिद्ध-भाषा का स्थान दिलाया है । इसी प्रकार ब्रजभाषा में रचित पदों ने कवि रसखान, राजस्थानी भाषा के भक्ति-पदों ने सन्त रैदास और मीरा बाई को भगवान कृष्ण का दर्शन कराकर राजस्थानी भाषा को सिद्ध-भाषा का स्थान दिलाया है जबकि राजषिर् जनक के परमपवित्र मिथिला क्षेत्र में अवतरित कवि-कोकिल विद्यापति के ‘मैथिली-बंगला’ पदों ने भगवान शिव से साक्षात्कार कराकर, ‘मैथिली-बंगला’ दोनों ही भाषाओं को सिद्ध-भाषा का दर्जा दिलाया है -विद्यापति एकमात्र ऐसे महान सन्त कवि हुए हैं जिन पर मैथिली और बंगला दोनों ही भाषाओं के विशेषज्ञ अपना होने के दाबा करते हैं) ।

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विश्व भाषा पटल पर हिन्दी

हिन्दी आज उसी सिद्ध-भाषा का महान दर्जा पाने की पंक्ति में खडÞी है और उसमें साथ दे रहे हैं महात्मा गांधी जिनका प्राणान्त ‘रघुपति राघव राजा राम’ और ‘हे राम’ के उच्चारणों से हुआ । स्वामी दयानन्द सरस्वती जिन्होंने पहली बार चारो वेदों का हिन्दी में अनुवाद कर ‘गैर-ब्राहृमणों’ को वेद पढÞने का अधिकार दिलाया । स्वामी रामदेव, जो आसन-प्राणायाम आदि यौगिक क्रियाओं को, कुछ चुने-गिने योगी-साधुओं के घेरे से बाहर लाकर, आम आदमियों को अपनाने का संदेश अपने सहज, सरल किन्तु ओजस्वी हिन्दी प्रवचनों के द्वारा देश-विदेश में फैला रहे हैं । आज श्री श्रीरविशंकर, कृपालु जी, मोरारी बाबू, आसाराम बापू, साध्वी ऋतम्भरा, युवा साध्वी चित्रलेखा जी, कृष्णचन्द्र ठाकुरजी आदि दर्जनों सन्त एवं राम और कृष्ण के कथावाचक अपने हिन्दी प्रवचनों द्वारा लोगों के हृदय में भक्ति-भावना जगा रहे हैं । इसी प्रकार हरिओम शरण और अनूप जलोटा जैसे सैकडÞों भजन गायक आज सम्पर्ूण्ा विश्व में अपने हिन्दी भजनों के द्वारा भगवत् संदेश फैला रहे हैं । और, स्वामी प्रभुपाद द्वारा स्थापित इस्कोन जैसे दर्जनों संघ संस्थाएं ‘हिन्दी’ को वह उच्च स्थान दिलाने में संलग्न हैं । अतः यह कहने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि हिन्दी अब ‘विश्व भाषा’ से ऊपर ‘सिद्ध-भाषा’ का दर्जा पा चुकी है, जिसके प्रवचनों एवं भजनों के माध्यम से करोडÞो-करोडÞ लोग अपनर्ेर् इहलोक-परलोक सुधारने में तल्लीन हैं ।
हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा, और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जानेवाली भाषा है । चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जानेवाली भाषा भी है । हिन्दी एवं इसकी बोलियां उत्तर और मध्य भारत के विभिन्न राज्यों में बोली जाती हैं । भारत और अन्य देशों में ६० करोडÞ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढÞते और लिखते हैं । फिजी, माँरिशस, गुयना, सुरीनाम की अधिकांश जनता हिन्दी बोलती है ।
और, नेपाल की बात करें तो यहां की लगभग पूरी आबादी हिन्दी समझती-बोलती है और नेपाल के पढÞे-लिखे लोग बखूबी, हिन्दी लिख लेते हैं क्योंकि ‘सरकारी कामकाज” और पढर्Þाई-लिखाई की भाषा भी ”नेपाली” है जिसकी लिपी देवनागरी है, जो हिन्दी की भी है । वैसे भी भारतीय सीमा से लगे नेपाल और उसके निवासी, तीन ओर से लगभग २५ करोडÞ हिन्दी भाषी भारतीय आबादी से जुडÞी हर्ुइ है । नेपाल तर्राई के लगभग एक करोडÞ से भी अधिक लोग हिन्दी पढÞते-लिखते और बोलते हैं । नेपाली राजनीति के इतिहास की जडÞों में जाएंगे तो पाएंगे कि नेपाल में १०४ वषर्ाें के तानाशाही राणा शासन की समाप्ति के बाद १९५० में स्थापित प्रजातंत्र तथा १९५९ में बहुदलीय संसदीय प्रजातांत्रिक प्रणाली अनुसार कराए गए आम चुनाव के बाद स्थापित नेपाली संसद में ‘नेपाली’ भाषा के साथ ही ‘हिन्दी’ भाषा को भी समान दर्जा प्राप्त था । तत्कालीन संसद के सभामुख -स्पीकर) कृष्णप्रसाद भट्टर्राई और डिप्टी स्पीकर महेन्द्र नारायण निधि क्रमशः नेपाली और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में हर्ुइ बहस पर दोनों ही भाषाओं में रूलिंग दिया करते थे ।
