विष के चक्रव्यूह में फंसता मानव जीवन : देवेश कुमार मिश्र

देवेश कुमार मिश्र, नेपालगंज | किसी भी जीवित प्राणी के लिए भोजन, हवा, और पानी अपरिहार्य आवश्यकता है । इसी तरह मानव के लिए भी इन आधारभूत आवश्यकताओं के परिपूर्ति के बिना जीवन संभव नहीं है । मानव अपनी शारीरिक वृद्धि और विकास, मानसिक स्वास्थ्य तथा विभिन्न प्रकार के रोगों से प्रतिकार के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकास हेतु तरह तरह का भोजन करता है जिससे कि उम्र के अनुसार उसका शारीरिक एवं मानसिक विकास भी होता रहे तथा नित्य शारीरिक एवं मानसिक जिम्मेवारी निर्वाह के लिए आवश्यक क्षमता का विकास भी होता रहे ।
आज मानव के भोजन में तरह तरह के व्यंजनो का संख्यात्मक एवं परिमाणात्मक रूप से वृद्धि हो रहा है जिससे उसको पहले की तुलना में स्वस्थ्य तथा दीर्घजीवी होना चाहिए लेकिन पहले से कहीं ज्यादा शारीरिक तथा मानसिक रूप से विभिन्न प्रकार के रोगों तथा चिन्ता से ग्रस्त होता जा रहा है । जिसके परिणामस्वरूप आज के लोग अपने आय का अधिकाश हिस्सा अपने या अपने परिवार के स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं । आखिर हम इतने विविध प्रकार के भोजन, व्यंजनों का सेवन तो करते हैं फिर भी हम स्वस्थ्य होने के बजाय अस्वस्थ्य होते जा रहे हैं । तरह तरह के शारीरिक एवं मानसिक रोगों से ग्रस्त होते जा रहे हंै । दीर्घजीवी होने के बदले अल्पजीवी होते जा रहे हैं । आखिर इसके विषय में हमने कभी सोचने का प्रयास किया है ? किसी भी प्राणी या मानव के स्वास्थ्य पर सबसे बड़ा प्रभाव उसके द्वारा सेवन किए गए भोजन, रहन सहन, हवा पानी, संस्कार, पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवहार इत्यादि का असर पड़ता है ।
हम अपने स्वास्थ्य के प्रति कितना सचेत है इसके विषय में हम एक उदाहरण से थोड़ा स्पष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं । जब हम कभी कोई नयी मोटरसाईकल खरीदते हैं तो उसी दिन से उस मोटरसाईकल के विषय में कि कैसे उसका इन्जिन ठीक ठाक रहे, मोटरसाईकल बिगड़ने न पावे सदा सही सलामत रहे ताकी हमे यात्रा में कभी कोई समस्या न आने पावे इस विषय को लेकर हम सदा सचेत रहते हैं । जिससे समय समय पर हम मोटरसाईकल का सर्विसिङ्ग कराते हंै, नित्य उसकी सफाई करते हैं और मोटर साईकल में सदा शुद्ध, बिना मिलावट वाला ही पेट्रोल डालते है ताकि मिलावटी पेट्रोल के कारण इन्जिन में कोई खराबी न आने पावे । डेढ़ दो लाख की खरीदी गयी मोटरसाईकल के विषय में हम इतनी सतर्कता रखते हैं लेकिन हम अपने इस अमूल्य शरीर एवं स्वास्थय के लिए कितना ख्याल रखते हैं ? क्या हमने कभी इस पर विचार किया है कि जो हम इस शरीर में भोजन के रूप में ग्रहण कर रहे है वह कितना शुद्घ, साफ सुथरा तथा स्वास्थ्यवर्धक या हानिकारक है । इस पर ध्यान नहीं देने के कारण से ही आज संसार के अधिकाश मानव किसी न किसी शारीरिक एवं मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं । किसी को रक्तचाप की समस्या, किसी को सूगर, किसी को आंखाें से कम दिखाई देना, किसी को गैस्ट्रिक, अल्सर, कैंसर इत्यादि रोगों से ग्रस्त है । यह तो दिखने वाला रोग है इसके अलावा हमारा शरीर भीतर ही भीतर तरह तरह की समस्याओं से ग्रस्त होता जा रहा है । इसका सवसे बड़ा और प्रमुख कारण है हमारे द्वारा ग्रहण किए जाने वाले भोजन एवं अपनायी गयी जीवन शैली । आज हम चावल, दाल, तरकारी, फलफूल, दूध, मांस, मछली, अण्डा इत्यादि जो भोजन के रूप में ग्रहण कर रहे हंै उसे तैयार करने में विभिन्न प्रकार के रासायनिक खादों, कीट एवं रोग नाशकों, हार्मोन इत्यादि का प्रयोग होता है । आखिर इस सबका असर तो पौधो और पौधों द्वारा उत्पादन किए गए कृषि उपज पर ही तो पड़ता है और उसी का हम सेवन कर रहे हैं । हमारे द्वारा पौधों के लिए प्रयोग किया हुआ जो भी रासायनिक उर्वरक, कीट नाशक इत्यादि हैं पौधों से उसके फूलों फलों इत्यादि के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं जिसका दुःश्प्रभाव हमारे शरीर में धीरे धीरे दिखाई देने लगता है और हम विभिन्न रोगों के शिकार होते चले जाते हैं ।
