वो ‘शक्ति’ जो नई शक्ति नहीं बन सकी : लीलानाथ गौतम

तकरीबन ५ लाख सदस्य–संख्या इकठ्ठा कर पार्टी घोषणा किया गया है, ऐसा दावा करनेवाला नया शक्ति पार्टी की वास्तविक हालात हाल ही में सम्पन्न विद्यार्थी संगठन की निर्वाचन (जिसको राष्ट्रिय जनमत के लिए मिनी निर्वाचन भी कहा जाता है) में सामने आया है, जहाँ नया शक्ति ने एक भी सीट में जीत हासिल नहीं किया ।
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27,मार्च । देश की राजनीतिक हालात और आर्थिक दूरावस्था का हवाला देकर चर्चित पत्रकार रवीन्द्र मिश्र ने हाल ही में बीबीसी नेपाली सेवा (पत्रकार की नौकरी) से इस्तिफा देकर राजनीति में आने की घोषणा की है । उनका मानना है– वर्तमान राजनीतिक दलों ने देश को बिगाड़ दिया है, कमजोर बनाया है । अब इस को सुधार करने के लिए राजनीति में नयी शक्ति की आवश्यकता है । मिश्र के इस कथन में समर्थन जतानेवालों की संख्या लाखों हो सकती है । लेकिन उनको ही राजनेता मानकर उसमें गोलबन्द होनेवालों की संख्या शून्य हो सकती है । रवीन्द्र मिश्र की तरह ही असन्तुष्टि जताकर लगभग एक साल पहले डा. बाबुराम भट्टराई ने ‘नया शक्ति पार्टी नेपाल’ नामक राजनीतिक दल की घोषणा की थी । लेकिन डा. बाबुराम भट्टराई तथा उनकी पार्टी की वर्तमान हालात देखने से लगता है कि नया शक्ति के पक्ष में कोई भी नहीं है ।
सिर्फ डा. बाबुराम भट्टराई तथा रवीन्द्र मिश्र ही नहीं, वर्तमान राजनीति के प्रति असन्तुष्ट बहुसंख्यक सर्वसाधारण जनता की नजर में कांग्रेस, एमाले, माओवादी केन्द्र तथा मधेशीवादी लगायत सभी राजनीतिक दल एक ही है, जो भ्रष्टाचार के दलदल में डूब चुका है । देश में व्याप्त दण्डहीनता, अराजकता, बेरोजगारी, महंगाई, कुशासन और आर्थिक पिछड़ेपन के लिए भी मुख्य दोषी उल्लेखित प्रमुख दल ही हैं । राजनीति के प्रति सम्वेदनशील कुछ सर्वसाधारणों के लिए, यह सभी पार्टियां विदेशी दलाल भी हंै । शक्ति केन्द्रों के सामने नतमस्तक हो जाना और दूतावास में ‘लम्पसार’ होकर सत्ता और अपने सन्तानों के लिए छात्रवृत्ति की याचना करना इन लोगों का

उज्ज्वल थापा, पुकार बम, सन्तोष प्रधान जैसे कुछ युवाओं ने भी अपने को नया शक्ति दावा करते हुए ‘विवेकशील नेपाली दल’ की घोषणा की है । स्वास्थ्यकर्मी डा. उपेन्द्र देवकोटा, राजनीतिक विश्लेषक भरत दाहाल जैसे कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी है, जो चाहते हैं कि अपनी ही नेतृत्व में नया शक्ति निर्माण हो । इस तरह खुद को नया शक्ति घोषणा करनेवालों की जमात लम्बी है । लेकिन इनमें से कोई एक समूह ऐसा हो, जो नया शक्ति बन सकता है, यह तो अभी तक नहीं दिखाई देता है ।

