शिक्षक एवं विद्यार्थी के जीवन से खिलवाड किसी भी व्यक्ति, समाज या देश की पहचान उसकी शैक्षिक स्थिति से होती है। आज हम २१वीं शताब्दी में तो आ गए है, पर हमारी अध्ययन-अध्यापन परम्परा पुरानी ही है। अभी भी हम पारम्परिक घटिया चाँक से लिखने से आगे नहीं जा सके हैं। नेपाली शिक्षण पद्धति परम्परागत
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शिक्षक एवं विद्यार्थी के जीवन से खिलवाड

शिक्षक एवं विद्यार्थी के जीवन से खिलवाड किसी भी व्यक्ति, समाज या देश की पहचान उसकी शैक्षिक स्थिति से होती है। आज हम २१वीं शताब्दी में तो आ गए है, पर हमारी अध्ययन-अध्यापन परम्परा पुरानी ही है। अभी भी हम पारम्परिक घटिया चाँक से लिखने से आगे नहीं जा सके हैं। नेपाली शिक्षण पद्धति परम्परागत शैली को अपनाने में राज्यपक्षीय नीति ही जिम्मेवार है। नवीनतम शिक्षण पद्धतिजन्य विकास क्रम को न अपनाने में सम्बन्धित पक्ष ही प्रमुख दोषी है। शिक्षक एवं विद्यार्थी दोनो ही गाडÞी के दो पहिये हैं। इस यथार्थ को हम उपेक्षा नहीं कर सकते है। शिक्षण पद्धति के रुप में प्रयुक्त लेखन सामग्री भी शिक्षक-विद्यार्थी दोनो के स्वास्थ्य में नकारात्मक प्रभाव पडÞता है। लेकिन इस सम्वेदनशील विषय में किसी का ध्यान नहीं जा पाया है। जहाँ शिक्षा के सम्बन्ध में बातें होती हैं, वहाँ इसके विषय में भी बातें भी उठनी चाहिए। पर दुःख की बात है कि स्वास्थ्य से सम्बन्धित सम्वेदनशील विषय भी प्रमुख स्थान नहीं पा सका है। विद्यालय में परम्परागत लेखन सामग्री के कारण ही सभी कक्षाओं का वातावरण प्रभावित नहीं हुआ है अपुति वैकल्पिक रुप में प्रयुक्त हानिकरण बोर्ड एवं मार्करों से कई गुणा आन्तरिक वातावरण प्रभावित हो रहा है। प्रदूषित खान-पान, रहन-सहन्, धूल एवं धूँआजन्य प्रदूषण से होने वाली हानि में अन्तर यह है कि विद्यालय में प्रयुक्त होनी वाली लेखन सामग्रियों के कारण हजारों शिक्षक और विद्यार्थीगण अनपेक्षित रुप में रोगग्रस्त हो रहे हैं। लेख्य सामग्रियों से उत्पन्न धूल एवं कक्षा में पडÞनेवाली नकरात्मक प्रभाव के बारे में शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावकगण सब के सब अनभिज्ञ है। आज के अभिावकगण तो केवल अपने-अपने बच्चे को विज्ञापन पर आधारित बहुचर्चित महंगे विद्यालयों में नामांकन कराने की केवल चिन्ता होती है। विज्ञापित विद्यालयों में अपने-अपने बच्चों को नामांकन करा कर चिन्तामुक्त हो जाते हैं। उन्हें फिर बच्चों की पढर्Þाई कैसे हो रही है – विज्ञापित विद्यालय आर्थिक रुप में हमारी जेब कैसे काटते है – तथा विद्यालय में प्रयुक्त लेखन सामग्रियों से हमारे बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पडÞ रहा है या नहीं – इन सबके बारे में उन्हें सोचने का फर्ुसद और सही जानकारी ही नहीं है। शिक्षा माफिया के रुप में विद्यालय व्यवस्था गुणस्तरहीन चाँक एवं मार्कर शिक्षकों और विद्याथियों के स्वास्थ्य से खिलवाडÞ तो कर रही है, अभिभावकों से जोक की तरह पैसा चूस रहें है। इस ओर न सरकार और न अभिभावक ही ध्यान दे रहा है। इसका पूरा पूरा लाभ विद्यालयीय व्यवस्थापक लोग ले रहे हैं। २१वीं शताब्दी के अन्तर्रर्ाा्रीय स्तरयुक्त प्रविधियों एवं शिक्षण पद्धतियों को अपनाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो ता हमें शिक्षक एवं विद्यार्थियों के स्वास्थ्य अनुरुप वैज्ञानिक और अन्तर्रर्ाा्रीय स्वास्थ्य मापदण्ड अनुसार चाँक का प्रयोग करना चाहिए। चाँक का धूल अल्पमात्रा में आंशिक हानिकारक ही है, पर दर्ीघकालिक प्रयोग से शिक्षक एवं विद्यार्थियों के फेफडेÞ और श्वास नली में एक मोटी तह धुल की जम जाती है। जिससे शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को श्वास-प्रश्वासजन्य रोग तथा अन्य प्रकार की छोटी-बडÞी रोगजन्य समस्याएँ दिखाई देने लगती है। चाँक से भी बढÞकर हानिकारक बोर्ड-मार्कर है। मार्कर हानिकारक रसायनिक कण सीधे हवा में घुलमिल जाता है, जो दिखता तो नहीं है पर ऐसा अदृश्य