पौधों पर प्रयोग किया गया रासायनिक उर्वरक एवं कीट नाशक पौधों के शरीर में प्रवेश करने के बाद उस फल इत्यादि का सेवन हम करते हैं और उसके पत्ताें, डण्ठलाें तथा अन्य अवशेषों को अपने पालतू पशुओं जैसे ः गाय, भैंस या अन्य पशुओं को चारे के रूप में खिलाते हैं । जिसका परिमाण यह होता है कि चारे के रूप में पशुओं को खिलाते समय चारे के साथ ही साथ उसमें प्रयोग किए गए कीट नाशक भी पशुओं के शरीर में प्रवेश हो जाता है फिर उन पशुओं के मांस और दूध में विष का असर पहँुच जाता है । पशुओं द्वारा उत्पादित मांस या दूध जो हम सेवन करते हंै उसी के साथ–साथ हमारे शरीर में वह विष प्रवेश कर जाता है । जिससे पशु भी प्रभावित होता है और मानव भी । इसलिए हमें यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि हम जो विष युक्त चारा पशुओं को खिला रहे हैं वह केवल पशुओं तक ही सीमित रहेगा । उसका सीधा प्रभाव तो पशुओं पर पड़ता है लेकिन अप्रत्यक्ष प्रभाव मानव लगायत अन्य जीवो पर भी पड़ता है ।
इसी तरह जो कीट नाशक विष मिट्टी में रहने वाले हानिकारक कीड़ों एवं रोगों के जिवाणुओं को नियंत्रण करने के लिए प्रयोग करते हैं वह विष मिट्टी में घुलकर या पौधाें पर प्रयोग किया गया कीट नाशक पौधों से धुलकर नीचे आता है और अन्ततः मिट्टी में मिलता है फिर वह मिट्टी में घुला हुआ विष युक्त पानी पोखर तालाव या अन्य पानी के स्रोतों में जाकर उसे दुषित बना देता है जिसके परिणामस्वरूप उसमें रहने वाले विभिन्न जलीय प्राणी या तो मर जाते हंै या जो विष को पचाकर जीवित रहते हैं वे जलीय प्राणी जैसे मछलियों को यदि हम सेवन करते हैं तो उन मछलियों के शरीर में प्रवेश किया हुआ कीट नाशक भी हमारे शरीर में प्रवेश कर शरीर को दूषित एवं विषाक्त बनाता जाता है । कभी कभी उसका परिणाम तत्काल में तो दिखाई नहीं पड़ता है लेकिन भीतर ही भीतर हमारे शरीर के विभिन्न अंग प्रत्यांग को क्षति पहुँचाता रहता है ।
पौधों या मिट्टी में प्रयोग किया गया विष घुल कर जमीन में ही जाता है और जमीन में ही रहकर जमीन में रहने वाले तमाम मित्र जीवों पर हानिकारक असर कर उसको मार देता है या उसके कृयाकलाप को सुस्त बना देता है । जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी में संचित हुआ खाद्य पदार्थ भीे पौधों को आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता जिसके कारण कृषि उपज की मात्रा घट जाती है और जो उत्पादन होता है वह भी विषाक्त होता है जिसका सेवन हमें विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रसित करता जाता है ।
मिट्टी में मिला हुआ विष अन्ततः घुल कर विभिन्न जल श्रोतों में मिलता है या भूमिगत जल में जाकर उस जल को भी विषाक्त बना देता है जब हम भूमि से जल निकाल कर सेवन करते हंै तो उसमे भी विष का असर होता है । तात्पर्य यह हुआ की विष हम केवल विभिन्न खाद्यान्न, तरकारी, फलफूल के माध्यम से ही ग्रहण नहीं कर रहे हैं बल्कि पीने वाले पानी के माध्यसे भी विषपान कर रहे हैं ।
