विष्ट की विशिष्टता

झलनाथ खनाल सरकार की यदि एक मात्र उपलब्धि है तो वह है ऊर्जा मंत्री के रूप में गोकर्ण  बिस्ट जैसे युवा प्रतिभावान और ऊर्जावान मंत्री का मिलना। वैसे तो खनाल के इस निर्ण्र्पर पहले तो सभी ने काफी आर्श्चर्य व्य्क्त किया और कुछ ने तो खनाल की आलोचना तक कर डाली कि आखिर एक नवसिखुए युवा को ऊर्जा जैसे महत्वपर्ण् और संवेदनशील मंत्रालय की जिम्मेवारी देकर क्या साबित करना चाहते हैं। लेकिन गोकर्ण  बिस्ट ने ना सिर्फअपनी काबिलियत का लोहा मनवाया बल्कि खनाल को अपने कार्यकाल में किए गए एकमात्र सही निर्ण्र्के लिए सर गर्व से ऊंचा करवाने का मौका भी दिया।
भ्रष्टाचार का अखÞा बन चुकी ऊर्जा मंत्रालय और इसके विभिन्न विभागों में राजनीतिक नियुक्ति की वजह से विष्ट ने अपने कार्यकाल में कई ऐसे महत्वपर्ूण्ा निर्ण्र्ाालिया जिसकी वजह से ऊर्जा मंत्रालय और इससे संबंधित नेपाल विद्युत प्राधिकरण को भी अच्छे दिन देखने को मिले। ६ महीने के खनाल सरकार के कार्यकाल में विष्ट का कार्यकाल महज तीन महीनों का ही रहा लेकिन इन तीन महीनों की अल्पावधि में विष्ट ने अपने फैसले कार्य करने के तरीके और दूरगामी सोच वाली योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जो कदम उठाए वह उन्हें और मंत्रियों से अलग ही विशिष्ट पहचान दिलाया है। मजे की बात यह है कि गोकर्ण्र्ाावष्ट कभी भी ऊर्जा मंत्रालय नहीं लेना चाहते थे। उन्होंने प्रधानमंत्री खनाल से कहा भी था कि उन्हें ऊर्जा मंत्रालय में ना भेजे। पार्टर्ीीें भी विष्ट स्थानीय विकास प्रकोष्ठ के ही प्रमुख थे और उनकी इच्छा भी यही थी कि उन्हें स्थानीय विकास मंत्रालय ही मिले। लेकिन राजनीतिक परिस्थिति की वजह से उन्हें ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेवारी संभालनी पडÞी।
जिस समय गोकर्ण्र्ाावष्ट को ऊर्जा मंत्रालय का कार्यभार दिया गया था उस समय देश १४ घण्टे के दैनिक बिजली कटौती की मार झेल रहा था। ऐसे में उनके आगे बहुत ही अधिक चुनौती थी और समस्या भी काफी। ऊर्जा मंत्रालय लेने से इंकार करते हुए विष्ट ने खनाल से कहा था कि इस मंत्रालय में ना तो उनका कोई ज्ञान है और ना ही कोई अनुभव। विष्ट को इस बात का डर था कि यदि वो ठीक से काम नहीं कर पाने से पूरा का पूरा राजनीतिक कैरियर ही चौपट होने का डर भी सता रहा था।
मंत्री पद का यह सफर उनके लिए सुखद नहीं रहा। दर्ुभाग्य से जिस दिन उन्हें ऊर्जा मंत्री के रूप में नियुक्त करने की घोषणा की गई उसी शाम को उन पर अपने ही घर से बाहर लगभग ५० मीटर की दूरी पर जानलेवा हमला हुआ। मंत्री पद के लिए शपथ ग्रहण करने की बजाय वो अस्पताल के बिस्तर पर पडे थे। डाँक्टरों ने उनके हाथ का आँपरेशन करने की बात कही तो वो और भी डर गए। डर इस बात का नहीं था कि उनका आँपरेशन होना था बल्कि वो इस बात से डर गए थे कि इतने कम समय के लिए मंत्री बनाया गया है और उसमें भी वो महीनों दिन अस्पताल में नहीं गुजारना चाहते थे।इसलिए अस्पताल में आँपरेशन कर रहने के बजाए उन्होंने एक थेरेपी लेनी शुरू की और मंत्री पद से छुट्टी मिलने के बाद ही आगे की इलाज कराने की उन्होंने ठान ली।
