व्यंग्य -मैला संविधान

वंही किसी महिला ने भारतीय या किसी अन्य विदेशी पुरुष से शादी कर लिया तो उसका पतिऔर होने वाला बच्चा दोनों को ही दोयम दर्जे का नागरिक मान कर अंगीकृत नागरिकता दी जाएगी । वाह रे देश

विडंबना की बात है जो महिला आज नेपाल में राष्ट्रपति के पद पर आसीन है उन्ही के दल नेकपा एमाले और स्वयं उनकी उपस्थिति मे महिलाओं के साथ संविधान में इतना भेदभाव हुआ । फिर भी वह चुप रही । महिला नेतृ होने के नाते उन्होने क्या किया ? मां के नाम से जब बच्चे को नागरिकता नहीं मिल सकती । जब कोई महिला अपनी पंसद के किसी विदेशी पुरुष से साथ शादी करते ही उसके बच्चे को अंगीकृत नागरिक मान लिया जाता है । मर्द किसी से भी शादी करे वह एक नंबर ही रहेगा पर औरत दो नंबरी हो जाएगी । हद है भइ ।

सिर्फ राष्ट्रपति और सभामुख में दो महिलाओं को चुन कर हात्ती के दांत दिखा दिए । पर क्या संविधान या इस देश के नेताओं को यह मालूम नहीं है कि खाने के दांत और ही होते है । खाने के दांत की जगह खाली है । पर सरकार सब से बढि़या संविधान का भजन कीर्तन में सभी को भुला रही है

 

बिम्मी शर्मा
आठ मार्च विश्वनारी दिवस है । दुनिया की आधी आवादी महिलाओं का है । नेपाल में भी पुरुषों से महिलाओं की संख्या ज्यादा है । पर अफसोस की बात इन्हीं महिलाओं के लिए जारी संविधान दोयम दर्जे का सावित हुआ है । इस संविधान ने महिलाओं को मैला बनाया है । महिला और पुरुष के बीच की समानता को मजाक बना कर रख दिया है इस संविधान ने । अगर नेपाल के पुरुष नागरिक किसी विदेशी महिला से शादी करे तो उसको तुरन्त नागरिकता दे कर प्रथम दर्जे की नागरिक माना जाएगा ।women-day-himalini

पर वंही किसी महिला ने भारतीय या किसी अन्य विदेशी पुरुष से शादी कर लिया तो उसका पतिऔर होने वाला बच्चा दोनों को ही दोयम दर्जे का नागरिक मान कर अंगीकृत नागरिकता दी जाएगी । वाह रे देश । वाह रे मैला संविधान ।
सौ साल पहले अमेरिका की सड़कों पर औरत और मर्द के बीच असमान पारिश्रमिक दरों को समान करने के लिए रोजालक्समवर्ग के नेतृत्व में वहां की औरतों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था । इन सौ साल के दरम्यान न अमेरिका में कोई महिला राष्ट्रपति ही बन पाई । न उनको पुरुषों की तरह समान काम के लिए समान पारिश्रमिक ही मिल पाया । स्थिति ज्यों की त्योेंं है । हां नेपाल में जरुर गणतंत्र आने के बाद एक महिला नें राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया । पर आम नेपाली महिलाओं की स्थिति में तो रत्ति भर फर्क नर्ही आया है ।