हिन्दी भारत और विश्व में र्सवाधिक बोली जानेवाली भाषाओं में से एक है । उसकी जडÞें प्राचीन भारत की संस्कृत भाषा में तलाशी जा सकती है । लेकिन, मध्ययुगीन भारत की ब्रजभाषा, अवधी, मैथिली और राजस्थानी आदि भाषाओं में भी हिन्दी साहित्य की जडÞें पाई जाती है । हिन्दी में गद्य का विकास बहुत बाद में हुआ । इसने अपनी शुरूआत कविता के माध्यम से की जो कि ज्यादातर लोकभाषा के साथ प्रयोग कर विकसित की गई । हिन्दी में तीन प्रकार का साहित्य मिलता है । गद्य, पद्य और चम्पू । हिन्दी की पहली रचना कौन सी है, इस विषय में विवाद है लेकिन अधिकांश साहित्यकार देवकीनन्दन खत्री द्वारा लिखे गए उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता’ को हिन्दी की पहली प्रामाणिक गद्य रचना मानते हैं । हिन्दी राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सर्म्पर्क भाषा और जनभाषा के सोपनों को पार कर विश्व-भाषा बनने की ओर अग्रसर है । भाषा-विकास-क्षेत्र से जुडÞे वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी हिन्दी प्रेमियों के लिए बडÞी ही संतोषजनक है कि आनेवाले समय में विश्व स्तर पर अन्तर्रर्ाा्रीय महत्व की जो चन्द भाषाएं होंगी, उनमें हिन्दी भी प्रमुख होंगी ।
‘हिन्दी’ शब्द का संबंध संस्कृत शब्द ‘सिन्धु’ से माना जाता है । सिन्धु सिन्ध नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके आसपास की भूमि को सिन्धु कहने लगे । यह सिन्धु शब्दर् इरानी में जाकर हिन्दू, हिन्दी और फिर हिन्द हो गया । बाद मेर्ंर् इरानी धीरे-धीरे भारत के अधिक भागों से परिचित होते गए और इस शब्द के अर्थ में भी विस्तार होता गया तथा हिन्द शब्द, पूरे भारत का वाचक हो गया । इसी मेर्ंर् इरानी कार् इक प्रत्यय लगने से -हिन्दर् इक) ‘हिन्दीक’ बना जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’ । यूनानी शब्द ‘इन्दिका’ या अंग्रेजी शब्द ‘इण्डिया’ आदि इस ‘हिन्दीक’ के ही विकसित रूप हैं । हिन्दी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग ‘शरफुद्दीन यज±दी’ के जफरनामा -१४४२) में मिलता है ।
प्रो. महावीर शरण जैन ने अपने ‘हिन्दी एवं उर्दू का अद्वैत’ शर्ीष्ाक आलेख में हिन्दी की व्युत्पत्ति पर विचार करते हुए कहा है किर् इरान की प्राचीन भाषा अवेस्ता में ‘स’ ध्वनि नहीं बोली जाती थी । ‘स’ को ‘ह’ के रूप में बोला जाता था । जैसे संस्कृत के ‘असुर’ शब्द को वहां ‘अहुर’ कहा जाता था । अफगानिस्तान के बाद सिन्धु नदी के इस पार हिन्दुस्तान के पूरे इलाके को प्राचीन पÞmारसी साहित्य में भी ‘हिन्द’, ‘हिन्दुश’ के नामों से पुकारा गया है तथा यहां की किसी भी वस्तु, भाषा, विचार को एडजेक्टिव के रूप में हिन्दी कहा गया जिसका मतलब है ‘हिन्द का’ । यही ‘हिन्दीक’ शब्द अरबी से होता हुआ ग्रीक में ‘इन्दिके’, ‘इन्दिका’, लैटिन में ‘इन्दिया’ तथा अंग्रेजी में इण्डिया बन गया । अरबी एवं फारसी साहित्य में हिन्दी में बोली जानेवाली भाषाओं के लिए ‘जÞबान-ए-हिन्दी’, ‘हिन्दी जुबान’ अथवा ‘हिन्दी’ का प्रयोग, दिल्ली आगरा के चारों ओर बोली जानेवाली भाषा के अर्थ में किया । भारत के गैर-मुस्लिम लोग तो इस क्षेत्र में बोले जानेवाले भाषा-रूप को ‘भाखा’ नाम से पुकारते थे, ‘हिन्दी’ नाम से नहीं ।
