व्यंग्य :पहले डाकु अब डाक्टर

पहले के डाकु अनपढ़ थे । अब के डाकु बकायदा डिग्री धारी हैं और अपनी यही डिग्री दिखा कर मरीजों को लूटते हैं ।

अब के आधुनिक डाकु यानी बड़े–बड़े डिग्री धारी डाक्टर अपने द्धारा किए गए दूसरे मरीजों का सफल इलाज ब्यौरा बता कर नएं मरीज का दिल जीतते हैं और मरीज भी डाक्टर को अनुभवी और बड़ा समझ कर उस के आगे हथियार डाल देते हैं

डाकु सीधा जा कर धनिमानियों के घर में लूटता है । गाँववाले डर कर अपने पास जो है पहले ही दे देते थे । पर आज के आधुनिक डाकु मरीजों के अस्पताल और क्लिनिक बिभिन्न रिपोर्ट और चेकअप के बहाने से लूटते ही हैं

मुस्कुरा कर लूटने की अदा तो कोई डाक्टर से सीखे भाई

बिम्मी शर्मा
पहले के जमाने मे डाकु चेहरे में नकाब लगा कर और घोड़े पर बैठ कर दूसरों के घर में लूटने और डाका डालने जाते थे । उन के हाथों मे बन्दुकें होती थीं । उस जमाने के डाकु अनपढ़ होते थे । अब वही डाकु आज के आधुनिक समय में डाक्टर बन गए हैं । यह आधुनिक डाकु अर्थात डाक्टर घोड़े की जगह कार चढ़ते हैं । बन्दूक की जगह सूई और स्टेथेस्कोप ले कर चलते हंै । यह नकाब की जगह चेहरे में मास्क लगाते हैं ताकि कोई इन्हें पहचान न लें ।20161141840294484
पहले के डाकु पुलिस के डर से छुप कर रहते थे या भूमिगत रहते थे । जब रात का अंधेरा और सन्नाटा चारों ओर पसरता था तब अपने ठिकाने से निकलते थे और धन्ना सेठ के यहां डाका डालने जाते थे । पर अब के जमाने डाकु के आधुनिक अवतार डाक्टर बड़े, बड़े क्लिनिक और अस्पताल खोल कर मरीजों को इलाज के बहाने वहां बुलाते हैं और लूटते हैं । इनकी पुलिस से पहले से ही सेटिगं रहती है । इसीलिए यह दिन के उजाले में ही अपने काले कारनाम छुपाते हुए काला चश्मा पहन कर काले शीशे मे बंद आलीशान गाड़ी में घूमते हैं ।
पहले के डाकु अनपढ़ थे । अब के डाकु बकायदा डिग्री धारी हैं और अपनी यही डिग्री दिखा कर मरीजों को लूटते हैं । पहले के डाकु से लोग इसीलिए डरते थे कि उनके कारनामे सुन कर वह कितनों को लूटने के बाद मार चुके हैं यह जान कर भयभीत रहते थे । और उनके इसी डर का पहले के डाकु भरपूर फायदा उठाते थे । अब के आधुनिक डाकु यानी बड़े–बड़े डिग्री धारी डाक्टर अपने द्धारा किए गए दूसरे मरीजों का सफल इलाज ब्यौरा बता कर नएं मरीज का दिल जीतते हैं और मरीज भी डाक्टर को अनुभवी और बड़ा समझ कर उस के आगे हथियार डाल देते हैं
तब डाक्टर अपने हथियार सूई, कैंची और छुरी से मरीज को लुटने में कोई कसर नहीं छोड़ता । मरीज को होश तो तब आता है जब ठीक होने के बाद लाखों रुपएं का बिल उन के सामने पेश किया जाता है । उस समय मरीज सोचता है कि आप्रेशन के टेबल में ही उसकी मौत हो जाती तो अच्छा होता । डाक्टर के क्लिनिक में जब कोई मरीज प्रवेश करता है तब उस को ईंसान नहीं पैसे की गड्डी समझा जाता है । भले ही वह मरीज कितना भी गरीब हो । गाँव के उस के थोड़े से खेत गिरवी रखवा कर या महाजन से मोटी सूद पर उधार लेने के लिए मजबुर कर के डाक्टर उस को खूब लूटता है ।
