वैश्विक सेतु-बंध की भाषा हिन्दी
कुमार सच्चिदानन्द

मानव-सभ्यता के इतिहास में सबसे महत्वपर्ूण्ा था – भाषा का आविष्कार। इसके द्वारा मनुष्य ने न केवल सम्प्रेषण के माध्यम की तलाश की बल्कि अप्रतिम और अनन्त विकास-यात्रा का मार्ग भी निर्धारित किया। भाषा न केवल विचारों की वाहिका है वरन यह मनुष्य की सभ्यता और सांस्कृृतिक समृद्धि की भी वाहिका होती है। यह सच है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है लेकिन यह सम्पर्ूण्ा पौर्वात्य चिन्तन की अभिव्यक्ति के लिए भी एक अनुपम भाषा है। आज यह विश्व में बोली जाने वाली दूसरी भाषा के रूप में जानी जाती है। बाइस देशों में लगभग एक अरब लोग इसे बोलते हैं साथ ही विदेशों के १५३ विश्वविद्यालयों में इसके शिक्षण की व्यवस्था है। वैसे विश्व में भारतीय भाषाओं का महत्तव पर्याप्त समय पर्ूव ही स्वीकारा गया था। जर्मनी के विद्वान मैक्समूलर ने भारत आकर संस्कृत सीखा और वेदों का जर्मन भाषा में अनुवाद किया जिससे सम्पर्ूण्ा विश्व में पौर्वात्य वाङ्मय की गुणवत्ता प्रमाणित हर्ुइ। चीन के यात्री तथा बौद्ध भिक्षुओं ने पाली भाषा से सभी त्रिपिटक एवं जातक कथाओं का अनुवाद चीनी भाषा में किया। संस्कृत में विरचित महाभारत, रामायण आदि महाकाव्यों के साथ-साथ पंचतंत्र, हितोपदेश तथा कालिदास आदि महाकवियों की कृतियों के साथ-साथ हमारे ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी अनेक ग्रंथ विश्व की प्रमुख भाषाओं में रूपांतरित हुए। आज निश्चित है कि मध्यकालीन आर्यभाषाएँ बहुजन प्रयुक्त नहीं हैं और पर्ूर्वी चिन्तन की अभिव्यक्ति की प्रतिनिधि भाषा के रूप में हिन्दी अग्रसर है।
जापान के सुप्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर क्यूया दोई ने कहा है कि ‘मैं विद्यार्थियों से कहता हूँ कि दस-दस साल सीखी अंग्रेजी में बोलने से तीन महीने में सीखी हिन्दी बोलना आसान है। हिंदी भाषा एक सामाजिक भाषा है । परिवार के आधार पर यह भारोपीय होते हुए भी एशिया की भाषाओं के बहुत निकट है। इसलिए मेरा विचार है कि यह एशिया और यूरोप दोनों महाद्वीपों की सर्ंपर्क भाषा हो सकती है।’ द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर उन्होंने कहा था कि ‘भारत में संसार का ध्यान आकृष्ट करनेवाली महान संस्कृति है और विश्व के बहुत से लोग हैं जो ऐसी संस्कृति से बहुत आकृष्ट होते हैं, परन्तु इनका जो सार है उन्हें अंग्रेजी आदि विदेशी भाषाओं में नहीं समझ सकते। यदि एक बार भारत में जाएँ तो वे लोग हिन्दी के लिए बहुत उत्साहित हो जाएँगे। मैं हिन्दी भाषियों से पर््रार्थना करता हूँ कि आप लोग अच्छी से अच्छी पुस्तकों का प्रकाशन करते रहें। क्योंकि एक बार हिन्दी जगत के एक गुरुदेव या एक स्वामी विवेकानन्दजी के सर्म्पर्क में आ जाएँ, तो संसार के बहुत से लोग हिन्दी की ओर दौडÞे चले आएँगे।’
जापानी विद्वान प्रोफेसर क्यूया दोई का यह कथन दो विन्दुओं पर प्रकाश डालता है। प्रथम, कि हिन्दी एक सहज भाषा है और द्वितीय कि यह पौर्वात्य चिन्तन की अभिव्यक्ति की प्रतिनिधि भाषा है। आज यही विशेषताएँ हिन्दी की लोकप्रियता और विस्तार के प्रमुख आधार हैं और आज यह विश्व भाषा के रूप में धीरे-धीरे अपना आकार ग्रहण करती जा रही है। इसके अतिरिक्त आज वैश्वीकरण, उदारीकरण, सूचना-क्रांति तथा भारत की तीव्र विकास गति ने हिन्दी भाषा की स्थिति को प्रभावित किया है। इसके प्रति आकर्षा भी बढÞा है और इसके प्रयोक्ता भी बढÞे हैं। बाइस देशों में लगभग अस्सी करोडÞ लोग इसे बोलते हैं साथ ही विदेशों के १५३ विश्वविद्यालयों में इसके शिक्षण की व्यवस्था है।