हिन्दी एवं उर्दू
भाषाविद् हिन्दी एवं उर्दू को एक ही भाषा समझते हैं । हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और शब्दावली के स्तर पर अधिकांशतः संस्कृत के शब्दों का प्रयोग करती है । जबकि, उर्दू फारसी लिपि में लिखी जाती है और शब्दावली के स्तर पर उसमें फारसी और अरबी भाषाओं का प्रभाव अधिक है । व्याकरणिक रूप से उर्दू और हिन्दी में लगभग शत-प्रतिशत समानता है- केवल कुछ विशेष क्षेत्रों में शब्दावली के स्रोत में अंतर होता है । कुछ विशेष ध्वनियां उर्दू में अरबी और फारसी से ली गई हैं और इसी प्रकार पÞmारसी और अरबी की कुछ विशेष व्याकरणिक संरचना भी प्रयोग की जाती है । उर्दू और हिन्दी को खडÞी बोली की दो शैलियां कहा जा सकता है ।
‘हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार के अन्दर आती है । ये हिन्दर्-इरानी शाखा की ‘हिन्द-आर्य’ उपशाखा के अर्न्तर्गत वर्गीकृत है । हिन्द-आर्य भाषाएं वह भाषाएं हैं जो संस्कृत से उत्पन्न हर्ुइ हैं । उर्दू, कश्मीरी, बंगाली, उडिÞया, पंजाबी, रोमानी, मराठी, नेपाली जैसी भाषाएं भी ‘हिन्द-आर्य’ भाषाएं हैं ।
हिन्दी का निर्माण काल
‘अपभ्रंश’ की समाप्ति और आधुनिक भारतीय भाषाओं के जन्मकाल के समय को संक्रांतिकाल कहा जा सकता है । हिन्दी का स्वरूप ‘शौरसेनी’ और र्’अर्धमागधी’ अपभ्रंशों से विकसित हुआ है । सन् १००र्०र् इ. के आसपास इसकी स्वतंत्र सत्ता का परिचय मिलने लगा था, जब अपभ्रंश भाषाएं साहित्यिक संदर्भाें में प्रयोग में आ रही थीं । यही भाषाएं बाद में विकसित होकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के रूप में अभिहित हर्ुइ । अपभ्रंश का जो भी कथ्य रूप था- वही आधुनिक बोलियों में विकसित हुआ । अपभ्रंश के संबंध में ‘देशी’ शब्द की भी बहुधा चर्चा की जाती है । वास्तव में ‘देशी’ से ‘देशी शब्द’ एवं देशी भाषा- दोनों का बोध होता है । प्रश्न यह है कि देशीय -देशज -) शब्द किस भाषा के थे – भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में उन शब्दों को ‘देशी’ कहा है जो संस्कृत के तत्सम एवं तद्भव रूपों से भिन्न हैं । ये देश शब्द जनभाषा के प्रचलित शब्द थे जो थे, जो स्वभावतया अप्रभंश में भी चले आए थे । जनभाषा व्याकरण के नियमों का अनुसरण नहीं करती, परन्तु व्याकरण को जनभाषा की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करना पडÞता है । प्राकृत व्याकरणों -पंडितों) ने संस्कृत के ढाँंचे पर व्याकरण लिखे और संस्कृत को ही प्राकृत आदि की प्रकृति माना । अतः जो शब्द उनके नियमों की पकडÞ में न आ सके, उनको देशी की संज्ञा दी गई ।
अन्तर्रर्ाा्रीय जगत में हिन्दी
