व्रि्रोही सन्त कवि
रामहरि जोशी

Kabir Ke Dohe

कबीर दास का जन्म वि.सं. १४५५ को काशी में एक जुलाहा परिवार में हुआ था। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था, जिस समय हिन्दू समाज के भीतर अनेक रुढिÞग्रस्त सम्प्रदाय पनप रहे थे, जो उसकी जीवनी शक्ति को खोखला बना रहे थे। उस समय दिल्ली में अफगानिस्तान से आए मुसलमान लोदी वंश का शासन चल रहा था। इससे पहले भी अफगानिस्तान की ओर से अन्य जातियाँ शक, हूण, सिथियन आदिने उत्तरी भारत में लगभग ढर्Þाई तीन सौ वर्षों तक शासन किया था। उस समय भारत में हिन्दू और बौद्ध धर्म की प्रधानता थी। उस समय के हिन्दू समाज में धार्मिक कट्टरता नहीं थी। इसलिए उसने बाहर से आई इन जातियों को अपने में आत्मसात कर लिया। परन्तु दशवीं सदी में मुसलमानों के आगमन के समय हिन्दू समाज अपनी धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता के कारण मुसलमानों को जो स्वयं भी कट्टर इस्लाम धर्मावलम्बी थे, अपने में आत्मसात नहीं कर सका।

भारत में दो प्रकार के मुसलमान हमलावर आए। एक महमूद गजनी और गादी की तरह के जो सिर्फभारत की सम्पत्ति को लूटने के उद्देश्य से आए थे जो लूटपाट मचाकर फिर स्वदेश लौट गए। और दूसरे मुसलमान जैसे खिलजी, तुगलक और लोदी वंश के जो अपनी विजय पश्चात् भारत ही में बस गए थे। दो विभिन्न संस्कृति और धर्म के होने पर भी अब हिन्दू और मुसलमान दोनों को एक साथ मिलजुलकर रहना था। मिलजुलकर रहने के लिए इन में अपास में प्रेम और सौहादर््रता का होना अत्यावश्यक था। यह एक ऐतिहासिक आवश्यकता बन चुकी थी। परन्तु दोनों धर्मों की अपनी-अपनी धार्मिक कट्टरता और अन्धविश्वास इन दोनों के आपस में मिलजुल कर रहने में बाधक बन रहे थे।

इसलिए आवश्यकता एक ऐसे महापुरुष की थी, जो धार्मिक कट्टरता और अंधपरम्परा को मिटा कर इन दोनों सम्प्रदायों के बीच प्रेम और सौहादर््रता का वातावरण पैदा कर सके। ठीक ऐसे ही समय में कबीर का जन्म हुआ, जिसने इस आवश्यकता को पूरी करने की कोशिश की। कबीर दास ने हिन्दू और मुसलमान दोनों को उनकी धार्मिक कट्टरता और अन्धपरम्परा के लिए फटकारा और दोनों को प्रेम, दया और अहिंसा जैसे मानव धर्म के पथ पर चलने की सीख दी। सन्त कवियों में कबीर दास की अपनी एक अलग पहचान है। वे एक निर्गुणोपासक फक्कडÞ मिजाज के सन्त थे। उन्होंने ज्ञान की जो भी बातें कही वे सभी उनके अपने जीवन के अनुभव थे, किसी धर्मग्रन्थ पर आधारित नहीं। किताबी ज्ञान के बारे में वे कहते हैं-

पोथी पढ पढ जग मुआ पण्डित भया न कोय।

र्ढाई आखर प्रेम का पढे से पण्डित होय।

उन्होंने जीवन की सात्विकता पर जोड दिया और लोगों को सही तरह से जीने की प्रेरणा दी। कबीर ने फक्कडÞपन से अपनी सधुक्कडÞी भाषा में हिन्दू और मुसलमान दोनों सम्प्रदाय के ढोंगी पण्डितों और मुल्लाओं पर जैसा तीखा व्यंग्य किया, वैसा और किसी ने नहीं किया है। इसलिए दोनों धमोर्ं के ढोंगी पण्डित और मुसलमान मुल्ला इनसे चीढÞे रहते थे, जिन्होंने उन्हें मारने की भी धमकी दी थी। परन्तु फक्कडÞ सन्त कबीर कब इसकी परवाह करते। उलटे कबीर ने उन लोगों को कहा-

खुल खेलो संसार में बांधि न सक्के कोय।

जाको राखे साइयां मारि न सक्के कोय।

धार्मिक बाहृयाडम्बर और कर्मकाण्ड के ऊपर तीखा प्रहार करते हुए कबीर कहते हैं-

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पुजूं पहाड

ताते ये चक्की भली, पीस खाय संसार।

कांकर पाथर जोरि के, मस्जिद लई चुनाय,

ता चढ मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।

कबीर मानव मात्र की एकता पर जोड देते हैं और कहते है-

काशी काबा एक है, एकै राम रहीम

मैदा इक पकवान बहु, बैठ कबीरा जीम।

सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप

जाके हरिदे सांच है, ताके हरिदे आप !

इसलिए हम कबीर को एक ही साथ समाज सुधारक और मर्ूर्तिभंजक सन्त कह सकते हैं। आज की संसदीय प्रणाली में संसद में विरोधी दल का होना आवश्यक माना जाता है। विरोधी दल की इस आवश्यकता और उसके महत्व के बारे में कबीर दास आज से लगभग सात सौ वर्षपहले ही इन शब्दों में कह चुके थे-

निन्दक नियरे राखिए आंगन कुटि छवाय

बिन साबुन बिन तेल के निर्मल करे सुभाय।

आजकल स्कूल काँलेजों मे पढÞाया जाता है कि गरीबी और आर्थिक शोषण की वजह से देश में उसके विरुद्ध क्रान्ति की ज्वाला भडÞक उठती है। कबीर दास पढेÞ लिखे नहीं होने पर भी उनका संवेदनशील हृदय इस तथ्य को जान गया था। उन्होंने कहा-

दर्ुबल को न सताइए जा कि मोटी हाय,

बिना जीव की सांस से लौह भस्म हो जाय।

कबीर दास जन-जीवन के गायक रहे। इसलिए इनकी भाषा अत्न्यन्त सरल और सुबोध है। इसे सधुक्कडÞी भाषा भी कहते हैं। कबीर दास पर उपनिषद् और मुसलमानों के सूफी मत का भी गहरा प्रभाव पडÞा है। इसलिए जीवन और ब्रहृम सम्बन्धी इनके पद रहस्यवादी ढंग के हैं, जो कहीं कहीं अन्त्यन्त ही क्लिष्ट तथा दुरूह है, जैसे-

जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी।

फुटा कुम्भ जल जलहि समाना, यह तत कथ्यो गियानी।।

यहाँ कुम्भ के बाहर के जल को परमात्मा और भीतर के जल को आत्मा और कुम्भ अर्थात् घडेÞ को माया कहा गया है। जब कुम्भ फूट जाता है, यानी माया का पर्दा हट जाता है तो आत्मा और परमात्मा दोनों मिलकर फिर एक हो जाते हैं। आत्मा और परमात्मा एक ही शक्ति के दो रूप हैं, जिसे माया ने अलग कर रखा है। यह अद्वैतवाद है।

नेपाल तर्राई के कई गाँवों और काठमांडू में भी कबीर पंथियों के अनेक मठ हैं, जहाँ अभी भी लोग बडÞे चाव से कबीर के निर्गुण भजन गाते है।

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