Sun. Sep 23rd, 2018

वो आए, मिले और चले गए

विजय महासेठ
‘वो आए मिले और चले गए” जी हां मित्रों यह शीर्षक है तत्कालीन लोकप्रिय हिन्दी समाचार माध्यम BBC का । वैसे समय का सही सही अंदाजा नहीं है मुझे । परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि शायद यह वाकया सन् १९७९–८० का है । समय इसलिए मैं करीब का बता रहा हूँ, कि उस समय विश्व स्तर पर बहुत सारी ऐसी घटनायें घट रही थी जो लोगो की कल्पना से परे हो । मसलन विज्ञान के क्षेत्र में अमेरिकी कपथ बिद का प्रयोग विफल रहा था और उसे गैर आबादी के क्षेत्र में गिराने की फिक्र में वैज्ञानिक लगे हुए थे । राजनीति के क्षेत्र में नेपाल जनमत संग्रह के दौर से गुजर रहा था, भारत में विभिन्न पार्टियों के एकीकरण के प्रयोग से निर्मित जनता पार्टी का प्रयोग विफल हो भारत में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव की प्रक्रिया आगे की खिसक रही थी । ईरान में रजा पहलवी का सत्ता च्युत हो, आयातुल्लाह खुमैनी की कट्टरपंथी सरकार बन रही थी ।
अमेरिकी राष्ट्रपति जिमि कार्टर की liberal legit failure हो चुकी थी और अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों को खुमैनी सरकार ने बंधक बना रखा था । इन कारणों से अमेरिका में democratic party की हार हुई औरrepublican उम्मीदवार रोनाल्ड रिगन सत्ता में आए । रिगन का खौफ कुछ इस कदर हावी था कि तत्कालीन विश्व स्तरीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं उनके सरकार वाली देशों में परिवर्तन का खतरा मंडराने लगा । उस समय के प्रमुख कम्युनिस्टीक स्तंभ चीन और सोवियत संघ माने जाते थे । चीन ने उदार अर्थ नीति को अपनाकर अपने कम्युनिस्टीक पतन से बचने का सफल प्रयास किया । परंतु सोवियत संघ, जो अंदर से आर्थिक बदहाली को झेलते हुए टूट चुका था, परन्तु अपने बाहरी दिखावे को बरकरार रखा था । जी हां, मित्रों उपर उल्लेखित BBC के नाम का शीर्षक इसी से सन्दर्भित है । स्थान स्– Iceland, मिलने वाले विश्व स्तरीय नेतागण थे, रीगन और मिषाइल गोर्वाचोव । विषय था, तत्कालीन कम्युनिस्टीक एवं गैर कम्युनिस्टीक देशों के बीच का शीत युद्ध कैसे समाप्त किया जाय ।
हुआ यह कि दोनों नेतागण आए और बगैर किसी प्रगति के वापस हो लिए । उस समयBBC की टिप्पणी यह थी– गोर्वाचोव के हंसते हुए दांत दिखावे के हैं, लगता है दिल से मुलायम हैं परन्तु दिखने वाले दांत पत्थर के हैं । उपर्युक्त बातों में मैं यह कहना चाहा हूँ कि भले ही तत्कालीन वार्ता विफल रही हो, परन्तु सोवियत संघ के रूप में वह आखिरी शिखर वार्ता रही । उसके बाद सोवियत संघ बिखर गया और रूस के रूप में परिणत हो गया, जिसके पहले से लेकर अब तक के कार्यकारी प्रमुखलादिमीर पुतिन हैं । मैंने इतनी लंबी बात इसलिए कही कि, जब भी हमें लगे कि वो आए मिले और चले गए । यह वाक्य बेमानी नहीं बल्कि समय आने पर अपना फल देकर जायगी । जी हां, आजकल कुछ ऐसा हमारे नेपाल के मधेशवादी दल राजपा में चल रहा है । इनके नेतागण प्रायः नियमित रूप से आपस में मिलते हैं परन्तु बगैर किसी निष्कर्ष के अगले मुलाकात तक के लिए अलग हो जाते हैं । इससे हम निराश न हों यह भी मिलना निष्काम नहीं जायेगा कुछ देकर ही जायेगा । नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो कुछ काम करो आज की आवश्यकता है कि हम जनता सजग और आंदोलित रहें । आपने देखा होगा कि विगत में ओली के सप्तरी दौरे पर नेताओं के बगैर जनता स्वयं ने बढ चढकर हिस्सा लिया और ओली के कार्यक्रम का दिशा बदल दिया । यानी हम जनता अगर चाह लें तो दिशा क्या नेताओं का दशा भी बदल डालेंगे । आवश्यकता है हम जगे रहें सोये नहीं ।

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