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वैश्विक स्तर पर नई पहचान बनाती हिन्दी : डा श्वेता दीप्ति ( हिंदी दिवस पर विशेष आलेख )

ज्ञान की, सम्मान की, प्यार की, मनुहार की, भाषा है ये दिल की, हम सबके अभिमान की ।

विश्व हिंदी दिवस पर DCM डा.अजय कुमार डा.श्वेता दीप्ति को सम्मानित करते हुये | विच में डा. रामदयाल राकेश |फाइल फोटो

डा श्वेता दीप्ति, काठमांडू , १४ सितम्बर २०१८ | इक्कीसवीं सदी ‘विश्व समाज’ की संकल्पना को साकार करने की सदी है। आज सारा जगत एक ही सूत्र में बन्ध रहा है। यह सूत्र जिस विचार धारा के लिए प्रवाहमान है। यह विचार धारा है ‘आधुनिकीकरण’ की विचारधारा । जो सारे वैश्विक समाज का तानाबाना बुनती है। जो वैश्विक समाज की संकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए जो सभी अवयव महती भूमिका का निर्वहन करते है, उनमे से एक है ‘भाषा’। निस्सन्देह हिन्दी आज सारे विश्व में ‘अंतर्राष्ट्रीय भाषा’ के उस आसन पर विराजमान है। किंतु साथ ही अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश, अरबी, मंडरिन भाषाएं भी विश्व भाषाएँ बन चुकी है। पहले यह मान्यता थी कि एक हिन्दी भाषी को दोयम दर्जे का माना जाता था और अंग्रेजी भाषा को सर्वोपरि परंतु आज जो हिन्दी हम बोलते, पढ़ते व सुनते है उसमें कई परिवर्तन दिखाई पड़ते है। आज हिन्दी सिर्फ प्राचीन उपमानों की बात ही नहीं करती बल्कि नए उपमानों को गढने की क्षमता रखती है। यही कारण है की चाहे वह चीन हो या जापान या फिर रूस हो या अमेरिका  हर देश में जब भाषाओं के ज्ञान की बात होती है तब हिन्दी को विशेष स्थान प्राप्त होता है।

मॉरिशस, थायलैंड, बैंकॉक, इन्डोनेशिया तथा श्रीलंका में हिन्दी के ज्ञान को अति महत्ता प्रदान की गई है। वहाँ यदि रोजगार के अच्छे अवसर तलाशने है तब हिन्दी तथा ‘अच्छी हिन्दी का ज्ञान’ होने की कसौटी को पार करना ही होता है। भाषा हमें समाज से जोड़ती है। परंतु भाषा का विस्तार हमारे अपने हाथों में होता है।

आज के समय में हिन्दी ने न केवल अपने भारत में अपितु विदेशों में भी अपनी पहचान गढ़ी है और यह अति आवश्यक भी है कि वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी की इस बदलती भूमिका को हम स्वीकार करें और इसका विस्तार करें।

हिन्दी को आज हर जगह पहचान मिली है इसलिए यह  आवश्यक है कि हिन्दी को उचित सम्मान कि दृष्टि से देखा जाए क्योंकि यह न सिर्फ भारत अपितु विश्व में उभरती एक नई पहचान है।

जब हम भाषा के वैश्विक परिदृश्य की बात करते हैं तो सबसे पहले हमें भाषा विशेष की क्षमताओं के बारे में आश्वस्त होना पड़ता है । वैश्विक धरातल पर कोई भी भाषा यूँ ही अनायास उभर कर अपना वर्चस्व नहीं बना सकती । इसके पीछे भाषा की सनातनता का भी महत्वपूर्ण हाथ है । स्वतंत्र भारत में जब पह्ला लोकसभा निर्वाचन हुआ था उस समय हिन्दी भाषा विश्व में पाँचवे पायदान पर थी । आज उसे प्रथम स्थान का दावेदार माना जा रहा है । भाषा की वैश्विकता के दो प्रमुख आधार हैं । प्रथम यह कि आलोच्य भाषा कितने बड़े भूभाग में बोली जा रही है और उस पर कितना साहित्य रचा जा रहा है । दूसरी अहम् बात यह है कि वह भाषा कितने लोगों द्वारा व्यवहृत हो रही है । इस पर विचार करने से पूर्व किसी भाषा का वैश्विक परिदृश्य क्या होना चाहिए और एतदर्थ किसी भाषा विशेष से क्या क्या अपेक्षाएँ हैं, इस पर चर्चा होना प्रासंगिक एवं समीचीन है ।

आंकड़ों के अनुसार विश्व के लगभग एक सौ पचास विश्व विद्यालयों में हिंदी का अध्ययन अध्यापन हो रहा है। मारीशस विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, वहांकी संसद ने हिंदी के वैश्विक प्रचार के लिए और उस संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा के रूप में प्रतिष्टित करने के लिए विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना की है। बारह लाख की आबादी वाले इस देश में पांच लाख हिंदी भाषी हैं। १५८९ से अध्यापक गण इस देश में हिंदी भाषा एंव इसके त्रिकाल गौरवशाली साहित्य में लगे हैं। मारिशस में हिंदी साहित्य की बहुतामय सर्जना की जा रही है। राजा हीरामन तथा राजरानी गोबिन जैसे कवि यूभ इस देश में बैठकर हिंदी कविता के माध्यम से पटल पर हिंदी साहित्य के महत्त्व को रेखांकित कर रहे हैं।