आज विश्व की प्रमुख भाषाओं में हिन्दी को चीनी -मैंडरिन) भाषा के बाद दूसरा स्थान प्राप्त है। मलयाला मनोरमार् इयर बुक-२००६ में चीनी भाषा भाषियों की संख्या ८७४ मिलियन, हिन्दी भाषा भाषियों की संख्या ३६६ मिलियन तथा अंग्रेजी भाषा भाषियों की संख्या ३६६ मिलियन बतायी गई है। मलयाला मनोरमा ने उपर्युक्त आँकडÞे वर्ल्ड अलमनैक-२००३ से लिए थे। हिन्दी भाषियों में उर्दू -६० मिलियन), मैथिली -२४ मिलियन), मगही -११ मिलियन), छत्तीसगढÞी -११ मिलियन), अवधी -२० मिलियन), गुजराती, मराठी भाषा भाषियों को इन आँकडÞों में शामिल नहीं किया गया है। सन् २००० में पेरिस के एस. आई. एल. इंटरनेशनल द्वारा बारबरा एफ ग्रिम्स द्वारा संपादित इथनोगाँग के प्रथम खण्ड में लैंग्वेज आँफ द वर्ल्ड -१४ संस्करण) में भी उपर्युक्त आँकडÞे दिए गए हैं, जिससे सिद्ध होता है कि हिन्दी बोलने वालों की संख्या संसार में दूसरे स्थान पर है।
कोई भी भाषा राष्ट्र की राजनैतिक सीमाओं को तब पार करती है जब उसके साथ यह विशेषता हो कि वह सहज हो और उसका साहित्य समृद्ध हो। इन मानदण्डों पर हिन्दी खडÞी उतरती है। वैसे विश्व के अनेक राष्ट्रों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पठन-पाठन की व्यवस्था है । रूस, अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड, बुल्गारिया, चेकस्लोवाकिया, रोमानिया इत्यादि देशों में हिंदी में शोध कार्य के साथ-साथ अनुवाद कार्य भी तेजी से हो रहे हैं। माँरिशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद, फिजी, दक्षिण अप|mीका, मलेशिया वर्मा थाईलैंड, सिंगापुर, इंडोनेशिया, जमैका, नेपाल, श्रीलंका आदि अनेक देशों में आज भी हिन्दी प्रचलित है और अत्यन्त आदर के साथ इसे अपनाया जा रहा है। ‘राजभाषा पुष्पमाला’ के जनवरी १९९४ के अंक में प्रकाशित सूचनाओं से विदित होता है कि विश्व के प्रायः अधिकांश राष्ट्रों में हिन्दी के प्रचार प्रसार के साथ शोध एवं अनुवाद के लिए हिन्दी के अध्ययनकेन्द्र स्थापित हैं और तुलसीदास कृत रामचरितमानस के साथ साथ प्रेमचंद, जैनेन्द्र, अज्ञेय आदि रचनाकारों की अधिकांश कृतियों के अंग्रेजी, जर्मन, रूसी, बुल्गारियाई भाषाओं में विपुल मात्रा में न केवल अनुवाद हो रहे हैं बल्कि तुलनात्मक अध्ययन भी प्रगति पर है। हिन्दी गीतों के साथ-साथ हिन्दी फिल्में भी वहाँ लोकप्रिय होती जा रही हैं। साथ ही व्यापार-वाणिज्य के क्षेत्रों में ही नहीं अपितु भारत के साथ भाषा एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध दृढÞतर बनाने के लिए आज विश्व के अनेक देश हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति आकषिर्त हो रहे हैं।
यह सच है कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा है। इस रूप में यह मुख्यतः हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, हिमाचल-प्रदेश तथा बिहार में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त कर्नाटक तथा आन्ध्र की दक्खिनी हिन्दी वाले भाग एवं कोलकाता, शिलांग, मुर्म्बई तथा अहमदावाद आदि भारत के अहिन्दीभाषी क्षेत्र के कुछ बडÞे नगरों में छोटे-छोटे हिन्दीभाषी क्षेत्र आते हैं। लेकिन भारत के बाहर भी कई देशों में हिन्दी भाषी लोग बडÞी संख्या में