शल्य की घेराबन्दी में कोइराला

shrimannarayanश्रीमन नारायण:महाभारत युद्ध में एक महत्वपर्ूण्ा पात्र थे, शल्य । पाण्डव के वे सहोदर मामा थे । दुर्योधन ने छल करके शल्य को कौरव पक्ष से लडÞने के लिए बाध्य बनाया था । परिस्थितिवश उन्हे दानवीर कर्ण्र्ााा सारथी बनना पडÞा । कर्ण्र्ााे जितने दिनों तक कौरव सेना का सेनापति बन कर युद्ध किया, उस अवसर में शल्य ने कर्ण्र्ााा मनोबल गिराने में कोई कसर बाँकी नहीं रखी । युद्ध में मनोवल बहुत बडी बात होती है । शल्य सारथी होकर कर्ण्र्ााे मनोवल को स्खलित करने के लिए अर्जुन की वीरता का हमेशा गुणगान करते थे । सम्भवतः उसी समय से ‘शल्य प्रवृत्ति’ शब्द का प्रयोग होने लगा ।
समकालीन नेपाली राजनीति में सुशील कोईराला कोर् इमानदारी पर्ूवक सहयोग करने के लिए अपनी पार्टर्ीीें कोई नेता नहीं मिल रहा है । कोईराला का तेजोबध करने के लिए अपनी ही पार्टर्ीीे लोग शल्य की भूमिका निर्वाह कर रहे हैं । उसी तरह गठबन्धन सरकार में सम्मिलित दल ने भी शल्य की भूमिका निर्वाह की है । इसलिए बारम्बार राजनीतिक वृत्त में उनके स्वास्थ्य की दुहाई देते हुए उनका इस्तीफा मांगा जाता है ।gh
प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला को कमजोर और असक्षम दिखा कर उन्हें पदत्याग करने के लिए बाध्य किया जा रहा है । जबकि कोईराला सत्ताधारी नेपाली कांग्रेस से संसदीय दल के नेता तो हैं ही, वे नेपाली कांग्रेस के सभापति भी हैं । जिसके चलते तत्काल उन्हें पार्टर्ीीे अन्दर से चुनौती की सम्भावना न्यून हैं । फिर भी तीन बार प्रधानमन्त्री हो चुके शेरबहादुर देउवा और प्रधानमन्त्री निर्वाचन में सत्रह बार पराजित रामचन्द्र पौडेल अपनी महती महत्वाकांक्षा के चलते प्रधानमन्त्री कोइराला को पार्टर्ीीे अन्दर से ही आवश्यक सहयोग नहीं मिल रहा है । उनके सहयोगी और सहकर्मी लोग भी उनको कमजोर और नाकारा सिद्ध करने में लगे हैं ।
सबसे विचित्र व्यवहार नेकपा एमाले के अध्यक्ष का है । सात-आठ महीना पहले नेपाली कांग्रेस को र्समर्थन करते हुए उसके नेतृत्व को स्वीकार कर गठबन्धन सरकार में सहभागी एमाले कम से कम एक वर्षतक जब तक संविधान नहीं बन जाता, इसी सरकार को र्समर्थन देने के लिए सहमत हुआ था । इस सरकार में नेकपा एमाले को उपप्रधान, गृह, परराष्ट्र और ऊर्जा जैसे आधा दर्जन से ज्यादा महत्वपर्ूण्ा मन्त्रालय प्राप्त हुए हैं । अपनी कार्यकुशलता दिखाने के लिए इस पार्टर्ीीो इतने मन्त्रालय काफी हैं । सबसे बडÞी बात, गृहमन्त्रालय इनकी जेब में है । देश की शान्ति सुरक्षा, इसी पार्टर्ीीे हाथ में हैं । एक चर्चित अपराधी जो खुद को डाँन कहने और सुनने में गौरव अनुभव करता था, और जिसने राजधानी और आसपास के जिलों में अपना आतंक फैलाया था, उसकी मृत्यु को लेकर एमाले ने संविधानसभा में सरकार का विरोध किया । अपनी ही पार्टर्ीीे नम्बर दो नेता देश के गृहमन्त्री हैं । ऐसी अवस्था में एमाले की ओर से ही अपराधी डाँन के बारे में प्रश्न उठाना किस दृष्टि से न्यायोचित था – या यह एमाले का  एक घटिया नाटक मात्र था –