मंत्रालय में पहला दिन जाने से पहले उन्हें यह भी नहीं मालूम था कि जाकर करना क्या है। बस यह था कि इमान्दारी से काम करना है – बस यह था कि इमान्दारी से काम करना है और देश की जनता को इस बात की अनुभूति दिलानी है कि वाकई उन्हें कुछ फायदा होना है। उनके सामने सबसे बडी चुनौती थी कि दैनिक हो रहे १४ घण्टे की बिजली कटौती से राहत दिलाना। इसके अलावा बिजली चोरी से निजात दिलाना और बडे बिजली उत्पादन की योजनाओं का कार्यान्वयन करना। लेकिन यह काम कैसे किया जाए इस बात की उनको कोई भी आर्इर्ीीा नहीं था।
तत्काल उन्होंने बिजली चोरी रोकने और लोडशेडिंग को कम करने के लिए आवश्यक कदम उठाया जिससे जनता में विष्ट के प्रति नई आशा जागी। बतौर विष्ट उनके कार्यकाल की सबसे बडी उपलब्धि अपर तामाकोशी जलविद्युत परियोजना के लिए ऋण समझौता और शिलान्यास करवानाथा । स्वदेशी लगानी में बनने वाली ४५६ मेगावाट की इस बडी परियोजना के लिए विष्ट ने नेपाल टेलीकाँम से ६०० करोड रूपये ऋण समझौता तथा ६० करोड रूपये के शेयर का इंतजाम कर दिया।
सिर्फतीन महीने की अवधि में ही में विष्ट ने चिलिमे जलविद्युत कंपनी अर्न्तर्गत कुल २६० मेगावाट के चार आयोजनाओं के लिए निवेश ढूंढ कर समझदारी पत्र पर हस्ताक्षर किया। इससे छोटे छोटे जल विद्युत आयोजनाओं के तरफ निजी क्षेत्र के आकर्षा होने का भी वातावरण बना। इसका परिणाम भी देखने को मिला। विष्ट ने एक और महत्वपर्ूण्ा निर्ण्र्ाालेते हुए वेष्ट सेती हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट के लिए पिछले १६ वषर्ाें से लाईसेंस लेकर भी काम नहीं करने वाली आँष्ट्रेलियन कंपनी से हुए समझौते को खारिज कर दिया। इस ७५० मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए चीन से ऋण लेने की प्रक्रिया को भी आगे बर्ढाई गई है।
ऊर्जा मंत्री के रूप में गोकर्ण्र्ाावष्ट की एक और बडी उपलब्धि जलविद्युत लगानी तथा कंपनी की स्थापना करना भी है। ५०० करोड रूपये की पूंजी के साथ शुरू हर्ुइ इस कंपनी में एक वर्षके भीतर ही १००० करोड रूपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। विष्ट के ही कार्यकाल में ६०० मेगावाट की बुढीगण्डकी और उत्तर गंगा जैसे एक दर्जन जलाशययुक्त आयोजना के लिए अध्ययन का काम भी शुरू कर दिया गया है।
देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी विभाग में अब तक हो रही राजनीतिक नियुक्ति की प्रक्रिया को खारिज कर खुले प्रतिस्पर्द्धर्ााे जरिये नियुक्ति का नयां आयाम खडा किया है। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के प्रबन्ध निदेशक जैसे महत्वपर्ूण्ा पद पर अब तक लाखों करोडो रूपये लेकर न्युक्ति की जाती थी जिसे विष्ट ने इस परम्परा को ही खत्म करते हुए खुले प्रतिस्पर्द्धर्ााे जरिये योग्य व सक्षम व्यक्ति को इस पर बिठाया। इतना ही नहीं विष्ट ने प्राधिकरण के अध्यक्ष पद पर ऊर्जा मंत्री के पदेन सदस्य होने की परिपाटी को भी खत्म किया और ऊर्जा सचिव को यह जिम्मेवारी सौंप दी। विष्ट के इस कदम का यह असर हुआ कि अब नेपाल आँयल निगम सहित अन्य महत्वपर्ूण्ा सरकारी संस्थानों के मुखिया पद पर खुला प्रतिस्पर्द्धर्ााे जरिये पद पर्ूर्ति करने की मांग उठने लगी है।