बसे हैं। जैसे माँरिशस, फिजी, सूरीनाम, टि्रनिदाद आदि के साथ-साथ नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में हिन्दीभाषी हैं। इसके बाद भी कई देशों में हिन्दी भाषियों की अच्छी संख्या है। जैसे इंग्लैंड में लन्दन, तजकिस्तान तथा उजबेकिस्तान की सीमा पर, अप|mीका में गियाना, दक्षिणी अप्रिmका के कुछ क्षेत्र, अमेरिका के कई बडÞे नगरों जैसे न्यूयार्क में भी हिन्दी भाषियों की अच्छी संख्या है। इनके अतिरिक्त हांगकांग, मलेशिया, सिंगापुर आदि पर्ूर्वी देशों में भी हिन्दी भाषी हैं।
आज हिन्दी विश्वभाषा बनने की दहलीज पर दस्तक दे रही है, उसके पीछे इन हिन्दीभाषी क्षेत्र और यहाँ फैले इसके प्रयोक्ताओं का व्यापक योगदान है ।
आज विश्व के समृद्ध देश भी हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन ने भी इस बात को गंभीरता से लिया है। इसका प्रमुख कारण है कि अमेरिका में आजीविका हेतु विश्व के तमाम देशवासी वहाँ पहुँच रहे हैं। परन्तु कोई भी विदेशी अमेरिका को अपना देश नहीं मानता। वहाँ की नागरिकता स्वीकार करने के बावजूद उस राष्ट्र को अपनी मातृभूमि नहीं मानता। अमेरिकी प्रशासन ने इस बात को गंभीरता से अनुभव किया कि अनेक भाषाभाषी अपनी आवश्यकताओं की पर्ूर्ति के लिए अमेरिका में निवास करते है। लेकिन उनके हृदयों में परस्पर विश्वास और अपनापन का भाव नहीं है। उनके भीतर द्वेष और अविश्वास के भाव भरे हुए हैं। अतः उनके साथ आत्मीयतापर्ूण्ा मैत्री सम्बन्ध और सौहार्द स्थापित करना है तो सुरक्षा की दृष्टि से भी उनके मन में सौजन्य भाव पैदा करना होगा कि अमेरिकावासी भी हृदयपर्ूवक उनका सम्मान करते हैं। इसके लिए एक मात्र उपाय एवं निकटतम मार्ग उनकी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करना है। इससे उनके हृदयों में यह भाव पैदा होगा कि हम उनका आदर करने के साथ हृदयपर्ूवक उनके साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं(ये अमेरिकी पर्ूवराष्ट्रपति जार्ँज बुश के उद्गार हैं और मौजूदा अमेरिकी प्रशासन ने भी इस विचार के कार्यान्वयन की दिशा में अपने कदम बढÞाए हैं।
आज संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए विभिन्न रूपों में प्रयास जारी है। तर्क यह है कि विश्व में बोली जानेवाली दूसरी भाषा हिन्दी, जिसका प्रयोग लगभग २२ देशों की एक अरब लोगों द्वारा किया जाता है, अभी तक संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा नहीं बन पाई है। आधिकारिक भाषा बन जाने के बाद विश्व जनसंख्या का एक बडÞा भाग अपनी भाषा के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियों तथा क्रियाकलापों से अवगत होगा तथा हिन्दी प्रयोग करने वाले देश भी वहाँ अपनी बात प्रभावी ढंग से रख सकेंगे। इससे हिन्दी भाषा का भी नये क्षेत्रों में प्रवेश होगा, जो इसके विकास एवं उन्नयन में सहायक होगा। ज्ञातव्य है कि संयुक्त राष्ट्र में अभी छः आधिकारिक भाषाएँ हैं और किसी भाषा को संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए उसके आधे से अधिक सदस्य देशों के र्समर्थन की आवश्यकता है। आज भारत के नेतृत्व में इस दिशा में कूटनैतिक प्रयास जारी हैं। भारत की विशाल जनसंख्या, व्यापक बाजार, मजबूत और तीव्र विकास दर वाली अर्थव्यवस्था के कारण धीरे-धीरे  विश्वभाषा के रूप में हिन्दी की स्वीकार्यता का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।