दक्षिणी पडÞोसी भारत के बिहार और उत्तर प्रान्त मेर्ंर् इमानदार, सिद्धान्तनिष्ठ, व्यक्तियों को दर किनार कर अपराधियों को आगे बढÞाने की जो प्रवृत्ति दिखाई दी, उसका प्रतिफल आज वहाँ के अच्छे-अच्छे नेता खुद भुगत रहे हैं । मूल्य एवं मान्यता में आधारित राजनीति को कमजोर बनाने वाले व्यक्ति या तत्व यथार्थ में खुद के पैरों पर कुल्हाडÞी मारते हैं । नेकपा एमाले के नवें महाधिवेशन में पार्टर्ीीे वरिष्ठ नेता माधवकुमार नेपाल ने केपी शर्मा ओली को शारीरिक अस्वस्थता के बहाने अयोग्य उम्मीदवार करार दिया था । इस आरोप से आहत हुए ओली ने अनैतिक एवं अराजनैतिक आरोप मुझ पर लगाया गया, ऐसा कहते हुए नेपाल के आरोप का जोरदार खण्डन किया था । उन्ही ओली ने अपनी बीमारी का इलाज कर लौटने पर कैन्सर से पीडिÞत वयोवृद्ध नेता सुशील कोइराला पर रोगी होने का आरोप लगाते हुए पद त्याग के लिए दवाव तैयार किया । गठबन्धन सरकार में नहीं बैठना हो तो अपना र्समर्थन वापस लेकर प्रधानमन्त्री का विरोध करना चाहिए था । एक ओर गठबन्धन सरकार में बैठ कर लाभ भी लेंगे, दूसरी ओर उसी सरकार के प्रधानमन्त्री की आलोचना करेंगे, यह बात विरोधाभाषपर्ूण्ा और अनैतिक है । उसी तरह राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति का अनुमोदन सदन से होना चाहिए, ऐसी मांग करना भी असान्दर्भिक एवं असंवैधानिक है ।
गठबन्धन सरकार बनते वक्त असंभव सभी शतोर्ं को स्वीकार किया जाता है । असम्भव शर्त राजनीतिक दल के लिए सत्ता से भागने का उपयुक्त रास्ता बनता है । जिस तरह मधेशी दल वाले हमेशा कहते हैं- ‘मधेशी समस्या समाधान कराने के लिए सरकार में गए थे, समाधान की आशा में सरकार में टिके रहे और समाधान होने का लक्षण नहीं दिखाई दिया, इसलिए सरकार छोडÞ दिए ।’ ऐसा लंगडा तर्क दो दशकों से देश और मधेश की जनता सुनती आ रही है । फिर भी नेतागण ऐसे ही तर्क का सहरा लेते रहे हैं । वैसे तो बडÞे दल भी साफ सुथरे नहीं हैं । इन्हे हर बार सरकार में जाना ही चाहिए । जैसे मछली पानी के बगैर जिन्दा नहीं रहती, उसी तरह यह बडेÞ दल भी सरकार से बाहर होने पर बडÞी तकलीफ महसूस करते हैं ।
संविधान निर्माण, शान्ति, राज्यपर्ुनर्संरचना, सहमति और सहकार्य जैसे शब्द सुनते-सुनते नेपाली जनता थक चुकी है । एमाले, कांग्रेस, माओवादी सबांे ने सबों के नेतृत्व में काम किया है । सत्ता और पद के लिए ही सभी दलों मंे टूट-फूट और जूट होते रहता है । मधेशवादी दल से लेकर जनजाति, चुरे भावर से लेकर राष्ट्रीय पार्टर्ीीक की मानसिकता, संस्कार और कार्य पद्धति एक ही प्रकार की है । सम्भवतः यही मानसिकता हमारे देश और दल के नेतागण की संयुक्त पहचान है ।
