वैशाख ३१ का निर्वाचन ! मधेश को अलग करने का खुल्ला संकेत : कैलाश महतो


कैलाश महतो, पराशी, १९ मई | अपने समय के जानेमाने अंग्रेज राजनीतिक विश्लेषक सांसद लर्ड म्याकियावेली ने सन् १८३५ में कहा था कि भारत पर अगर शासन करना है तो अंग्रेजों को भारतीय समाज में रहे सामाजिक सहिष्णुता और भावनात्मक एकता को तोडना होगा ।

Lord Macaulay said the following about India in 1835 in British Parliament.

“I have traveled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native self-culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.”

गौरतलब है कि व्यापार करने के उद्देश्य से भारत आए अंग्रेजों ने सन् १६००, दिसम्बर ३१ से सन् १७५७ तक एकक्षत्र व्यापार किया । सन् १७५६ में शुरु हुए १७वें अंग्रेज फ्रेंच युद्ध के कारण ब्रिटेन ने एशिया और प्यासिफिक में भी अपना सैन्य बल मजबूत करने के मनसुवे से सैनिक शक्ति की बढोतरी की, जिसका भरण पोषण का जिम्मा भारत में राज कर रहे मुसलमान शासकों से करवाया गया । बंगाल, बिहार और ओडिसा से हो रहे भरण पोषण को वैधानिक बनाने के लिए सन् १७६५ में मुस्लिम शासकों ने अंग्रेजों को दीवानी ‐लगान) वसूल करने की छुट दे दी । और हुआ यह कि जिसके दानापानी अंग्रेज सैनिक खा रहे थे, सन् १८५७ तक भारत पर अपना अधिकार समझ कर भारतीय शासन में हुकुमत कायम करते गये ।

सन् १८५७ में भारत में जब चेतना आयी तो झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के नेतृत्व में सन् १८५७, मई १० से १८५८, जून १७ तक अंग्रेज विरुद्ध भीषण लडाई हुई, जिसमें रानी लक्ष्मी ने अपनी प्राण की आहुती दे दी । कुछ इतिहासकारों का दावा है कि उन्हें मरबाने में ग्वालियर राजा सिंधिया राज का भी हाथ रहा था जब वो ग्वालियर में सैनिक तैयारी में थी ।

रानी लक्ष्मी बाई के हत्या पश्चात् भारत में British Raj  नाम से अंग्रेजी शासन विधिवत रुप में शुरु होकर सन् १९४७ तक कायम रहा । अपने शासन काल में अंग्रेज ने भारत में पहली बार सन् १९२० में Imperial Legislative Council sf General Election कराया था । उसके बाद क्रमशः १९२३ और १९३४ में General Elections तथा १९३७ और १९४६ में Provincial Elections करबाये गये । उन सारे निर्वाचनों का उद्देश्य निर्वाचन कराने से ज्यादा मैकियावेली के सुझाव अनुसार भारतीयों के बीच जातीय, साम्प्रदायिक, धार्मिक एवं क्षेत्रिय वैमनस्यताओं को फैलाना और फुट डालकर राज करना ही था, जिसके अन्तर्गत सन् १९४६ के Provincial Elections में अपना रुप दिखाते हुए पाकिस्तान बँटवारे का जग निर्माण कर ही डाला गया ।

गत वैशाख ३१ को सम्पन्न नेपाली स्थानीय तह निर्वाचन २०७४ ने ही दे दी है मधेश देश बनाने का खुल्ला संकेत । वैसे सम्पन्न और जेष्ठ १२ को होने जा रहे चुनावों से मधेश को वर्तमान में किसी प्रकार के फायदे तो नहीं हो सकते, मगर इनसे स्वतन्त्र मधेश के लिए लाभ होना पक्का है । इन चुनावों से नेपाली राज ने मधेश को फँसाकर अपने संविधान को एक तरफ कार्यान्वयन कराने का साजिस रचा है, वहीं दूसरी तरफ वह घुमावदार रुप में भारत लगायत के देशों को यह सँदेश देना चाहा है कि नेपाल के वास्तविक शासक नेपाली ही हैं । इन चुनावों के आन्तरिक मनोविज्ञान को अगर ठीक से चीरफार किया जाय तो नेपाली राज ने अपने देश का स्थानीय चुनाव करा चुका है । मधेशी दलों को मधेश में चुनाव अपने ढंग से कराना ही मधेश के लिए सौभाग्य है ।

