शिव पूजन में रखें इन १० बातों का विशेष ध्यान : आचार्य राधाकान्त शास्त्री

शिवपूजन के लिये निम्न बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिये नहीं तो शिव रूष्ट हो सकते हैं।
किसी भी देव पूजन में मनुष्य को स्नान आदि से शुद्ध तो होना ही पड़ता है, यदि सम्भव हो और कठिनाई न हो तो पूजा करने वाले को सिले हुए वस्त्र नहीं पहनना चाहिये। आसन शुद्ध होना चाहिये। पूजा के समय पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठना चाहिये। संकल्प किया जाना चाहिये।
1. भस्म, त्रिपुण्ड और रुद्राक्ष माला ये शिव पूजन के लिये विशेष सामग्री हैं जो पूजक के शरीर पर होनी चाहिये।
2. भगवान शंकर की पूजा में तिल का प्रयोग नहीं होना चाहिये और चम्पा का पुष्प नहीं चढ़ाना चाहिये।
3. शिव की पूजा में दूर्वा, तुलसी दल चढ़ाया जाता है, इसमें संदेह नहीं किया जाना चाहिये। अवश्य ही तुलसी की मंजिरियों से पूजा अधिक श्रेष्ठ मानी जाती है।
4. शंकर जी के लिये विशेष पत्र और पुष्प में बिल्व-पत्र प्रधान है किन्तु बिल्व पत्र में चक्र और बज्र नहीं होना चाहिये। बिल्व पत्र में कीड़ों के द्वारा बनाया हुआ जो सफेद चिह्न होता है उसे चक्र कहते हैं और बिल्व पत्र के डण्ठल की ओर जो थोड़ा सा मोटा भाग होता है वह बज्र कहलाता है।
5. आक का फूल और धतूरे का फूल भी शिव पूजा की विशेष सामग्री है, किन्तु सर्वश्रेष्ठ पुष्प है नील कमल का। इसके अभाव मे कोई भी कमल का फूल होना चाहिये।
6. कुमुदिनी पुष्प अथवा कमलिनी पुष्प का प्रयोग भी शिव पूजा में होता है।
7. भगवान शंकर के पूजन के समय करताल नहीं बजाया जाता।
8. शिव की परिक्रमा सम्पूर्ण नहीं की जाती। जिधर से चढ़ा हुआ जल निकलता है, उस नाली का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिये। वहां से प्रदक्षिणा उल्टी की जाती है।
9. शिव जी की पूजा में कुटज, नागकेसर, बन्धूक, मालती, चम्पा, चमेली, कुन्द, जूही, मौलीसेरी, रक्तजवा, मल्लिका, केतकी, केवड़ा आदि पुष्प नहीं चढ़ाने चाहिये।
10. दो शंख, दो चक्रशिला (गोमती चक्र), दो शिवलिंग, दो गणेश मूर्ति, दो सूर्य प्रतिमा और तीन दुर्गा जी की प्रतिमाओं का पूजन एक बार में नहीं करना चाहिये। इससे दुख की प्राप्ति होती है।
11. भगवान शंकर की आधी बार, विष्णु की चार बार, दुर्गा जी की एक बार, सूर्य की सात बार तथा गणेश जी की तीन बार परिक्रमा करनी चाहिये।
12. शिवजी को भांग का भोग अवश्य लगाना चाहिये। लोगों की यह धारणा है कि शिव जी को लगाया गया भोग भक्षण नहीं करना चाहिये, गलत है। केवल शिवलिंग को स्पर्श कराया गया भोग नहीं लेना चाहिये।
शिव पूजा साधना
साधक शिव साधना घर पर भी कर सकता है और मंदिर में त्रयोदशी को भी, जो प्रदोष कहलाती है, यह शिव प्रदोष व्रत है तथा प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी को ‘मास शिवरात्रि’ कही जाती है, इन दिनों में शिव साधना प्रारंभ की जा सकती है, सोमवार भी शिव का दिन है।
प्रात: स्नान कर अपने सामने दो ताम्र पात्र स्थापित करें, एक में शिव यंत्र तथा दूसरे में ‘स्वर्णग्रास युक्त पारदेश्वर शिवलिंग’ स्थापित करें। शिवलिंगों में भी पारदेश्वर शिवलिंग सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, जो कि पूर्ण सिद्ध संस्कारित हो।
प्रात: शुद्ध वस्त्र धारण कर, सर्वप्रथम स्थान शुद्धि, आसन शुद्धि कर शिव का ध्यान करें, उसके पश्चात आगे बताये गये शास्त्रोक्त विधान के अनुसार पूजन करें।
मनोकामना महादेव , मल्लिकार्जुन महादेव आप सपरिवार की रक्षा करें ,
आचार्य राधाकान्त शास्त्री
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