वैज्ञानिकों ने धरती पर सौर-सुनामी आने की चेतावनी दी ।

s-1वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी धरती बड़े सौर तूफानों से निकली तरंगों से प्रभावित हो सकती है। सूर्य के कोरोना से निकलने वाली अस्वाभाविक चुंबकीय लपटों से विद्युत आवेशित बादल हमारी पृथ्वी की ओर बढ़ने लगे हैं। वैज्ञानिकों ने धरती पर सौर-सुनामी आने की चेतावनी दी है। ‘न्यू साइंटिस्ट’ ने खबर दी है कि यह सूर्य के कोरोना का हिस्सा है। इस धमाके को कोरोनल विस्फोट कहा जा रहा है। यह अविश्वसनीय रूप से नौ करोड़ 30 लाख मील तक फैल चुका है। यह सौर सुनामी पृथ्वी की ओर बहुत तेजी से बढ़ रही है। इसमें कहा गया है कि जब ये उच्छृंखल बादल टकराएंगे, तो वे कभी भी ध्रुव के ऊपर आकाश में तेज रोशनी उत्पन्न कर सकते हैं और उपग्रहों के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। हालांकि, गंभीर रूप से खतरा नहीं है, लेकिन सूर्य की सतह पर जब कोई बडी सौर लपट उठेगी तो उसका प्रभाव धरती पर पड़ सकता है।

नासा के अनुसार हर 22 साल बाद सूरज की चुंबकीय ऊर्जा का चक्र शीर्ष पर होता है। इसके साथ ही हर 11 साल की अवधि में इससे निकलने वाली लपटों की संख्या सर्वाधिक होती है। सूरज के इन दोनों विनाशकारी (अव) गुणों वाली अवधि साल 2013 में एक साथ मिल रही है। इससे सूरज से सबसे ज्यादा विकिरण हो सकता है। निकलने वाली लपटों और चुंबकीय ऊर्जा में तेजी से वृद्धि हो सकती है। यह धरतीवासियों के लिए खतरनाक होगा। सौर ज्वालाओं से फूटने वाला यह विकिरण वैज्ञानिक भाषा में विद्युत चुंबकीय ऊर्जा के नाम से जाना जाता है। इसमें वे तमाम किरणें समाई रहती है, जिन्हें हम आम तौर पर गामा किरणें, एक्स किरणें, पराबैंगनी किरणें आदि नामों से पुकारते हैं। सौर ज्वालाओं में लाखों हाइड्रोजन बमों के बराबर ऊर्जा समाई रहती है। इसका पता खासतौर से सूरज और इसकी कारगुजारियों पर नजर रखने वाले ‘सोहो’ (सोलर एंड हीलियोग्राफिक ऑब्जवेट्री) नामक उपग्रह से चला। नासा और यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा संयुक्त रूप से स्थापित सोहों से मिले आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिक इस विशाल ज्वाला या लपट को ‘एक्स’ वर्ग की लपट बता रहे हैं। गौरतलब है कि ये ज्वालाएं अंतरिक्ष में हजारों किलोमीटर दूर तक फैल जाती हैं। कई बार इनकी पहुंच इतनी अधिक होती है कि हमारी पूरी धरती इसके भीतर समा जाए। अभी तक इनका अधिकतम प्रसार लगभग ढाई लाख किलोमीटर बताया गया है। s-2

2010 में अमेरिकी खगोलविदों ने धरती से सौर तूफान के टकराने की भविष्यवाणी की थी। खगोलविदों के मुताबिक पृथ्वी से यह दस करोड़ हाइड्रोजन बमों की ताकत से टकराएगा। 2011 की शुरुआत में इसी तूफान के चलते अंतरिक्ष में अद्भुत रोशनियां दिखाई दी थीं। इस सौर तूफान में इतनी ताकत होगी कि यह पूरी धरती की बिजली व्यवस्था को ठप कर देगा। इस बात के खंडन के बावजूद नासा 2006 से इस तूफान पर नजर रख रहा है। खगोल विज्ञान के प्रोफेसर डेव रेनेक ने इस बारे में कहा था, ‘सौर खगोलविदों के बीच आम राय यह है कि आने वाला यह सौर तूफान पिछले 100 सालों में सबसे ज्यादा अशांति लाने वाला सिद्ध होगा।’ सूर्य अब अपनी सुसुप्त अवस्था से धीरे-धीरे जाग रहा है। आशंका है कि सूरज के पूरी तरह से सक्रिय होने पर भयंकर सौर लपटें उठेंगी, जो तूफान बन धरती पर भयंकर तबाही मचाएंगी। यह तूफान सभी कृत्रिम उपग्रहों को नष्ट कर देगा, जिससे पूरी संचार व्यवस्था और हवाई सेवाएं ठप हो जाएंगी। इस तबाही का असर कई महीनों तक रह सकता है। अंतरिक्ष वैज्ञानिक वॉशिंगटन में ‘अमेरिकन एसोसिएट फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस’ की सालाना बैठक में इस मुद्दे पर विस्तृत विचार-विमर्श कर चुके हैं। नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य की सतह पर उठने वाली सौर लपटों का प्रभाव हमारी धरती पर भी पड़ेगा। इसकी शुरुआत 1 अगस्त 2010 से हो चुकी है और यह सौर सक्रियता 2014 तक जारी रहेगी। 14 फरवरी, 2011 की रात सूरज की सतह पर हुए विस्फोट से चीन का रेडियो संचार बाधित हो गया था। हालांकि, यह पिछले विस्फोटों के मुकाबले बहुत छोटा था। पर 2014 तक सूरज की सतह पर कई विस्फोट होंगे, जिससे पूरी धरती की जलवायु और मौसम बदल सकता है।s-3

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