भूमंडलीकरण की नई स्थितियाँ जनसंचार और प्रोद्यौगिकी के कारण भी संभव हर्ुइ है। जनसंचार के क्षेत्र में हिन्दी आज दुनिया की महत्वपर्ूण्ा भाषा के रूप में विकसित हो रही है, इसलिए उसका भविष्य उज्ज्वल होने की संभावना है। मास्को, चीन, जर्मनी, बी. बी. सी.,अमेरिका आदि टी.वी. एवं रेडियो में हिन्दी छायी हर्ुइ है। इसके अलावा अनेक देशों में जनसंचार विशेषकर दृश्य-श्रव्य माध्यमों में हिन्दी का प्रभुत्व है। विश्व में सबसे ज्यादा सिनेमा का निर्माण करने वाला बाँलीउड हिन्दी की व्यापक सम्प्रेषण क्षमता का ही लाभ उठा रहा है। मुद्रित माध्यम के रूप में भी हिन्दी अखबारों की संख्या अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों से ज्यादा है। उपनिवेशवादी देश अब भी अपनी भाषाओं का ही जनसंचार में प्रभुत्व चाहते हैं। लेकिन अंग्रेजी के इतने व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद जनसंचार के माध्यमों में हिन्दी की जो पकडÞ है वह उत्साहजनक है और हिन्दी भाषियों के कारण हिन्दी फिल्मों का विश्व बाजार भी खुल रहा है। इसलिए यह अब नहीं कहा जा सकता कि संचार के क्षेत्र में हिन्दी एक पिछडÞी भाषा है।
विश्वभाषा बनने के मार्ग पर चल रही हिन्दी के लिए अब यह आवश्यक है कि उसमें ज्ञान-विज्ञान की मौलिक सामग्री तैयार हो। लेकिन यह कार्य हिन्दीभाषी वैज्ञानिकों, लेखकों और विचारकों के सहयोग से ही संभव है। इस तरह का ज्ञान शीघ्र संपादित करने के लिए हिन्दी में अन्य भाषाओं से यंत्रानुवाद की प्रक्रिया को तीव्र बनाना होगा। महात्मा गाँधी अन्तर्रर्ाा्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में अनुवाद प्रौद्योगिकी जैसा विषय लाने का यही उद्देश्य है। जिस तरह भारत में प्रशासन के क्षेत्र में सह-राजभाषा के रूप में हिन्दी विकसित हो रही है उसी तरह प्रौद्योगिकी, विशेषतः सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी हिन्दी सह-प्रौद्योगिकी भाषा के रूप में विकसित होने की प्रबल संभावना है। महात्मा गाँधी अन्तर्रर्ाा्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में ‘हिन्दी सूचना विश्वकोष’ परियोजना प्रारम्भ करने के पीछे यही उद्देश्य रहा है। इस क्षेत्र में एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है जिससे हिन्दी संबंधी प्रौद्योगिकी अनुसंधान कार्यों को समायोजित कर सकें। बाजार की भाषा के रूप में हिन्दी पहले से ही समादृत है और ‘बाजार हिन्दुस्तानी’ की चर्चा ग्रियर्सन के समय से ही प्रायः सभी भाषा वैज्ञानिक करते आ रहे हैं। इस तरह ज्ञान-विज्ञान-प्रौद्योगिकी के नए-नए क्षेत्रों से हिन्दी को जोडÞने से ही हिन्दी सच्चे अथोर्ं में विश्व भाषा बन सकेगी।
विश्व भाषा का आशय है चेतस् संस्कृति का वहन कर सकने वाली भाषा। आज हिन्दी विश्व का चित्त छूने में र्समर्थ है। इसका आशय है कि वह विश्व भाषा बनने का अहर्त्तर्ााखती है। हिन्दी का स्वरूप शुरू से ही वैश्विक रहा है। यह सच है कि राजनैति कारणों से कई देशों में हिन्दी के प्रति दुराग्रह है लेकिन क्रमशः हिन्दी अपने व्यापक लक्ष्य की ओर अग्रसर है। वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी दक्षिण एशिया की सर्म्पर्क भाषा के रूप में र्सवस्वीकृत होगी और विश्व भाषा के रूप में सूचीकृत होकर पौर्वात्य धर्म, दर्शन, अध्यात्म, चिंतन का उद्घोष विश्व- रंगमंच पर करेगी।
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