थोडे से अपवादों के अलावा नेपाल ने मधेश को अलग करने का आधार दे चुका है । बस्, समझना मधेशियों को है । मधेशी इस बात को समझने में भले ही देरी करें, मगर नेपाली शासन इस बात का संकेत कर चुका है कि अब मधेश से लडना उसकी कमजोरी होगी । हकिकत यह है कि वह मधेश में चुनाव कराना भी नहीं चाहता है । अगर वह चुनाव कराने की दिलचस्पी लेता है तो उसका केवल एक यही उद्देश्य होगा कि मधेश में स्वतन्त्र मधेश के लिए बनते जा रहे एकता, सहिष्णुता और सौहाद्रता को तोडकर आपसी वैमनस्यता को पैदा करें और भारत और पाकिस्तान के तरह मधेश को अन्तहीन झमेलों में डाल दें ।

अपने इल On the Origin of Species में Darwin ने Malthus के  Essay on the Principle of Population के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि संसार में उसी जीव, मानव या समाज का अस्तित्व कायम रह सकता है जो जिने के लिए संघर्षशिल रहेगा । अपने Evolution Theory में भी Darwin ने Survival of the Fittest कहकर इसी बात का जिक्र किया है कि जो जिने के लिए उपयुक्त होगा, वही इस संसार में अपना अस्तित्व कायम रख सकता है । बदलते परिस्थिती के अनुासर अपने को नहीं ढाल सकने बाला संसार के सम्भवतः सबसे विशाल और शक्तिशाली जीव डायनोशर ने भी अपना अस्तित्व ही समाप्त कर लेने का प्रमाण हमारे सामने मौजुद है ।

संसार संघर्ष पर ही चलता है । अमेरिका, भारत, फिजी, हंगकंग, फ्रान्स आदि देशों पर शासन करने के लिए अंग्रेजों ने संघर्ष की, मेहनत की और वहाँ टिकने की तरकिबें निकाली । मगर उनका संघर्ष केवल भौतिक शासन और सत्ता पर टिका रहा, उनके हाथों में जनसत्ता और जनादेश नहीं होने के कारण अत्याधुनिक हाथ हथियारों से लैस होते हुए भी उन तमाम देशों से शिकन्दर, अंग्रेज, हिटलर, न्यापोलियन जैसे तानाशाह साम्राजयवादियों का पतन हुआ ।

नेपाली राज संघर्ष कर रहा है अपने साम्राज्य को मधेश में टिकाने के लिए–जो स्वाभाविक भी है । मगर उसका साम्राज्य का सत्ता सिर्फ मधेश के मानसिकता पर टिका हुआ है, दिल पर नहीं । और जो शासन आत्मा से बाहर का हो, वह धरासायी जरुर होगा । यही प्राकृतिक नियम है । यही शास्वत सत्य भी है । गोली, बारुद, मिसाइल और क्षेप्यास्त्रों में ही सारी ताकत होती तो अंग्रेजों का संसार में साम्राज्य आज भी कायम होता, हिटलर आज भी जिंदा होता, नेपोलियन हर चीज को संभव कर लिया होता, अमेरिका से क्यालिफोर्निया अलग होने की बात न करती, न स्पेन से क्याटेलोनियाँ अलग देश बन पाता, न तो ब्रिटेन से अलग होने के लिए स्कट्ल्याण्ड बार बार जनमत संग्रह कराने का हिम्मत करता । दूसरो घर में चोर ही नहीं, कई बार खूंखार डकैत भी हथियारों के साथ घुस जाते हैं । कुछ समयतक शासक बन जाते हैं, सारा घर कब्जा कर लेते हैं, लूटपाट करते हैं । कुछ अनहोनी घटनायें भी घटा देते हैं । त्रास फैला देते हैं, हाहाकार मचा देते हैं । मगर क्या उनकी शासन हमेशा वहाँ टिक पाती है ? नहीं । क्यूँकि डर तो उसे भी है कि त्रास में रहे लोग ही न कहीं आरपार की ठान लें । उसके इर्दगिर्द के समाज या पडोसी कहीं खडे न हो जाये ।

हिम्मत न करनेतक किसी साम्राज्य का शासन कहीं पर कायम रहता है । हिम्मत लोगों में खुद व खुद आ जाती है तब जब वे अपना इतिहास देखता है, प्रमाण पाता है । मधेश में कुछ लोगों में यह भ्रम है कि मधेशी नहीं सुधरेंगे । मैं बाँकी मधेशियों के सुधार होने का इनतजार करने बाले लोगों से ही आग्रह करुँगा कि वे आत्मा से कह दें कि वे सुधर गयें तो बाँकी सबको सुधरे पायेंगे । इसका प्रमाण देखना है तो नेपाल सरकार से जनमत संग्रह कराने का अनुरोध करें और देखें कि कितने मधेशी सुधर गये और कितने बिगडे रह गये !

 

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