चरित्र है ।
वैसे सभी राजनीतिक दल तथा नेताओं पर ऐसा आरोप लगाना गलत होगा । लेकिन विद्यमान राजनीतिक गतिविधि तथा प्रमुख नेताओं के प्रति बढ़ती वितृष्णा के कारण ही ऐसा आरोप का प्रचारबाजी खूब होता आ रहा है । और इसी प्रचारबाजी के बीच नया वैकल्पिक राजनीतिक शक्तियों की बहस चल रही है । बहस के क्रम में ही कुछ पुराने पार्टी अपने को खुद वैकल्पिक शक्ति का दावा भी करने लगे है । और कुछ समूह ने नया पार्टी स्थापना करके अपने को नया शक्ति होने की घोषणा भी की है । ऐसी ही अवस्था में पूर्वप्रधानमन्त्री डा. बाबुराम भट्टराई ने ‘नयाँ शक्ति पार्टी नेपाल’ की घोषणा की थी । लेकिन जिसने अपने को नया शक्ति कहकर दावा किया है या घोषणा किया है, आज वो सभी ‘नई शक्ति’ शक्तिहीन अवस्था में दिखाई देती है । हाल ही में सम्पन्न विद्यार्थी संगठनों का निर्वाचन और परिणाम इस तथ्य को पुष्टि करता है ।
दूसरी बात, नया शक्ति पार्टी घोषणा का १ साल भी नहीं हुआ है । लेकिन इतनी छोटी–सी अवधि में ही यह पार्टी विभाजन की ओर अग्रसर हो रहा है । घोषित स्थानीय निर्वाचन सम्बन्धी विषयों को लेकर डा. बाबुराम भट्टराई तथा संघीय समाजवादी फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव बीच जो सहकार्य हो रहा है, उसी को लेकर आज नया शक्ति के भीतर डा. भट्टराई के विरुद्ध मोर्चाबन्दी हो रही है और प्रायः सभी जिलों में समान्तर संगठन निर्माण की तैयार हो रही है ।
अपने को खुद नया शक्ति के रूप में दावा करने वाले व्यक्ति तथा समूह सिर्फ डा. बाबुराम भट्टराई ही नहीं है । पार्टी तथा संस्था का नाम तो, नया शक्ति नहीं है, लेकिन कुछ ऐसे व्यक्ति तथा समूह भी है, जो अपने को नया शक्ति कहने में गर्व करते हैं । वे लोग कहते हैं– ‘सत्ता और संसद् में प्रतिनिधित्व करनेवाले वर्तमान राजनीतिक दलों से सुशासन और आर्थिक समृद्धि सम्भव नहीं है ।’ ऐसा ही दावा करनेवाले दूसरे व्यक्ति हैं– बीबीसी नेपाली सेवा के पूर्वकर्मचारी तथा पत्रकार रवीन्द्र मिश्र । उन्होंने बीबीसी नेपाली सेवा से इस्तिफा देते हुए कहा है– ‘देश को आर्थिक रूप में समृद्ध बनाने के लिए यहाँ नया शक्ति की जरूरत है । इसलिए मैंने अपनी नौकरी छोड़ कर राजनीति में आने का फैसला किया है ।’ मिश्र का मानना है कि डा. बाबुराम भट्टराई भी राजनीति में परीक्षण हो चुके हैं, उनके नेतृत्व में नया शक्ति निर्माण सम्भव नहीं है । इसके साथ–साथ मिश्र ने ‘साझा पार्टी’ नाम देकर एक नया राजनीतिक दल की भी घोषणा की है । इसीतरह उज्ज्वल थापा, पुकार बम, सन्तोष प्रधान जैसे कुछ युवाओं ने भी अपने को नया शक्ति दावा करते हुए ‘विवेकशील नेपाली दल’ की घोषणा की है । स्वास्थ्यकर्मी डा. उपेन्द्र देवकोटा, राजनीतिक विश्लेषक भरत दाहाल जैसे कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी है, जो चाहते हैं कि अपनी ही नेतृत्व में नया शक्ति निर्माण हो ।
इस तरह खुद को नया शक्ति घोषणा करनेवालों की जमात लम्बी है । लेकिन इनमें से कोई एक समूह ऐसा हो, जो नया शक्ति बन सकता है, यह तो अभी तक नहीं दिखाई देता है । नया शक्ति नामक पार्टी घोषणा करके अभियान में निकलने वाले डा. बाबुराम भट्टराई और उनकी हालात भी यही बताती है । तकरीबन ५ लाख सदस्य–संख्या इकठ्ठा कर पार्टी घोषणा किया गया है, ऐसा दावा करनेवाला नया शक्ति पार्टी की वास्तविक हालात हाल ही में सम्पन्न विद्यार्थी संगठन की निर्वाचन (जिसको राष्ट्रिय जनमत के लिए मिनी निर्वाचन भी कहा जाता है) में सामने आया है, जहाँ नया शक्ति ने एक भी सीट में जीत हासिल नहीं किया । प्रायः सभी कैम्पसों में नेकपा एमाले, नेपाली कांग्रेस और माओवादी केन्द्र निकट भातृ संगठनों ने अपना कब्जा जमा लिया । अपवाद के रूप में कुछ कैम्पस में अन्य राजनीतिक दल भी आए हैं, जो नगन्य हंै । इसीलिए नया शक्ति के नाम में प्रचार–बाजी जितनी भी हो रही है, डा. बाबुराम भट्टराई की ‘नया शक्ति पार्टी’ या कोई दूसरों की नयी पार्टी ही ‘नयी शक्ति’ के रूप में आगे आ पाएगी, इसकी कोई ग्यारेन्टी नहीं है ।
पूर्वप्रधानमन्त्री के नेतृत्व में राजनीतिक व्यक्तियों की सहभागिता में स्थापित नया शक्ति पार्टी की हालात तो इस तरह नाजुक है तो, रवीन्द्र मिश्र के नेतृत्व में स्थापित ‘साझा पार्टी’ तथा उज्ज्वल थापा के नेतृत्व में रहे ‘विवेकशील नेपाली दल’ जनस्तर से कैसे मत प्राप्त कर सकता है ? यह विचारणीय प्रश्न है । फेशबुक लगायत सामाजिक सञ्जाल और कुछ ऑनलाइन सञ्चार माध्यमाों में कुछ दिन बहस का विषय और पात्र बन कर नया शक्ति निर्माण नहीं हो सकता है, यह बात डा. भट्टराई की नया शक्ति पार्टी नेपाल के जरिए स्पष्ट हो चुका है ।
अपने को नयाँ शक्ति दावा करनेवाले प्रायः सभी ने कहा है– ‘नेपाल में अब पुरानी राजनीतिक दलों का सान्दर्भिकता खत्म हो चुका है, इन दलों से अब विकास और समृद्धि सम्भव नहीं है । नया शक्ति ही अब उसका नेतृत्व कर सकता है ।’ इस तरह कहा तो जाता है लेकिन जनमत (विद्यार्थी–चुनाव) की परिणाम पुरानी राजनीतिक शक्ति को ही मिलता है तो, कैसे बन सकता है नया शक्ति ? इसलिए अपने को नया शक्ति दावा करनेवाले व्यक्ति तथा समूह, खुद शक्ति हीन हो रहे हैं ।

 

 

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