ग    बीसवीं शदी के अन्तिम दो दशकों में हिन्दी का अन्तर्रर्ाा्रीय विकास बहुत तेजी हुआ है- वेब, विज्ञापन, संगीत, सिनेमा और बाजार के क्षेत्र में हिन्दी की मांग जिस तेजी से बढÞी है वैसी किसी और भाष में नहीं, विश्व में लगभग १५० विश्वविद्यालयों तथा सैकडÞो छोटे-बडÞे केन्द्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध स्तर तक हिन्दी अध्ययन, अध्यापन की व्यवस्था हर्ुइ है । विदेशों से २५ से अधिक पत्र-पत्रिकाएं लगभग नियमित रूप से हिन्दी में प्रकाशित हो रही हैं । यू.र्एर्.इ. के ‘हम एफ एम’ सहित अनेक देश हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं जिनमें बीबीसी, जर्मनी के डाँयचे वेले, जापान के एन एच के वर्ल्ड, और चीन के चाइना इन्टरनेशनल की हिन्दी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय है ।
ग    विश्व में हिन्दी की स्थिति पर चर्चा करते हुए यह जान लेना भी आवश्यक है कि हिन्दी प्रयोग करनेवालों की संख्या के आधार पर १९५२ में हिन्दी, विश्व में पांचवें स्थान पर थी, १९८० के आसपास वह चीनी और अंग्रेजी के बाद तीसरे स्थान पर आ गई, १९९१ की जनगणना में हिन्दी को मातृभाषा घोषित करनेवालों की संख्या के आधार पर पाया गया कि यह पूरे विश्व में अंग्रेजी भाषियों की संख्या से अधिक है । इतना ही नहीं डाँ. जयंती प्रसाद नाँटियाल ने निरन्तर २० वर्षतक भारत तथा विश्व में भाषाओं संबंधी आंकडÞों का विश्लेषण करके सिद्ध किया कि विश्व में हिन्दी प्रयोग करनेवालों की संख्या चीन से भी अधिक है और हिन्दी अब प्रथम स्थान पर है । उसने विश्व की अंग्रेजी समेत अन्य सभी भाषाओं को पीछे छोडÞ दिया है ।
ग    सन् १९९८ के पर्ूव, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में र्सवाधिक बोली जानेवाली भाषाओं के जो आंकडÞे मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था । सन् १९९७ में भारत जनगणना का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित होने तथा संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए यूनेस्को द्वारा सन् १९९८ में भेजी गई यूनेस्को प्रश्नावली के आधार पर उन्हें भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निर्देशक प्रो. महावीर सरन जैन द्वारा भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब विश्व स्तर पर यह स्वीकृत है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से संसार की भाषाओं में चीनी भाषा के बाद हिन्दी का दूसरा स्थान है । चीनी भाषा के बोलनेवालों की संख्या हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग-क्षेत्र, हिन्दी की अपेक्षा सीमित है । अंग्रेजी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु मातृभाषियों की संख्या अंग्रेजी भाषियों से अधिक है । प्रो. जैन ने अपने आलेख ”संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएं एवं हिन्दी” में विश्व स्तरीय सर्न्दर्भ ग्रन्थों से प्रमाण प्रस्तुत करते हुए प्रतिपादित किया है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में चीनी भाषा के बाद हिन्दी के बोलनेवाले सबसे अधिक हैं ।
विज्ञापन और मुनाफे की भाषा
१९८० और १९९० के दशक में भारत में उदारीकरण, वैश्वीकरण तथा औद्योगीकरण की प्रक्रिया तीव्र हर्ुइ । इसके परिणामस्वरूप अनेक विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में आयी तो हिन्दी के लिए एक खतरा दिखाई दिया था, क्योंकि वे अपने साथ अंग्रेजी लेकर आई थीं । मीडिया महारथी ‘र्रूपर्ट मरडोक’ स्टार चैनल लेकर आए, वह अंग्रेजी में बडÞी धूमधाम से शुरू हुआ था । इसी तर्ज पर सोनी वगैरह दूसरे चैनल भी अंग्रेजी कार्यक्रम लेकर भारत में आए । मगर इन सबको विवश होकर हिन्दी की ओर मुडÞना पडÞा, क्योंकि इन्हें अपनी दर्शक संख्या बढÞानी थी । अपना व्यापार, अपना मुनाफा बढÞाना था । आज टी. वी. चैनलों एवं मनोरंजन की दुनिया में हिन्दी सबसे अधिक मुनाफे की भाषा है । कुल विज्ञापनों का लगभग ७५ प्रतिशत हिन्दी माध्यम में है ।