विडंबना की बात है जो महिला आज नेपाल में राष्ट्रपति के पद पर आसीन है उन्ही के दल नेकपा एमाले और स्वयं उनकी उपस्थिति मे महिलाओं के साथ संविधान में इतना भेदभाव हुआ । फिर भी वह चुप रही । महिला नेतृ होने के नाते उन्होने क्या किया ? मां के नाम से जब बच्चे को नागरिकता नहीं मिल सकती । जब कोई महिला अपनी पंसद के किसी विदेशी पुरुष से साथ शादी करते ही उसके बच्चे को अंगीकृत नागरिक मान लिया जाता है । मर्द किसी से भी शादी करे वह एक नंबर ही रहेगा पर औरत दो नंबरी हो जाएगी । हद है भइ । और यह सब होते हुए भी एक महिला राष्ट्रपति के पद पर विराजमान हंै और कुछ नहीं बोलती । क्या उनको इस पद पर बैठे रहना शोभा देता है । हां देता है क्योंकि यह पद उनको अपनी योग्यता के बलबुते पर नहीं किसी के नजदीक होने और सिफारिश के कारण मिला है ।
राष्ट्रपति ही क्यों सभामुख भी आरक्षण और सिफारिश के चलते ही इस पद पर आसीन है । शिक्षा और योग्यता तो गया तेल लेने, बस पार्टी और उनके नेताओं के पैरों मे तेल मालिस कर दिया बन गए राष्ट्रपति और सभामुख । आरक्षण और ३३ प्रतिशत महिला कोटा ने योग्य और प्रतिभाशाली महिलाओं को पीछे धकेल दिया है । बस जो राजनीति करते हंै और विभिन्न दल के नेताओं की कृपापात्र हैं उन्हीं महिलाओं को राष्ट्रपति, मंत्री और सभामुख बना दिया जाता है । यह नहीं देखा जाता कि उन्हें बोलने और बातों को समझने की तमीज कितनी है ?
महिलाओं को आगे लाने का मतलब यह नहीं कि निरक्षर अयोग्य महिलाओं को बड़ा पद दिया जाए । हमारे गाँव देहात में महिलाओं कि स्थिति खराब है । उनको शिक्षा, रोजगार और आत्मविश्वास दे कर आगे लाना जरुरी है । सरकार महिलाओं की शिक्षा में पहुंच के लिए उन्हें स्कूलऔर कलेज की शिक्षा मुफ्त करें । ताकि वह आगे चल कर योग्य नागरिक बन कर देश की जिम्मेवारी संभाले । पर हमारे देश मे तो महिलाओं को शिक्षा तो नहीं पर बचपन से ही राजनीति जरुर सिखाया जाता है । मधेश में महिलाओं को दहेज न लाने पर उन्हे सताया जाता है । शारीरिक यातना दी जाती है । गावं की बूढ़ी और अकेली औरत को डायन का आरोप लगा कर गाँव निकाला किया जाता है । महिला और किशोरियों को जहां कहीं भी रेप का शिकार होना पड़ता है ।
इस के लिए हमारे संविधान मे कड़े कानून बनाने के लिए निर्देशन नहीं दिया गया है । हां ०६३ साल के अंतरिम संविधान में महिलाओं को जो अधिकार दिया गया था उसको भी इस संविधान ने छी न लिया है । अंतरिक संविधान में माँ के नाम से नागरिकता देने का जो प्रावधान था वह भी इस संविधान ने छीन लिया । ९ महीने अपने गर्भ में रख कर पैदा किए हुए बच्चे को मां अपना नाम नहीं दे सकती, अपने नाम और पहचान के आधार पर उसको देश की नागरिकता नहीं दिला सकती । इस से बड़ी दुख की बात और क्या होगी । यह तो सरासर अन्याय है । एक रेप औरत के शरीर पर मर्द करता है । यह भी दूसरे प्रकार का एक मानसिक रेप है जो देश और संविधान ने महिलाओं के साथ किया है । आखिर सरकार हो या देश या संविधान बनाने वाले सभी में तो पुरुषवादी मानसिकता हावी है । जो औरत को अपनी तरह पहले दर्जे का नागरिक नहीं मानना चाहता ।
और नेपाल की जितनी भी महिला संगठन और महिलावादी हैं सब इस पर चुप्पी साध कर बैठ गए हैं । उन्हें इस में कोई भेदभाव क्यों नजर नहीं आता ? मां के नाम से नागरिकता मिलनी तो दूर उल्टे बच्चों को अंगीकृत नागरिक बना कर उन्हे हर सरकारी सुविधा और नौकरी से वंचित किया गया है । शायद इन महिलावादियों ने इस अन्याय को पहाड़ी चश्मे से देखा है । या तो वह डिभी चिठ्ठा के तहत ग्रिनकार्ड ले कर विदेश चली जाएगीं, या किसी स्थानीय युवा से शादी कर के सेटल हो जाएगी । पर किसी भारतीय या विदेशी से उनकी शादी की संभावना बहुत कम है । इसी लिए वह इस अन्याय को मधेश की महिलाओं का विषय मान कर चुप है । हिमाल हो, पहाड़ हो या मधेश आखिर हैं तो सभी इसी देश में पैदा हुई और पली बढीं महिलाएं । क्या एक का दुख और अन्याय दूसरे का दुख और अन्याय नहीं है ?
सिर्फ राष्ट्रपति और सभामुख में दो महिलाओं को चुन कर हात्ती के दांत दिखा दिए । पर क्या संविधान या इस देश के नेताओं को यह मालूम नहीं है कि खाने के दांत और ही होते है । खाने के दांत की जगह खाली है । पर सरकार सब से बढि़या संविधान का भजन कीर्तन में सभी को भुला रही है । यह संविधान मांँ के नाम से उस के बच्चों को नागरिकता देने के सवाल में हाथ खींंच कर औरत को सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन मान कर चल रही है । बच्चे पैदा करना ही औरत का काम है । पैदा होने के बाद उस बच्चे का क्या करना है यह औरत का पति या उस बच्चे का बाप तय करेगा । आखिर क्यों न हो यह मानसिकता संविधान में भी महिला सभासदों की सहमति या राय सलाह को परे खिसका कर चार दल कें सुप्रिमो यानी बाप और पति नाम के मर्दों ने इस को आनन फानन में जारी कर कें मुछों में ताव देने लगे । आखिर अपने घर का बच्चा समझ कर ही उन्होंने यह किया होगा एनेकपामाओवादी के सुप्रिमो कमरेड प्रचण्ड अपनी बहु और पोते को तो नकार रहे हैं । देश की बांकी महिलाओं का वह क्या मान रखेंगे ?
यह संविधान च्यूंगम की तरह है । च्यूंगम चबाते समय शुरुआत में मीठा लगता है । जब ज्यादा देर तक चबाते रहने पर न इस में मिठास रहता है, और ज्यादा चबाने से मुँह में तकलीफ भी होने लगती है । यह संविधान भी महिलाओं के लिए बेस्वाद का और मैला है । जिस संविधान में महिला अपने बच्चे को नागरिकता नहीं दिला सकती । जिस संविधान ने महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक मान लिया हो । वह संविधान तो महिलाओं के लिए मैला ही सावित हुआ न ?
वरसों पहले बिहार में पैदा हुए भारतीय उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु नें महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर “मैलाआंचल”उपन्यास लिखा था । कमोवेश महिलाओं की नेपाल में यही स्थिति है । इसीलिए महिला हक हित की विरोधी और महिलाओं के साथ भेदभाव और अन्याय करने वाले इस संविधान को गंदगी या मैल का ढेर मान कर “मैला संविधान” घोषित कर देना चाहिए । जो समाज और पुरुषवादी मानसिकता महिला को उसका अधिकार न दें वह समाज और संविधान महिलाओं के किस काम का ?और जो राष्ट्रपति महिला हो कर भी इस अन्याय के विरोध में नहीं बोलती है तो उनका महिला होने या न होने से देश की तमाम महिलाओं को क्या मिलेगा ?

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