भारतीय हिंदी की सुंदरतम बोलियाँ यथा अवधी, मगधी, भोजपुरी और मैथिली भाषा के सम्मिश्रण से ‘सूरीनाम’ की हिन्दी बनी है। जिसे सरनामी हिंदी कहा गया है। सन १९७७ से ‘हिंदी परिषद्’ नामक स्वौच्छिक संस्था हिंदी भाषा तथा साहित्य के उत्थान पथ की विशेष मार्गदर्शीका सिध्द हुई है।

त्रिनिदाद एंव टोबैगो द्वीप समूह की जनसँख्या लगभग दस लाख है। उसमे अप्रवासी भारतीय चालीस प्रतिशत से अधिक है। यहाँ १९८७ से सरकारी संस्था ‘निहस्तर’ में हिंदी के अध्यापकों को प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टइंडीज़ में हिंदी पीठ की स्थापना हुई है। १९९६ में पांचवा विश्व हिंदी सम्मलेन यही आयोजित किया गया था। काफी बड़ी संस्था में यहाँ पर शोध( कार्य हो रहा है तथा रचनात्मक साहित्य भी लिखा जा रहा है।

इंग्लैंड में हिंदी का स्थान भी अमेरिका की तरह ही यशस्वी है। यहाँ पर कार्यरत हिंदी साहित्य सेवी संस्थानों की सूची लम्बी है। जिनमें से भारतीय भाषा संगम, गीतांजलि, बहुभाषिक साहित्य समुदाय, यू।के। हिंदी समिति, हिंदी भाषा समिति, चौपाल, कृति यूके। कृति इंटरनेशनल कथ यूके। आदि उल्लेखनीय है। इस देश में रहकर हिंदी साहित्य की सर्जना करने वाले रचनाकरों की सूचि विशाल है। जिसमें दिव्या माथुर, राजेन्द्र शर्मा, उषा राजे सक्सेना, नीना पॉल, उषा वर्मा, महेंद दवेसर, कादंबरी मेहरा, नीरा त्यागी प्रमुख है। उल्लेख्य है कि भारतेंद्रू युग में इंग्लैंड वासी व हिंदी विद्वान श्री फ्रेडरिक पिंकाट ने साहित्यक पत्रकारिता के क्षेत्र में अन्मोल योगदान दिया था। उन्होंने उस समय जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था एंव अंग्रेजी के वर्चस्व को बढाने की कुनीति ब्रिटिश सरकार अपना रही थी, तब इन्गलैंड में रहते हुए विपुल मात्रा में हिंदी साहित्य का सृजन किया। जिस से वैश्विक पटल पर हिंदी साहित्य का महत्त्व स्पष्टतस् परिलक्षित हो जाता है।

रशिया में प्रारंभ से ही लोग हिंदी में रुचि लेते रहे हैं। यहाँ प्राथमिक स्थर से लेकर विश्व विद्यालय स्थर तक हिंदी का पठन पाठन होता है। मार्को विश्व विद्यालय, रूसी मानविकी विश्व विद्यालय, सेंट पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय, अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध संस्थान सहित लगभग दो दर्जन संस्थानों में डेढ़ हज़ार से अधिक  विद्यार्थी हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं।

फ्रांस के सौरबेन विश्व विद्यालय में हिंदी भाषा एंव साहित्य संबन्धी पाठ्यक्रम है। चीन के भी पेइचिंग विश्व विद्यालय तथा नानचिंग विश्व विद्यालय मे हिंदी के पठन पाठन की व्यवस्था है। भारतीय विद्या विभाग के संस्थापक प्रो चिशमेन ने वाल्मीकि रामायण, गोदान, राग दरबारी का गंडारिन भाषा मे अनुवाद किया है।

विश्व के सबसे प्राचीन लोकतंत्र अमेरिका में दो करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग रहते हैं। वहां हार्वर्ड, पेन, मिशिगन,भेल, आदि विश्व विद्यालयों मे हिंदी का शिक्षण हो रहा है। अमेरिका के लगभग ठछ विश्वविद्यालयों मे हिंदी पढ़ाई जा रही है। हिंदी का अध्ययन करने वाले छात्रों की संख्या लगभग ज्ञछण्ण् से अधिक है। हिंदी के लिए कार्यरत संस्थाओं में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, विश्व हिंदी समिति, हिंदी न्यास आदि प्रमुख है। अमेरिका से प्रकाशित होने वाली हिंदी पत्रिकाओं विश्वा, सौरभ हिंदी जगत, डितिज विश्व विवेक, नाल भारती, हिंदी चेतना आदि प्रमुख है। ये पत्रिकाएँ निरंतर हिंदी साहित्य के विकास के लिए श्रमारत है। असंख्य हिंदी कवि, लेखकमन इस देश मे रहकर हिंदी साहित्य सेवा कर रहे हैं।