लोकप्रियता का मिसाल
भारत के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पर्ूव निर्देशक प्रो. महावीर सरन जैन ने अपने एक आलेख में हिन्दी की विश्वव्यापी लोकप्रियता का प्रतिपादन करते हुए यह अभिमत व्यक्त किया है कि हिन्दी की फिल्मों, गानों, टीवी कार्यक्रमों ने हिन्दी को कितना लोकप्रिय बनाया है, इसका आकलन करना कठिन है । केन्द्रीय संस्थान में हिन्दी पढÞने के लिए आनेवाले ६७ देशों के विदेशी छात्रों ने इसकी पुष्टि की है कि हिन्दी फिल्मों को देखकर तथा हिन्दी फिल्मी गानों को सुनकर उन्हें हिन्दी सीखने में मदद मिली । लेखकने खुद जिन देशों की यात्रा की तथा जितने विदेशी नागरिकों से बातचीत की उनसे भी जो अनुभव हुआ उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिन्दी की फिल्मों और हिन्दी फिल्मों के गानों ने हिन्दी के प्रसार में अप्रतिम योगदान दिया । सन् १९९५ के बाद से टीवी चैनलों से प्रसारित कार्यक्रमों की लोकप्रियता भी बढÞी है ।
‘कौन बनेगा करोडÞपति’ की लोकप्रियता ने मीडिया के क्षेत्र में हिन्दी के झंडे गाडÞ दिए । कमाई तथा प्रसिद्धि के अनेक कर्ीर्तिमान भंग कर दिए तथा आनेवाले समय में हिन्दी के सुखद भविष्य के सपने जगा दिए हैं । आज सभी चैनल तथा फिल्म निर्माता अंग्रेजी कार्यक्रमों और फिल्मों को हिन्दी डब करके प्रस्तुत करने लगे हैं । जुरासिक पार्क जैसी अति प्रसिद्ध फिल्म को भी अधिक मुनाफे के लिए हिन्दी में डब किया जाना जरूरी हो गया । इसके हिन्दी संस्करण ने भारत में इतने पैसे कमाए जितने अंग्रेजी संस्करण ने पूरे विश्व में नहीं कमाए थे । आज भारत में र्सवाधिक पत्र-पत्रिकाएं तथा उनके पाठक हिन्दी में हैं । र्सवाधिक फिल्में हिन्दी में बनती हैं ।
भारतीयों ने अपनी कडÞी मेहनत, प्रतिभा और कुशाग्र बुद्धि से आज विश्व के तमाम देशों की उन्नति में जो सहायता की है उससे प्रभावित होकर समझ गए हैं कि भारतीयों से अच्छे संबंध बनाने के लिए हिन्दी सीखना कितना जरूरी है । अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर आसीन जार्ँज बुश ने ११४ मिलियन डाँलर की एक विशेष राशि अमेरिका में हिन्दी, चीनी और अरबी भाषाएं सीखने के लिए स्वीकृत की थी । इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दी के महत्व को विश्व में कितनी गंभीरता से अनुभव किया जा रहा है ।
हिन्दी विकास में कम्प्यूटर क्रान्ति
आज हिन्दी ने कम्प्यूटर के क्षेत्र में अंग्रेजी का वर्चस्व तोडÞ डाला है और हिन्दीभाषी करोडÞो की आबादी कम्प्यूटर का प्रयोग अपनी भाषा में कर सकती हैं । आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी के प्राध्यापक, साहित्यकार, सम्पादक एवं प्रकाशक कम्प्यूटर पर हिन्दी का प्रयोग करें और इसके र्सवांगीण विकास के लिए कदम बढÞाएं । प्रवासी भारतीयों में हजारों लोग हिन्दी के विकास में संलग्न हैं । जिनमें से तीन सौ से अधिक से आप वेव पर सर्म्पर्क स्थापित कर सकते हैं । धर्ैय के साथ इनसे सर्म्पर्क बनाते हुए बहुत कुछ सीखा जा सकता है । कम्प्यूटर और इन्टरनेट ने पिछले वषर्ाें में सूचना क्रान्ति ला दी है । आज कोई भाषा कम्प्यूटर -तथा कम्प्यूटर की तरह के अन्य उपकरणों) से दूर रहकर लोगों से जुडÞी नहीं रह सकती । कम्प्यूटर के