वृद्ध भत्ता मछली फंसाने का चारा : बिम्मी शर्मा

वृद्ध भत्ता नेकपा एमाले के लिए वह दूधारु गाय है जो वह हर निर्वाचन में दूह कर जीतना चाहता है । ०४६ साल में देश में बहूदलीययवस्था आने के बाद नेकपा एमाले के ९ महीने के सरकार में पहली बार वृद्ध भत्ता बांटा गया । तब से अबतक इस वृद्ध भत्ते में पैसे की वृद्धि कर कर के इसे अच्छा खासा रकम बना दिया गया । होते होते २० साल बाद हुए स्थानीय तह के निर्वाचन में नेकपा एमाले के मेयर में जीतने के बाद पहली घोषणा में पोखरा और काठमांडू महानगर में रहने वाले वृद्ध, वृद्धाओं के लिए मासिक २ सौ से ले कर वार्षिक १२ हजार रूपए तक की वृद्धि बतायी गयी है ।
एमाले कितनी अच्छी तरह अपने हर घोषणापत्र या भाषण में वृद्ध भत्ता को भुनाता है या यह पैसा वह अपने पॉकेट से या पुस्तैनी संपत्ति बेच कर दे रहा है । वृद्ध भत्ता के रूप में देह का कितना विकास बजट खर्च हो रहा है यह किसी ने खोजबीन नहीं की है । बस लूट के धन की तरह वृद्ध भत्ता रेवडी जनता को बाँटी जा रही है और जनता खुश है कि नेकपा एमाले ही देश का एक मात्र ऐसी राजनीतिक पार्टी है जो देश के ज्येष्ठ और वरिष्ठ नागरिकों का ख्याल रखता है । पर इन मुर्खों को यह नहीं मालूम कि यह वृद्ध भत्ता मछली को जाल में फंसने के लिए फेंका गया चारा या आटे की लोई है ।
पर नहीं महीनें में मिलने वाले हजार या दो हजार रूपए अपनी अंटी में बाँध कर बड़े, बूढे भले खुश हो जाए पर यह उनके लिए कांटा बना हुआ है । चार–चार महीने में ६ या १२ हजार मिलने पर उन वृद्धों के सन्तान खुद ही यह पैसा हड़प जाते हैं और कितने लोग तो अपने मरे हुए मां बाप को भी जिंदा बता कर सरकार से वृद्ध भत्ता का रकम असूल कर लेते हैं । ऐसे और कितने ही नकली वृद्ध भत्ता का कार्ड बना कर खुद को अपने मां, बाप का इकलौता वारिश का सिफारिश ले आ कर बैंक के खाते से पैसे ऐंठ रहे है । कितनी ही बार बैंक कर्मचारी से इनकी कहासुनी हो जाती है फिर झक मार कर बैंक वाले पैसे दे देते हैं । कईयों ने अपने, मां बाप को घर से निकाल दिया है पर पैसे लेने के समय में बैंक में श्रवण कुमार बन कर प्रस्तुत होते हैं । क्या नेकपा एमाले को यह सब घोटाला पता है ?
और सब से बड़ी आश्चर्य कि बात जो खुद पेन्शनधारक है वह भी सरकार और नगरपालिका द्वारा वितरण किए जाने वाले वृद्ध और विधवा भत्ता ले रहे हैं । यह सुनी सुनाई नहीं आंखों देखी बात है । क्या सरकार की ओर से दिए जाने वाले एक सेवा सुविधा व पेन्शन लेने के बाद गरीब, अनाथ और एकलयक्तियों को वितरण किया जाने वाला पेन्शन लेना कानून सम्मत है ?यदि यह गलत है और सरकारी नियम के विपरीत है तो इनके ऊपर कोई निगरानी या कड़ी कारवाही क्यों नहीं होती ? क्या सिर्फ वृद्ध भत्ता वितरण कर देने से नेकपा एमाले या सरकार की जिम्मेवारी पूरी हो गई ? यह वृद्ध भत्ता लक्षित वर्ग तक सहज और सरल ढंग से जा रहा है कि नहीं यह देखेगा कौन ? जाहिर सी बात है यह बस चुनावी मोहरा है जीतने के लिए । किसको मिला या नहीं मिला भांड में जाए उसकी बला से । रौतहट के रहने वाले और वहीं से सांसद और प्रधानमंत्री बने एक प्रभावशाली नेता के पिता जो खुद शिक्षक थे वह भी अपने बेटे के पार्टी की तरफ से बांटा गया वृद्ध भत्ता बड़े शौक से लेते थे । शायद उनके बेटे और तथाकथित वरिष्ठ नेता के आंख का पानी सूख चुका है । खैर अब तो इन नेता के पिताश्री स्वर्ग सिधार चुके हैं । वहां पर तो वृद्ध भत्ता भेजने की कोई सुविधा नहीं है ।