डाकु सीधा जा कर धनिमानियों के घर में लूटता है । गाँववाले डर कर अपने पास जो है पहले ही दे देते थे । पर आज के आधुनिक डाकु मरीजों के अस्पताल और क्लिनिक बिभिन्न रिपोर्ट और चेकअप के बहाने से लूटते ही हैं । उस के बाद जिन लैबो में यह एक्सरे, रक्त, पेसाब या अन्य शारीरिक व्याधियों का टेस्ट कराने भेजते हैं वहां से भी कमीशन वसूलते हैं । मरीज को आईसीयू जरुरी न हो पर अपने अस्पताल के फायदे के लिए डाक्टर उनको जबरदस्ती आईसीयू में भर्ती करवा देते हैं । मरीज और उन के अपनों के पाकेट पर जो नजर है इनकी जब तक उस को खाली नहीं करवा लेते चैन की सांस नहीं लेते । मरीज की मजबुरी या उस के आंसू से डाकुओं की तरह डाक्टर भी नहीं पिघलते ।
पचासों लाख खर्च कर के पहले डाक्टरी पढ़ते हैं । उस के बाद अपनी लगानी को वसूलने के लिए शादी में लड़की की तरफ से मोटी रकम दहेज में लेते हैं । और उसी पैसे से शहर में बढ़िया क्लिनिक खोल कर या अस्पताल में उस पैसे को लगानी कर के मरीजों को इलाज के बहाने से खूब लूटते हैं । मरीज बेचारा भी क्या करेगा ? भूखे शेर के सामने बकरी कितनी देर मिमियाएगी ? मरता क्या नहीं करता वाला मरीज अपने हाथ, पैर सब छोड़ देता हैं डाक्टर के सामने । अब डाक्टर बकरी का जिबह करने के लिए सूई और कैंची उठा कर लपक पड़ता है ।
सभी को डाक्टर बनना है, अच्छे नंबर से पास होना है और उस के बाद बड़े से मशहूर अस्पताल में काम करना है । नहीं तो अपना ही क्लिनिक खोल कर पैसा कमाना है । पढ़ाई मे पिद्दी है पर बाप के पैसे से खिला, पिला कर या नकली सर्टिफिकेट खरिद कर डाक्टरी की वैतर्णी पार कर के ही छोडेÞंगें । और इस वैतर्णी को पार करने में कितने लाख या करोड़ खर्च होगा कोई नहीं जानता । जब वैतर्णी जैसे, तैसे पार कर लेंगें तब इसे पार करने के पैसे को मरीजो से उगाहेंगें ।
सभी को अपनी जान प्यारी होती ही है । जब शरीर में बिमारी घर बना लेती है तब उस से निजात पाने के लिए इंसान सौ तरीके आजमाता है । कभी अस्पताल और डाक्टर का चक्कर तो कभी लैब टेस्ट, रिपोर्ट और दवाओं का चक्कर । बेचारा आदमी इस सब में घुन की तरह पिस जाता है । और थोड़े, बहुत बचत और लोन लिए हुए सभी पैसे इस बिमारी में स्वाहा हो जाता है । पर डाक्टर का दिल नहीं पसिजता । भले ही वह डाक्टर दिल का आप्रेशन कर के उस के अंदर का हाल जान लें ।
सभी शिक्षा और पेशा में डाक्टरी को उत्कृष्ट दर्जा हासिल है । मानव सेवा से जुड़ा यह पेशा सरकारी नौकरी या अस्पताल के भी गाँव देहात में जा कर भी अपना क्लिनिक खोल और चला सकते है । पर डाक्टर अपने पेशे को मानव सेवा में खर्च करने की बजाए पैसे कमाने की मशीन बनाने लगता है । अगर डाक्टर दक्ष, किसी रोग का विशेषज्ञ है तो वह इस पेशे को कामधेनू गाय बना कर दुहने लगता है । डाक्टर को लगता है कि जितना मिले लुट लेना चाहिए फिर मिले न मिले । मरीज की बिमारी, उस का ठीक होना न होना कोई मतलब नहीं और यदि ईलाज करते हुए मरीज स्वर्ग सिधार गया तब भी डाक्टर की चाँदी है । और मरीज ठीक हो कर तन्दुरुस्त हो कर घर चला जाए तब भी डाक्टर की डबल चाँदी हैं । मरजि के ठीक होने पर डाक्टर को जो वाहवाही मिलती है और सब तरफ उसका प्रचार होता है उस से डाक्टर को दुगूना फायदा होता है ।
तो देखा आपने । पुराने जमाने के डाकु अपना लिवास और हुलिया बदल कर पर तेवर और अंदाज उसी तरह का रख कर कैसे आधुनिक डाकु यानी डाक्टर बन गए हैं । पहले के डाकु पैसे न देने पर साहुकारों या गरीबों का गला काटते थे अभी के डाक्टर इलाज के बहाने मरीज के शरीर का हरेक हिस्सा बेहद चतुराई से काट लेते है । मुस्कुरा कर लूटने की अदा तो कोई डाक्टर से सीखे भाई । व्व्व्

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