नेपाल की लगभग द्धढ५ जनसंख्या नेपाली का अपनी मातृभाषा के रूप में प्रयोग करती है जबकि ण्।द्धठ५ लोग हिन्दी को अपनी मातृभाषा मानते हैं। परन्तु अधिकांश लोग हिन्दी भाषा को बोल और समझ सकते हैं। इसका एक मुख्य कारण भारतीय टेलिविज़न और सिनेमा की नेपाल में लोकप्रियता है । नेपाल के हिन्दी के व्यवहार का प्राचीनतम रूप शिलालेखों एवं उपलब्ध हस्तलिखित सामग्रियों से अनुमान किया जा सकता है। पश्चिम नेपाल की दांग घाटी में प्राप्त आज से अलगभग ६५० वर्ष पूर्व के शिलालेख में दांग का तत्कालीन राजा रत्नसेन, जो बाद में योगी बन गया था, उसकी एक दंगीशरण कथा नामक रचना भी मिलती है। यह कृति नेपाल में हिन्दी के व्यापक प्रयोग और गहरी जड़ को पुष्ट करती है। यह रचना साहित्यिक दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण है ही हिन्दी की भाषिक विकास प्रक्रिया को समझने की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हिन्दी साहित्य का जो इतिहास आज तक लिखा गया है, वह भारत के हिन्दी साहित्य का ही इतिहास है। वास्तव में भारत से बाहर हिन्दी की जो धाराएं चलती रही हैं, वे अब भी इतिहासकारों की दृष्टि से ओझल है। उनकी ओर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। पाल्पा के सेन वंशीय नरेशों तथा पूरब में मोरंग और अन्य कई राज्यों के तत्कालीन नरेशों ने तो हिन्दी को अपनी राजभाषा ही बनाया था। कुष्णशाह, मुकंदसेन आदि नरेशों के सभी पत्र और हुक्मनामें हिन्दी में ही मिलते हैं, जिससे हिन्दी की तत्कालीन स्थिति का आसानी से अनुमान हो जाता है। काठमांडू उपत्यका के मल्ल राजाओं में से अनेक ने हिन्दी में रचनाएं कीं। उनके हिन्दी प्रेम का कारण भी वहां हिन्दी का व्यापक प्रयोग और प्रचार ही कहा जा सकता है। इस प्रकार हिन्दी वहाँ कम से कम सात सौ वर्षों पूर्व से ही बहुसंख्यक लोगों की प्रथम और द्वितीय भाषा के रूप में चलती आई है।

विश्व में हजारों भाषाएँ हैं लेकिन कुछ ही भाषाओँ के साहित्य का स्तर इतना समुन्नत है कि उस भाषा की रचनाओं का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओँ में हो । जिस भाषा का जितना अधिक साहित्य विश्व की अन्यान्य भाषाओँ में अनूदित किए जाने की एक निरंतर परंपरा रहेगी, निश्चित रूप से उसकी प्रयोजनीयता प्रामाणिक मानी जाएगी और विश्व स्तर पर उसकी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण बनी रहेगी । डा करुणाशंकर उपाध्याय के अनुसार विश्वस्तरीय भाषा ऐसी होनी चाहिए कि—  ‘उसमें मानवीय और यांत्रिक अनुवाद की आधारभूत तथा विकसित सुविधा हो जिससे वह बहुभाषिक कम्प्यूटर की दुनिया में अपने समग्र सूचना स्रोत तथा प्रक्रिया सामग्री सॉफ्टवेयर के साथ उपलब्ध हो। साथ ही,  वह इतनी समर्थ हो कि वर्तमान प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों मसलन ईमेल, ईकॉमर्स, ईबुक,इंटरनेट तथा एसएमएस। एवं वेब जगत में प्रभावपूर्ण ढंग से अपनी सक्रिय उपस्थिति का अहसास करा सके।’ जब हम हिन्दी भाषा की परख करते हैं तो हमें अनेक सुखद पहलू दिखाई देते हैं । इसकी देवनागरी लिपि संभवतः विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है । यह जैसी लिखी जाती है वैसी ही पढी जाती है । इसमें अंग्रेजी के GO  और TO  तथा PUT और  BUT जैसा उच्चारण वैषम्य नहीं है . इसी प्रकार  CALM  और  BALM  जैसे शब्दों मे L के साइलेंट होने जैसी कोई व्यवस्था नहीं है . हिंदी में कैपिटल और स्माल लैटर का भी झंझट नहीं है . उच्चारण और एक्सेंट की समस्या नहीं है .

निष्कर्षतः यह माना जा सकता है कि हिंदी की महती भूमिका आज न केवल राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने के लिए अनुभूत हो रही है, बल्कि उस भाषा के साहित्य में सकल विश्व को प्रेम व ज्ञान सौरभ से सज्जित व परिमार्जित करने के भी अनुपम क्षमता है। जिससे स्पष्टतः विश्व स्तर पर हिंदी साहित्य का अनुपम महत्त्व परिलक्षित व प्रतिफलित होता है।

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