पौधों में लगने वाले विभिन्न प्रकार के रोगों एवं हानिकारक कीट पतगों के नियंत्रण हेतु जो विष का प्रयोग होता है उसका कुछ मात्रा पौधे शोषण कर लेते हैं, कुछ मिट्टी में चला जाता है और बाकी विष खुले वातावरण में जाकर हवाओं के साथ मिलकर वातावरण में फैल जाता है और जब हम सांस लेते हैं तो सांस लेने वाले वायु के साथ हमारे शरीर में पहुँच कर हमारे श्वास प्रश्वास के अंगो को प्रभावित करने के साथ हमारे शरीर के विभिन्न अंग प्रत्यंग को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे होते हैं जिसका परिणाम यह हो रहा है कि इसके प्रभाव से हम विभिन्न प्रकार के श्वास प्रश्वास संबन्धी रोगों से प्रभावित होते जा रहे हैं । कहने का मतलब जो हम या अन्य कोई भी कीट नाशक का छिड़काव करता है वह हवा में मिलकर हवा को भी दूषित बना देता है इससे हम खाने पीने की चीजों के साथ–साथ हवा के माध्यम से भी विष के फन्दे में पड़ते जा रहे हैं ।
एक अध्ययन के अनुसार तुलनात्मक रूप में कपास खेती में कीट नाशकों का ज्यादा प्रयोग होता है । प्रयोग किया गया कीट नाशक कपास में जाकर जमा होता रहता है । उसी कपास से हम अपने दैनिक जीवन में प्रयोग किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पहनने वाले वस्त्र या अन्य ओढ़ने और बिछाने वाले बिस्तरों के रूप में प्रयोग करते हैं जिसमें भी विष का असर रहता ही है । वह कपड़ा चाहे हम पहनने में या बिस्तर इत्यादि बनाने में प्रयोग करे अदृश्य रूप में छिपा हुआ कीट नाशक हमारे शरीर को किसी न किसी प्रकार से हानिकारक असर पहुँचाता ही रहता है जिसके कारण हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के चर्म रोग लगायत अन्य रोग भी लग जाते हंै ।
आज केवल मानव ही नहीं बल्कि हर जीवित प्राणी किसी न किसी रूप में विष खा रहा है, विष पी रहा है, श्वास के रूप में विष मिश्रित हवा ले रहा है, विष से प्रभावित वस्त्रों का प्रयोग कर रहा है और विष प्रयोग किए गए बिस्तर पर ही सो रहा है । सुबह से शाम तक हम विष का प्रयोग करते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि कृषि से उपज बढ़ाने के चक्कर में जो विष का प्रयोग किया जा रहा है और विष की मात्रा जो दिन प्रतिदिन बढ़ाकर प्रयोग किया जा रहा है उसके कारण आज का मानव धीरे धीरे विष के चक्कर में घिरता जा रहा है । इसके बावजूद भी विष का प्रयोग बढ़ाते जा रहे है क्योंकि विषादि के निरन्तर प्रयोग से पौधों में लगने वालो रोगों के जिवाणुओं तथा हानिकारक कीट पतंगो में विष पचाने की क्षमता बढ़ती ही जा रही है । जैसे जैसे कीट पतगों में विषादि पचाने की क्षमता बढ़ती जा रही है वैसे वैसे उसको नियंत्रण करने के लिए विष का मात्रा भी बढ़ाया जा रहा है । जिसके कारण कृषि में उत्पादन लागत भी बढ़ती जा रही है, वातावरण तथा जैविक संतुलन बिगड़ रहा है, मानव लगायत हर जीवित प्राणी इससे तबाह हो रहे है और विष के चक्रव्युह में फसते ही जा रहे हैं । हम कब तक विषादि की मात्रा को बढ़ाते रहेंगे तथा कडेÞ से कडेÞ विषादि का प्रयोग करते रहेंगे । इससे केवल हम अपने स्वास्थ्य ही नही, अपनी मिट्टी को भी बिगाड़ रहे हंै और साथ ही पूरे पर्यावरण को तबाह कर रहे हैं । जैविक संतुलन बहुत तेजी से बिगड़ रहा है जिसका दूरगामी परिणाम क्या होगा इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । अब भी विष के प्रयोग और इसके दःुश्परिणाम के प्रति सचेत नहीं हुए तो विष के चक्रव्यूह में इसी तरह फसते जाएँगें जिससे मानव जीवन केवल संकट में ही नहीं पडेÞगा बल्कि उसके अस्तित्व पर भी प्रश्न चिह्न लग सकता है । अब भी समय है सोच विचार करें एवं इस विष के चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता पहचान कर उससे बाहर निकलने का प्रयत्न करे ।
( लेखकः वरिष्ठ कृषि अधिकृत तथा प्रधानमंत्री कृषि आधुनिकीकरण परियोजना (जोन) बांके के जोन प्रमुख हैं)

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