प्रधानमंत्री खनाल द्वारा इस्तीफा दिए जाने की बात आने के बावजूद विष्ट ने अपने कामों को नहीं रोका। बिजली विभाग का बकाया राशि नहीं देने वाले मंत्रालय, सरकारी विभाग और उद्योगों का बिजली लाईन काटने के लिए खुद विष्ट ने कदम आगे बढाया। आज तक किसी भी सरकार ने यह काम नहीं किया था जो कि विष्ट ने कर दिखाया। सिर्फसरकारी मंत्रालयों का ही ६६ करोड रूपया बिजली विभाग का बकाया था। मंत्री के रूप में विष्ट के इस अभियान के एक हफ्ते के भीतर इसका अधिकांश बकाया विभाग को मिल गया जिससे बिजली विभाग को आर्थिक रूप से सक्षम बनने में काफी मदत मिली।
नेपाल विद्युत प्राधिकरण इस समय २७०० करोड रूपये के नुकसान में है। मंत्री विष्ट के मुताबिक इस वर्षही प्राधिकरण को ६०० करोड का नुकसान हुआ है। और इसके लिए मंत्री विष्ट सिर्फऔर सिर्फप्राधिकरण में व्याप्त भ्रष्टाचार को ही जिम्मेवार मानते हैं। इसके सुधार के लिए कई आवश्यक और कडे कानून बनाने के पक्ष में हैं विष्ट। उन्होंने अपने कार्यकाल में मंत्रालय मातहत के विभागों की गाडियों का पर्ूव प्रधानमंत्री और कुछ मंत्रियों द्वारा दुरूपयोग किए जाने की खबर के बाद सभी गाडियों को वापस बुलवा लिया है। बिजली का बकाया नहीं देने वाले मंत्रालय का लाईन खुद काटने के लिए जाने से उनपर प्रोपोगण्डा का भी आरोप लगा। लेकिन इससे बेपरवाह विष्ट अपने काम को अंजाम देने में व्यस्त हैं।
प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद कई मंत्रियों ने अपने काम काज से छुट्टी ले ली है लेकिन विष्ट अभी ही छुट्टयिों के दिन में भी कार्यालय में कई महत्वपर्ूण्ा फाईलों पर काम में मशगूल दिखते हैं। इस समय नई सरकार गठन तक विष्ट चाहते हैं कि हाईड्रो पावर आयोजना के लिए टेण्डर देने के नियमों में बदलाव की जाए और र्सार्वजनिक रूप से टेण्डर आहृवान कर सबसे अधिक टैक्स देने वाली कंपनी को ही कोई भी जलविद्युत आयोजना का काम सौंपा जाए। विष्ट चाहते हैं कि उनके बाद इस मंत्रालय में आए मंत्री भी उनके द्वारा शुरू किए गए सुधार के प्रयास को जारी रखे ताकि देश के आम लोगों को फायदा हो सके।
विष्ट के कामों से हर कोई प्रभावित है। उनके आलोचक या फिर उनके पार्टर्ीीें विरोधी के रूप में रहे नेता भी दबी जुबान ही सही उनके कामों की प्रशंसा किए बगैर नहीं रहते हैं। विष्ट के लिए सबसे बडा काँम्प्लीमेण्ट यह रहा कि जिस तीन महीने के कार्यकाल में लोगों को मंत्रियों के नाम तक याद नहीं रहे उन तीन महीनों में विष्ट ने ऐसा काम कर दिया कि माओवादी उपाध्यक्ष और माओवादी के तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे डाँ बाबूराम भट्टर्राई को भी यह कहना पडा कि यदि उनकी सरकार बनती है और एमाले सरकार में शामिल होती है तो विष्ट को ही ऊर्जा मंत्रालय का कार्यभार दिया जाएगा।

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