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सरोज सिन्हा

सरोज सिन्हा
मधूलिका दास जब अपने पडोस की कक्षा बारह उत्तर्ीण्ा रमा थापा को प्रातः आँफिस जाते देखती तो गमगीन हो नारी के अधिकार की माँग करने वाले संगठनों के आधारभूत माँग में अपनी आकांक्षा को ढूँढने लगती थी। वह भी तो काशी विश्वविद्यालय की स्नातक थी।
थापा जी सरकारी अफसर थे, नेपाल में, जहाँ मासिक तनख्वाह की पतली धार दो उदरों को भी नहीं सीच सकती थी, वे अष्ट इकाई के अपने परिवार को बडÞी शान शौकत से पाल रहे थे। माता-पिता के अनन्यभक्त थापा जी ने उनके लिये चौथी मंजिल पर शौचायल सहित एक भव्य कमरा बनवा दिया था। एक मधेशी उनकी पत्रुबत सेवा में निशिवासर लगा रहता था। दोनों वेटे उच्च माध्यमिक परीक्षाओं में बैक पेपर दे पास हो इंजीनियर व डाक्टर बन रहे थे। प्यारी प्यारी दो षोडसी बेटियों की उन्मुक्त हँसी से उनका घर आँगन गुंजायमान रहता था। स्कूटी पर बैठ कुछ घण्टे काँलेज जानकर शायद वे भी स्नातक, स्नातकोत्तर परीक्षायें दे रही थीं। काँछे, ड्राइभर, माली सानी दीदी और चौकीदार आदि की कर्तव्यपरायण गतिविधियों से घर सजीव रहता था। पर शायद यह राव रमाजी को घर में बाँध कर नहीं रख पाता था, वे तो मन लगाने के लिये एक एनजीओ में काम कर रही थी। पर उन का वह एनजीओ क्या कर रहा था, समाज के लिये वह शायद वे भी नहीं जानती थी। हाँ एक विदेशी गाडÞी अवश्य उन्हें लेने और पहुँचाने आ जाती थी।
मधूलिका प्रायः अपने सरकारी अधिकृत पति से पूछती कि वे थापा जी की तरह अपने चार सदस्यीय परिवार की परवरिश नहीं क्यों कर पा रहे थे। दबी जुवान से अपनी शैक्षिक योग्यता के अनुसार समाजोपयोगी कार्यरत हो उनके क्षीण आयस्रोत को बढÞाने की पेशकश भी की थी। दास इसका क्या उत्तर देते। कैसे वे और उनका पौरुष अपनी पत्नी के आगे अपनी कमजोरी और कभी को स्वीकार कर लेता। खानदानी आदशों के ढाँचे में ढÞले दास जी अपने सशक्त पक्ष को अब अपनी दर्ुवलता की वो समझने लगे थे। बहिर्मुखी, देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत, लोकतन्त्र के अधरो की सहज स्मिता कहाँ विलीन हो गई थी ! उच्चतम अंकों से उच्चतम शैक्षिक योग्यता प्राप्त कर भी अपनी नियुक्ति के समय उन्होंने कितना वर्ग विरोध, भाई भतीजा बाद और तिरस्कार झेला था। वे अपनी पति के लिये क्या कर सकते थे। अपने सहकर्मियों द्वारा उपेक्षित दास यह जानते थे कि नेपाल के सभी आँफिस के कर्मचारी थापा जी हैं, वह अकेला दास क्या कर सकता था। टैगोर की पंक्तियाँ उन्हें कंठाग्र थी- यदि कोई तुम्हारे साथ न आये तो तुम अकेले चलो। वे चल रहे थे पर स्पन्दन व संवेदना विहीन। ‘पूरे विश्व में मानवता की मीठी धूप में, सारे चर अचर सहज खुशियों की अनूभूति के साथ अपने जीवन काल के हर पल बितायें।’ की पर््रार्थना अब उन्हें बेमानी सी लगने लगी थी। जब अडिग शिला से आदर्शो की बात करने वाले दास जीवन के वास्तविक धरातल के थपेडÞो से मर्माहत हो जाते तो उन के कानो में ‘प्रचण्ड पुकार’ गूँजने लगती थी और एक दिन मानव जीवन त्याग कर वे चल दिये मानव वेध शाला में।
बारह वर्षवाद- अब थापा जी अवकाश प्राप्त कर्मचारी है। जीवन स्तर पहले से ऊँचा हो गया है। उच्च पदासीन पत्रों, धनाढ्य कुलीन परिवारों में व्याही बेटियों के बच्चों के कलरवु से थापा निवास गूँज रहा हैं। बडÞी-बडÞी विदेशी झडेवाली काली गाडियाँ आती रहती हैं। आखिर थापा जी नब नेपाल के लोकतान्त्रिक सरकार व नेताओं के पोषक व परामर्श दाता जो हैं।
पति के बहिर्गमन के बाद अपने कलेजे के दो टुकडÞो के परवरिस के लिये विद्यालयों मे आवेदनपत्र प्रेषित कर आँखों में आशा के दीप जलाये मधूलिका प्रति दिन साक्षात्कार के निमन्त्रण की प्रतीक्षा करती रही। ६ मास बीत गये। विद्यालय ने बडÞी जिम्मेवारी पर्ूवक उन्हें नागरिकता प्रमाणपत्र लाने के लिये कहा। पति के सभी महत्वपर्ूण्ा कागज तो शाही सैनिक खान तलाशी कर ले गये थे। उसकी नागरिकता के लिये कौन सिफारिश करता ! भूख से विह्वल अर्ध न्रि्रा में वह कभी पाँच तारा होटल अथावा लंगूर में खाना खा रही होती थी। कक्षा दस में जब उसने प्रेमचन्द्र की ‘बूढी काकी’ पढÞी यी तो वह काकी पर क्रोधित हो उठी थी- उसका घर था, सीधे रसोई में जाकर उसने पूडÞी जलेवी क्यों नहीं खाया। वह क्यो प्रतीक्षा करती रही कि वह उसे भोजन परोस कर देगी। आधी रात तक भोज नमिलने पर उसने कोहराम क्यो न मचाया जो, जूठे पतलो को तलाशने लगी। आज शायद वह भी बूढी काकी की ही मानसिक स्थिति में थी पर उसने वो नहीं किया।
बीरु और दीपू सडÞको पर खेल खेल थक कर घर लौट आये थे। ‘धूल धूसरित शोमित श्यामजू, तैसी लसे सिर सुन्दर चोटी’ सहज हास्य से उसने उन्हें कण्ठ से लगा लिया। नन्हे बाल को भूख लायी है। एक सुन्दर देहयष्टि व कल्पनाओं के आँगन के आदर्शों की ज्योति में स्तरीय चिन्तन करने वाला उस का मस्तिष्क क्या आज रुग्ण हो चला है – वह अपने कदमों को रोक नहीं रही- मातृत्व बोध ने उसे वीरांगना जो बना दिया है। वह रमा जी के प्रवेश द्वार पर खडÞी उनसे उनके घर की कोई जिम्मेदारी सौपने की पर््रार्थना कर रही है। करुणा निधान रमाजी ने उसे स्नेह से देखा और कहा- ‘सानी दीदी बीमार है। आ जाओ। आज से वर्तन और कपडे धो लो और हाँ बच्चों को घर पर ही छोड कर आना। मधूसिका ने विनम्र अविभादन किया जैसे वह कृतकृत्य हो गई हो और उसके हाथ घी में सने बडÞे-बडÞे पीतल के वर्तनों को रगडने लगे- आखिर मातृत्व ने उसे वीरांगना जो बना दिया है।
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