शहीदों के खू“ का असर देख लेना

डा. पुष्पज राय चमन: जीवन में हमे कई दिवस, पर्व और त्योहाराें से रुबरु होने का मौका मिलता हंै । कई त्योहार परम्परा का बोझ बनता प्रतीत होने लगता है तो कई श्रद्धा और जीवन्तता से अनुप्राणित परम्परा की मूल ऐषणा के आधारशिला पर मूल को टिकाए हुए अग्रगामी चेतना से अनुप्राणित सम्यक सामजिक विकास व्रmम के अजस्र प्रेरणा पूँज के रूप में स्थापित हो जाता है । शहीदों के बलिदान पर श्रद्धा सुमन अर्पण कर बलिदानी जीवन का संकल्प लेने का उत्सव है शहीद दिवस । हमारी परम्परा रही है जिसका जीवन ही नहीं जिसका मृत्यु वरण भी साहसिक और बलिदानी हो ऐसे पुरुष को महापुरुष के रूप में महिमा मण्डित कर आनेवाली भावी पीढ़ी के लिए उनकी अक्षुण्ण कीर्ति स्तम्भ की चराग की लौ जलती रहे अभिप्रेरित हो शहीद दिवस का आयोजन करते हैं । विश्व के मानचित्र में समादृत मधेश का बलिदानी पूर्ण इतिहास रहा है । भाषा, साहित्य दर्शन, अध्यात्म, विज्ञान के साथ साथ सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में किए गये युगान्तकारी परिवर्तन उसी बलिदानी पूर्ण जीवन का साक्ष्य है । मधेश ने बहुआयामिक क्षेत्र में अपनी कीर्ति पताका वैश्विक रूप में फहराकर कालजयी इतिहास स्थापना किया है प्राचीन वाङ्गमय, आधुनिक इतिहास जिसका साक्षी है । काल चव्रm गतिशील रहा और शायद प्रकृति का नियोजित यही इशारा रहा होगा मधेश की धरती ही नही वल्कि विरासत से प्राप्त तमाम अमूल्य धरोहर सम्पदा पर दानवी आव्रmमण कर धूल धुसरित करने का अनवरत श्रृखला जारी किया गया जो अभी तक बरकरार है । और कुछ ही दिन और बरकरार रहने का संकेत भी मिल रहा है । मधेश की पावन धरती सदियों से सुषुप्त मधेशी चेतना को पूर्णरुपेण आन्दोलित कर अग्रगामी वनाने हेतु वलिदान मांग रही है । मधेश की धरती तैयार है सिर्फ हम धरतीपुत्र तैयार हो जाय संसार की कोई भी शक्ति हमें अपना अधिकार और धरती से पृथक नही कर सकती है । हम वलिदान को आत्मसात कर ले स्वयं काल भी हमारा सहयात्री वन दिशा निर्देश करने हेतु विवश बन जाएगी । वलिदान का अर्थ सिर्फ शारीरिक रूप में जीवन को मृत्यु की मुँह में निगल जाने देना ही नही है अपितु हमारे पास जो भी बहुमूल्य और अमूल्य है उसे निःशर्त मातृभूमि पर न्योछावर कर देना चाहे वह तन–मन–धन प्रतिभा हो या पद प्रतिष्ठा आदि की आकांक्षा । बलिदान का इस मूल मंत्र से हमारे नेताओं और आन्दोलनरत सहयात्रियों का समागम होते ही मंजिल द्वार पर दस्तक देने स्वयं आ जाएगी । हमारे अगुवा नेता एवं कार्यकर्ता स्वयं आत्म चिन्तन करें क्या उनका जीवन और उद्देश्य बलिदानी सिद्धान्त से अनुप्राणित रहा है या अब भी है । रास्ता स्वयं मिल जाएगा और रास्ता मिल जाए तो मंजिल दूर नही रह जाती है क्योकि मंजिल रास्ते का ही दूसरा छोर होता है । यदि नेताओं को लगे उनका जीवन और उद्देश्य बलिदानी चिन्तन और सिद्धान्त से अनुप्राणित