विकास के आरंभिक काल में अंग्रेजी को छोडÞकर विश्व की अन्य भाषाओं के कम्प्यूटर पर प्रयोग की दिशा में बहुत कम ध्यान दिया गया जिस कारण सामान्य लोगों में यह गलत धारणा फैल गयी कि कम्प्यूटर अंग्रेजी के सिवा किसी दूसरी भाषा लिपि में काम नहीं कर सकता । किन्तु यूनिकोड के पदार्पण के बाद स्थिति बहुत तेजी से बदल गयी । इस समय हिन्दी में सजाल, चिÝे, विपत्र, गपशप, खोज, सरल मोबाईल सन्देश, तथा अन्य सामग्री उपलब्ध हैं । इस समय अन्तरजाल पर हिन्दी संगणन के संसाधनों की भी भरमार है और नित नये कम्प्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं । लोगों में इनके बारे में जानकारी देकर जागरूकता पैदा करने की जरूरत है ताकि अधिकाधिक लोग कम्प्यूटर पर हिन्दी का प्रयोग करते हुए हिन्दी का और पूरे समाज का विकास करें ।
प्रवासी पत्रकारिता
यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि जिस प्रकार से भारत में हिन्दी-पत्रकारिता विभिन्न चरणों में विकसित हर्ुइ है, ठीक उसी प्रकार से विदेशों में भी प्रवासी भारतीयों के द्वारा उसके विकास की दिशा में महत्वपर्ूण्ा कार्य हुआ है । अनेक प्रवासी अपने धर्म, संस्कार और भाषा से भावात्मक रूप में जुडÞे हुए हैं । इनके द्वारा समय-समय पर हिन्दी पत्रकारिता के उन्नयन के लिए पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन आरम्भ किया गया था, जो अनेक रूपों में आज भी हो रहा है । इनके मूल में हिन्दी पत्रकारिता के प्रति निष्ठा और अन्तर्रर्ाा्रीय विकास की भावना निहित है । अनेक स्थानों पर व्यावहारिक रूप से लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से उसमें हिन्दी के साथ ही स्थानीय भाषाओं का अंश भी प्रकाशित किया जाता है वे द्विभाषी अथवा त्रिभाषी आदि रूपों में प्रकाशित हो रहे हैं ।
वैसे भारत स्वतंत्र होने के तुरंत बाद ही हिन्दी और हिन्दी पत्रकारिता के विकास के क्षेत्र में तरह-तरह के प्रयोग शुरू किए गए । क्योंकि, गैर-हिन्दीभाषी स्वामी दयानन्द सरस्वती एवं महात्मा गांधी जैसे सन्तों ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही हिन्दी पत्रकारिता को आन्दोलन का माध्यम बनाया था । तब तो हवा ऐसी थी कि महात्मा गांधी के हिन्दी भाषणों को सुनने और उनकी पर््रार्थना सभाओं में भाग लेने के लिए दक्षिण भारत के तमिल, तेलूगू, मलयालम और कन्नडÞभाषी आम जनता, बडÞी श्रद्धा और आत्मीय भाव से हिन्दी पढÞने और सीखने में जुट गई थी । उन्हीं दिनों समाचार सम्प्रेषण के क्षेत्र में भी एक उल्लेखनीय कार्य किया गया । पहले तो अंग्रेजी टाइपराइटरों को देवनागरी लिपि में परिवर्तित कराया गया और हिन्दी सहित अन्य भाषाओं के दैनिक समाचार पत्रों को हिन्दी में कागज पर र्टाईपकर समाचार सेवा दिया जाना शुरू हुआ जो केवल स्थानीय स्तर पर ही संभव था । क्योंकि, एक शहर से दूसरे शहर में समाचार सम्प्रेषण का साधन टेलीग्राम के अतिरिक्त केवल अंग्रेजी टेलीप्रिन्टर थे । और, हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के समाचार पत्रों को भी अंग्रेजी समाचार सेवा ही लेने की बाध्यता थी । लेकिन, क्रान्ति तब आयी, जब हिन्दुस्थान समाचार नामक बहुभाषी समाचार एजेन्सी ने सन् १९५२ में अंग्रेजी के टेलीप्रिन्टर को ‘देवनागरी -हिन्दी) टेलीप्रिन्टर’ में परिवर्तित कराया तथा हिन्दुस्थान समाचार के पटना और नई दिल्ली कार्यालय के बीच पहली बार ‘देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा में’ समाचारों का सम्पे्रषण शुरू हुआ । इस महान प्रयास का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डाँ. राजेन्द्रप्रसाद ने किया था । तब से टेलेक्स और फैक्स होता हुआ आज हिन्दी भाषा में समाचार सेवा सम्पे्रषण का मुख्य माध्यम कम्प्यूटर बन चुका है ।