देश के असंख्य वृद्ध वृद्धा अपने ही बच्चो से पीडित हैं । उन्हे ढंग का खाना नहीं मिलता, अपने बच्चो से इन्हें वह प्यार और सेवा नहीं मिलता जिसके वह हकदार हैं । पर अपने ही घर में अपने ही बच्चों से अवहेलित इन मां, बाप के हक में सरकार कोई प्रभावकारी कानून नहीं बनाती बस वृद्ध भत्ता दे कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है । मेरे पड़ोस में एक ७० साल से उपर की वृद्धा को उसका बेटा खाने नहीं देता, मारपीट करता है, छाती में चढ कर उसको लात मारता है । जैसे तैसे वह वृद्धा अपने लिए अलग से भात बना कर नमक के साथ खाती है तो वह भी बहू आ कर फेंक देती हैं । बेचारी वह अभागी वृद्धा जाए तो जाए कहां । उस पर सरकार भी उस के घाव में नमक छिड़क कर उसको वृद्ध भत्ता के पूरे पैसे नहीं देता । उस वृद्धा को ७० साल से कम का मान कर महीने में हजार रूपए भत्ता दिया जाता है और उस पर भी कांट छांट कर के । वह पैसा भी बेटा बहू के नजर में चढ गए तो मिलने से रहे । गनीमत है कि घर उस वृद्धा के नाम से है और बहू को इसी बात की जलन है । इसीलिए घर अपने नाम से करने के लिए वह सास को अनेक बहाने से आए दिन प्रताडि़त करती है । पर सास की यह चित्कार कौन सुनेगा ? सरकार के लिए तो वह बस एक मतदाता है ।
मां, बाप के साथ उनके बच्चों का दुव्र्यवहार हद नांघ रहा है पर कोई प्रभावकारी सामाजिक या पारिवारिक कानून नहीं हैं । इसीलिए लाखों मां, बाप वृद्धाश्रम का शरण लेने के लिए बाध्य हैं । सरकार इस गंभीर सामाजिक समस्या को हल करने या कोई पहल करने को ले कर मौन है । मात्र अपनी कमाई का १० प्रतिशत मां बाप को देने और मां, बाप को भी अपना सब कुछ बच्चों के नाम न कर २५ प्रतिशत संपत्ति अपना कमाया संपत्ति अपने लिए बचाने का कानून बनाने से समस्या समाधान हो गया ? जब तक मां, बाप का अपनी कमायी संपत्ति का अपनी मर्जी का मालिक है । वह इस संपत्ति को चाहे जिसको दे सकते हैं और अपने बच्चों को ही वह अपनी संपत्ति देने के लिए बाध्य नहीं हैं । जब यह कानून बना कर कडाई से लागू किया जाएगा उसी दिन से सारे वृद्धाश्रम खाली हो जाएँगे और न वृद्ध भत्ता की ही जरूरत पड़ेगी । जिन मां, बाप को उनके बच्चे खाने नहीं देते, उनके साथ मारपीट व गाली, गलौज करते हैं उनको भी कुछ महीने या साल के लिए जेल में रखने का कानून बनाने में देरी नहीं होनी चाहिए । और हर महीने सरकारी प्रतिनीधि हर घर में जा कर जांच करें कि वहां पर वृद्ध मां, बाप के साथ अच्छा सलूक होता है कि नहीं ?
मात्र वृद्ध भत्ता बांटने से वृद्धों का दुख कम नहीं होगा । यह वृद्ध भत्ता भी जिसको पहले से है उसी को मिल रहा है । जिसके पास नहीं है और जिसको जरूरत है वह बेचारा ठनठन गोपाल है । नेकपा एमाले कामधेनू गाय की तरह इस को दूह कर चुनाव में अपने पक्ष में परिणाम लाना चाहता है । बिना यह देखे, समझे कि वृद्ध भत्ता के एवज में वह अपना ब्लैंक चेक को कैश कर के उन्हीं वरिष्ठ नागरिकों को भावनात्मक तरीके से लूट रहा है । क्योंकि यह वृद्ध, वृद्धा एमाले के लिए सिर्फ एक मछली की मानिंद है, जिसे वृद्ध भत्ता नाम का चारा फें क कर अपने जाल में बखूबी फंसाया जा रहा है ।

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