नही है, तो उनसे अनुरोध है आन्दोलन से विमुख हो उनका नेतृत्व करना छोड़ दे । क्योकि जिस मातृभूमि की आस्मिता की लड़ाइ है वह स्वयं उस नायक को खोज लेगी क्योकि मुक्ति सुनिश्चित है पात्र बनने का सौभाग्य उन्हीं को मिल सकता है जिन्हें मातृभूमि का आर्शिवाद हो । और यदि वे इन वलिदानपूर्ण सिद्धान्त से अनुप्राणित हंै तो समर में डटे रहं,े उन्हें वह सब मिलेगा जो गान्धी–मण्डेला सदृश नेताओं को मिला । देश की युगान्तकारी परिवर्तन की लड़ाई हो या मधेश की अस्मिता की लड़ाई मधेशी धरती पूत्र ने अपने बलिदान से सिंचित करने में कोई कसर नही बाँकी रखा है । दुर्गानन्द झा, रघुनाथ ठाकुर लगायत धरती पुत्र का उत्सर्ग वस्तुतः उसी स्वराज्य का आह्वान था जिनकी लड़ाई हम लड़ रहे हैं और हमारा भावी अभिष्ठ भी है । बलिदानी देने की श्रृखंला अनवरत रूप में जारी है । राज्य ने उन वीर महापुरुषों के साथ आतंककारी सदृश व्यवहार किया तो हमारे नेता और समाज के अगुवा कहलाने वाले ने भी इन्हे एक पत्थर की प्रतिमा समझ कर्मकाण्डी श्रद्धा के अतिरिक्त कुछ भी दे पाने में समर्थ नही रहा । कारण यही है की मधेश की चेतना को आन्दोलित होने में इतनी देर लगी । एक भगत सिंह, रामप्रसाद विस्मिल की कुर्वानी करोड़ों भारतीय चेतना को आन्दोलित कर दी तो क्या हमारी शहीदों की शहादत हजारों चेतना को आन्दोलित कर पाने में सक्षम नही है ? नही है तो वह कमजोरी उन शहीदों की नही है बल्कि हमारे नेताओं की है मानना ही पडेÞगा । मधेश का यह संग्राम वस्तुतः एक महावलिदानी महायज्ञ है । इस में अपनी क्षमता अनुसार की शक्ति, साधन और श्रोत को अर्पण कर जीवन को सौभाग्यशाली वनाया जा सकता है । जैसे श्रीराम के सेतु–बन्ध कार्य में गिलहरी ने अपनी क्षमता अनुसार कार्य कर सेतुवन्ध निर्माणकर्ताओं का अमर सौभाग्य प्राप्त किया था उसी तरह हम भी अमर इतिहास एवं सौभाग्य का संवाहक बन सकते हैं । यही मातृभूमि का आह्वान एवं खुल्ला आमन्त्रण भी है । शहीदों का वलिदान कभी बेकार नहीं जाता । खून के हरेक कतरे में पुरानी शक्ति और सत्ता का अवसान और नवीन शक्ति और सत्ता का आरोहण की सूक्ष्म प्रकृया उन्मुख होती रहती है । वलिदान बिना सम्यक विकास व्रmम की और कदापि अग्रसरित नही हुवा जा सकता है जैसे दीप की बाती अपने को जलाकर ही अपने अस्तित्व को ज्योति में रुपान्तरित कर अहोभाग्य का श्रेय पाती है, बीज अपनी क्षुद्र अस्तित्व को न्योछावर कर विराट अस्तित्व को पाती है वह भी पुष्प, फल, सौन्दर्य और सुवास के साथ । ऐसे ही शहीदों का स्वप्न उचित समय आने पर साकार रूप में उभरता है । अन्त में रामप्रसाद विस्मिल की यह पक्ति रखना सान्दर्भिक समझता हूँ

– शहीदों के खुं का असर देख लेना मिटा देंगे जालिम का घर देख लेना
किसी के इशारे के हम मुंतजिर है बहा देंगे खूँ का नहर देख लेना
जो नक्श हमने खीचा है खूने जिगर से वो होगा कभी बारवर (सफल) देख लेना

loading...