इन पंक्तियों के प्रस्तोता ने १९६७ में पटना स्थित हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेन्सी में प्रशिक्षार्थी पत्रकार के रूप में सेवा में प्रवेश किया था । उसी समय हिन्दुस्थान समाचार के महाप्रबंधक बालेश्वर अग्रवाल और पटना के कुछ जानेमाने पत्रकारों के बीच एक बैठक हर्ुइ थी, जिसमें इस पर विचार किया जा रहा था कि ‘हिन्दी अखबारों के लिए सबसे कठिन सवाल यह है कि १० या १२ प्वाइन्ट से कम के अक्षरों में अखबार के समाचार कम्पोज नहीं किया जा सकता । क्योंकि, देवनागरी के ओकार-उकार की मात्राओं के कारण, दो पंक्तियों के बीच अधिक जगह खपत हो जाती है । जबकि, अंग्रेजी अखबारों को अक्षर छोटा करने की सुविधा है और वे ६ और ८ प्वाइन्ट फाँन्ट में भी अखबारों में समाचार छाप सकते हंै । जबकि, आज कम्प्यूटर के आविष्कार ने यह क्रान्ति ला दी है कि हिन्दी में भी छोटे से छोटे फाँन्ट में सामग्री छापने में कोई कठिनाई नहीं होती । मुझ जैसे सात दशक से भी अधिक उम्र तथा चार दशक से भी अधिक हिन्दी पत्रकारिता सेवा दे चुके कलमजीवियों के लिए, इससे बडÞी खुशी और गौरव की बात और हो भी क्या सकती है ।
हिन्दी सिनेमा एवं सीरियल
हिन्दी सिनेमा का उल्लेख किए बिना हिन्दी का कोई भी लेख अधूरा होगा । मुर्म्बई में स्थित ‘बाँलीवुड’ हिन्दी फिल्म उद्योग पर भारत के करोडÞो लोगों की धडÞकनें टिकी रहती हैं । हर चलचित्र में कई गाने होते हैं । हिन्दी और उर्दू -खडÞी बोली) के साथ-साथ अवधी, बम्बइया हिन्दी, भोजपुरी, राजस्थानी जैसी बोलियां भी संवाद और गानों में उपयुक्त होती हैं । प्यार देशभक्ति, परिवार, अपराध, भय, इत्यादि मुख्य विषय होते हैं । अधिकतर गाने उर्दू शायरी पर आधारित होते है । सबसे बडÞी बात तो यह है कि आज एक सौ करोडÞ की मेगा लागत से भी फिल्में बनने लगी हैं ।
इस पंक्ति में हिन्दी टीवी सीरियलों का तो कहना ही क्या – रामायण और महाभारत के बाद तो दर्जनों धार्मिक सीरियलों की झडÞी सी लग गई, जो अभी भी जारी है । इस क्रम में गुजराती हिन्दी, पंजाबी हिन्दी, मराठी हिन्दी, बिहारी हिन्दी, में सीरियलों का उत्पादन हुआ, जो काफी लोकप्रिय हुआ । सीआईडी हिन्दी सीरियल पिछले १४ वर्षों से लगातार दिखायी जा रही हैं । क्योंकि, सास भी कभी बहू थी, बालिका बधू, उतरन, बिदाई आदि सीरियलों का कहना ही क्या –
भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री तथा हिन्दी के महान् कवि अटल बिहारी वाजपेयी, संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा को ‘हिन्दी’ भाषा में संबोधित करने की नींव डÞाल चुके हैं और अब वह दिन दूर नहीं जब भारत के साथ विश्व के अन्य प्रभावशाली देशों के प्रभाव से संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषाओं में हिन्दी भाषा भी जुडÞ जाएगी । और, भारत के अलावा विश्व के अन्य देश भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी में अपने विचार व्यक्त कर सकेंगे तथा सदन की कार्यवाही को हिन्दी में सुन सकेंगे । -इति)

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