शिक्षा क्षेत्र में आए भूकंप से उबर पाएगा देश ?

मुक्तिनाथ शाह
महाभूकंप और मधेश आन्दोलन के प्रभाव से देश अभी तक उबर नहीं पाया है । भूकंप पीड़ितों को अभी तक न तो राहत पहुँचायी जा सकी है न ही उचित व्यवस्थापन किया जा सका है । वर्तमान अवस्था में देश का हरेक क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित है । राजनीतिक संकट बरकरार है । इस अवस्था मे शिक्षा ऐन का आठवाँ संशोधन विधेयक व्यवस्थापिका संसद द्वारा सर्व सम्मति से पारित किया गया है और प्रमाणीकरण के क्रम में है । यह संशोधित विधेयक और एसएलसी परीक्षा का परीक्षाफल लेटर ग्रेडिङ मे प्रकाशित होना देश की शिक्षा क्षेत्र में भूकंप ला दिया है कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी । क्योंकि सरकार बिना किसी गृहकार्य को किए पूरी शैक्षिक संरचना को बदलने वाली विधेयक को पास किया है । यदि इसको उचित समय पर सही तरीके से व्वस्थापन और कार्यान्वयन नही किया गया तो भयंकर नाकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला है । शिक्षा बहुत ही संबेदनशील क्षेत्र होता है और इसका प्रभाव कई पीढ़ियों तक पड़ता है । Slc
संशोधित विधेयक के प्रावधान अनुसार अब देश में सिर्फ दो तह की शिक्षा प्रणाली रहेगी । एक विधालय शिक्षा और दूसरी उच्च शिक्षा । विधालय शिक्षा में भी १ से ८ तक की आधारभूत शिक्षा और ९ से १२ तक की माध्यमिक शिक्षा । कहने का तात्पर्य है कि वर्तमान मे चल रही उच्च माध्यमिक शिक्षा अब माध्यमिक शिक्षा में परिणत हो जाएगी । वास्तव में कहा जाए तो इस व्यवस्था ने शिक्षा क्षेत्र मे भूकंप ला दिया है । भूकंप इस मायने में कि यह नयी व्यवस्था देश की मौजुदा शैक्षिक संरचना को ही पूर्ण रूपेण बदलने वाली है जिस से विधार्थी, अभिवावक, सामुदायिक विधालय, निजी विधालय और सभी सरोकार वाले बुरी तरह प्रभावित होने वाले हैं । इस व्यवस्था का अच्छा परिणाम भले ही दूरगामी हो पर तत्काल विकराल समस्या विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने वाली है । शिक्षा विधेयक को पूर्ण रूपेण लागु करना सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती साबित होगी । वह इसलिए की वर्तमान अवस्था मे संचालन में रहे सम्पूर्ण विधालय चाहे सामुदायिक हो या निजी, सभी को माध्यमिक शिक्षा अन्तर्गत ११–१२ खोलनी होगी अन्यथा आधारभूत शिक्षा अन्तर्गत १से ८ तक में सीमित होना पड़ेगा । मान लिया जाए की १० तक चलने वाली सम्पूर्ण सामुदायिक और निजी विधालय ११–१२ संचालन करती है, तो उसके लिए उस को सभी विषय–विज्ञान, व्यवस्थापन, मानविकी और शिक्षा संचालन करनी होगी । तब कहीं जाकर सम्पूर्ण विधार्थी को रोका जा सकता है नहीं तो ८ के बाद ही विद्ययार्थी पलायन हो जाएगा । अब प्रश्न उठता है कि क्या सम्पूर्ण सामुदायिक और निजी विधालय सभी चारो विषय के साथ ११–१२ संचालन करने मे सक्षम हो पाएगा ? मौजुदा जनशक्ति से ११–१२ की कक्षा चल पाएगी ? वर्तमान अवस्था में तो सरकार प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विज्ञान विषय नही खोल पायी है न ही शिक्षक की व्यवस्था कर पायी है । वैसे भी सामुदायिक विधालय की शैक्षिक अवस्था और एक दो अपवाद को छोड़कर उसके उत्पादन के गुणस्तर के बारे में शायद ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है । लाख कोशिशों के बावजूद सरकार सामुदायिक विधालयों की भौतिक और शैक्षिक अवस्था को उठाने मे नाकाम रही है । दूसरी तरफ निजी विधालय जो की सकारात्मक परिणाम देती आ रही है उसके लिए सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति नहीं है । उसकी भूमिका और सहभागिता के बारे में कोइ स्पष्ट सोच नहीं है सरकार के पास । क्या सिर्फ सामुदायिक विधालय के आधार पर देश की शिक्षा की गाड़ी आगे बढ़ सकती है ? विधेयक के प्रावधान के अनुसार गाँव के गरीब बच्चे माध्यमिक और उच्च शिक्षा हासिल करनें से वंचित हो सकते हैं । क्योंकि माध्यमिक शिक्षा का मतलब है ९ से १२, यदि किसी गाँव का विधालय किसी भी कारण से ११–१२ संचालन नहीं कर पाता है तो वहाँ क विद्ययार्थियों को या तो वहाँ से पलायन होना पड़ेगा या फिर आधारभूत शिक्षा यानी ८ तक की पढ़ाई में संतोष करना पड़ेगा । स्मरण रहे कि सम्पूर्ण विधार्थी किसी विधालय में तब ही रूक पाएगी जब वह विधालय चारो विषय –विज्ञान, व्यवस्थापन, मानविकी और शिक्षा एक साथ संचालन करेगी । यह शायद बहुत मुश्किल होगा खास कर निजी विधालयों के लिए । तब उनके लिए सिर्फ एक ही विकल्प रह जाएगा आधारभूत शिक्षा तक सीमित रहना ।
एक दूसरी जटिल और गंभीर समस्या है कि संशोधित विधेयक के कई प्रावधान संविधान के खिलाफ हंै । संविधान ने माध्यमिक तह तक निःशुल्क शिक्षा कहा है । नेपाल के संविधान के मौलिक हक अन्तर्गत धारा ३१ में शिक्षा सम्बन्धी हक को प्रत्याभूत किया गया है । इस धारा में कुछ इस तरह का प्रावधान है–
१. प्रत्येक नागरिक को राज्य द्वारा आधारभूत शिक्षा पाने का हक होगा ।
२. प्रत्येक नागरिक को राज्य द्वारा आधारभूत तह तक की शिक्षा अनिवार्य और निःशुल्क तथा माध्यमिक तह तक की शिक्षा निःशुल्क मिलने का हक होगा ।