रसायनिक कण मानव शरीर में क्यान्सर सेल को बढÞा देता है। इससे होने वाले असर के कारण आँखे दुखने, आँखोंसे पानी आने, सिरका दर्द होने, चक्कर आने जैसा दृष्प्रभाव पडÞने लगता है। इस बात की पुष्टि डिएफसी नेपाल ने काठमांडौं के निजी तथा सरकारी विद्यालयों में किए गए अध्ययन से किया है। अतः शिक्षा क्षेत्र से सम्बन्धित सभी निकायों और वर्गर्ाे को जागरुक होकर अपनी भलाई की ओर आगे बढना आवश्यक है। हानिकारक चाक एवं बोर्ड-मार्कर के प्रयोग से उत्पन्न समस्याजन्य एक अध्ययनः चाँक एवं बोर्डर्माकर के प्रयोग से शिक्षक, विद्यार्थी ही नहीं दुष्प्रभावित होता हैप, अपितु कक्षास्थित वातावरण तथा फर्निचर भी दुष्प्रभावित होता है। कक्षा में शिक्षक-विद्यार्थी द्वारा ग्रहीत चाँक- धूल या रासायनिक कण इन के फेफडÞो में जमा होते जाते और नकारात्मक प्रभाव शरीर में होने लगता है। विगत में चिकित्सकों को ऐसे रोगियों का उपचार करना पडÞा, जो पेशागत दृष्टि से शिक्षक थे। इन शिक्षकों की मुख्य समसया श्वास-प्रश्वासजन्य समस्या, दमा, चर्मरोग, गलेका रोग तथा एलर्जीजन्य समस्याएँ तथ्यांकों से साबित हुआ है। तथ्याङ्का अनुसार इन रोगों का मुख्य कारण चाँक एवं हानिकारक मार्कर है। यह समस्या आज की नहीं बहुत पुरानी है। शिक्षक-विद्यार्थी वर्ग इन समस्याओं से लम्बे समय से दुष्प्रभावित होते आ रहे हैं। शिक्षकों एवं विद्यार्थियों में नेत्रजन्य समस्या अधिक होती है। इसका मुख्य कारण चाँक-धुल, मार्कर है। कई शिक्षकों की अवस्था इतनी तक जा पहुँची है कि उन्हें इस पेशा से अलग होना पडÞता है। जो इस पेशा में लगे है, उन्हें चिकित्सकों से हिदायत मिली है कि आप कम बोलें, चाँक प्रयोग नहीं करे, मास्क लगाएँ आदि। इतना हानेे पर भी विद्यालय व्यवस्थापक, प्रिन्सिपल तथा समाज शिक्षकों को हेय दृष्टि से देखता है। क्या यह उचित है – परम्परागत चाँक सामाजिक ब्लिचिंग एवं चाँक को सफेद बनाने के लिये प्रयुक्त छोटेनिंग पाउडर स्वास्थ्य के लिए विशेष हानिकारक है। लम्बे समय तक चाँक तथा मार्कर के प्रयोग से एवं विद्यार्थियों के कलेजा, फेफडÞा, गलें आदि दर्ीघकालीन रोग से ग्रस्त हो जाता है। अस्पताल में खाँसी, दमा, श्वास प्रश्वास, चर्मरोग तथा एलर्जी जन्य रोगों से ग्रस्त रोगियों में शिक्षण पेशा में ही संलग्न ९५ प्रतिशत व्यक्ति होते हैंप, ऐसे पुष्टि तथ्यांक ने किया है। अतः शिक्षण पेशा को यदि रोगमुक्त कराना है तो चाँक-मार्कर प्रयोग को प्रतिबन्धित करते हुए नवीनतम प्रविधियों को अपनाने की जरुरत है। कुछ जानकारियाँ अस्वस्थ वातावरण के कारण विद्यार्थियों का ध्यान विकषिर्त हो पर्ढाई में नकारात्मक असर पडÞता है। क) अस्वस्थ वातावरण के कारण विद्यार्थियों का ध्यान विकषिर्त हो पढर्Þाई में नकारात्मक असर पडÞता है। ख) दमा, एलर्जी जैसे रोग से प्रभावित हो विद्यार्थी वर्ग की स्थिति और अधिक नाजुक हो जाती है। ग) रोगग्रस्त विद्यार्थियों की संख्या बढÞ जाती है, कक्षा में विद्यार्थी उपस्थिति न्यून हो जाती है और विद्यार्थियों को महत्व पर्ूण्ा पाठ छूट जाता है। घ) शिक्षकों की कार्यक्षमता एवं कार्य कुशलता में ह्रास आने लगता है। सावधानः चाँक का धूल एवं र्माकर का हानिकारक रसायन तो शिक्षक और विद्यार्थी वर्ग स्वास्थय सम्बन्धी मुख्य स्रोत तो है ही। कभी कभी किसी किसी विद्यालय में प्रोजेक्टर का प्रयोग करके दिखाया जाता है। पर हमेशा नहींं कही विद्यालय तो आर्थिक स्रोत के अभावमें इस सुविधा से बञ्चित है। अतः ब्लैकबोर्ड एवं हृवाइटबोर्ड के स्थान पर हरे बोर्डका प्रयोग वैकल्पिक रुप में होने लगा है। यह एक कक्षा सुधार के लिए नवीनतम प्रणाली है। वैकल्पिक में आए वातावरण मैत्री युक्त चाँक कलम एवं हरे बोर्ड के हरेक कक्षा में पहुँचाना जरुरी है। इस दिशा में शिक्षा मन्त्रालय, शिक्षा भिाग, प्याब्सन, एन प्याब्सन, शैक्षिक संस्था और शैक्षिक संघ-संगठन के साथ ही अभिभावक वर्ग की ओर से पहल होना आवश्यक है। ±±±

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