इसका मतलब प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला ने अच्छा काम किया ही नहीं, ऐसी बात नहीं । प्रधानमन्त्री अस्वस्थ होने का अर्थ देश ही अस्वस्थ है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । देश चलाने का काम मूलतः व्युरोक्रेसी करती है । यद्यपि प्रधानमन्त्री कोईराला की कामकारवाही ‘ड्यासिङ’ नहीं दिखती, फिर भी वे प्रधानमन्त्री पद के लिए उपयुक्त नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । एक कहावत है- शर्माने वाली गणिका -वेश्या) सन्तोषी राजा और लालची ब्राहृमण का पतन होता है । हम लोगों के प्रधानमन्त्री सामान्य कामकाज से ही सन्तुष्ट दिखते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए । उनकी निष्त्रिmयता के कारण में उनका रोग ही प्रमुख तत्व है, ऐसा नहीं माना जा सकता । भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडू के र्सवाधिक लोकप्रिय मुख्यमन्त्री तथा चर्चित अभिनेता एमजी रामचन्द्रन वर्षोर्ं तक बिछावन में पडÞे रहे और मुख्यमन्त्री का कार्यभार भी सम्भालते रहे । उनके नेतृत्व की आलोचना कहीं नहीं हर्ुइ । अमेरिका के चर्चित लोकप्रिय सफल राष्ट्रपति प|mेंकलिन डिलोनो रुज्वेल्ट पक्षाघात के शिकार हुए थे । उनके दोनों पैर में वजनदार स्टिल राँड लगाया गया था । फिर भी वर्षों तक उन्होंने देश का शासन चलाया । इतना ही नहीं, दूसरे विश्वयुद्ध में वे हीरो साबित हुए और उन्होंने अमेरिका को विश्व में र्सवाधिक शक्तिशाली राष्ट्र बनाया । उन्हें पक्षाघात है और चलने में भी उनको कठिनाई है, इस बात की जानकारी बहुत बाद में लोगों को मिली । पडÞोसी भारत में केन्द्रीय सरकार में बार बार मन्त्री बने एस. जयसवाल रेड्डी हृविलचेयर की सहायत से चलते थे । लेकिन हरेक सरकार में वे प्रभावकारी मन्त्री साबित हुए । नेपाल में भी प्रधानमन्त्री बहुतेरे हुए लेकिन नेपाली जनता की ओर से जितनी प्रशंसा कृष्णप्रसाद भट्टर्राई के नेतृत्ववाली एक वषर्ीय अन्तरिम सरकार और मनमोहन अधिकारी के नेतृत्ववाली नौ महीने की एमाले सरकार को प्राप्त हर्ुइ, उतनी अन्य सरकार को प्रशंसा नहीं मिली । सरकार का मूल्यांकन जनहित में उसने कितना काम किया, उससे होता है । कर्ुर्सर्ीीें टिके रहने की अवधि से नहीं । इस समय प्रधानमन्त्री कोइराला को दृढ निश्चय के साथ सही मार्ग पर आगे बढÞते जाना चाहिए । उनसे भी बडÞी उमर के लोग नेपाल में प्रधानमन्त्री हुए हंै । यदि देश को सही दिशा प्रदान करने में वे अपने को सक्षम नहीं पाते, अपनी पार्टर्ीीे अन्दर से असहयोग मिल रहा है और गठबन्धन के सहयोगी दल भर्ीर् इमानदारीपर्ूवक सहयोग और र्समर्थन नहीं कर रहे हैं तो ऐसी ‘शल्य प्रवृत्ति’ वालों की भीडÞ में बैठे रहने से पद त्याग कर देना ही उचित होगा । एक शल्य के कारण महावीर कर्ण्र्ााैसे योद्धा को महाभारत में मुँह की खानी पडÞी तो बहुत सारे शल्य के घेरे में रहने वाले वयोवृद्ध कोइराला अपने को कैसे जीवित रख पाएंगे !

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