संविधान के अनुसार सरकार को १२ तक की पढ़ाई को निःशुल्क और ८ तक कि पढ़ाई को निःशुल्क के साथ–साथ अनिवार्य भी करना होगा । कहने का मतलब अब किसी भी नागरिक को माध्यमिक तह तक की पढ़ाई मे एक पैसा खर्च नहीं लगेगा, पूर्णतः निःशुल्क होगा । इस अवस्था में निजी विधालयों का क्या होगा ? उसके व्यवस्थापन के लिए क्या गृह कार्य किया गया है ? यह एक गंभीर समस्या है । क्या “समान शिक्षा “लागु कर सकती है सरकार ? इस के लिए सरकार के पास क्या योजना है ? सामथ्र्य है ? यदि नही है, तो क्या अर्थ है ऐसी विधेयक की जो पूर्णतः लागु न हो सके । निजी शिक्षा में अब तक करोड़ों निवेश कर चुके संचालकों का क्या होगा ? इस कारण शिक्षा में निजी क्षेत्र की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए ।
एसएलसी परीक्षा की ८२ बर्ष के इतिहास मे पहली बार लेटर ग्रेडिङ प्रणाली मे परीक्षाफल प्रकाशित हुआ है । पर यह हड़बड़ी में लिया गया निर्णय जैसा लगता है । क्योंकि अब एसएलसी परीक्षा वोर्ड परीक्षा के रूप में नही होगी । अब सिर्फ १० से ११ में स्तरोन्नति होगी, तो क्या सिर्फ एक बर्ष के लिए ही यह प्रणाली जरूरी थी ? खैर किसी तरह लागु हो गया पर इस प्रणाली के बारे मे सूचना संप्रेशन के अभाव के कारण विद्यार्थी, अभिभावक, विधालय संचालक लगायत सभी वर्ग इस प्रणाली को समझ नहीं पा रहे है भ्रमित हैं । शिक्षाविदो के अनुसार इस प्रणाली से मात्र साज–सज्जा परिवर्तन हुआ है गुणस्तर में कोई परिर्वतन नहीं हुआ है । इस साल ५ लाख ८८ हजार १ सौ ५२ विद्यार्थी एसएलसी परीक्षा मे सम्मिलित हुए थे जिनमें १ लाख ८५ हजार ५ सौ ६४ विद्यार्थी ‘डी’ और ‘ई’ ग्रेड में है । इन ‘डी’ और ‘ई’ ग्रेड वालों विद्यार्थी –विज्ञान, व्यवस्थापन, मानविकी और शिक्षा लेकर ११ नही पढ़ सकते । इनके लिए इस बार सैद्धान्तिक शिक्षा का दरबाजा बंद है । इन के लिए अब सिर्फ दो विकल्प हैं । एक विकल्प है की सीटीईभीटी की प्राविधिक शिक्षा हासिल करे या दूसरे विकल्प के रूप में अगले वर्ष फिर से १० का परीक्षा दे । इन के लिए पहला विकल्प वाला रास्ता भी आसान नहीं है । क्योंकि वर्तमान अवस्था मे सीटीईभीटी के पास सिर्फ २४ हजार विद्यार्थियों को पढ़ाने की क्षमता है । यह १ लाख ८५ हजार ५ सौ ६४ डी और ई ग्रेड के विद्यार्थी कल के दिनों मे विकराल समस्या पैदा कर सकते हंै ।
समग्र मे कहा जाए तो शिक्षा ऐन के संशोधित विधेयक और इस बार के लेटर ग्रेडिङ प्रणाली नेपाल की शिक्षा क्षेत्र में एक प्रकार का भूकंप ला दिया है जिसकी यदि समय पर ही कुशल ढङ्ग से उचित व्यवस्थापन एंव कार्यान्यवयन नहीं किया गया तो भविष्य की कई पीढ़ी इस से प्रभावित होने की सम्भावना है ।
नोट ः आलेख प्रकाशित होने तक की जानकारी के अनुसार सरकार ने नई शिक्षा नीति में थोड़ी सुधार करते हुए अब ११ में दाखिला लेने के लिए सी की जगह डी प्लस की आवश्यकता बताई है ।

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